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भु‑भारत पोर्टल की तकनीकी खामियों से कृषि भूमि लेन‑देन में देरी, डेटा सत्यापन के लिए नई टीमें तैनात की जाएँगी

भु-भारत पोर्टल अभी पूरी तरह से कार्यशील नहीं होने के कारण भारत के कृषि भूमि लेन‑देन में मौजूदा विसंगतियों को दूर करने में कठिनाइयों का सामना किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने डिजिटल भूमि अभिलेख प्रणाली को तेज़ी से लागू करने का आश्वासन दिया था, परन्तु तकनीकी खामियों और डेटा असंगति के कारण किसान तथा रजिस्ट्री अधिकारी दोनों ही इस पोर्टल के उपयोग में बाधाओं का सामना कर रहे हैं। इस स्थिति ने भूमि बिक्री, वार्ता और वार्षिक कर भुगतान जैसे महत्त्वपूर्ण वित्तीय प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ी है।

पिछले पाँच वर्षों में भूमि रिकॉर्ड को इलेक्ट्रॉनिक रूप में संकलित करने के लिए कई पहलें चलाई गईं। 2019 में ‘डिजिटल इंडिया’ के तहत भु‑भारत पोर्टल का विकास शुरू हुआ, जिसका उद्देश्य जमीन के स्वामित्व, सीमांकन और कर‑दायित्व की जानकारी को एक ही मंच पर उपलब्ध कराना था। इस योजना के तहत राज्यों को अपने भूमि राजस्व विभागों को पोर्टल से जोड़ने और मौजूदा कागजी अभिलेखों को डिजिटल रूप में परिवर्तित करने का निर्देश दिया गया। प्रारंभिक चरण में कुछ प्रमुख राज्यों ने सफलतापूर्वक डेटा माइग्रेशन पूरा किया, परन्तु अधिकांश छोटे जिलों में डेटा की सटीकता और अद्यतन में कमी देखी गई।

डेटा असंगति का मुख्य कारण भूमि सर्वेक्षण की पुरानी पद्धतियों और स्थानीय रजिस्ट्री में दर्ज रिकॉर्ड के बीच तालमेल न होना बताया गया है। कई बार किसानों द्वारा वास्तविक रूप से जिस क्षेत्र में खेती की जाती है, वह सरकारी अभिलेखों में दर्ज नहीं रहता, या फिर अभिलेख पुरानी सीमाओं के आधार पर बना रहता है। इस अंतर के कारण जब किसान पोर्टल पर अपनी भूमि की जानकारी देखना चाहते हैं तो अक्सर उन्हें असंगत आँकड़े मिलते हैं, जिससे लेन‑देन में देरी और कानूनी विवाद उत्पन्न होते हैं।

भु‑भारत पोर्टल के तकनीकी विभाग ने कहा है कि प्रारंभिक चरण में सर्वर लोड, यूज़र इंटरफ़ेस की जटिलता और डेटा इंटेग्रेशन समस्याओं के कारण पोर्टल का प्रदर्शन अपेक्षित स्तर पर नहीं रहा। पोर्टल के परीक्षण संस्करण में उपयोगकर्ताओं को लॉग‑इन करने में बार‑बार त्रुटियाँ मिल रही थीं, जबकि कई ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या भी इस पर असर डाल रही थी। इन समस्याओं के कारण किसानों को अपने रिकॉर्ड को अपडेट करने के लिए रजिस्ट्री कार्यालयों की यात्रा करनी पड़ती है, जिससे समय और खर्च दोनों में वृद्धि होती है।

वहीं, राज्य भूमि विभागों के प्रमुख ने बताया कि पोर्टल की पूरी कार्यक्षमता प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जिले में कम से कम दो तकनीकी अधिकारी नियुक्त किए जा रहे हैं, जो डेटा सत्यापन और अपडेट का काम करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान में पोर्टल में अपलोड किए गए 2.5 करोड़ रिकॉर्डों में से केवल 60 प्रतिशत को पूर्ण रूप से मान्य किया गया है। शेष रिकॉर्डों को मान्य करने के लिये विस्तृत फील्ड सर्वेक्षण और स्थानीय अधिकारियों के साथ समन्वय की आवश्यकता होगी।

इसी बीच, कई वित्तीय संस्थानों ने भी इस डिजिटल मंच पर भरोसा नहीं किया, जिससे भूमि‑आधारित ऋण की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न हुई है। बैंकों के प्रतिनिधियों ने कहा कि वे तब तक पोर्टल पर उपलब्ध डेटा को आधिकारिक मान्यता नहीं देंगे जब तक उसकी सटीकता और अद्यतनता की पुष्टि नहीं हो जाती। इस कारण ग्रामीण ऋण की मंज़ूरी में देरी हो रही है, जिससे कृषि निवेश और उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

कई किसान संगठनों ने पोर्टल की अनियमितता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और तत्काल सुधार की माँग की। दिल्ली में आयोजित एक सामूहिक बैठक में उन्होंने कहा कि यदि पोर्टल के माध्यम से अपनी जमीन की सही जानकारी नहीं मिल पाती, तो वे भूमि बेचने या किराए पर देने की प्रक्रिया को छोड़ देंगे। उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी डिजिटल पहल का लाभ तभी उठाया जा सकता है जब तकनीकी बुनियादी ढाँचे और डेटा की विश्वसनीयता को प्राथमिकता दी जाए।

राज्य सरकारों ने इस मुद्दे पर त्वरित कार्यवाही का आश्वासन दिया। महाराष्ट्र सरकार के भूमि अधिकारी ने कहा कि अगले तीन महीनों में सभी जिलों में डेटा सत्यापन टीमें तैनात की जाएँगी और पोर्टल की कार्यक्षमता को 90 प्रतिशत तक बढ़ाया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि नई टीमें स्थानीय रजिस्ट्री कर्मचारियों के साथ मिलकर फील्ड सर्वेक्षण करेंगे, जिससे डेटा में मौजूद अंतर को समाप्त किया जा सके।

केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष कार्यसमिति का गठन किया है। कार्यसमिति के प्रमुख ने कहा कि पोर्टल के तकनीकी मानकों को अंतरराष्ट्रीय स्तर के डेटा सुरक्षा और अभिलेख प्रबंधन मानकों के अनुरूप बनाना आवश्यक है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पोर्टल की कार्यशीलता में सुधार न होने पर अतिरिक्त वित्तीय सहायता को रोक दिया जा सकता है, जिससे राज्यों को अपने स्वयं के संसाधन जुटाने पड़ सकते हैं।

व्यापारिक विश्लेषकों ने बताया


The Bhū‑Bharat portal remains largely non‑functional, plagued by technical glitches and mismatched land records, which is delaying sales, tax payments and rural credit. States are deploying verification teams and the centre has set up a task force to overhaul the system and bring data accuracy up to international standards.

The Bhū‑Bharat rollout shows how a flashy “digital‑first” promise can backfire when legacy records and rural connectivity clash, turning what should be a catalyst for farm finance into a bottleneck that stalls credit and land markets. Until the data gap is sealed with on‑ground verification,

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