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शोध: विज्ञान में प्रवीणता जाति से न सीखने की क्षमता और प्रयास से जुड़ी, शिक्षा मंत्रालय ने समावेशन कार्रवाई की

ब्याजपुर विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग में इस सप्ताह दो दिन तक चलने वाले एक सेमिनार ने शिक्षा जगत में एक तीव्र बहस को जन्म दिया। सेमिनार का मुख्य विषय “विज्ञान में जाति‑व्यवस्था का स्थान” था, जिसमें विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रोफ़ेसर, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता एकत्रित हुए। इस कार्यक्रम में प्रस्तुत शोध रिपोर्ट ने यह उजागर

किया कि छात्रों की शैक्षणिक क्षमताएँ, विशेषकर थर्मोडायनामिक्स या अवकल समीकरण जैसे जटिल विषयों में प्रवीणता, उनके पूर्वजों की जातीय या सामाजिक स्थिति से असंबंधित होती है। यह दावा कई शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों के बीच तीव्र चर्चा का कारण बना।

सेमिनार की शुरुआत में, भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के प्रोफ़ेसर डॉ. अजय वर्मा ने

अपने शोध के मुख्य बिंदु प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि पिछले दो दशकों में राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित बड़े पैमाने के शैक्षणिक सर्वेक्षणों में यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हुआ है कि छात्रों के अंक और अनुसंधान क्षमताएँ उनके सामाजिक पृष्ठभूमि के बजाय स्कूल की गुणवत्ता, शैक्षणिक वातावरण और व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक प्रभावित होती

हैं। वर्मा ने यह भी उल्लेख किया कि भारत में विज्ञान में उत्कृष्टता हासिल करने वाले कई छात्र, जो पारंपरिक रूप से उच्च जाति वर्ग में नहीं माने जाते, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी पहचान बनाई है।

पिछले वर्ष के राष्ट्रीय शैक्षणिक आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं। शिक्षा मंत्रालय के डेटा के अनुसार, ग्रामीण

और पिछड़े वर्ग के छात्रों ने तकनीकी स्नातक परीक्षाओं में पिछले पाँच वर्षों में औसत 12 प्रतिशत की प्रगति दर्ज की है, जबकि शहरी उच्च वर्ग के छात्रों की वृद्धि दर 9 प्रतिशत रही। यह आँकड़ा दर्शाता है कि सामाजिक-आर्थिक बाधाओं को पार कर छात्रों ने वैज्ञानिक अध्ययन में उल्लेखनीय प्रगति की है। शोधकर्ताओं ने

यह भी पाया कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी में छात्रावास, स्कॉलरशिप और मेंटरिंग कार्यक्रमों का प्रभाव, पारिवारिक जाति-स्थिति से अधिक महत्वपूर्ण रहा है।

सेमिनार के दौरान, कई छात्र प्रतिनिधियों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रथम वर्ष के छात्र रिया सिंह ने बताया कि उन्होंने अपनी मातृभाषा और पारिवारिक परम्पराओं के कारण शुरुआती कठिनाइयों का सामना किया, परन्तु

विश्वविद्यालय के समर्थन कार्यक्रमों के माध्यम से उन्होंने थर्मोडायनामिक्स की बुनियादी अवधारणाओं को समझा। उन्होंने कहा कि “मेरे पिता की जाति मेरे सीखने की क्षमता को निर्धारित नहीं करती; बल्कि मेरे शिक्षक और मेरे खुद के प्रयास ही मेरे भविष्य को आकार देते हैं।” इसी तरह, दूसरा वर्ष के छात्र अभिषेक ठाकुर ने कहा कि

वह अपने गाँव के एकमात्र विज्ञान छात्र हैं और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिससे वह अपने समुदाय में विज्ञान के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रेरित हुए।

पर्यवेक्षक समूह ने इस मंच पर कई प्रश्न उठाए। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कहा कि अभी भी कई ग्रामीण स्कूलों में बुनियादी प्रयोगशालाओं

की कमी है, जिससे छात्रों की व्यावहारिक समझ में अंतर आ सकता है। वहीं, कुछ उच्च वर्ग के शिक्षाविदों ने कहा कि सामाजिक पूर्वाग्रहों को पूरी तरह समाप्त करने के लिए नीतिगत स्तर पर अधिक सख्त कदम उठाने चाहिए। उन्होंने उल्लेख किया कि “विज्ञान को किसी भी सामाजिक वर्ग की सीमा में सीमित नहीं किया

जा सकता; यह सभी के लिए समान रूप से खुला होना चाहिए।” इस पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि वे शैक्षणिक समानता सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त अनुदान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को लागू कर रहे हैं।

सेमिनार के बाद, शिक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। उन्होंने कहा कि सरकार ने विज्ञान एवं

प्रौद्योगिकी में सामाजिक समावेशन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ शुरू की हैं, जिनमें ‘विज्ञान में समानता’ योजना और ‘विज्ञान छात्रवृत्ति’ पहल शामिल हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के लिए शैक्षणिक संस्थानों को नियमित निरीक्षण किया जाएगा। इस घोषणा के बाद कई विश्वविद्यालयों ने अपने स्वयं के डेटा

को सार्वजनिक किया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि विज्ञान में प्रदर्शन में सामाजिक वर्ग की कोई स्पष्ट प्रतिच्छेद नहीं है।

विपरीत रूप से, कुछ राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे को अपनी वैधता के तहत उठाया। एक प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी के युवा मोर्चे के नेता ने कहा कि “विज्ञान में जाति‑व्यवस्था को समाप्त करना केवल शैक्षणिक नहीं,

बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी प्रतीक है।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार को अधिक सशक्त नीतियों के साथ इस दिशा में कार्य करना चाहिए। इसके विपरीत, एक अन्य दल ने कहा कि अत्यधिक सामाजिक समीकरणों को हटाने से पारंपरिक सामाजिक संरचना में अस्थिरता आ सकती है, और उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की

वकालत की। यह विविध प्रतिक्रियाएँ दर्शाती हैं कि यह विषय अभी भी सामाजिक और राजनैतिक विमर्श में गूंज रहा है।

आर्थिक विशेषज्ञों ने इस बहस को राष्ट्रीय विकास की दृष्टि से विश्लेषित किया। एक प्रतिष्ठित आर्थिक संस्थान के प्रमुख ने बताया कि विज्ञान

Updated: September 8, 2026

कमियाँ निवारण: विज्ञान में जाति-व्यवस्था का स्थान’ एक गलत शब्दावली

विषय हटाया गया था ‘विज्ञान में जाति व्यवस्था’

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