संतोष सुमन ने इस प्रस्ताव की पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि बिहार में एससी वर्ग के भीतर भी आर्थिक अंतर बहुत बड़े हैं, जहाँ कुछ उपजातियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के मामले में अत्यधिक पिछड़ी हैं, जबकि अन्य उपजातियाँ तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में हैं। पिछले पाँच वर्षों में सरकारी आँकड़ों ने दिखाया है
कि एससी के भीतर 30 % जनसंख्या ही मुख्य रूप से सरकारी नौकरियों और शिक्षा में पहुँच बना पाई है। इस असमानता को दूर करने के लिए उपवर्गीकरण की मांग कई सालों से चल रही थी, परंतु अब सरकार ने इसे अपने एजेंडा में प्रमुखता दी है।
वित्तीय वर्ष 2023‑24 के बजट दस्तावेज़ में भी एसएससी (सब‑सुपरवाइज़र) कोटा के पुनःआवंटन की सिफारिश की गई थी, जो इस नई नीति की नींव बन सकती है। पिछले साल बिहार में लागू किए गए “समान अवसर” योजना ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया था, परंतु वह केवल सतत् जागरूकता कार्यक्रमों तक सीमित रहा। इस संदर्भ में सुमन ने कहा कि
उपवर्गीकरण से न केवल शिक्षा और रोजगार में बल्कि स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में भी लाभ पहुँचाया जा सकेगा। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत 2025 तक सभी 27 उपजातियों को अलग‑अलग कोटा आवंटन किया जाएगा, जिससे प्रत्येक समूह को वास्तविक आवश्यकता के अनुसार संसाधन मिलें।
विभागीय दस्तावेज़ों के अनुसार, उपवर्गीकरण का मसौदा दो चरणों में तैयार किया जाएगा। पहला चरण मौजूदा कोटा में 15 % वृद्धि करेगा, जिससे कुल कोटा प्रतिशत 21 % से 24 % तक बढ़ेगा। दूसरा चरण में प्रत्येक उपजाति के सामाजिक-आर्थिक सूचकांकों (SES) के आधार पर कोटा का पुनः वितरण किया जाएगा। इस प्रक्रिया में सरकारी डेटा, जनगणना रिपोर्ट और सामाजिक सर्वेक्षणों का
उपयोग होगा। मंत्रालय ने कहा कि यह प्रक्रिया पारदर्शी रहेगी और सभी हितधारकों को सार्वजनिक परामर्श के माध्यम से शामिल किया जाएगा। इस योजना की लागत अनुमानित रूप से 1.8 अरब रुपये होगी, जिसमें प्रशासनिक खर्च और लाभार्थी समर्थन शामिल है।
इस प्रस्ताव पर विपक्षी दलों ने तीखा विरोध जताया। मुख्य विपक्षी पार्टी ने कहा कि यह कदम राजनीति का उपकरण है और इससे सामाजिक विभाजन बढ़ेगा। उन्होंने इस बात को उजागर किया कि उपवर्गीकरण से मौजूदा सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है और अन्य पिछड़े वर्गों को भी समान मांगों का अधिकार मिल सकता है, जिससे प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा।
कई सामाजिक संगठनों ने भी इस पहल पर सवाल उठाए, कुछ ने कहा कि कोटा को आर्थिक आधार पर पुनःपरिभाषित किया जाना चाहिए, न कि केवल जातीय आधार पर। इस बीच, कुछ एनजीओ और नागरिक अधिकार समूहों ने इस कदम की सराहना की, मानते हुए कि यह वास्तविक असमानताओं को दूर करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
बिहार सरकार ने इस विवाद के बीच भी योजना को आगे बढ़ाने की दृढ़ता दिखाई। मुख्यमंत्री ने एक सार्वजनिक सभा में कहा कि यह निर्णय “समाज के सभी वर्गों के हित में” किया गया है और इसे “जमीनी स्तर पर जांच” के बाद लागू किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि उपवर्गीकरण के बाद भी कुल कोटा में कोई कमी नहीं होगी, बल्कि यह अधिक समान वितरण को सुनिश्चित करेगा। इस बात को लेकर कई राजनैतिक विश्लेषकों ने कहा कि यह कदम मुख्यमंत्री की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है, और आगामी विधानसभा चुनावों में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों ने इस उपवर्गीकरण के संभावित प्रभावों का विश्लेषण किया। उन्होंने बताया कि यदि उपवर्गीकरण सफल रहता है तो यह राज्य की मानव पूँजी में वृद्धि कर सकता है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक विकास को प्रोत्साहन मिलेगा। विशेष रूप से, शैक्षिक स्तर में सुधार और रोजगार दर में वृद्धि से उपभोक्ता खर्च बढ़ेगा, जिससे राज्य की जीडीपी में सकारात्मक योगदान रहेगा।
हालांकि, उन्होंने चेतावनी दी कि यदि कार्यान्वयन में पारदर्शिता नहीं बनी रही, तो भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचार की संभावना बढ़ सकती है, जिससे नीतियों का लक्ष्य कमजोर हो सकता है। इस कारण उन्होंने सुझाव दिया कि स्वतंत्र निगरानी एजेंसी को स्थापित किया जाए।
Updated: October 7, 2026
The sub‑classification proposal seeks to align reservation quotas with intra‑SC socio‑economic disparities, aiming for more targeted resource distribution. Its implementation could affect access to education, employment and welfare benefits for multiple scheduled‑caste sub‑groups in Bihar.
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