सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में कई सरकारी रिपोर्टों, विशेषज्ञों के विश्लेषण और पर्यावरण समूहों के सबूतों को सम्मिलित किया। कोर्ट के दस्तावेज़ों में दिखाया गया कि गंगा के कुछ प्रमुख धारा क्षेत्रों में बायोकैमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) स्तर अनुमत सीमाओं से कई गुना अधिक है, जबकि कुल घुलनशील ठोस (TDS) भी खतरनाक स्तर पर पहुँच चुका है। इन आँकड़ों ने न्यायालय को गहन हस्तक्षेप की आवश्यकता महसूस करवाई।
सुनवाई के दौरान, उत्तर प्रदेश के जल और जल संसाधन विभाग ने बताया कि उन्होंने जल शोधन संयंत्रों का विस्तार किया है और औद्योगिक अपशिष्टों की निगरानी में सुधार किया है। बिहार सरकार ने भी समान रूप से बताया कि वह ग्रामीण जल निकायों में स्वच्छता अभियान को तेज़ कर रही है, तथा गंगा के प्रमुख प्रवाह क्षेत्रों में नई बायो‑रेमेडिएशन तकनीकें लागू कर रही है। दोनों राज्यों ने संयुक्त रूप से एक विशेष गंगा पुनरुद्धार निधि की घोषणा भी की।
इन दावों के बावजूद, अदालत ने कहा कि वर्तमान उपाय पर्याप्त नहीं हैं, क्योंकि कई परियोजनाओं की प्रगति में देरी और वित्तीय अनुपालन में खामियां दिखी हैं। कोर्ट ने उल्लेख किया कि पिछले पाँच वर्षों में गंगा सफाई के लिए आवंटित बजट का केवल लगभग 55 प्रतिशत ही वास्तविक रूप में खर्च हुआ, जबकि शेष राशि अनिर्दिष्ट खातों में फँसी हुई है। यह वित्तीय अनुशासन की कमी न्यायालय को अत्यंत चिंतित कर रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने दो प्रमुख बिंदुओं पर विशेष ध्यान देने का आदेश दिया। पहला, सभी औद्योगिक इकाइयों को जल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) के तहत सख्त मानक अपनाने और अनिवार्य रूप से पूर्व-उपचार (pretreatment) स्थापित करने की जरूरत है। दूसरा, कृषि क्षेत्र में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को नियंत्रित करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर की निगरानी प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए। इन उपायों को लागू न करने पर प्रतिवादात्मक कार्यवाही का प्रावधान रखा गया।
गंगा के पुनर्स्थापन पर केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्री ने कोर्ट की टिप्पणी को “राष्ट्र की जल सुरक्षा के प्रति एक स्पष्ट संदेश” बताया। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्य स्तर पर कार्यान्वयन को तेज़ करने के लिए विशेष तकनीकी सहायता और फंडिंग प्रदान करेगी, तथा एक राष्ट्रीय जल मानचित्र बनाकर सभी प्रदूषण स्रोतों की पहचान करेगी।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने जल शोधन परियोजनाओं में नवीनतम तकनीकों को अपनाया है और अगले दो वर्षों में गंगा के प्रमुख शहरों में जल शुद्धि दर को 70 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने राज्य के कई उद्योगपतियों के साथ मिलकर “ग्रीन इंडस्ट्री” पहल शुरू करने की भी घोषणा की, जिससे औद्योगिक अपशिष्ट की मात्रा में उल्लेखनीय कमी आएगी।
बिहार के मुख्यमंत्री ने राज्य के ग्रामीण जल निकायों में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए “गंगा बचाओ” अभियान को पुनर्जीवित करने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि स्थानीय पंचायतों को जल निगरानी समूहों के रूप में सशक्त किया जाएगा, जिससे प्रदूषण की शुरुआती चेतावनी प्राप्त हो सके। इस पहल के तहत जल परीक्षण किट्स का वितरण और शिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन किया जाएगा।
विरोधी पर्यावरण समूहों ने कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया
The Supreme Court’s warning turns the Ganga saga into a litmus test for India’s ability to enforce environmental law—if states can’t marshal the funds they already have, the whole national water agenda risks becoming a symbolic gesture.
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