वितरकों को कम कीमत पर बेचा। इस प्रक्रिया में उन्होंने कई अमेरिकी फार्मास्यूटिकल कंपनियों और स्वास्थ्य सेवा संस्थानों को धोखा दिया, जिससे हजारों रोगियों को संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का सामना करना पड़ा। इस मामले को अमेरिकी अधिकारियों ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा कहा।
ओज़ेम्पिक, जो ग्लाइसेमिक नियंत्रण के लिए
विश्वभर में अत्यधिक मांग में है, पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ रोगियों की संख्या में वृद्धि के कारण कई देशों में भारी कीमत वृद्धि देखी गई है। इस दवा की आपूर्ति में अंतराल के कारण, बाजार में नकली उत्पादों की भरमार बढ़ी। भारतीय दवा उद्योग की निर्यात क्षमता और चीन के उत्पादन नेटवर्क ने
इस तस्करी को सुविधाजनक बनाया। अमेरिकी न्याय विभाग के अनुसार, इस तस्करी योजना में कई मध्यस्थ और लॉजिस्टिक कंपनियों ने सहयोग किया, जिससे नकली उत्पादों को अमेरिकी सीमा तक पहुँचाया गया।
स्वप्नदीप राय और विकी रामंचा दोनों ही भारतीय नागरिक हैं, जिनका व्यवसायिक पृष्ठभूमि फार्मास्यूटिकल आयात-निर्यात में रहा है। जांच में पता चला
कि उन्होंने चीन के एक अज्ञात निर्मातावाला से सीधे संपर्क किया, जहाँ से उन्होंने उच्च-गुणवत्ता के नकली ओज़ेम्पिक की बड़ी मात्रा खरीदी। इन उत्पादों को फिर वे अमेरिकन वितरकों को आकर्षक मूल्य पर पेश करते थे, जिससे अमेरिकी खरीदारों को असली दवा के बजाय नकली दवा मिलती थी। इस योजना के तहत लगभग 15,000
डोज़ नकली दवा का अमेरिकी बाजार में प्रवेश किया, जिससे कई रोगियों की दवा उपचार में बाधा उत्पन्न हुई।
जांच के दौरान, अमेरिकी सीमा सुरक्षा एजेंसियों ने कई बार सीमा पार शिपमेंट को रोक दिया, परन्तु नकली दवा अक्सर छोटे पैकेजों में छिपाकर भेजी जाती थी। इस प्रक्रिया में कई बार शिपमेंट के
कागजों को संशोधित करके वैध दस्तावेज़ तैयार किए जाते थे। अमेरिकी न्याय विभाग ने यह भी कहा कि इस तस्करी में उपयोग किए गए वित्तीय लेनदेन कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों के माध्यम से हुए, जिससे धनराशि का ट्रैक करना कठिन रहा। अंततः, वित्तीय फॉरेन्सिक टीमों ने कई लेनदेन को ट्रेस करके दो भारतीय नागरिकों के
खातों को जाम किया।
अमेरिकी स्वास्थ्य और मानव सेवा विभाग (HHS) ने इस तस्करी के कारण प्रभावित रोगियों को चेतावनी जारी की। विभाग ने बताया कि नकली ओज़ेम्पिक में सक्रिय घटक की मात्रा में अनियमितता होती है, जिससे रोगियों को हाइपोग्लाइसिमिया, रक्त शर्करा नियंत्रण में विफलता, और संभावित एलर्जिक प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं।
HHS ने स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को सलाह दी कि वे दवा की प्रामाणिकता की जाँच के लिए अतिरिक्त कदम उठाएँ और संदिग्ध दवा को तुरंत रोक दें।
अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले में दो प्रमुख आरोप लगाए—नकली दवा की आयात एवं वितरण के लिए अंतरराष्ट्रीय तस्करी, तथा स्वास्थ्य संबंधी धोखाधड़ी। दोनों को
अभी तक जेल नहीं भेजा गया है, परन्तु उन्हें बड़े जुर्माने और संपत्ति जब्ती का सामना करना पड़ेगा। विभाग ने कहा कि यदि उन्हें दोषी पाया गया तो उन्हें 20 साल तक की सज़ा भी हो सकती है। इस बीच, दोनों पर अमेरिकी न्यायालय में बायलॉजिकल प्रूफ़ के आधार पर मुकदमा चल रहा है,
जहाँ उन्हें अपने कार्यों के प्रमाण प्रस्तुत करने का अवसर दिया गया है।
भारत में इस खबर को लेकर विभिन्न सरकारी एजेंसियों ने तत्काल जांच की मांग की है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत हमेशा अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ सहयोग करता है और इस मामले की पूरी जांच करेगा। भारतीय दवा
निर्यात संस्थान (IDMA) ने भी इस घटना को गंभीर स्वास्थ्य धोखा कहा और कहा कि भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय नियामकों के मानकों का पालन करना चाहिए।
दूसरी ओर, अमेरिकी दवा कंपनियों ने इस तस्करी के कारण हुए आर्थिक नुकसान को उजागर किया। एक प्रमुख ओज़ेम्पिक निर्माता ने कहा कि नकली दवा की बिक्री
से उनकी आय में लगभग 5 प्रतिशत का नुकसान हुआ, साथ ही ब्रांड की विश्वसनीयता को भी खतरा पड़ा। उन्होंने अमेरिकी सरकार से कड़े नियमों की मांग की, ताकि भविष्य में ऐसी तस्करी को रोका जा सके।
अमेरिकी कांग्रेस भी इस मामले पर चर्चा कर रही है। कई सांसदों ने एक विशेष समिति
बनाने का प्रस्ताव रखा है, जो अंतरराष्ट्रीय दवा तस्करी को रोकने के लिए कड़े कानूनों को लागू करे। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार की तस्करी न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य बल्कि वैश्विक फार्मास्यूटिकल बाजार की स्थिरता को भी प्रभावित करती है।
The case highlights vulnerabilities in international drug supply chains that allowed counterfeit Ozempic to enter the U.S. market. It underscores the need for stronger cross‑border enforcement to protect public health and pharmaceutical market integrity.
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