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बिहार बीजेपी में सब कुछ ठीक ठाक नहीं चल रहा है

नरेन्द्र मोदी 2014में देश के प्रधानमंत्री बने और साथ में अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष इसके बावजूद भी बिहार बीजेपी मोदी और शाह के एजेंडे के साथ खड़ा नहीं था।

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में मोदी और शाह पूरी ताकत लगा दिये बिहार बीजेपी पर कब्जा करने के लिए लेकिन इतनी बूरी हार हुई की दोनों को समझ में आ गया कि बिहार को साधना इनके बस में नहीं है,और फिर सुशील मोदी के हाथ बिहार बीजेपी का कमान सौप दोनों शांत बैठ गये।

सुशील मोदी अरुण जेटली के साथ मिलकर 2017 में नीतीश कुमार को फिर से अपने साथ लाने में कामयाब हो गये और 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 के लोकसभा में जीती हुई पाँच सीट देकर नीतीश कुमार के साथ गठबंधन करने को मजबूर हुए ।
मतलब भारत की राजनीति में आप दोनों की जोड़ी भले ही महानायक वाली क्यों ना हो बिहार में चलेगी तो नीतीश और सुशील मोदी की ही चलेगी ।

ऐसा ही 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में भी हुआ नीतीश बिहार में मोदी और शाह किस लाइन पर बोलेगे ये भी नीतीश तय किये।
चिराग के साथ गठबंधन टूटने की वजह नीतीश खुद थे या फिर चिराग के पीछे बीजेपी खड़ी थी इसलिए गठबंधन नहीं हो सका यह अभी भी स्पष्ट नहीं है ।

लेकिन गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी जिस तरीके से चिराग को मदद कर रहा था उससे यह संदेश जाने लगा था कि जदयू को कमजोर करने में बीजेपी शामिल है। हालांकि दूसरे चरण के बाद बीजेपी को लगा की यह दाव उलटा पड़ सकता है और राजद की सरकार बन जायेंगी तो फिर तीसरे चरण में चिराग को जो मदद मिल रहा था वह बंद हुआ और फिर पीएम मोदी चिराग के खिलाफ पहली बार दरभंगा की सभा में बोले तब तक बहुत देर हो चुकी थी,और फिर जो परिणाम आया उसमें पहली बार नीतीश बिहार में तीसरे नम्बर पर पहुँच गये ।

मोदी और शाह को जैसे ही मौका मिला सबसे पहले सुशील मोदी को बिहार से बाहर का रास्ता दिखाया, संगठन मंत्री नागेन्द्र जी को बिहार से बाहर किया और ऐसे विधायक को मंत्री बनाया जो नीतीश और सुशील मोदी के गुड बुक में नहीं थे और समय आने पर इन दोनों पर हमला भी कर सके ,उसी कड़ी में नितिन नवीन,सम्राट चौधरी और शहनवाज जैसे को मंत्री बनाया और प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल को नीतीश के खिलाफ बयान देने की खुली छुट दी गयी ।

बिहार विधानसभा के अध्यक्ष को सरकार को नीचे दिखाने को लेकर प्रेरित किया गया और संघ के एजेंडे को लागू करने को लेकर नीतीश पर दबाव बनाने को कहॉ गया।
पहली बार विधानसभा सत्र के दौरान जन गन मन की जगह वंदे मातरम गाया गया,विधानसभा के स्मृति स्तम्भ से अशोक चक्र को हटाया गया, इस तरह के कई काम हुए जो नीतीश को पसंद नहीं था।
2021में यानी 7 वर्ष बाद मोदी और शाह का बिहार भाजपा पर पूरी तरह कब्जा हो गया ।

वही नीतीश मोदी और शाह के रणनीति को भाप गये और चुनाव परिणाम आने के एक माह बाद ही वो चुपचाप पार्टी को मजबूत करने में लग गये गाँव गाँव तक संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश शुरु हुई ,उपेन्द्र कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर कुर्मी कोयरी गठजोड़ को मजबूत किया फिर नाराज सवर्ण नेता को मिलाना शुरु किया।

दोनों उप चुनाव जीते फिर विधान परिषद के सीट बटवारे में भी बड़े भाई की भूमिका में बने रहे विधान परिषद चुनाव में मधुबनी में बीजेपी वाले साथ नहीं दिये तो बेगूसराय में बदला ले लिये और बोचहा का रिजल्ट तो बता दिया कि बिहार में मोदी शाह की जोड़ी चलने वाला नहीं है।

