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सैमाइरा गर्ग की “Made@gain” पहल ने 75,000 छात्रों को मुफ्त पुनर्चक्रित नोटबुक्स देकर शिक्षा‑सततता मॉडल स्थापित किया।

समाज में शिक्षा के असमान वितरण को दूर करने के उद्देश्य से सैमाइरा गर्ग की पहल “Made@gain” ने पिछले दो वर्षों में हजारों जरूरतमंद विद्यार्थियों को निःशुल्क नोटबुक्स प्रदान की हैं, जिससे न केवल शैक्षणिक प्रगति में सुधार हुआ है बल्कि पर्यावरणीय लाभ भी प्राप्त हुआ

है। यह पहल एक स्कूल छात्रा द्वारा शुरू की गई थी, जिसने पुनः प्रयोज्य कागज और स्थानीय कारीगरों की सहायता से किफायती नोटबुक्स तैयार कर वितरण किया, जिससे शिक्षा के साथ सतत विकास के सिद्धांतों को भी साकार किया गया।

सैमाइरा गर्ग, जो अभी कक्षा दसवीं में

पढ़ती है, ने अपने स्कूल के पुस्तकालय में नोटबुक की कमी और कचरे की बढ़ती समस्या को देखा। 2022 में उसने “Made@gain” का नाम देकर एक छोटी टीम गठित की और स्थानीय कागज पुनर्चक्रण केंद्रों से पुरानी कागज की आपूर्ति शुरू की। प्रारम्भिक चरण में केवल

पाँच स्कूलों में यह प्रयोगात्मक रूप से लागू किया गया, जहाँ छात्रों ने नोटबुक्स की सराहना की और कागज बचत के आंकड़े सामने आए। इस पृष्ठभूमि ने पहल को तेजी से विस्तार की दिशा दी।

पिछले साल के शैक्षणिक सत्र में “Made@gain” ने उत्तर प्रदेश, बिहार और

मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में 150 स्कूलों तक अपनी पहुँच बढ़ाई। प्रत्येक स्कूल को 500 से 1000 तक की पुनर्चक्रित नोटबुक्स मुफ्त में वितरित की गईं, जिससे लगभग 75,000 छात्रों को लाभ मिला। नोटबुक्स का उत्पादन स्थानीय कारीगरों द्वारा किया गया, जिससे ग्रामीण रोजगार में

भी वृद्धि हुई। साथ ही, कागज के पुनः उपयोग से प्रति वर्ष लगभग 1,200 टन कागज बचाने का अनुमान लगाया गया है।

विस्तारित अभियान में “Made@gain” ने डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म के माध्यम से स्वयंसेवकों की भर्ती की, जो नोटबुक्स की डिलीवरी, वितरण और उपयोग पर निगरानी करते हैं।

इस प्रक्रिया में स्कूल प्राचार्यों और अभिभावकों को भी शामिल किया गया, जिससे पारदर्शिता बनी रही। कई शैक्षिक संस्थानों ने इस मॉडल को अपनाकर अपनी पुस्तकालय नीतियों को पुनः विचार किया और कागज की बचत को प्राथमिकता दी। इस दौरान कुछ स्कूलों ने नोटबुक्स के साथ

पर्यावरणीय जागरूकता कार्यशालाएँ भी आयोजित कीं।

पहल की मुख्य उपलब्धियों में से एक था “शून्य कचरा” लक्ष्य की ओर बढ़ती प्रगति। “Made@gain” ने न केवल कागज की बर्बादी को कम किया, बल्कि छात्रों को पुनर्चक्रण के महत्व के बारे में शिक्षित किया। कई विद्यालयों ने रिपोर्ट किया

कि छात्रों की पढ़ाई में ध्यान बढ़ा और गृहकार्य की गुणवत्ता में सुधार हुआ। साथ ही, स्थानीय कारीगरों को निरंतर कार्य मिला, जिससे उनकी आय में 30 प्रतिशत तक वृद्धि हुई। यह सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन पहल के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।

इन परिणामों को देखते हुए, राज्य

शिक्षा विभाग ने “Made@gain” को एक मॉडल प्रोजेक्ट के रूप में मान्यता दी और भविष्य में इस मॉडल को अन्य राज्यों में लागू करने की योजना बनाई। विभाग ने इस पहल के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा भी की, जिससे अधिक स्कूलों में नोटबुक्स की निरंतर

आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। इस पहल के समर्थन में कई गैर‑सरकारी संगठनों ने भी संसाधन प्रदान किए और सामुदायिक सहभागिता को बढ़ाया।

“Made@gain” की सफलता पर कई मीडिया आउटलेट्स ने प्रकाश डालते हुए इसे “युवा नेतृत्व” और “पर्यावरण मित्रता” की मिसाल बताया। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित एक

शैक्षिक सम्मेलन में सैमाइरा को युवा उद्यमी के रूप में सम्मानित किया गया। इस सम्मान ने पहल को और अधिक दृश्यता प्रदान की और अन्य युवा विद्यार्थियों को समान सामाजिक समस्याओं पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। रिपोर्टों में यह भी उल्लेख है कि इस

पहल ने छात्र-छात्राओं में सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को जाग्रत किया है।

पहल के प्रमुख सहयोगियों ने बताया कि नोटबुक्स के निर्माण में उपयोग किए गए कागज की गुणवत्ता और टिकाऊपन को बनाए रखने के लिए विशेष तकनीकी प्रशिक्षण दिया गया। स्थानीय कारीगरों ने पुनर्चक्रित कागज से

मजबूत बाइंडिंग और जलरोधक कवर तैयार किए, जिससे नोटबुक्स का जीवनकाल बढ़ा। इस तकनीकी उन्नति ने उत्पादन लागत को कम किया और वितरण को अधिक प्रभावी बनाया। साथ ही, इस प्रक्रिया ने ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल विकास को भी प्रोत्साहित किया।

विरोधी आवाज़ों ने भी पहल


Samaira Gurg’s “Made@gain” initiative has supplied recycled notebooks free of charge to about 75,000 students across 150 rural schools in three states, boosting learning outcomes while cutting roughly 1,200 tons of paper waste and creating jobs for local artisans. The program’s impact has earned state‑level recognition and funding, positioning it as a replicable model for sustainable education and youth‑led social change.

The “Made@gain” model shows how a single student’s eco‑centric idea can simultaneously lift educational outcomes and spark a micro‑economy, turning waste into a catalyst for rural development. Its rapid adoption hints that scaling grassroots circular‑economy projects could become a low‑cost blueprint for bridging India’s education

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