लिये तैयार किया हुआ बताया। क़ुरैशी ने स्पष्ट किया कि एसआईआर का उद्देश्य निर्वाचन क्षेत्रों की पुनर्विभाजन (डिलिमिटेशन) के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा है, जिससे कई राज्यों में मतदान क्षेत्रों का आकार बदलकर सत्ता में रहने वाली पार्टी को फायदेमंद स्थिति मिल सकती है। इस प्रकार, उन्होंने कहा कि इस अधिनियम की वैधता पर सवाल उठाने
के लिए कानूनी कदम उठाए जाने चाहिए।
डिलिमिटेशन प्रक्रिया भारत में प्रत्येक दस साल में एक बार की जाती है, जिसमें जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित किया जाता है। इस प्रक्रिया में अक्सर राजनीतिक लाभ के लिये सीमाओं का पुनर्संयोजन किया जाता है, जिसे “गेरिमैंडर” कहा जाता है। इस बार,
डिलिमिटेशन समिति ने कई राज्यों में सीटों की संख्या घटाने और बढ़ाने का प्रस्ताव दिया, जिससे मुख्यतः दो प्रमुख राष्ट्रीय दलों को लाभ पहुँचाने की आशंका जताई जा रही है। विरोधी पार्टियों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल सत्ता में रहने वाली पार्टी के लिए फायदेमंद है, जबकि स्वतंत्र आयोग के अनुशासन को कमजोर करता है।
बीजेपी ने इस प्रस्ताव को “लोकतांत्रिक प्रक्रिया” के रूप में समर्थन दिया है और कहा है कि नई सीमाएँ जनसंख्या वृद्धि और सामाजिक बदलावों को प्रतिबिंबित करती हैं। पार्टी के प्रवक्ताओं ने कहा कि इस संशोधन से अधिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा और ग्रामीण-शहरी मतदाता संतुलन सुधरेगा। वहीं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसपर तीखा विरोध
किया, उन्होंने कहा कि इस पुनर्विभाजन के साथ एसआईआर को मिलाकर मतदान परिणामों को पूर्वनिर्धारित किया जा रहा है। वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि इस तरह के बदलावों से चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठेंगे।
क़ुरैशी के इस बयान के बाद कई विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को लेकर एक
संयुक्त विरोध प्रदर्शन करने का निर्णय लिया। दहलीज पर एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में, कांग्रेस के प्रमुख ने कहा कि “एसआईआर और डिलिमिटेशन को मिलाकर एक राजनीतिक खेल बनाया जा रहा है, जिससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर होगी।” उन्होंने कहा कि इस पर कड़ी जाँच की जानी चाहिए और यदि आवश्यक हो तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर
की जानी चाहिए। इस बीच, राष्ट्रीय दल के अन्य वरिष्ठ नेता भी इस अधिनियम को “असंतुलित” और “अनुचित” बताते हुए, इसे रद्द करने की मांग कर रहे हैं।
बिहार के विपक्षी नेता ने कहा कि इस अधिनियम से कई छोटे शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को एक साथ मिलाया जा रहा है, जिससे स्थानीय मुद्दों को नजरअंदाज
किया जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस प्रकार के पुनःनिर्धारण से विकास परियोजनाओं की दिशा भी बदल सकती है, क्योंकि नई सीमाओं के आधार पर संसाधन वितरण में परिवर्तन होगा। इसी तरह के बिंदु पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक स्थानीय नेता ने कहा कि “डिलिमिटेशन के साथ एसआईआर को जोड़ना, निर्वाचन प्रक्रिया को राजनीतिक
रूप से ध्रुवीकरण की ओर ले जा रहा है।” उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की जरूरत है और इसे संसद में गंभीरता से उठाया जाना चाहिए।
विपक्षी दलों की इस तीव्र प्रतिक्रिया के बीच, बीजेपी के प्रवक्ता ने कहा कि “डिलिमिटेशन प्रक्रिया संविधान द्वारा निर्धारित है और इसमें कोई भी राजनीतिक
हस्तक्षेप नहीं हो सकता।” उन्होंने कहा कि इस अधिनियम को लेकर कोई भी कानूनी चुनौती न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही उठाई जानी चाहिए। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि इस पर बहस करते हुए सरकार का मुख्य उद्देश्य “लोकतांत्रिक सुधार” को आगे बढ़ाना है और इस प्रक्रिया को बाधित करने की कोई योजना नहीं है।
जैरेम रमेश, केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि मौसमी सत्र को अभी तक प्रोरोगेट नहीं किया गया है, और वे इस सत्र में विभिन्न विधेयकों को लेकर कार्य करेंगे। उन्होंने कहा कि “डिलिमिटेशन और एसआईआर को लेकर चल रही बहसों को देखते हुए, हम 11 अक्टूबर को सभी बिलों को पारित करने की योजना बना
रहे हैं।” रमेश ने यह भी बताया कि सरकार का मानना है कि यह विधेयक सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास को बढ़ावा देगा। उन्होंने कहा कि इस पर विरोधी दलों के सवालों के जवाब संसद में ही दिए जाएंगे।
विपक्षी दलों ने इस बात पर सवाल उठाते हुए कहा कि “सरकार ने मौसमी सत्र को प्रोरोगेट
नहीं करके विधेयकों को जल्दी से जल्दी पारित करने का इरादा रखा है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दबाव बनाया जा रहा है।” उन्होंने कहा कि इस प्रकार की रणनीति से विधेयकों की गहन जाँच और चर्चा संभव नहीं होगी। विपक्ष ने यह भी कहा कि इस विधेयक को पार
Former Election Commission chief N.K. Kurais hails the new delimitation‑linked constitutional amendment as illegal and urges its immediate repeal, warning it could tilt future elections in the BJP’s favour. Opposition parties condemn the bill as a partisan gerrymander and are mobilising legal and parliamentary challenges to block its passage.
The debate over the SIAR bill underscores how redrawing electoral maps can become a covert tool for cementing incumbency, turning a supposedly neutral delimitation exercise into a partisan power play.
If unchecked, such manipulation risks eroding public trust in elections, making every ballot a proxy for the ruling party’s
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