यह बात जैसे ही सामने आया सुशील मोदी अपने अंदाज में हमला शुरु कर दिये और संकेत भी दे दिये कि नीतीश कमजोर होगे तो फिर 2024 का लोकसभा चुनाव में बिहार में हाल बूरा हो सकता है ।

ऐसे में आने वाले समय में नीतीश गठबंधन का साथ कब छोड़ते हैं ये तो नीतीश तय करेंगे लेकिन बिहार बीजेपी मोदी और शाह के नीति के साथ सहज नहीं है ये साफ दिखने लगा है और 60 से अधिक ऐसे बीजेपी विधायक है जो किसी भी समय चुनौती दे सकते हैं,ऐसे में वीर कुंवर सिंह के विज्योउत्सव कार्यक्रम की सफलता से मोदी और शाह के चेहते खुश हैं लेकिन सुशील मोदी की ट्टीट ने पलीता लगाने का काम कर दिया है यह साफ दिखने लगा है ।

पटेल की तरह वीर कुंवर सिंह के सहारे राजपूत नेताओं को साधने की तैयारी में तो नहीं जुटा है बीजेपी

आरा में वीर कुंवर सिंह की जयंती के मौके पर 78 हजार 25 लोगों ने तिरंगा फहराकर पाकिस्तान के एक साथ 75 हजार लोगों द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराने का वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ दिया है और अब जल्द ही यह रिकॉर्ड ग्रीनिज बुक में भारत के नाम दर्ज होगा ।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इस आयोजन के सहारे बीजेपी राजनीति के किस नैरेटिव का साधना चाह रही है। हालांकि जो नैरेटिव दिख रहा है वो यह था कि वीर कुंवर सिंह को जाति से बाहर निकाला जाये और उन्हें राष्ट्रवाद के नैरेटिव में फिट किया जाये।

इसके पीछे मोदी और शाह की यह सोच है कि पटेल की तरह ही वीर कुंवर सिंह ऐसे स्वतंत्रता सेनानी है जिनका जातीय आधार राष्ट्रीय फलक पर काफी मजबूत है लेकिन इनके जाति के कई ऐसे नेता है जो उन्हें आने वाले समय में चुनौती दे सकते हैं ऐसे में वीर कुंवर सिंह के व्यक्तित्व को राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह से स्थापित किया जाये जिससे उनके विरादरी के नेता का प्रभाव कम हो ।

इसके लिए आने वाले समय बाबू साहब अंग्रेज के साथ लड़ाई के दौरान 22 अप्रैल 1858 को जब बलिया के शिवपुर घाट पर गंगा पार कर रहे थे तब उनकी भुजा में गोली लगी जिसे काटकर गंगा में फेंक दिया था उस स्थान पर पटेल से भी बड़ी मूर्ति और शौर्य पार्क बनाने की योजना है जिसकी चर्चा आज अमित शाह अपने भाषण के दौरान किये हैं ।

साथ ही वीर कुंवर सिंह के 80 वर्ष मे हथियार उठाने और अंग्रेज का हराने का जो शौर्यगाथा रहा है उसका इस्तमाल मोदी के लिए आने वाले समय में किया जा सका ये भी रणनीति का हिस्सा है ताकी मोदी ने मार्गदर्शक मंडल के सहारे जिस तरीके आडवाणी सहित बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं को एक साथ साध दिये थे वैसे कोई मोदी को ना साधे।

क्यों कि वीर कुंवर सिंह की जो छवि रही है वो कही से भी बीजेपी के नैरेटिव में फिट नहीं बैठता है ये अलग बात है कि आजादी के आन्दोलन के दौरान सावरकर कई बार वीर कुंवर सिंह को अंग्रेजों के खिलाफ हिन्दू चेहरा के रूप में स्थापित कोशिश की जरूर किया था लेकिन उस तरीके से आगे नहीं बढ़ पाया था वैसे आज शाह कह गये हैं कि वीर कुंवर सिंह के बारे में सही इतिहास नहीं लिखा गया है ऐसे में आने वाले समय में वीर कुंवर सिंह की अलग छवि देखने को मिले तो कोई बड़ी बात नहीं होगी देखिए आगे आगे होता है क्यों कि जाति इस देश का यथार्थ है और पटेल की तरह राजपूतों का शहरीकरण नहीं हो पाया है अभी भी बड़ी आबादी गांव में रहता है कृषि उसका मुख्य पेशा है ।

