वैष्णव ने बताया कि एआई को केवल कानून के माध्यम से नियंत्रित नहीं किया जा सकता; इसके लिए तकनीकी-कानूनी समाधान की आवश्यकता है। परामर्श प्रक्रिया में उद्योग, शैक्षणिक संस्थान, सिविल सोसाइटी और उपयोगकर्ता समूहों को शामिल किया जाएगा, ताकि व्यापक सहमति स्थापित की जा सके।
वित्त मंत्रालय ने पिछले साल एआई नीति
की रूपरेखा जारी की थी, जिसमें तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ संभावित जोखिमों को घटाने पर ज़ोर दिया गया था। तब से विभिन्न विभागों ने एआई के विभिन्न अनुप्रयोगों की जांच शुरू की, विशेषकर स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाओं और सार्वजनिक सुरक्षा के क्षेत्रों में। हालांकि, इस दौरान कई मामलों में
एआई द्वारा उत्पन्न गलत जानकारी और भेदभावपूर्ण निर्णयों ने नियामक चुनौतियों को उजागर किया। इन चुनौतियों के मद्देनज़र, सरकार ने एक समग्र नियामक ढांचा तैयार करने का इरादा जताया है, जिसे आज की परामर्श प्रक्रिया में विस्तृत किया जाएगा।
परामर्श दस्तावेज़ के मुख्य बिंदुओं में एआई प्रणाली की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और जवाबदेही
को सुनिश्चित करने के उपाय शामिल हैं। इसमें एआई मॉडल की प्रशिक्षण डेटा की गुणवत्ता, एल्गोरिदम की ऑडिटिंग, तथा उपयोगकर्ता को स्पष्ट जानकारी प्रदान करने की शर्तें निर्धारित की गई हैं। इसके अलावा, डीपफ़ेक्स जैसे घातक उपयोग मामलों को रोकने के लिए तकनीकी पहचान उपकरण और दंडात्मक प्रावधानों का प्रस्ताव रखा
गया है। दस्तावेज़ में एआई अनुप्रयोगों की वर्गीकरण भी प्रस्तावित है, जिससे उच्च जोखिम वाले सिस्टम को विशेष नियामक निगरानी में रखा जा सके।
परामर्श प्रक्रिया की शुरुआत में, कई प्रमुख टेक कंपनियों ने अपने एआई प्लेटफ़ॉर्म की सुरक्षा मानकों को बेहतर बनाने का संकल्प व्यक्त किया। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अमेज़ॅन जैसी
कंपनियों ने कहा कि वे सरकारी दिशा-निर्देशों के साथ मिलकर एआई के नैतिक उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए सहयोग करेंगे। इन कंपनियों ने यह भी कहा कि तकनीकी समाधान और कानूनी प्रावधानों का संतुलन स्थापित करना आवश्यक है, ताकि नवाचार को बाधा न पहुँचाई जाए। इसके अतिरिक्त, भारतीय स्टार्ट‑अप इकोसिस्टम
ने भी अपनी चिंताएँ व्यक्त कीं, विशेषकर छोटे उद्यमों के लिए भारी अनुपालन लागत के संबंध में।
शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों ने भी परामर्श दस्तावेज़ के प्रति सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) और इन्स्टीट्यूट ऑफ़ इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईआईटी) ने कहा कि एआई के नैतिक प्रशिक्षण और प्रमाणन कार्यक्रमों को राष्ट्रीय
स्तर पर मानकीकृत करने की जरूरत है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि नियामक ढांचा अनुसंधान की स्वतंत्रता को नहीं रोकना चाहिए, बल्कि उसे सुरक्षित और पारदर्शी बनाना चाहिए। कई विश्वविद्यालयों ने अपने एआई पाठ्यक्रमों में नैतिकता और सामाजिक प्रभाव को शामिल करने की योजना बनायी है, जिससे भविष्य के
पेशेवरों को जिम्मेदार एआई विकास की समझ हो।
सिविल सोसाइटी संगठनों ने भी एआई के सामाजिक प्रभावों पर सवाल उठाए। डिजिटल अधिकार समूहों ने कहा कि एआई प्रणाली में मौजूद पूर्वाग्रहों को दूर करने के लिए अधिक कड़ा डेटा संरक्षण कानून आवश्यक है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार को उपयोगकर्ता की
सहमति और जानकारी प्रदान करने के नियमों को सुदृढ़ करना चाहिए, विशेषकर व्यक्तिगत डेटा के उपयोग के मामले में। इन समूहों ने परामर्श में सार्वजनिक हित की रक्षा के लिए स्वतंत्र निगरानी निकाय की स्थापना का प्रस्ताव भी रखा है। उन्होंने यह भी कहा कि एआई के दुरुपयोग को रोकने के
लिए सख्त दंडात्मक प्रावधान आवश्यक हैं।
केंद्रीय सरकार ने इस परामर्श को एक टेक्नो‑लीगल पहल माना है, जिसमें नीतिनिर्माता, तकनीकी विशेषज्ञ और उद्योग प्रतिनिधियों को मिलकर समाधान तैयार किया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत, परामर्श के बाद 90 दिन के भीतर एक नियामक फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा, जिसमें एआई के विभिन्न वर्गों
के लिए अलग‑अलग मानदंड तय किए जाएंगे। सरकार ने यह भी कहा कि इस फ्रेमवर्क को लागू करने के लिए एक विशेष नियामक एजेंसी की स्थापना की जाएगी, जो एआई अनुप्रयोगों की निरंतर निगरानी करेगी। यह एजेंसी अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्य करेगी, जिससे भारत वैश्विक एआई नियमन में अग्रणी बन
सके।
वित्त मंत्रालय ने बताया कि परामर्श के दौरान प्राप्त सुझावों को विस्तृत रूप से विश्लेषित किया जाएगा और आवश्यकतानुसार संशोधित किया जाएगा। यह प्रक्रिया डिजिटल अर्थव्यवस्था को सुरक्षित बनाते हुए निवेश को आकर्षित करने के लक्ष्य को भी पूर
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