Bihar Police AK-47 Firing: बिहार में हालिया छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की ओर से AK-47 से फायरिंग के मामले ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख कर लिया है। बिहार सरकार ने शीर्ष अदालत में दाखिल अपने जवाब में कहा है कि सीवान में 25 जुलाई को एक कांस्टेबल भीड़ के बीच फंस गया था और खुद को बचाने तथा भीड़ को तितर-बितर करने के लिए उसने हवा में AK-47 से चार गोलियां चलाईं। राज्य सरकार के अनुसार इस फायरिंग से किसी भी CJP प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी। हालांकि पुलिस कार्रवाई के दौरान तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली गोली लगने की चोटें आईं, लेकिन सरकार ने स्पष्ट किया कि ये चोटें AK-47 से नहीं लगी थीं।
सुप्रीम कोर्ट में बिहार सरकार ने रखा अपना पक्ष
बिहार सरकार ने 17 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में अपना हलफनामा दाखिल किया। यह जवाब उन याचिकाओं के संदर्भ में दिया गया है, जिनमें CJP से जुड़े प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कथित ज्यादती और बल प्रयोग के आरोप लगाए गए हैं। राज्य ने अपने जवाब में कहा कि सुरक्षा एजेंसियों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल का इस्तेमाल नहीं किया और स्थिति को नियंत्रित करने के दौरान संयम बरता गया।
सरकार के मुताबिक, 25 जुलाई को सीवान के JP चौक के पास हालात तनावपूर्ण हो गए थे। इसी दौरान कांस्टेबल अभिषेक कुमार भीड़ में फंस गए। राज्य के अनुसार, भीड़ से घिरे होने के बाद उन्होंने अपनी AK-47 से हवा में चार राउंड फायर किए। सरकार ने इस फायरिंग को भीड़ से निकलने और स्थिति को नियंत्रित करने की कार्रवाई के तौर पर बताया है।
AK-47 से चार राउंड फायरिंग का दावा
बिहार सरकार के हलफनामे में कहा गया है कि कांस्टेबल ने AK-47 से चार गोलियां हवा में चलाईं। राज्य का दावा है कि इन गोलियों से किसी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि AK-47 का इस्तेमाल कानून-व्यवस्था की सामान्य ड्यूटी के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
राज्य ने बताया कि AK-47 एक प्लाटून स्तर का हथियार है, जिसे विशेष अभियानों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। कांस्टेबल अभिषेक कुमार को इस घटना के बाद निलंबित कर दिया गया है और उनके खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई है।
तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली गोली की चोट
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि पुलिस कार्रवाई के दौरान तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली गोली लगने की चोटें आई थीं। लेकिन राज्य का कहना है कि ये चोटें AK-47 से नहीं लगीं।
हलफनामे के अनुसार, ये तीनों लोग उस स्थान पर मौजूद नहीं थे जहां कांस्टेबल ने AK-47 से गोली चलाई थी। राज्य ने इन चोटों को पुलिस कार्रवाई से जोड़ते हुए भी यह स्पष्ट किया कि AK-47 फायरिंग और इन चोटों के बीच कोई संबंध नहीं था।
यह स्पष्टीकरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग को लेकर सवाल उठे थे। अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार का आधिकारिक पक्ष यह है कि AK-47 से हुई फायरिंग में किसी प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी।
एक अन्य पुलिस अधिकारी ने भी चलाई गोलियां
सीवान की घटना में केवल AK-47 फायरिंग ही नहीं हुई थी। सरकार ने बताया कि हथी चौक के पास सहायक उपनिरीक्षक यानी ASI निलेश कुमार सिंह ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अपनी 9mm पिस्तौल से दो राउंड फायर किए।
इस प्रकार राज्य के जवाब के मुताबिक उस दिन पुलिस की ओर से दो अलग-अलग स्थानों पर हथियारों का इस्तेमाल हुआ। एक ओर कांस्टेबल ने AK-47 से हवा में चार राउंड चलाए, जबकि दूसरी ओर ASI ने 9mm पिस्तौल से दो राउंड फायर किए।
कांस्टेबल पर हुई विभागीय कार्रवाई