ऐसे में मोदी और शाह इस खेल में कहां तक कामयाब होते हैं कहना मुश्किल है लेकिन देश की राजनीति को बदलने की एक बड़ी कोशिश जरुर है।

वीर कुंवर सिंह की जंयती पर खास

कालिदास तुम सही थे ! तुम्हारा वह कथानक चित्र जिसमें तुम पेड़ के एक डाल पर बैठे हो और उसी डाल को काट रहे हो यह बिना सोचे कि डाली जब कट के गिरेगी तो तुम भी उसी डाली के साथ गिर जाओगे।

कालिदास तुम अलग नहीं हो । सदियों से मनुष्य जाति यही तो करती आई है ।
आज बुलडोजर चलाने पर जो खुश है वो तुम्हारे कथानक चित्र को वो पात्र है, जिसे यह समझ में नहीं आ रहा है कि कानून है तो तुम हो, संविधान है तो तुम हो ।शासन और सत्ता तो चाहती ही है कि कानून और संविधान पर से लोगों का भरोसा उठ जाये ।
आज जिस रहमान के घर बुलडोजर चलने पर खुश हो, वह सिर्फ रहमान का घर नहीं है वह घर भारतीय संविधान और न्याय संहिता का घर है जिसके बुनियाद पर भारत बसा हुआ है ।सत्ता और सरकार तो चाहती ही कि कभी धर्म के नाम पर तो कभी जाति के नाम पर कानून और संविधान को धत्ता बताते रहे । कल तुम रहमान का घर टूटने पर खुशी मना रहे थे आज रमन झा और विवेक गुप्ता के घर बुलडोजर चला तो कागज दिखा रहे हो ।

तेरी हंसी कब तरे घर मातम लेकर पहुंच जाये किसी ने नहीं देखा है सत्ता और सरकार को इतनी छूट दिये तो फिर बहु बेटी को घर से उठा कर ले जाये तो कोई बड़ी बात नहीं होगी ।

Editorial

देखो सत्ता का चरित्र आज जरुरत पड़ी तो वीर कुंउर सिंह के परिवार वाले की हत्या मामले में एक माह बाद डाँक्टर पर कार्यवाही हो रही है ।इससे पहले सूना था बिहार में इलाज में लापरवाही बरतने पर किसी डाँक्टर पर कार्यवाही हुई हो ।वैसे 23 अप्रैल के बाद डाँक्टर साहब को मनचाही जगह मिल जायेंगी ये भी तय है काली हो सकता है इस कथा में तुम्हारे नाम को जोड़कर उस ज़माने के तुझे नापसंद करने वालों ने तेरी फिरकी ली हो ।फिर भी एक बात तो है, तुम मिथक कथा के पात्र ही सही पर जीवंत बिंब हो मनुष्य जाति के एक पहलू के ।

भाई भाई को लड़ा रहा है सत्ता के लिए और ससुरे को समझ में नहीं आ रहा है नौकरी और रोजगार हाथ से जा रहा है शहर दर शहर उजर रहा है 35 रुपया का पेट्रोल 120 रुपया में बेच रहा है अपनी ऐयाशी के लिए फिर भी समझ में नहीं आ रहा है।
काली मेरा मानना है कि तुम ये कहानी मनुष्य को संचेत करने के लिए गढ़ा था लेकिन दुर्भाग्य है काली 1500 सौ वर्ष बाद भी समझ में नहीं आया है क्या करोगे मनुष्य समझदार ही हो जाता तो फिर ऐसे लोगों की दुकाने कैसे चलती है।

संघ को अब भंग कर देना चाहिए – संघ का पूर्व प्रचारक

हाल ही में संघ के एक पूर्व प्रचारक से मुलाकात हो गयी आज कल वो विधायक भी हैंं लम्बे अवधि तक इनका मेरे यहां आना जाना रहा है इसलिए मुलाकात के साथ ही पुरानी यादें ताजी हो गयी । कोई चार घंटा का साथ रहा ऐसे में स्वाभाविक था कि संघ और बीजेपी को लेकर इनसे लम्बी बातचीत हुई अभी जो देश में चल रहा है उसको लेकर ये काफी दुखी है,एक बात है संघ का प्रचारक अभी भी लाग लपेट में विश्वास नहीं करता है और जो सच है उस सच को स्वीकार करने में तनिक भी देर भी नहीं करता है ।

