परियोजना की योजना 2022 में घोषित हुई थी, जिसमें पश्चिम बंगाल के इस भाग को अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए एक नया हब बनाने का इरादा था। लैंड पोर्ट अथॉरिटी ने कहा था कि इस बंदरगाह से भारत-चीन सीमा के पार वस्तुओं का तेज़ प्रवाह संभव होगा, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलेगी। हालांकि, इस क्षेत्र में 1970 के दशक से कई जनजातीय समूह निवास कर रहे हैं, और उन्हें भूमि के अधिग्रहण के संबंध में उचित पुनर्वास योजना की कमी की शिकायत है।
धरने से पहले, आदिवासी समुदाय ने स्थानीय प्रशासन को कई बार लिखित और मौखिक रूप से पुनर्वास के लिए अनुरोध प्रस्तुत किए थे। उन्होंने कहा कि उन्हें पर्याप्त भूमि, घर और आजीविका के साधन नहीं मिलेंगे, जिससे उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति बिगड़ जाएगी। लैंड पोर्ट के लिये आवश्यक भूमि लगभग 150 एकड़ है, जिसमें कई बागान और जलस्रोत भी शामिल हैं, जो जनजातीय लोगों के पारंपरिक जीवन के लिये महत्वपूर्ण हैं।
धरने के दौरान, आदिवासी लोगों ने न तो हिंसा अपनाई न ही कोई ध्वनि उत्पन्न की, बल्कि उन्होंने शांति से पोस्टर और लिखित बैनर लगाकर अपनी माँगों को व्यक्त किया। स्थानीय गाँवों में रोज़ाना दो घंटे का प्रार्थना सभागार और स्वास्थ्य जांच आयोजित की जा रही थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था। लेकिन 12 जुलाई को स्थानीय पुलिस ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई कर ग्यारह धरनेकारियों को गिरफ्तार कर लिया, जिन्हें ‘अविधि आंदोलन’ का आरोप लगाया गया।
गिरफ़्तारी के बाद, पुलिस ने कहा कि धरनेकारियों ने अनधिकृत सभा आयोजित की थी और निर्माण कार्य में बाधा उत्पन्न की थी। उन्होंने यह भी बताया कि सुरक्षा कारणों से कार्यस्थल को सुरक्षित रखने के लिये इस कदम की आवश्यकता थी। इसी बीच, लैंड पोर्ट का निर्माण अब भी योजना के अनुसार जारी है, और अगले दो हफ्तों में भारी मशीनरी और कच्चे माल की आपूर्ति बढ़ाने की उम्मीद है।
स्थानीय प्रशासन ने बताया कि गिरफ्तारी के बाद भी धरने जारी रहेगा और पुनर्वास की माँग को अनदेखा नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि पुनर्वास योजना तैयार करने के लिये एक विशेष समिति गठित की जाएगी, जिसमें स्थानीय प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। हालांकि, इस प्रस्तावित समिति की कार्यवाही की समयसीमा अभी स्पष्ट नहीं हुई है, जिससे धरनेकारियों में निराशा बनी हुई है।
जैसे ही समाचार मीडिया ने इस घटना को कवर किया, विभिन्न राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं। कुछ नेताओं ने पुलिस के कदम की सराहना की, यह कहते हुए कि विकास कार्य में बाधा डालने वाले किसी भी आंदोलन को रोकना आवश्यक है। वहीं, अन्य नेताओं ने इस गिरफ्तारी को ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ कहा और तुरंत न्यायालय में याचिका दायर करने का प्रस्ताव रखा।
राज्य सरकार ने भी इस मुद्दे पर टिप्पणी की, यह कहते हुए कि लैंड पोर्ट के लिये आर्थिक लाभों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, पर साथ ही जनजातीय समुदायों के पुनर्वास को भी गंभीरता से लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस दिशा में जल्द से जल्द पुनर्वास योजना तैयार कर लागू की जाएगी, ताकि विकास और सामाजिक न्याय दोनों को संतुलित किया जा सके।
विपरीत पक्षों के बीच इस बहस से यह स्पष्ट हो रहा है कि विकास परियोजनाओं में सामाजिक पक्ष को अक्सर उपेक्षित किया जाता है। कई सामाजिक संगठनों ने इस मामले को ‘स्थानीय समुदाय के अधिकारों की अनदेखी’ कहा है और लैंड पोर्ट की योजना को पुनः मूल्यांकन करने की मांग की है। इस बीच, आर्थिक विशेषज्ञों ने कहा कि यदि पुनर्वास उचित नहीं किया गया तो दीर्घकालिक सामाजिक असंतोष से परियोजना की सफलता जोखिम में पड़ सकती है।
आर्थिक दृष्टिकोण से, लैंड पोर्ट का पूर्ण होने पर अनुमानित वार्षिक व्यापार आय में 15‑20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे
Construction of the Land Port Authority of India’s inland port in Gotabari, West Bengal has continued despite a 100‑day peaceful sit‑in by local tribals demanding proper rehabilitation, culminating in the arrest of eleven protesters. While officials tout the project’s potential to boost cross‑border trade, the state has pledged to form a committee on resettlement, though timelines remain unclear, fueling tension between development goals and tribal rights.
The silent, months‑long sit‑in reveals that even “development‑friendly” infrastructure can become a flashpoint when tribal livelihoods are treated as an afterthought, turning economic promise into a political liability. If the promised resettlement package remains vague, the land port’s projected trade gains may be eroded
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