बिहार विधान परिषद, राज्य की द्विसदनीय विधायिका, में 75 सदस्य
होते हैं, जिनमें से 63 सदस्य निर्वाचित होते हैं और 12 सदस्य सरकार द्वारा नामित। सभापति का पद परिषद की कार्यवाही को व्यवस्थित करने, चर्चा को नियंत्रित करने और विधायी प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले दो वर्षों में, सिंह ने कई प्रमुख विधेयकों की पारित करने में भूमिका निभाई, जैसे कृषि सुधार
अधिनियम और शिक्षा सुधार योजना। उनका इस्तीफा न केवल एक व्यक्तिगत निर्णय है, बल्कि परिषद के कार्यप्रवाह में संभावित व्यवधान का कारण भी बन सकता है।
इस्तिफा देने के बाद, सिंह ने एक सार्वजनिक बयान में कहा कि व्यक्तिगत स्वास्थ्य कारणों और परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उन्हें यह कठिन निर्णय लेना पड़ा। उन्होंने अपनी जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक
पूरा करने के बाद ही इस्तीफा दिया, यह स्पष्ट किया। इस बयान में उन्होंने परिषद की उपलब्धियों को सराहते हुए कहा कि भविष्य में भी परिषद की कार्यक्षमता बनी रहेगी। इसके अलावा, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के चयन में कोई दखल नहीं दिया है, और यह प्रक्रिया स्वच्छ और लोकतांत्रिक रहनी चाहिए।
बिहार सरकार ने इस इस्तीफे को प्राप्त कर तत्काल एक स्वतंत्र चयन समिति गठित की, जिसमें राज्य के प्रमुख न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारी शामिल होंगे। समिति को 45 दिनों के भीतर संभावित उम्मीदवारों की सूची तैयार कर मुख्यमंत्री को प्रस्तुत करनी होगी। इस प्रक्रिया में विधायिका के विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है, जिससे
चयन पारदर्शी और निष्पक्ष हो सके। चयन समिति ने स्पष्ट किया कि उम्मीदवारों को प्रशासनिक योग्यता, विधायी अनुभव और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए ही चुना जाएगा।
पिछले कुछ हफ्तों में कई संभावित उम्मीदवारों के नाम सामने आए हैं, जिनमें वरिष्ठ विधायक, अनुभवी न्यायाधीश और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के भीतर, दो
प्रमुख नेता—विधायकी अध्यक्ष रवींद्र कुमार और वरिष्ठ मंत्री सुनीता प्रसाद—को संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। वहीं, विरोधी दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी अपने अनुभवी विधायक अंशुल बिड़ला को प्रस्तावित किया है, जो सामाजिक न्याय के मुद्दों में सक्रिय रहे हैं। इन सभी नामों को लेकर राजनीतिक दलों के भीतर कई चर्चा चल रही है।
परिचालन की दिशा में, कई पक्षों ने इस इस्तीफे को एक अवसर के रूप में देख कर नई दिशा निर्धारित करने की बात कही है। बहुसंख्यक दलों ने कहा कि नई सभापति के चयन में महिलाओं और अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि परिषद में विविधता बढ़े। इसके अलावा, कुछ नेता ने कहा कि नई अध्यक्ष
को डिजिटल विधायी प्रक्रियाओं को तेज करने और पारदर्शिता बढ़ाने का काम सौंपा जाना चाहिए। यह सुझाव इस बात को उजागर करता है कि वर्तमान में विधायी कार्य में तकनीकी नवाचारों की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ विभिन्न स्तरों पर सामने आई हैं। राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के मुख्य सचिव ने कहा कि
उन्होंने सिंह के योगदान को सराहा और नए सभापति के चयन में पार्टी की एकजुटता बनाए रखेगी। उन्होंने यह भी कहा कि चयन प्रक्रिया में किसी भी तरह की अनुचित प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने इस अवसर को सामाजिक समावेशीता को बढ़ावा देने के लिए प्रयोग किया है और
उन्होंने अपने पक्ष से एक अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता को प्रस्तावित किया है। इन बयानों से स्पष्ट होता है कि हर दल अपने रणनीतिक हितों के साथ नई अध्यक्ष को अपना समर्थन देना चाहता है।
Bihar’s Legislative Council chief Avadhesh Narayan Singh quit on Aug 28, citing personal reasons, prompting the state to set up a fast‑track, 45‑day selection panel to appoint a successor. Parties are already jockeying for the post, with calls for a more diverse, tech‑savvy chairperson that could reshape the council’s legislative agenda.
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