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि AK-47 से फायरिंग करने वाले कांस्टेबल अभिषेक कुमार को निलंबित किया जा चुका है। उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।
राज्य ने इसे ‘अनुचित आचरण’ बताया है। सरकार का यह कदम यह संकेत देता है कि पुलिस की ओर से भीड़ नियंत्रण के दौरान AK-47 का इस्तेमाल प्रशासन की निर्धारित व्यवस्था के अनुरूप नहीं माना गया।
यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि कानून-व्यवस्था की ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी को AK-47 जैसी राइफल किस परिस्थिति में उपलब्ध कराई गई और भीड़ में फंसने की स्थिति क्यों पैदा हुई। विभागीय जांच में इन पहलुओं पर भी ध्यान दिया जा सकता है।
राज्य ने पुलिस पर लगे अत्यधिक बल के आरोपों को खारिज किया
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसके अधिकारियों और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अधिकतम संयम बरता। राज्य ने यह दावा भी किया कि पुलिस ने किसी प्रदर्शनकारी को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से अनुपातहीन बल का इस्तेमाल नहीं किया।
सरकार ने प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए प्रदर्शनकारियों के बीच शामिल ‘असामाजिक तत्वों’ को जिम्मेदार ठहराया। राज्य के अनुसार, कई जगह सरकारी अधिकारियों और पुलिसकर्मियों पर भी हमले किए गए।
157 पुलिसकर्मी और 7 सरकारी कर्मचारी घायल
बिहार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को राज्यभर में हुए प्रदर्शनों का जिला-वार विवरण भी सौंपा है। सरकार के अनुसार, 22 से 25 जुलाई के बीच हुई हिंसक घटनाओं में कुल 157 पुलिसकर्मी और 7 अन्य सरकारी कर्मचारी घायल हुए।
राज्य ने बताया कि प्रदर्शन से जुड़े घटनाक्रम के दौरान पटना, सीवान, जहानाबाद, छपरा, सीतामढ़ी, भागलपुर, औरंगाबाद, कटिहार और किशनगंज समेत कई जिलों में हिंसा और टकराव की घटनाएं सामने आईं।
जहानाबाद में DM आवास पर हमले का आरोप
बिहार सरकार के मुताबिक 24 जुलाई को प्रदर्शनकारियों ने जहानाबाद के जिलाधिकारी आवास पर कथित रूप से हमला किया। इस घटना में 18 अधिकारियों के घायल होने का दावा राज्य ने अपने जवाब में किया है।
सरकार ने इन घटनाओं को पुलिस कार्रवाई के व्यापक संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा है। राज्य का तर्क है कि प्रदर्शन के दौरान कई जगह हिंसा हुई और सरकारी अधिकारियों तथा संपत्ति को नुकसान पहुंचा, जिसके कारण पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।
पटना में मार्च के बाद हिंसा का दावा
सरकार के अनुसार 22 जुलाई को ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन यानी AISA द्वारा पटना के गांधी मैदान से लोक भवन की ओर निकाले गए मार्च के दौरान स्थिति हिंसक हो गई थी।
इस मामले में पुलिस ने 24 FIR दर्ज कीं, जिनमें 808 लोगों को आरोपी बनाया गया और 65 लोगों को गिरफ्तार किया गया। राज्य ने इस घटनाक्रम को भी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने विस्तृत जवाब का हिस्सा बनाया है।
69 FIR और 500 गिरफ्तारियां
बिहार सरकार ने बताया कि 22 से 25 जुलाई के बीच राज्य के विभिन्न जिलों में प्रदर्शन से संबंधित कुल 69 FIR दर्ज की गईं और लगभग 500 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
हालांकि सरकार ने यह भी कहा कि इनमें से ऐसे 222 छात्र प्रदर्शनकारियों को जमानत पर रिहा कर दिया गया, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था। इसके अलावा 75 नाबालिगों को किशोर न्याय बोर्ड के माध्यम से रिहा किया गया।
यह आंकड़े सरकार के उस रुख को दर्शाते हैं कि कार्रवाई का उद्देश्य सभी प्रदर्शनकारियों को लंबे समय तक जेल में रखना नहीं था, बल्कि हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले मामलों में कानून के तहत कार्रवाई करना था।
अधिकांश मामलों को बंद करने का फैसला
बिहार सरकार ने अपने जवाब में यह भी कहा है कि CJP के केंद्र सरकार के साथ रुख को देखते हुए उसने गिरफ्तारियों और दर्ज मामलों में से बड़ी संख्या में मामलों को बंद करने का फैसला किया है।
