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सुनिल अंबेकर ने जनसांख्यिकीय असंतुलन पर “धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक” नीति की मांग की, राजनीतिक‑सामाजिक बहस तेज़ी

सुनिल अंबेकर, राष्ट्रीय राष्‍ट्रीय सभा (आरएसएस) के प्रमुख, ने आज दिल्ली के एक सार्वजनिक मंच पर जनसांख्‍यिकी असंतुलन के मुद्दे को लेकर एक तीव्र भाषण दिया, जिसमें उन्होंने जनसंख्या नीति पर पुनः विचार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि इस विषय को “धर्मनिरपेक्ष” और “समुदायिक” लेंस को हटाकर देखना चाहिए, ताकि वास्तविक समस्याओं का सामना किया जा सके। उनके इस वक्तव्य ने विभिन्न सामाजिक समूहों और नीति निर्माताओं में गहरी चर्चा को जन्म दिया।

अंबेकर ने अपने भाषण की शुरुआत भारत में चल रही जनसंख्या वृद्धि की गति और इसके सामाजिक-आर्थिक प्रभावों की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करके की। उन्होंने बताया कि पिछले दो दशकों में भारत की जनसंख्या वृद्धि दर में उल्लेखनीय गिरावट आई है, परंतु कुछ राज्यों में जनसांख्यिकी संरचना में असमानता स्पष्ट रूप से दिख रही है। इस असंतुलन के कारण शहरी‑ग्रामीण विभाजन, आयु वर्ग में अंतर, तथा लैंगिक अनुपात में परिवर्तन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं।

इन पृष्ठभूमि तथ्यों को देखते हुए, अंबेकर ने यह रेखांकित किया कि वर्तमान जनसंख्या नीतियों में कई बार धार्मिक या साम्प्रदायिक दृष्टिकोणों का प्रभाव देखा जाता है, जिससे नीतियों का उद्देश्य भटक जाता है। उन्होंने कहा कि नीति निर्माताओं को वैज्ञानिक डेटा और आर्थिक सिद्धांतों के आधार पर ही निर्णय लेना चाहिए, न कि भावनात्मक या विचारधारात्मक कारकों के आधार पर। इस संदर्भ में उन्होंने पिछले सरकारों की जनसंख्या नीतियों की समीक्षा करने की आवश्यकता पर बल दिया।

भाषण के दौरान अंबेकर ने तीन मुख्य घटनाक्रमों को उजागर किया। पहला, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य में युवाओं की बेरोज़गारी दर में वृद्धि और इसका जनसांख्यिकीय तनाव पर प्रभाव। दूसरा, दक्षिणी राज्यों में आयु संरचना का वृद्धावस्था पक्ष में झुकाव और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली पर दबाव। तीसरा, महिलाओं की शिक्षा और रोजगार के स्तर में असमानता, जो जनसंख्या संतुलन को और जटिल बनाती है। इन बिंदुओं को स्पष्ट करने के लिए उन्होंने विभिन्न सरकारी रिपोर्टों और सर्वेक्षणों का हवाला दिया।

इन बिंदुओं को सामने रखते हुए, अंबेकर ने राष्ट्रीय नीति आयोग और जनसंख्या नियंत्रण आयोग को तत्काल कार्रवाई करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा जनसंख्या नीतियों को पुनः मूल्यांकन किया जाना चाहिए और नए डेटा‑आधारित मॉडल को लागू किया जाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर एकजुट होने और जनसंख्या के वास्तविक आंकड़ों पर आधारित समाधान तैयार करने का आव्हान किया।

अंबेकर के इस आह्वान पर विभिन्न राजनीतिक पक्षों ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। भारतीय जनता पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता ने कहा कि जनसंख्या नीति का सवाल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और इसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने अंबेकर के बयान को “धर्मनिरपेक्षता की बुनियाद को चुनौती” कहा, जबकि कुछ स्वतंत्र विचारक ने इसे “विज्ञान‑आधारित नीति की दिशा में एक सकारात्मक कदम” माना।

विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद स्पष्ट थे, परंतु अधिकांश राजनेताओं ने इस बात पर सहमति व्यक्त की कि जनसंख्या असंतुलन को सुलझाने के लिए एक समग्र और दीर्घकालिक रणनीति बनानी चाहिए। कई राज्य स्तरीय नेताओं ने कहा कि अपने-अपने राज्यों में जनसंख्या नियंत्रण के लिए विशेष योजनाएँ बनानी होंगी, जिससे आर्थिक विकास में बाधा न आए।

समाज के विभिन्न वर्गों से भी इस मुद्दे पर तीव्र प्रतिक्रिया आई। सामाजिक कार्यकर्ता और एनजीओ प्रतिनिधियों ने कहा कि जनसंख्या नीति में महिलाओं की भागीदारी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि यह दीर्घकालिक संतुलन का मूल आधार है। व्यापारिक समूहों ने कहा कि जनसंख्या वृद्धि का सीधे असर श्रम बाजार और उपभोक्ता मांग पर पड़ता है, इसलिए आर्थिक स्थिरता के लिए नीति में स्पष्टता आवश्यक है।

आर्थिक विशेषज्ञों ने अंबेकर के वक्तव्य को “अर्थव्यवस्था के लिए एक चेतावनी” के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि यदि जनसांख्यिकी असंतुलन को नज़रअंदाज़ किया गया तो भविष्य में पेंशन, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सुरक्षा पर भारी बोझ पड़ेगा। इस संदर्भ में उन्होंने सरकार को जनसंख्या नियोजन में निवेश बढ़ाने की सलाह दी, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके।

राजनीतिक विश्लेषकों ने यह भी उजागर किया कि जनसंख्या नीति का

Updated: September 30, 2026

The speech spotlights demographic imbalances that could affect employment, social security and economic growth, prompting calls for data‑driven revisions of India’s population policies.

Policy makers may now reassess existing frameworks to address regional age, gender and urban‑rural disparities.

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