1–संघ को अब भंग कर देना चाहिए बातचीत को लब्बोलुआब यही था कि संघ का सौ वर्ष पूरे होने वाला है अब इस संस्था को भंग कर देना चाहिए संतोष बाबू जिस समय मैं प्रचारक बना था उस समय पूरे देश में 3487 प्रचारक हुआ करता था(अविवाहित फुल टाइम संघ के लिए काम करने वाले ) पिछले वर्ष मैं बाहर निकला हूं उस समय मात्र 709 प्रचारक बच गये और हाल यह है कि नये लोग अब संघ के प्रचारक के रूप में काम करने नहीं आ रहे हैं यही स्थिति रही तो दो तीन वर्ष में सौ के नीचे हो जायेगा और आप जानते ही है कि संघ जो यहां तक पहुंचा है उसके पीछे हजारों प्रचारक का 24 घंटे का श्रम है वैसे भी संघ का लक्ष्य क्या था राम मंदिर ,धारा 370 और कॉमन सिविल कोड।

राम मंदिर और धारा 370 हो ही गया और 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले कॉमन सिविल कोड लागू हो ही जाएगा उसके बाद संघ के पास बचेगा क्या ।वैसे भी जब से सरकार में बीजेपी आयी है अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का हाल देख लीजिए अब पहले वाला तेज रहा है ,मजदूर संगठन.स्वदेशी जागरण मंच, और सरस्वती शिशु मंदिर का अब कोई मतलब रह गया संघ के सभी अनुषांगिक संस्थान का यही हाल है कोई भी संगठन कार्यक्रम और आन्दोलन से चलता है ।

सरकार में आने के बाद अब ये सब करने का गुंजाइश ही नहीं रह गया है ऐसे में संगठन कमजोर पड़ेगा संतोष बाबू विवेकानंद भी कहे थे किसी भी संस्था पर उर्म सौ वर्ष होता है और अभी जो देश मेंं हो रहा है वो संघ को स्वीकार्य नहीं है हिन्दु जागरण का यह मतलब नहीं है कि मुसलमान को तंग करे इससे संगठन को और नुकसान ही हो रहा बताइए संतोष बाबू आप तो देखे हैं ना एक साइकिल और साथ में झौला सुबह का नास्ता किसी के यहां दोपहर का भोजना किसी और के यहां,शाम का नास्ता मिला तो ठीक नहीं तो रात का भोजन किसी स्वयंसेवक के यहां होता था कोई डर भय नहीं आज ना भाजपा सत्ता में है बीस वर्ष पहले गांव में भाजपा और संघ कहां था फिर भी जो संघ का स्वयंसेवक नहीं भी था उसके दरवाजे पर भी चले जाते थे तो सम्मान के साथ बैठाते थे हमलोग को देख कर गांव की महिलाए भी हिन्दी में बात करने लगती थी हाफ पेंट वाला सर जी नाम ही था हम लोगों का लेकिन अब जो स्थिति बनते जा रहा है कोई प्रचारक सोच भी सकता है कि दूसरे विचार धारा वाले के यहां बैठ भी सकता है।

Editorial
Editorial

बताइए ना संतोष बाबू हम ठहरे प्रचारक मोटरसाइकिल से चलते हैं तो पार्टी वाला हल्ला करने लगता है आप विधायक है मोटरसाइकिल से चलिएगा बताइए तीन चार लोगों के यहां चले गये हजार रुपया का तेल लग जाता है गाड़ी रखिए तो ड्राइवर रखिए कहां से उसको पैसा देंगे विधायक फंड है तो कार्यकर्ता सबका अलगे हिसाब है संतोष बाबू यहां हमको मन नहीं लग रहा है बताइए कहता है भीड़ जुटाइए कहां से जुटाए और अगर जुट भी गया तो उसको लाने ले जाने में जो खर्च होगा कहां से लायेंगे ये सब जब पार्टी में सवाल करते हैं तो ऐसे देखता है जैसे मैं इस दुनिया के इंसान ही नहीं है बहुत मुश्किल है इसके लिए थोड़े ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिये हैं संघ में अब लौट सकते नहीं है और राजनीति हम लोगों से होने वाला नहीं है दिन भर झूठ बोलिए क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा है ।

