बिहार शराबबंदी के पहले वर्ष में ही अवैध शराब की तस्करी और खपत के आंकड़े चौंकाने वाले हैं, जिससे प्रशासन की निष्क्रियता के आरोप लग रहे हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2026 के जनवरी से मई तक राज्य में अवैध शराब की मात्रा बढ़ी है, जो कि राज्य सरकार की मंशा के विरूद्ध है।
मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो की निरीक्षण में पता चला है कि शराब बेचने वालों से 56,947 लोग गिरफ्तार किए गए हैं जिनमें से एक छोटा सा प्रतिशत शराब बेचने वालों का था। दूसरी ओर, शराब पीने वालों की संख्या लगभग दोगुनी है। राज्य में शराबबंदी से 1,14,000 के करीब लोग पकड़े गए।
इस ब्रेकिंग न्यूज़ को हमने रिपोर्ट के मुख्य हिस्से को तोड़कर आप तक पहुंचाया है। इसने राज्य से बड़ी चुनौती को तो झेल लिया, लेकिन पूर्ण शराबबंदी को वास्तविक रूप से प्रभावित करने की मुश्किलें इस बात को स्पष्ट कर देती हैं।
राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में शराबबंदी के विरोध को मानते हुए जिन लोगों की रोजी-रोटी शराब से आती है, उनकी संख्या कम नहीं है। राज्य में रोजी-रोटी न होने पर वह यहां शराब के नाम पर अपने पेट का पेट्रोल बनाते हैं।
बिहार सरकार ने शराबबंदी का निर्णय लेते समय इसके विभिन्न पहलुओं पर विचार किया था। लेकिन प्रशासन की निष्क्रियता के कारण शराबबंदी का असली स्वरूप बाहर आ गया है।
शराब के वैकल्पिक व्यापार को बढ़ावा देना एक ज़रूरी कदम है, जिससे शराब बेचने वालों को जीवनयापन के लिए एक विकल्प दिया जा सके। यही नहीं, किसानों को उनकी खेती की दामों से अधिक पैसों से भी मदद मिली होगी।
लेकिन जैसा कि हमें पता है, निजी शराब की बिक्री को शुरू करना एक अत्यंत मुश्किल काम है। जैसे शराब के तस्करों की कोई खुशबू होती है वैसे ही प्रशासन के लिए उन्हें पकड़ने के लिए भी कठिन है, लेकिन बिल्कुल जरूरी भी है।
मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो के डॉ. प्रवीण कुमार का मानना है कि शराब तस्करों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए अत्यधिक सतर्कता बरती जा रही है। वे बताते हैं, शराब तस्करों ने देसी शराब बेचने वालों का कारोबार चालु किया जिससे कि काली कमाई जारी रहे।
यह एक चिंताजनक सच्चाई है कि बिहार में शराबबंदी के बावजूद शराब की तस्करी और अवैध कारोबार की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं। इससे कानून के प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठते हैं। हालांकि, केवल इन घटनाओं के आधार पर प्रशासन की निष्क्रियता का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, क्योंकि राज्य में समय-समय पर बड़े पैमाने पर छापेमारी, जब्ती और गिरफ्तारियों की कार्रवाई भी की जाती रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि शराबबंदी कानून को प्रभावी बनाने के लिए सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने, खुफिया तंत्र को मजबूत करने, तकनीक का अधिक उपयोग करने और जन-जागरूकता अभियानों को गति देने की आवश्यकता है। साथ ही, अवैध तस्करी में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय से इस चुनौती से अधिक प्रभावी ढंग से निपटा जा सकता है।