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लोकसभा सचिवालय ने तमिलनाडु कांग्रेस के बागी सांसदों की अयोग्यता याचिका उत्तर के लिए 15‑दिन का समय बढ़ाने की मांग को विचाराधीन

लोकसभा के सचिवालय को आज दोपहर एक आधिकारिक नोटिस मिला, जिसमें कई तमिलनाडु कांग्रेस (टीएमसी) के बागी सांसदों को उनकी अयोग्यता की याचिका पर उत्तर देने के लिये केवल पाँच दिन का समय दिया गया था। इस नोटिस के जवाब में बागी सांसदों ने अतिरिक्त पंद्रह दिन की विस्तार की मांग की, यह बात आज दिल्ली के

संसद भवन के पास एकत्रित हुए पत्रकारों को बताई गई। विस्तार की मांग के पीछे मुख्य कारण दस्तावेज़ों की पूर्णता न होना बताया गया, जबकि विपक्षी दलों ने इस कदम को राजनीतिक दबाव का हिस्सा कहा।

टामिलनाडु कांग्रेस के बागी सांसदों का समूह कई महीनों से पार्टी के प्रमुख नेता के खिलाफ विरोध प्रदर्शित कर रहा है। उनका

विरोध मुख्यतः पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की नीतियों और उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को लेकर है, जिससे कई सांसदों ने अपना समर्थन वापस ले लिया। इस संघर्ष के कारण सांसदों को लोकसभा में अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिये कई बार नोटिस प्राप्त हुए हैं। अब तक इस समूह ने लगभग दो सौ दस्तावेज़ एकत्र किए थे, लेकिन

वे सभी को एकसाथ प्रस्तुत करने के लिये समय की कमी का हवाला दे रहे हैं।

बागी सांसदों में प्रमुख आवाज़ गीता घोष-दास्तिदर ने कहा कि उन्होंने सभी आवश्यक कागजात इकट्ठा करने की पूरी कोशिश की है, परंतु कुछ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ अभी भी विभिन्न जिलों से प्राप्त नहीं हुए हैं। उन्होंने कहा कि इन दस्तावेज़ों में वित्तीय लेन‑देनों,

पार्टी के भीतर अनुशासनहीनता और चुनावी उल्लंघन के प्रमाण शामिल हैं, जिन्हें पूर्ण रूप से जांचे बिना उत्तर देना अनिवार्य नहीं होगा। इस कारण उन्होंने सचिवालय से पंद्रह दिन का अतिरिक्त समय माँगा, ताकि वे अपनी प्रतिक्रिया को व्यवस्थित रूप से तैयार कर सकें।

लोकसभा सचिवालय ने इस मांग पर अभी तक कोई औपचारिक उत्तर नहीं दिया है,

परंतु प्रक्रिया के तहत ऐसे अनुरोधों को विचार करने की प्रथा मौजूद है। सचिवालय की एक अज्ञात अधिकारी ने कहा कि यदि बागी सांसदों को सभी दस्तावेज़ तैयार करने में कठिनाई हो रही है, तो उन्हें आवश्यक समय दिया जाएगा, बशर्ते कि वे अपने अनुरोध को लिखित रूप में प्रस्तुत करें। यह बयान संसद के कार्यप्रवाह की

पारदर्शिता को दर्शाता है, जबकि यह भी स्पष्ट करता है कि नियमों में लचीलापन हो सकता है।

बागी सांसदों के इस कदम को राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने अलग‑अलग रूप से देखा है। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि यह विस्तार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सम्मान के लिये आवश्यक है और इसे राजनीतिक

दमन के रूप में नहीं देखना चाहिए। वहीं राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के प्रतिनिधियों ने कहा कि संसद को अपने कार्यकाल में अनुशासन बनाए रखना चाहिए और इस तरह की मांगें अनावश्यक देरी पैदा कर सकती हैं। इस बीच कई स्वतंत्र विश्लेषकों ने कहा कि यह मामला संसद की कार्यकुशलता और पार्टी के आंतरिक संघर्ष दोनों को

उजागर करता है।

आर्थिक दृष्टिकोण से इस विवाद का असर अभी स्पष्ट नहीं है, परंतु सांसदों के अयोग्यता की संभावित प्रक्रिया से संसद में वोटिंग शक्ति के पुनर्संतुलन की संभावना बनी है। यदि बागी सांसदों को अयोग्य ठहराया जाता है, तो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में उप-चुनाव आयोजित होना पड़ेगा, जिससे आर्थिक खर्च में वृद्धि होगी। इसके अलावा, कई

राज्य‑स्तरीय विकास योजनाओं की मंजूरी में देरी हो सकती है, क्योंकि संसद में बहुमत के परिवर्तन से विधेयक पारित करने में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

सामाजिक प्रभावों की बात करें तो इस घटना ने तमिलनाडु में सार्वजनिक विचारधारा को भी प्रभावित किया है। कई नागरिक समूहों ने इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन किए, जिसमें बागी सांसदों की

पक्षधरता और विरोध दोनों स्पष्ट दिखे। इस बीच सामाजिक मीडिया पर इस मामले को लेकर बहस चल रही है, जहाँ कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा मानते हैं, तो कुछ इसे राजनीतिक खेल का हिस्सा मानते हैं। यह विभाजन सामाजिक संवाद को तीव्र बनाता है और चुनावी माहौल को गर्माता है।

बागी सांसदों के प्रमुख प्रतिनिधि गीता

घोष-दास्तिदर ने अपने बयान में कहा कि वे इस विस्तार को केवल प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिये माँग रहे हैं, न कि किसी प्रकार की देरी की रणनीति के रूप में। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि उन्हें पर्याप्त समय नहीं दिया गया, तो उनका उत्तर अधूरा रह सकता है, जिससे न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न होगी।

इसके अलावा, उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी के भीतर सुधार की आवश्यकता को समझते हुए उन्होंने इस कदम को उठाया है, जिससे भविष्य में ऐसी समस्याएँ दोहराई नहीं जा सकें।

विपक्षी दलों के नेता ने इस मांग को लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सम्मान के रूप में सराहा, परंतु उन्होंने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि सांसदों को अपनी

जिम्मेदारियों को समय पर पूरा करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि बागी सांसदों को आवश्यक दस्तावेज़ नहीं मिलते, तो यह उनकी स्वयं की असंगतियों को दर्शाता है। इस पर कई सांसदों ने कहा कि विस्तार के बाद भी यदि उत्तर स्पष्ट नहीं रहा तो उन्हें आगे की कार्यवाही का सामना करना पड़ेगा

Updated: October 8, 2026

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