चलिए बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई और चाचा जी लोग ठीक है ना माँ कुशल हैं बच्चा सबका पढ़ाई लिखाई चल रहा है एक बात संतोष बाबू आपका पूरा परिवार संघ का स्तम्भ रहा है आप ऐसे मत लिखा करिए सीधा हमला बोल देते हैं तो फिर विधायक जी क्या चाहते हैं कलम गिरवी लगा दे ना ना संतोष बाबू कांलेज जीवन से ही इंडिया टुडे नियमित पढ़ते थे उसमें भी तवलीन सिंह का लेख जरुर पढ़ते थे पत्रकार को स्वतंत्र जो जरुर होना। तभी जिनके कार्यक्रम में हम दोनों पहुंचे थे वो दौरे दौरे आये और बोले विधायक भी संतोष जी से क्या बतिया रहे हैं सब बात मीडिया में आ जाएगा, नहीं नहीं हम लोग इनके घर में पले बढ़े हैं पता है अपने मिजाज से पत्रकारिता करते हैं वैसे संघ को अब भंग कर देना चाहिए ये मैं अब मंच से भी बोलने वाला हूं ।

उजड़ता बिहार : बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था अंतिम सांसे ले रही है

काफी लम्बे अंतराल के बाद हाल में ही 20 दिनों से अधिक समय तक गांव और गांव के लोगों के बीच रहने का मौका मिला वैसे गांव में अब पहले वाली बात नहीं रही युवा तो दिखता ही नहीं है कुछ बच्चे दिखते हैं उन्हें भी खेलकुद से ज्यादा वास्ता नहीं है। फिर भी गांव मुझे बहुत आकर्षित करता है वजह गांव के लोगों में एक अलग तरह का विश्वास और समझदारी आज भी देखने को मिलता है ।

दरभंगा बाजार समिति से कोई दस किलोमीटर पर एक गांव है गांव के मुखिया जी रिश्तेदारी में आते हैं उनसे मिलने उसके घर गये थे ,पूरानी हवेली कब गिर जाए कहना मुश्किल है ,दरवाजे पर दो दो ट्रैक्टर देखने से लगता था कि वर्षो से बंद पड़ा है,दरवाजे के ठीक सामने लम्बा सा घर जिसमें सौ से अधिक मवेशी को बांधने वाला खूंटा औरमवेशी के खाना खाने वाला नाद बना है लेकिन बहुत दूर एक गाय बंधी हुई दिखायी दी ।ठीक उसके सामने बहुत बड़ा खलिहान था जिसके बीचो बीच अभी भी एक बांस गड़ा हुआ दिख रहा था जहां कभी दर्जनों बैल धान का दौनी करता होगा ऐसा एहसास आज भी हो रहा था।

खलिहान के ठीक बाजू में अनाज रखने के लिए बड़ा बड़ा घर बना हुआ था मिथिलांचल में इसे बखाड़ी कहते हैं बखाड़ी का हाल यह था कि ऊपर का छज्जा कब उड़ गया अनुमान लगाना मुश्किल है एक आकृति बची हुई है जो एहसास दिलाती है कि किसी जमाने में हजार क्विंटल अनाज रहता होगा।दरवाजे पर जो कुर्सी लगी हुई थी ऐसा लग रहा था वर्षो से उसका रंग रोगन नहीं हुआ है शीशम और सखुआ जैसे लकड़ी का बना हुआ है इसलिए अभी टूटा नहीं है ।यह सब मैं देख ही रहा था कि भूंजा आ गया लगा चलो बहुत दिनों बाद गाँव के कनसार(जहाँ भुजा बनाता था) का भूंजा खाने का मौका मिला लेकिन देख कर बड़ी निराशा हुई वही शहर वाला भूंजा चूड़ा और चना अलग से नमक ,प्याज और मिर्च।

