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23 साल बाद इराक से अमेरिकी सैनिकों की वापसी, क्षेत्रीय सुरक्षा और शक्ति संतुलन पर बढ़ी चर्चा

इराक में दो दशकों से अधिक समय तक अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी ने क्षेत्रीय सुरक्षा पर कई प्रश्न उठाए हैं, और 23 वर्ष बाद आज अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर इराक से अपनी सेना को वापस ले लिया, जबकि ईरान में उसकी सैन्य उपस्थिति जारी रखी गई।
इस घोषणा को वाशिंगटन के विदेश मंत्रालय ने एक संक्षिप्त ब्रीफ़िंग में किया, जिसमें कहा गया कि इराक में अमेरिकी सैनिकों की भूमिका अब “रणनीतिक पुनर्संरचना” के चरण में प्रवेश कर चुकी है। इराकी सरकार ने इस कदम का स्वागत किया, परन्तु ईरानी अधिकारियों ने इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन में बदलाव के रूप में देखा।इराक पर 2003 में अमेरिकी आक्रमण को “वॉर ऑन टेरर” का दूसरा चरण माना गया था, जिसने देश में बिखराव, आतंकवाद और सामाजिक‑आर्थिक अराजकता को जन्म दिया। शुरुआती वर्षों में अमेरिकी सैनिकों की संख्या लगभग 150,000 तक पहुँच गई, जो धीरे‑धीरे घटते हुए 2020 में लगभग 2,500 तक सीमित रह गई।

इस अवधि में इराकी सुरक्षा बलों की क्षमताओं को विकसित करने, बुनियादी ढाँचे को पुनर्निर्मित करने और विभिन्न सशस्त्र समूहों के बीच समझौते स्थापित करने का प्रयास किया गया। लेकिन निरंतर असुरक्षा, भ्रष्टाचार और राजनैतिक अस्थिरता ने इस प्रक्रिया को जटिल बना दिया।

इराक में अमेरिकी सैनिकों की वापसी की पृष्ठभूमि में कई कारक सम्मिलित हैं। प्रथम, इराकी राष्ट्रीय सरकार ने हाल के महीनों में अपने संप्रभु अधिकारों को पुनर्स्थापित करने की मांग को तीव्र किया, जिससे अमेरिकी सैन्य समर्थन पर निर्भरता कम करने की दिशा में दबाव बढ़ा।

द्वितीय, अमेरिकी कांग्रेस ने बजट प्रतिबंधों के कारण विदेशी सैन्य अभियानों के खर्च को घटाने की मांग की, जबकि सार्वजनिक राय में भी इराकी युद्ध के विरुद्ध असंतोष बढ़ रहा था। तृतीय, ईरान के साथ बढ़ती प्रतिद्वंद्विता ने अमेरिकी रणनीति को पुनः मूल्यांकन करने पर मजबूर किया, क्योंकि दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक तनाव तीव्र हो रहा था।

वॉशिंगटन ने इस निर्णय को “इराक में सुरक्षा सहयोग के नए मॉडल” के तहत प्रस्तुत किया, जिसमें अमेरिकी सलाहकारों और प्रशिक्षकों की संख्या को सीमित करके इराकी सुरक्षा बलों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने के अवसर प्रदान किए जाएंगे। इस प्रक्रिया में अमेरिकी सेना की मुख्य भूमिका अब इराकी अधिकारियों को तकनीकी सहायता, खुफिया जानकारी और लॉजिस्टिक समर्थन प्रदान करने तक सीमित रहेगी। इस दौरान, इराकी राष्ट्रपति ने कहा कि यह कदम “देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों के सम्मान” को दर्शाता है, और इराकी सेना के प्रशिक्षण पर अधिक ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

ईरान में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के बारे में वाशिंगटन ने कहा कि वह “आधारभूत सुरक्षा सहयोग” को बनाए रखेगा, जिससे क्षेत्र में आतंकवादी नेटवर्कों के खिलाफ जासूसी और खुफिया कार्रवाई जारी रहेगी। अमेरिकी डिप्लोमैटिक स्रोतों ने बताया कि इरान में अमेरिकी सैनिकों की संख्या सीमित है, मुख्य रूप से हवाई अड्डों, लॉजिस्टिक केंद्रों और विशेष खुफिया इकाइयों में तैनात है। यह उपस्थिति, जो 2015 के बाद से ही जारी है, को अमेरिका ने “पुनरावर्ती आतंकवादी खतरों के प्रतिउत्तर” के रूप में वर्णित किया है।

इराकी नागरिकों ने इस विकास पर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दर्ज कराई हैं। कई शरणार्थी और गृहयुद्ध के शिकार परिवारों ने कहा कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी से उनकी सुरक्षा में कमी आ सकती है, क्योंकि कुछ क्षेत्रों में अभी भी असुरक्षित समूह सक्रिय हैं। दूसरी ओर, कई राष्ट्रीयवादी समूहों ने इस कदम का स्वागत किया, यह कहते हुए कि अब इराक को अपनी सुरक्षा नीतियों को स्वतंत्र रूप से निर्धारित करने का अवसर मिला है। इराकी मीडिया में भी इस खबर को लेकर बहस छिड़ी है, जहाँ कुछ विश्लेषकों ने कहा कि यह कदम इराक के पुनर्निर्माण प्रक्रिया को तेज करेगा।

ईरान के विदेश मंत्रालय ने इस निर्णय को “क्षेत्रीय सुरक्षा संरचना में असंतुलन” के रूप में वर्णित किया, यह संकेत देते हुए कि अमेरिकी सैनिकों की इराक से वापसी ईरान के साथ प्रतिद्वंद्विता को और तेज कर सकती है। ईरानी राजनेताओं ने कहा कि इराक में अमेरिकी उपस्थिति का हटना इरान की रणनीतिक योजनाओं में बदलाव का संकेत नहीं है, और वे अपनी सुरक्षा नीतियों को मजबूत करने के लिए आगे कदम उठाएंगे। इस बीच, ईरानी सेना ने भी इराकी सीमा क्षेत्रों में संभावित सुरक्षा खामियों को भरने के लिए अतिरिक्त तैनाती की योजना बनाई है।

अमेरिकी राजनयिकों ने बताया कि इराकी सरकार के साथ कई महीनों तक वार्तालापों के बाद यह निर्णय लिया गया, जिसमें इराकी सेना के प्रशिक्षण, उपकरणों की आपूर्ति और सुरक्षा सहयोग के नए ढाँचे पर चर्चा की गई।

Updated: September 30, 2026


After 23 years, the United States announced the complete withdrawal of its troops from Iraq, shifting to a limited advisory role while retaining a small presence in Iran for intelligence and counter‑terrorism. Baghdad welcomed the move as a step toward sovereignty, but Tehran warned it could tilt the regional security balance in Iran’s favor.

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