पॉयामोझी, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता हैं, पर 2024 में एक बड़े वित्तीय धोखाधड़ी के आरोप लगाए गए थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद के दायरे में सरकारी निधियों को निजी कंपनियों को असामान्य रूप से आवंटित कराकर व्यक्तिगत लाभ हासिल किया। इस मामले की जाँच में कई सरकारी एजेंसियों ने हिस्सा लिया, और प्रारम्भिक रिपोर्टों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताओं का उल्लेख किया गया।
ऐतिहासिक रूप से, भारत में बड़े भ्रष्टाचार मामलों में जांच की स्वीकृति के लिए विभिन्न प्राधिकरणों की भागीदारी रहती है। अधिकांश मामलों में, सार्वजनिक विभाग के प्रमुख या राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा मंजूरी दी जाती है, जबकि कुछ विशेष मामलों में गवर्नर की मंजूरी अनिवार्य होती है। इस संदर्भ में, पॉयामोझी का यह तर्क कि केवल गवर्नर ही अनुमति दे सकते हैं, मौजूदा कानूनी ढाँचे में एक असामान्य स्थिति प्रस्तुत करता है।
जांच के प्रमुख चरणों में पहले सार्वजनिक विभाग सचिव ने 23 जून 2026 को अनुमति दे दी, जिसके बाद कई रिट्रीवली आदेश जारी किए गए। इस अनुमति पर पॉयामोझी ने कई बार सवाल उठाए, यह दावा करते हुए कि प्रक्रिया में अनुचित दबाव और राजनीतिक प्रभाव रहा है। इसके बाद, न्यायालय ने इस अनुमति की वैधता पर विचार करने के लिए एक विशेष बेंच स्थापित की, जिसमें इस मामले के संवैधानिक पहलुओं को भी जांचा जाएगा।
वर्तमान सुनवाई में पॉयामोझी ने कोर्ट को यह भी बताया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्होंने कई बार अपनी निरपराधता सिद्ध करने के प्रयास किए, लेकिन उन प्रयासों को राजनीतिक दांव पर रखा गया। उन्होंने कहा कि एफआईआर की वैधता पर सवाल उठाने के लिए गवर्नर की स्वीकृति आवश्यक है, क्योंकि यह प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत ही चलनी चाहिए।
कोर्ट ने इस दलील को सुनते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में सभी पक्षों को समान रूप से सुनना आवश्यक है और किसी भी अधिकारिक निर्णय की वैधता को स्पष्ट करने के लिए दस्तावेजी प्रमाण आवश्यक हैं। न्यायाधीश ने पॉयामोझी को अपने दावे के समर्थन में लिखित दस्तावेज प्रस्तुत करने का निर्देश दिया और इस विषय पर आगे की सुनवाई तय की।
संबंधित सरकारी विभाग ने कहा कि उन्होंने सभी प्रक्रियात्मक नियमों का पालन किया है और अनुमति देने की प्रक्रिया में कोई अनियमितता नहीं हुई। विभाग के प्रवक्ता ने बताया कि एफआईआर के आधार पर जांच को जारी रखना आवश्यक है और इस पर कोई भी राजनीतिक दबाव नहीं डाला गया। उन्होंने यह भी कहा कि गवर्नर की मंजूरी के बिना भी जांच जारी रह सकती है, क्योंकि संबंधित कानून में स्पष्ट रूप से ऐसा प्रावधान है।
कांग्रेस पार्टी ने पॉयामोझी की रक्षा में कहा कि यह मामला राजनीतिक उत्पीड़न का हिस्सा है और न्यायालय को इस बात को समझना चाहिए कि इस तरह की बड़ी आर्थिक धोखाधड़ी के आरोप अक्सर विपक्षी नेताओं पर लगाए जाते हैं। उन्होंने न्यायालय से तत्काल एफआईआर को निरस्त करने की मांग की और यह भी कहा कि इस मामले में सभी साक्ष्य स्पष्ट रूप से पॉयामोझी की निरपराधता की ओर इशारा करते हैं।
विपक्षी दलों ने इस मुद्दे को लेकर कहा कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की वैधता पर नहीं, बल्कि पूरे प्रणालीगत भ्रष्टाचार पर प्रकाश डालता है। उन्होंने न्यायालय से त्वरित कार्रवाई करने और जांच को निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ाने का आग्रह किया। साथ ही, उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि यदि गवर्नर की अनुमति ही एकमात्र मान्य मानदंड है, तो इस प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए विधायी सुधारों की आवश्यकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा कि ₹100 करोड़ की धोखाधड़ी का मामला अगर सिद्ध हो जाता है, तो यह राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। ऐसे बड़े पैमाने की अनियमितताओं से सार्वजनिक निवेशकों
Updated: September 28, 2026
Poyamozhi’s procedural challenge spotlights a loophole where a single governor’s nod can throttle a multi‑crore fraud probe, hinting that legal tech‑checks, not party politics, may be the real barrier to accountability.
If courts force a clearer statutory hierarchy, the case could
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