विवेक भगत पर महिला पत्रकार द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जाँच 2023 के अंत में शुरू हुई थी। उस समय कई मीडिया संस्थाओं ने इस मामले को प्रमुखता से कवरेज किया, जिससे सार्वजनिक विमर्श में इस मुद्दे को व्यापक ध्यान मिला। आरोपों के बाद पुलिस ने प्रारम्भिक पूछताछ की, लेकिन तत्काल कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। इस बीच, कई नागरिक समूहों ने न्यायिक प्रक्रिया तेज़ करने और पीड़िता के अधिकारों की रक्षा का आग्रह किया।
दिल्ली पुलिस ने 2024 की शुरुआती महीनों में कई वरिष्ठ अधिकारियों के पदोन्नतियों की सूची जारी की, जिसमें विवेक भगत समेत 11 अन्य अधिकारियों को अतिरिक्त डीसीपी के पद पर नियुक्त किया गया। इस आदेश को एक आधिकारिक सरकारी विज्ञप्ति के माध्यम से सार्वजनिक किया गया, जिसमें पदोन्नतियों के कारणों का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया। यह घोषणा PTI के हवाले से सामने आई और विभिन्न समाचार चैनलों में तेज़ी से फैल गई।
पदोन्नति के बाद, कई सामाजिक संगठनों ने इस निर्णय की वैधता पर सवाल उठाए। पत्रकार संघ और महिला अधिकार समूहों ने त्वरित स्पष्टीकरण की मांग की, यह कहते हुए कि ऐसे संवेदनशील मामलों में प्रशासनिक निर्णयों को पारदर्शिता के साथ लेना आवश्यक है। विपक्षी दलों ने भी इस कदम को राजनीतिक दखल के रूप में लेबल किया, और सरकार पर न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप का आरोप लगाया।
पोलिस विभाग की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पदोन्नतियों का निर्णय सेवा नियमों और प्रदर्शन मूल्यांकन के आधार पर लिया गया है। विभाग ने यह भी कहा कि किसी भी प्रकार के अनुशासनात्मक मामले को उचित प्रक्रिया के तहत चलाया जा रहा है, और इस दौरान कोई भी आधिकारिक निर्णय प्रभावित नहीं होगा। इस बयान के साथ, विभाग ने यह स्पष्ट किया कि प्रमोशन का कोई संबंध यौन उत्पीड़न के आरोपों से नहीं है।
विवेक भगत के पक्ष में कई पुलिस अधिकारियों ने निजी तौर पर समर्थन जताया, यह कहते हुए कि वह एक अनुभवी अधिकारी हैं और उनके कार्यकाल में कई सफल ऑपरेशन हुए हैं। कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी कहा कि पदोन्नति का निर्णय उनके कुल प्रदर्शन और सेवा के वर्ष पर आधारित है, न कि व्यक्तिगत मामलों पर। इस तरह की बातें विभागीय आंतरिक संवाद में साझा की गईं, लेकिन सार्वजनिक रूप से इनका उल्लेख नहीं किया गया।
विरोधी राजनेताओं ने इस प्रमोशन को छेड़छाड़ का मिला इनाम कहा और तत्काल जांच की मांग की। उन्होंने कहा कि यदि कोई अधिकारी यौन उत्पीड़न के आरोपों का सामना कर रहा है, तो उसे सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई मिलनी चाहिए, न कि पदोन्नति। कुछ सांसदों ने संसद में इस मुद्दे को उठाया और पूछताछ के लिए एक समिति का प्रस्ताव रखा। विपक्षी दलों ने इस घटना को सरकार की न्यायसंगतता पर सवाल उठाने का अवसर माना।
कई नागरिक समूह और एनजीओ ने इस मुद्दे पर सार्वजनिक जागरूकता अभियानों की शुरुआत की। उन्होंने सोशल मीडिया पर #JusticeForJournalist हैशटैग के तहत विभिन्न पोस्ट और वीडियो साझा किए, जिससे जनता का ध्यान इस मुद्दे की ओर आकर्षित हुआ। इन अभियानों में यह भी कहा गया कि न्यायिक प्रक्रिया में लम्बी देरी से पीड़िता की मानसिक और सामाजिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है।
इस बीच, न्यायपालिका ने इस मामले की सुनवाई को तेज़ करने का आश्वासन दिया। उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश ने कहा कि यौन उत्पीड़न के आरोपों को गंभीरता से लिया जाएगा और कोई भी अनावश्यक विलंब नहीं होगा। उन्होंने यह भी कहा कि अगर कोई प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया में त्रुटि पाई गई तो उसे सुधारा जाएगा। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि न्याय की पहुँच सभी नागरिकों के लिए समान होनी चाहिए।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखे तो इस प्रकार की विवादित प्रमोशनें सार्वजनिक विश्वास को कमजोर कर सकती हैं, जिससे
Updated: October 5, 2026
The promotion raises questions about how disciplinary investigations intersect with personnel decisions in law‑enforcement agencies.
It also highlights demands for transparency and accountability in handling sensitive allegations.
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