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सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानने की मांग पर विचार, सरकार ने पारिवारिक संरचना को हिलाने की चिंता व्यक्त की

वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के चार्टर में एक विवादास्पद मामला चल रहा है, जिसमें वैवाहिक बलात्कार, यानी मैरिटल रेप, को आपराधिक धारा में शामिल करने की मांग पर विचार किया जा रहा है। यह याचिका कई महिलाओं की अधिकार सुरक्षा को लेकर उठाई गई है, जबकि प्रतिवादियों का कहना है कि यह पारिवारिक संरचना पर

प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। कोर्ट के दायरे में इस प्रश्न का समाधान न मिलने के कारण, सार्वजनिक विमर्श तेज़ी से बढ़ रहा है और विभिन्न सामाजिक समूहों ने इस पर अपनी-अपनी आवाज़ उठाई है।

भारत में वैवाहिक बलात्कार की कानूनी स्थिति दशकों से अस्पष्ट रही है। 1980 के दशक में वैवाहिक संबंध के भीतर

होने वाले यौन उत्पीड़न को ‘सहमति’ के रूप में माना जाता था, जिससे पीड़ितों को न्याय दिलाना कठिन हो जाता था। 2005 में महिला अधिकार समूहों ने इस धारा को संशोधित करने की मांग की, परन्तु संसद में व्यापक बहस के बाद भी कोई स्पष्ट कानून नहीं बन पाया। इस पृष्ठभूमि में, कई राज्य विधानसभाओं

ने अलग-अलग उपाय पेश किए, परंतु राष्ट्रीय स्तर पर एक समान कानूनी ढांचा अभी तक नहीं बन सका।

वर्तमान याचिका में मुख्य रूप से दो बिंदु उठाए गए हैं: प्रथम, वैवाहिक संबंध के भीतर उत्पन्न यौन उत्पीड़न को आपराधिक अपराध के रूप में मान्यता देना, और द्वितीय, ऐसे मामलों में पीड़िता को शीघ्र और सुरक्षित

न्याय प्रदान करना। याचिकाकर्ता ने यह तर्क दिया है कि वैवाहिक बंधन के कारण कई महिलाएं मौखिक और शारीरिक दुरुपयोग को सहन करती हैं, जिससे उनका आत्मसम्मान और सामाजिक स्थिति क्षीण होती है। इस याचिका के समर्थक मानते हैं कि अगर इस अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया तो पीड़ितों को न्याय मिलना

आसान होगा।

सुप्रीम कोर्ट के सुनवाई में विभिन्न वकीलों ने इस मुद्दे पर विस्तृत तर्क प्रस्तुत किए। कुछ वकीलों ने कहा कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध में बदलने से महिलाओं को सुरक्षा का आश्वासन मिलेगा और सामाजिक मान्यताओं में बदलाव आएगा। वहीं, कुछ ने चेतावनी दी कि इस कदम से वैवाहिक बंधन की वैधता पर

प्रश्न उठेंगे और पारिवारिक विवादों में न्यायालय की दखलंदाजी बढ़ेगी। इस प्रकार, अदालत में दोनों पक्षों के तर्कों की तीव्रता से सुनवाई आगे बढ़ रही है।

केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर संतुलित राय व्यक्त की है। सरकार का मानना है कि वैवाहिक संबंध में यौन बलात्कार को अपराध के रूप में मान्यता देना सामाजिक

संरचना को हिलाकर रख सकता है और परिवार के मूलभूत इकाई पर संकट उत्पन्न कर सकता है। साथ ही, सरकार ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा के लिए अन्य उपाय, जैसे कि सामाजिक जागरूकता और समर्थन सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता है। इस प्रकार, सरकारी स्थिति को देख कर कई सामाजिक संगठनों

ने भी इस पर अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया।

कई महिला अधिकार समूहों ने इस याचिका को समर्थन देते हुए कहा कि वैवाहिक बलात्कार को कानूनी रूप से मान्यता देना महिलाओं के आत्म-विश्वास को बहाल करेगा और सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ एक मजबूत संदेश देगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस कदम से पीड़िता को न्याय

मिलने की संभावना बढ़ेगी, क्योंकि अब उन्हें अपराधी के रूप में नहीं, बल्कि शिकार के रूप में माना जाएगा। इस बीच, कुछ धार्मिक और पारिवारिक संगठनों ने इस प्रस्ताव के विरुद्ध आवाज़ उठाते हुए कहा कि इससे पारिवारिक जीवन में अनावश्यक तनाव उत्पन्न होगा।

विपक्षी पक्ष ने यह तर्क दिया कि वैवाहिक संबंध में सहमति

की अवधारणा को बदलना सामाजिक मान्यताओं के साथ तालमेल नहीं रखता। उन्होंने कहा कि कई मामलों में वैवाहिक विवादों को न्यायिक रूप से हल करने से पारिवारिक बंधनों को क्षति पहुँच सकती है। इसके अलावा, उन्होंने यह भी बताया कि वर्तमान कानून में ही महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पर्याप्त

प्रावधान मौजूद हैं, और इन्हें सुधारने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।

आर्थिक पहलू से इस मुद्दे का प्रभाव भी व्यापक माना जा रहा है। यदि वैवाहिक बलात्कार को अपराध में वर्गीकृत किया जाता है, तो न्यायालय की कार्यभार में वृद्धि होगी, जिससे न्यायिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। साथ ही, इस बदलाव

से सामाजिक जागरूकता बढ़ेगी, जिससे कई महिलाओं को कार्यक्षेत्र में अधिक सुरक्षा मिलेगी और आर्थिक उत्पादन में सकारात्मक योगदान की संभावना बढ़ेगी। इसके उलट, कुछ आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि इस कदम से सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक विकास पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।

सामाजिक दृष्टिकोण से इस मुद्दे ने महिलाओं

के अधिकारों और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती को उजागर किया है। कई सामाजिक कार्यकर्ता इस बात पर बल देते हैं कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध मानकर सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ी छलांग लगाई जा सकती है। वहीं, कुछ सामाजिक समूह इस बात से चिंतित हैं कि इससे पारिवार

Updated: September 12, 2026


Summary: The Supreme Court is hearing a petition to criminalise marital rape, sparking a heated debate between women’s rights advocates who argue it would safeguard victims and opponents who warn it could undermine family stability. The government remains cautious, urging broader social reforms while the issue fuels intense public discourse and legal‑policy scrutiny.

The Supreme Court’s consideration of criminalising marital rape could create a uniform national legal framework for addressing spousal sexual abuse. It also raises questions about the potential impact on judicial workload and existing family‑law structures.

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