सार्वजनिक स्क्रीनिंग पर सवाल खड़े हो गए हैं। कार्यक्रम के मुख्य आयोजक, केरल राज्य चैलाचित्र अकादमी के निदेशक ने कहा कि यह निर्णय फेस्टिवल के उद्देश्य—स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री निर्माण को प्रोत्साहित करने—के साथ असंगत है और इस पर तत्काल समाधान खोजा जाना आवश्यक है।
यह विवाद पिछले कुछ महीनों में विकसित हुआ, जब
कई स्वतंत्र फ़िल्म निर्माताओं ने अपने कार्यों को भारत के विभिन्न हिस्सों में सेंसर बोर्ड द्वारा प्रतिबंधित या संशोधित करने की शिकायतें दर्ज की थीं। इस प्रक्रिया में, फिल्म निर्माताओं ने अक्सर संवेदनशील सामाजिक, राजनीतिक या पर्यावरणीय मुद्दों को उजागर किया था, जो कुछ अधिकारियों द्वारा अनुचित माना गया। इस पृष्ठभूमि में,
IDSFFK का चयन 31 अनदेखी फ़िल्मों को प्रदर्शित करने के लिए किया गया था, जिससे फेस्टिवल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान मिलने की उम्मीद थी।
फेस्टिवल के आयोजन में केरल सरकार की सक्रिय भूमिका रही है, विशेषकर सांस्कृतिक मामलों के मंत्री ने कई बार कहा कि फ़िल्मों की स्क्रीनिंग को लेकर
कोई भी बाधा हटाने के लिए सभी कानूनी उपाय किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सेंसरशिप का मुद्दा केवल कलात्मक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक बहस का भी हिस्सा है। इस बीच, फ़िल्म निर्माताओं का समूह ने अपने आप को सेंसरशिप के खिलाफ संघर्ष के रूप में स्थापित किया और इस पर राष्ट्रीय तथा
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समर्थन प्राप्त करने के लिए विभिन्न मंचों का उपयोग किया।
उसी दिन, फेस्टिवल के उद्घाटन में प्रदर्शित हुई प्रमुख डॉक्यूमेंट्री पानी का संघर्ष को दर्शकों ने सराहा, परंतु इसके बाद के सत्रों में 31 प्रतिबंधित फ़िल्मों के बारे में प्रश्न उठे। फेस्टिवल के आयोजक ने बताया कि ये फ़िल्में
विभिन्न सामाजिक मुद्दों—जैसे जमीन अधिग्रहण, पर्यावरणीय क्षति, महिला अधिकार और नीतिगत भ्रष्टाचार—पर प्रकाश डालती हैं, और इनकी स्क्रीनिंग से दर्शकों को विविध दृष्टिकोण मिलेंगे।
सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने आधिकारिक बयान में कहा कि सेंसर बोर्ड ने इन फ़िल्मों को सामान्य सार्वजनिक नैतिक मानकों के विरुद्ध पाते हुए छूट नहीं दी है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी फ़िल्म को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने से पहले राष्ट्रीय स्तर पर उचित प्रमाणन आवश्यक है। इस कारण से, मंत्रालय ने इन 31 फ़िल्मों के लिए विशेष छूट देने से इनकार किया, जिससे फेस्टिवल में अनिश्चितता उत्पन्न हुई।
केरल के चैलाचित्र अकादमी ने इस
निर्णय को चुनौती देने के लिए कानूनी उपायों की घोषणा की। अकादमी ने बताया कि उन्होंने तुरंत ही एक विशेष न्यायालयीय याचिका दायर की है, जिसमें फ़िल्म निर्माताओं के अभिव्यक्ति अधिकार और कला की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने का आग्रह किया गया है। इसके अतिरिक्त, अकादमी ने कई उच्च न्यायालयों में पूर्वव्यापी
आदेशों की मांग भी की है, जिससे फेस्टिवल के दौरान इन फ़िल्मों को बिना प्रतिबंध के प्रदर्शित किया जा सके।
इसी बीच, सेंसरशिप को लेकर विभिन्न राजनैतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के केरल इकाई के प्रमुख ने कहा कि कलात्मक अभिव्यक्ति पर सेंसरशिप का दबाव लोकतंत्र के मूल
सिद्धांतों के विरुद्ध है, और उन्होंने सरकार से तुरंत कार्यवाही करने का आह्वान किया। वहीं, भाजपा के केरल नेता ने कहा कि सेंसर बोर्ड का कार्य सार्वजनिक हित को संरक्षित करना है, और उन्होंने मंत्रालय के निर्णय को समर्थन दिया। दोनों पक्षों के बीच इस मुद्दे पर तीखी बहस चल रही है।
फिल्म निर्माताओं की संघटित आवाज़ ने इस पर एक संयुक्त बयान जारी किया, जिसमें उन्होंने कहा कि स्वतंत्र डॉक्यूमेंट्री का अभाव हमारे समाज के सच को उजागर करने की क्षमता को कमजोर करता है। उन्होंने फेस्टिवल के मंच को संकट के समय में आवाज़ देने वाले मंच के रूप में वर्णित किया
और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों से समर्थन की मांग की। इस बीच, अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समुदाय से भी कई सन्देश आए, जिनमें IDSFFK को स्वतंत्र विचारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण मंच माना गया।
आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट हो रहे हैं। फेस्टिवल के प्रमुख प्रायोजकों ने कहा कि अगर ये फ़िल्में प्रदर्शित नहीं
हो पाईं तो दर्शकों की संख्या में गिरावट आएगी, जिससे टिकेट बिक्री, होटल बुकिंग और स्थानीय व्यापार पर नकारात्मक असर पड़ेगा। केरल पर्यटन विभाग ने इस मुद्दे को फेस्टिवल के आर्थिक लाभ को घटाने वाला माना और सरकार से तुरंत हस्तक्षेप की मांग की। इस प्रकार, सांस्कृतिक स्वतंत्र
Updated: September 25, 2026
Insight: The censorship showdown transforms IDSFFK from a showcase of daring documentaries into a litmus test for India’s claim to democratic openness, exposing how cultural policy can become a battlefield for political legitimacy.
If the court forces the screenings, the festival could spark a ripple effect, compelling other regional arts events to challenge similar
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