भूंजा खत्म होते होते चाय आ गया वैसे मैं चाय पीता नहीं हूं फिर भी दो घुट ले लिए चाय के स्वाद से लग गया कि इस घर का हाल क्या है मुखिया बनते आ रहे हैं क्यों कि इसके दादा जी भी मुखिया थे और गांव के लोगों में आज भी धारणा है कि मालिक का परिवार है इनके बच्चों में वो ईमान धर्म बचा हुआ है और परिवार वाले उसी ईमान धर्म को बनाये रखने में इस बार भी मुखिया बनने में दो बीघा जमीन बेचना पड़ा है। यह हाल किसी एक गांव के किसानों का नहीं है यह हाल बिहार के हर गांव का है जिनके पास जमीन है वो आज सबसे अधिक गरीब है उनके पास जरूरतें पूरी करने लाइक भी पैसे घर में नहीं है शादी हो या फिर कोई बीमार पड़ गया तो जमीन बेचने के अलावे उसके पास कोई चारा नहीं रह गया है यही हाल छोटे किसान और खेतिहर मजदूर का है यू कहे तो पूरी कृषि व्यवस्था अंतिम सांसे ले रही है मुफ्त में अनाज योजना का कितना बड़ा असर कृषि पर पड़ा है जरा गांव में जाकर देखिए ।

इतना ही नहीं पहले हर गांव में आपको सौ दो सौ भैंस गाय मिल जाता था आज गरीब के घर भी एक दो मवेशी मिल जाये तो बड़ी बात है हालांकि अभी भी गांव का यह कृषक समाज हार नहीं माना है संघर्ष कर रहा है अभी मुर्गी पालन और मछली पालन के सहारे किसानी को किसी तरह खींच रहा है ,लेकिन अब यह साफ दिखने लगा है कि गांव का कृषि व्यवस्था अंतिम सांसे ले रही है ।इस हालात को समझने के लिए मैं छोटे और बड़े किसानों से जहां गया जिस गांव में गया काफी बातचीत किया जो स्थिति बनती जा रही है उसमें यह कह सकते हैं कि भारत भी श्रीलंका की और बढ़ चला है ।

किसानों से खेती ना करने कि वजह जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि खेती में पांच वर्ष पहले जहां पांच हजार रुपया बीघा खर्च होता था आज वो खर्च 25 हजार रुपया बीघा हो गया है लागत मूल्य पांच गुना बढ़ गया है लेकिन अनाज का दाम में मामूली वृद्धि हुई है, पांच वर्ष पहले खेत के जोत में नौ फाड़ा ,कल्टी और रोटावेटर का रेट था 25–35–50 रुपये प्रति कट्टा था वो आज बढ़कर नौ फाड़ा 50 रुपया ,कल्टी 70 रुपया और रोटावेटर 100 रुपया कट्टा हो गया है ।

लेकिन अभी हाल यह है कि दूध का उत्पादन घट कर रोजाना दो लाख से ढाई लाख प्रति लीटर हो गया है ,दूध का पाउडर बनाने वाली मशीन महीनों से बंद है,दूध उत्पादन में कमी को लेकर जब किसान से बात किये तो पता चला कि जर्सी और फ्रीजियन गाय के पालने में उसके खाना और दवा में इतना खर्च बढ़ गया कि अब किसान को गाय पालना घाटे का सौदा हो गया है। समस्तीपुर के किसी भी गांव में चले जाये जहां कभी हर किसान के दरवाजे पर दस से बीस गाय रहता था आज घटकर दो चार बच गया है छोटे किसान भी गाय पालना लगभग छोड़ दिया है ।

यह उजड़ा बिहार की वो तस्वीर है जिसके सहारे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि पुचका बेचने बिहारी कश्मीर क्यों जा रहा है , पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था बर्बाद हो चुका है एक और बदलाव आया है पहले बिहारी जो बिहार से बाहर काम करता था गांव में जमीन और घर बनाने में निवेश करता था लेकिन यह प्रवृति भी काफी तेजी से घट रहा है इसका असर भी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था पर बहुत ही गहरा पड़ा है ।

इतना ही नहीं बहेरी ,बिरौल और कुशेश्वर स्थान जैसे छोटे छोटे बाजार में भी माँल खुल गया है इसका असर यह देखने को मिल रहा है कि छोटे छोटे दुकान के सहारे वर्षो से रोजगार करने वाले दुकानदारों का दुकान बंद होने के कगार परआ गया है यू कहे तो पूरी ग्रामीण अर्थ व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है फिर भी लोग खामोश है । ऐसे तमाम उजड़े हुए चमन के घर पर आपको मोदी और भगवा झंडा जरुर मिल जायेंगा जिसके पास अपनी बदहाली पर बात करने कि फुर्सत तक नहीं है।

