बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव: नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद नए मुख्यमंत्री की तलाश शुरू
बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव आने वाला है, जिसकी शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले से हुई है। नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए अपनी राज्यसभा जाने की इच्छा जाहिर की है, जिसके बाद यह लगभग तय हो गया है कि वह मुख्यमंत्री पद छोड़ देंगे।
नीतीश कुमार के इस फैसले के बाद बिहार में नई सरकार और नए मुख्यमंत्री को लेकर चर्चा तेज हो गई है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सहमति और मर्जी से ही तय होगा। यह बयान भाजपा और जेडीयू के बीच राजनीतिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
बिहार की राजनीति में इस साल की होली यादगार रहने वाली है, क्योंकि नीतीश कुमार करीब दो दशक से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे हैं और अब सत्ता की कमान छोड़ने जा रहे हैं। 2005 से लगातार अलग-अलग परिस्थितियों में उन्होंने बिहार की राजनीति का नेतृत्व किया है, लेकिन अब उनके राज्यसभा जाने के फैसले से सत्ता का नया अध्याय शुरू होने वाला है।
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद बिहार में एनडीए के भीतर सत्ता का संतुलन बदल सकता है। अब तक जेडीयू को गठबंधन में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में देखा जाता था, लेकिन नई स्थिति में भाजपा के नेतृत्व में सरकार बनने की संभावना जताई जा रही है। यानी भाजपा पहली बार राज्य में प्रमुख भूमिका निभा सकती है।
नए मुख्यमंत्री को लेकर भाजपा के कई नेताओं के नाम चर्चा में हैं। डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी और केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय को प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। इसके अलावा डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा और भाजपा नेता संजीव चौरसिया का नाम भी राजनीतिक हलकों में लिया जा रहा है। हालांकि अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और गठबंधन के भीतर बातचीत के बाद ही होगा।
नित्यानंद राय के आवास पर समर्थकों की आवाजाही बढ़ गई है, जो उनके सीएम पद की संभावनाओं को और मजबूत बना रही है। भाजपा के भीतर नित्यानंद राय को एक मजबूत और प्रभावशाली नेता माना जाता है, और यादव समुदाय से आने के कारण उन्हें बिहार की जातीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नित्यानंद राय को आगे लाने के पीछे भाजपा की रणनीति भी हो सकती है, जिससे वह यादव वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर सकती है। अगर भाजपा नेतृत्व उन्हें आगे बढ़ाता है तो यह केवल नेतृत्व परिवर्तन नहीं बल्कि राजनीतिक समीकरण साधने की कोशिश भी मानी जाएगी।