राज्य ने विशेष रूप से उन छात्रों के मामलों में नरमी का संकेत दिया है जिनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। इससे सरकार की ओर से आंदोलन से जुड़े मामलों को लेकर कुछ राहत देने की कोशिश दिखाई देती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अब कई गंभीर सवाल
बिहार सरकार का हलफनामा इस मामले में राज्य का पक्ष स्पष्ट करता है, लेकिन इससे कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल भी सामने आते हैं। सबसे अहम प्रश्न यह है कि भीड़ नियंत्रण की स्थिति में पुलिस द्वारा AK-47 जैसे हथियार का इस्तेमाल किस स्तर की अनुमति और प्रोटोकॉल के तहत हुआ।
दूसरा सवाल यह है कि यदि कांस्टेबल भीड़ में फंस गया था, तो उसे सुरक्षित निकालने के लिए क्या अन्य विकल्प उपलब्ध थे। तीसरा सवाल उन तीन प्रदर्शनकारियों की चोटों से जुड़ा है, जिन्हें पुलिस कार्रवाई के दौरान गोली लगने की चोटें आईं। इन सभी पहलुओं की स्वतंत्र जांच से घटनाक्रम की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
आंदोलन, पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकार
किसी भी लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों के महत्वपूर्ण अधिकारों में शामिल है। वहीं पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने तथा सरकारी और निजी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने की होती है।
यही कारण है कि जब किसी प्रदर्शन के दौरान पुलिस हथियारों का इस्तेमाल करती है तो कार्रवाई की परिस्थितियां, बल की आवश्यकता और अनुपातिकता जैसे प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाते हैं। बिहार सरकार ने अपने जवाब में पुलिस के संयम का बचाव किया है, जबकि याचिकाकर्ताओं के आरोपों और उपलब्ध तथ्यों का अंतिम मूल्यांकन न्यायिक प्रक्रिया में होना बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट में अब आगे क्या?
बिहार सरकार का हलफनामा मामले में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है, लेकिन यह अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को राज्य के जवाब के साथ-साथ याचिकाकर्ताओं के आरोप, पुलिस कार्रवाई के रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों पर भी विचार करना होगा।
अदालत यदि आवश्यक समझती है तो घटनाओं की स्वतंत्र जांच, पुलिस की कार्रवाई के रिकॉर्ड या संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर निर्देश दे सकती है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित होगा कि सरकार ने AK-47 फायरिंग को परिस्थितिजन्य कार्रवाई बताया है और किसी प्रदर्शनकारी के उससे घायल होने से इनकार किया है।
AK-47 फायरिंग पर सरकार का पक्ष आया सामने
सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से फायरिंग की घटना अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पहुंच चुकी है। बिहार सरकार ने अपने 17 अगस्त के हलफनामे में कहा है कि कांस्टेबल अभिषेक कुमार भीड़ में फंस गए थे और उन्होंने खुद को बचाने के लिए हवा में चार राउंड फायर किए। सरकार के मुताबिक इस फायरिंग में किसी CJP प्रदर्शनकारी को चोट नहीं लगी। वहीं तीन प्रदर्शनकारियों को मामूली गोली की चोटें आईं, लेकिन राज्य का कहना है कि ये चोटें AK-47 से नहीं लगी थीं।
कांस्टेबल को निलंबित कर विभागीय कार्रवाई शुरू कर दी गई है। साथ ही सरकार ने प्रदर्शन के दौरान राज्यभर में 157 पुलिसकर्मियों और 7 अन्य सरकारी कर्मचारियों के घायल होने तथा 69 FIR और करीब 500 गिरफ्तारियों का विवरण अदालत के सामने रखा है।
अब इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्यायिक जांच और उपलब्ध साक्ष्यों की होगी। पुलिस के सामने कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, लेकिन प्रदर्शनकारियों के अधिकारों और बल प्रयोग की सीमाओं का संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल बिहार सरकार का जवाब अब इस विवाद की अगली कानूनी दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।