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हिमालयी जलस्रोतों में “पीक‑वाटर” चेतावनी: 2050 तक प्रमुख नदियों का प्रवाह घटेगा

हिमालय में जलवायु परिवर्तन के कारण “पीक वाटर” की चेतावनी, नई रिपोर्ट में कहा गया कि मध्य शताब्दी तक नदियों का प्रवाह घटने की संभावना है। अंतरराष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान (IWI) द्वारा प्रकाशित इस अध्ययन ने हिमालयी जलस्रोतों की स्थिति को “टिपिंग पॉइंट” के निकट बताया। रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक कई

प्रमुख नदियों का शैक्षणिक जल स्तर अब घटना शुरू हो जाएगा, जिससे कृषि, जल आपूर्ति और ऊर्जा उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। इस चेतावनी को देखते हुए विभिन्न राज्य सरकारें और केंद्र सरकार जल प्रबंधन नीति में त्वरित बदलाव की मांग कर रही हैं।

हिमालय, जो एशिया की प्रमुख जलधारा का

मूल है, पिछले दशकों में तेज़ी से बर्फ़ीले क्षेत्रों में पिघलाव और वर्षा पैटर्न में परिवर्तन देख रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण बर्फ़ का पिघलाव पहले की तुलना में जल्दी हो रहा है, जिससे मौसमी प्रवाह में अस्थायी वृद्धि हुई, परन्तु दीर्घकालिक प्रवाह में कमी आने की

संभावना है। IWI की टीम ने 30 वर्षों के डेटा को मॉडलिंग किया, जिसमें जलवायु, भूगोलिक और मानवीय कारकों को सम्मिलित किया गया। इस मॉडल ने दिखाया कि वर्तमान प्रवाह में 3-5% की गिरावट 2040 तक हो सकती है, जो कृषि उत्पादकता और जल सुरक्षा के लिए जोखिमपूर्ण है।

रिपोर्ट के

निर्माताओं ने कहा कि “पीक वाटर” वह बिंदु है जब नदियों का प्रवाह अब बढ़ना बंद कर गिरावट शुरू करता है। यह अवधारणा जलविज्ञान में महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे जल संसाधन योजना, जलाशय प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण पर सीधा असर पड़ता है। हिमालय के कई गॉर्ज और ग्लेशियर, जो भारत, नेपाल, भूटान

और चीन में फैले हैं, अब इस चरण के निकट पहुँच रहे हैं। अध्ययन में बताया गया कि अगर मौजूदा तापमान वृद्धि दर जारी रहती है, तो 2050 तक इस “टिपिंग पॉइंट” तक पहुँचने की संभावना 70% से अधिक है।

पिछले पाँच वर्षों में भारतीय हिमालयी क्षेत्रों में तापमान में औसतन

0.6°C की वृद्धि दर्ज की गई है। इस तापमान वृद्धि के साथ बर्फ़ीले क्षेत्रों में पिघलाव की गति भी बढ़ी है। जलवायु मॉडल के अनुसार, 2023 में हिमालय के कई प्रमुख ग्लेशियरों में 10-15% बर्फ़ का नुकसान हुआ। इससे नदियों के शुरुआती प्रवाह में तीव्रता आई, परन्तु दीर्घकालिक जल संग्रहण क्षमता घट

रही है। इस बदलाव ने जल-विद्युत संयंत्रों की उत्पादन क्षमता को भी प्रभावित किया है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा पर प्रश्न उठे हैं।

इसी बीच, भारत सरकार ने जल सुरक्षा योजना के तहत कई बड़े जलाशयों का पुनर्संरचना कार्य शुरू किया है। लेकिन रिपोर्ट ने कहा कि मौजूदा उपायों में “पीक वाटर”

के प्रभाव को रोकने के लिए पर्याप्त लचीलापन नहीं है। जल अभियांत्रिकी विशेषज्ञों ने बताया कि बुनियादी ढाँचे में सुधार, जल पुनर्चक्रण और कुशल उपयोग को बढ़ावा देना आवश्यक होगा। कई राज्य जल प्राधिकरण ने जल संरक्षण के लिए नई नीतियाँ लागू करने की घोषणा की है, परन्तु उनकी कार्यान्वयन गति को

लेकर संदेह बना है।

हिमालयी नदियों पर निर्भर रहने वाले लाखों किसानों ने पहले ही जल अभाव की चेतावनी दी है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में कृषि क्षेत्र को विशेष रूप से जोखिम का सामना करना पड़ेगा। फसल उत्पादन में कमी के साथ खाद्य सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती

है। स्थानीय किसान समूहों ने जल वितरण के न्यायसंगत प्रावधान और सिंचाई प्रणाली के आधुनिकीकरण की माँग की है।

नेपाल सरकार ने भी इस रिपोर्ट को गंभीरता से लिया है। उन्होंने कहा कि हिमालयी जल स्रोतों की कमी से देश की जल आपूर्ति और ऊर्जा उत्पादन पर बड़ा असर पड़ेगा। नेपाल

के जल मंत्री ने कहा कि जल संरक्षण के लिए द्विपक्षीय सहयोग को सुदृढ़ करना आवश्यक है, विशेषकर भारत और चीन के साथ। चीन ने भी अपने हिमालयी क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन की निगरानी बढ़ा दी है, और दोनों देशों के बीच डेटा साझा करने की पहल को तेज किया गया है।

भूटान ने अपने जल संसाधन प्रबंधन में “हाइड्रो-इकोसिस्टम” को प्राथमिकता दी है। भूटान के जल वैज्ञानिकों ने कहा कि बर्फ़ीले क्षेत्रों में पिघलाव की दर को नियंत्रित करने के लिए वन संरक्षण को बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह न केवल जल प्रवाह को स्थिर रखेगा, बल्कि बाढ़ और सूखे

के जोखिम को भी कम करेगा।

आर्थिक दृष्टिकोण से, “पीक वाटर” की स्थिति उद्योगों को भी प्रभावित करेगी। जल-निर्भर ऊर्जा संयंत्र, जैसे जलविद्युत और थर्मल पावर प्लांट, को उत्पादन में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ेगा। निवेशकों ने कहा कि जल जोखिम को कम करने के

Updated: September 15, 2026

The study identifies a likely “peak‑water” tipping point for Himalayan rivers by mid‑century, signalling reduced downstream flow. This finding affects water‑resource planning, agriculture, energy generation and trans‑boundary cooperation across the region.

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