अब देखना यह है कि हिन्दू मुसलमान ,जय श्री राम और पांच किलो अनाज के सहारे कितने दिनों तक सरकार इस बवंडर को रोक पाती है वैसे अंदर अंदर आग तो सुलगनी शुरु हो गयी है बस एक माचिस की जरूरत है।

अनुपम खैर कब से मौका परस्त हो गये

अक्सर मेरी दादी कहती थी कि जो जितना पढ़ा है वो उतना भ्रष्ट है ।दादी से मैं अक्सर भ्रष्ट का मतलब समझना चाहते थे वैसे उनकी नजर में पढ़ा लिखा लोग(व्यक्ति) में लोक लज्जा नहीं होता है सही को सही और गलत को गलत कहने की ताकत नहीं होती है साथ ही मौका परस्त होता । तो फिर मेरा सवाल होता था कि हम लोगों को क्यों पढ़ा रही हो,दादी पूरे विश्वास के साथ कहती थी तुम लोग भी पढ़ के यही करेगा फिर भी पढ़ा रहे हैं लोक(मनुष्य) तो बन जायेगा ।

आज एक बार फिर मुझे दादी की कही वो बात याद आ गयी द कश्मीर फाइल्स फिल्म के मुख्य किरदार अनुपम खेर ने कश्मीर समस्या को लेकर 2010–2011-2012 और 2013 में ट्वीट किया है उस ट्वीट में क्या लिखा है जरा आप भी पढ़ लीजिए –
1—2010 में कश्मीर के मसले पर अनुपम खेर ने एक ट्वीट किया था, इसमें वो लिखते हैं-
”कश्मीर के लिए मेरा दिल रोता है. राजनीति और आतंकवाद ने वहां के लोगों के लिए इस जन्नत को जहन्नुम बनाकर छोड़ दिया है. हिंदु और मुस्लिम दोनों के लिए.”

2——2011 में अनुपम खेर ने एक इमाद नजीर नाम के एक ट्विटर यूजर को जवाब देते हुए लिखा-
”समस्या कश्मीरी पंडितों और मुस्लिमों के साथ नहीं है. हम सालों तक शांति से एक-दूसरे के साथ रहे हैं. ये सब पॉलिटिशियन का किया धरा है दोस्त.”


3————-2012 में अनुपम खेर का कश्मीर, कश्मीरी पंडितों और मुसलमानों पर किया एक ट्वीट नीचे पढ़िए-
”न भूलिए. न माफ करिए. हमें कश्मीरी मुस्लिमों के साथ पंडित महिलाओं के बारे में नहीं भूलना चाहिए. दोनों कमोबेश एक समान दुख से गुज़रे हैं.”


4———2013 में किया अनुपम खेर का ये ट्वीट ‘द कश्मीर फाइल्स’ की रिलीज के बाद सबसे ज्यादा वायरल हो रहा है. इसके पीछे की वजह आप ये ट्वीट पढ़कर समझ जाएंगे-
”मैं देख रहा हूं कि कुछ लोग विस्थापन को लेकर कश्मीरी पंडितों के हाहाकार को धार्मिक रंग दे रहे हैं. ये धर्म के बारे में नहीं है. मानवीय पीड़ा के बारे में है, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों गुज़रे.”

5—-द कश्मीर फाइल्स की रिलीज के बाद अनुपम खेर ने लिखा-
”लोगों का प्यार, कश्मीरी हिंदुओं के आंसू, विवेक अग्निहोत्री का धैर्य/साहस, द कश्मीर फाइल्स की पूरी टीम की मेहनत और सबसे ऊपर बाबा भोलेनाथ का आशीर्वाद. सच की जीत कभी ना कभी तो होनी थी. 32 साल बाद ही सही. कश्मीर को लेकर अनुपम खेर या तो पहले झूठ बोल रहे थे या फिर अब झूठ बोल रहे हैं लेकिन बड़ा सवाल यह है कि अनुपम खेर जैसी शख्सियत को ये करने कि जरूरत क्यों पड़ी जिसके अभिनय ने देश के यूथ को ईमानदारी और राष्ट्र प्रेम के लिए प्रेरित किया लेकिन इस ट्वीट के पढ़ने के बाद तो यही लगता है कि अनुपम खेर कर्मा वाला डॉक्टर डैंग ही हैं बाकी सब ढोंग है ।