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बिहार की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मधुबनी पेंटिंग की सरकारी उपेक्षा और कलाकारों की दयनीय अवस्था पर पटना हाइकोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यदि इस सम्बन्ध में ब्लू प्रिंट एक सप्ताह में नहीं पेश किया गया, तो कोर्ट इस पर गंभीर रुख अपनाएगा

पटना हाइकोर्ट ने राज्य की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मधुबनी पेंटिंग की सरकारी उपेक्षा और कलाकारों की दयनीय अवस्था पर सुनवाई की। आत्मबोध की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने राज्य सरकार दिए गए कार्रवाई रिपोर्ट पर गहरा असंतोष जाहिर किया।

कोर्ट ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि यदि इस सम्बन्ध में ब्लू प्रिंट एक सप्ताह में नहीं पेश किया गया, तो कोर्ट इस पर गंभीर रुख अपनाएगा।

पिछली सुनवाई में याचिकाकर्ता के वकील डा. मौर्य विजय चन्द्र ने कोर्ट को बताया था कि मधुबनी पेंटिंग के विकास,विस्तार और कलाकारों के कल्याण के लिए राज्य सरकार ठोस कार्रवाई नहीं कर रही है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कला व संस्कृति सचिव व उद्योग विभाग के निर्देशक को पटना एयरपोर्ट परिसर में बने मधुबनी पेंटिंग का निरीक्षण कर कल कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत का निर्देश दिया था।

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उन्होंने जो रिपोर्ट दिया ,उससे स्पष्ट हुआ कि पटना एयरपोर्ट के परिसर में जो मधुबनी पेंटिंग लगी है,वहां न तो कलाकारों को क्रेडिट दिया गया है।साथ ही जी आई टैग भी नहीं लगा है।इससे मधुबनी पेंटिंग व उसके कलाकारों की उपेक्षा स्पष्ट होती है।

कोर्ट ने राज्य सरकार को कहा था कि मधुबनी पेंटिंग के विकास और विस्तार के लिए युद्ध स्तर पर कार्य किया जाना चाहिए।याचिकाकर्ता के वकील डा. मौर्य विजय चन्द्र ने कोर्ट को बताया कि मधुबनी पेंटिंग सरकारी उपेक्षा का शिकार तो है ही, साथ ही मधुबनी पेंटिंग करने वाले कलाकारों का शोषण भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि मधुबनी पेंटिंग की ख्याति देश विदेश में है,लेकिन मधुबनी पेंटिंग के कलाकार गरीबी में जीवन बिता रहे है।उन्होंने बताया कि मधुबनी पेंटिंग के कलाकारों को अपने कानूनी अधिकारों का ज्ञान नहीं है।

इसी का लाभ बिचौलिए उठाते है।उनकी पेंटिंग का बाहर ले जा कर महंगे दामों में बेचते है, जबकि उन कलाकारों को बहुत थोड़ी सी रकम दे देते है।

उन्होंनेे कोर्ट को बताया कि उन्हें 2005 में ही जीआई टैग भारत सरकार से लगाने की अनुमति प्राप्त हुई।ये भौगोलिक क्षेत्र के तहत रजिस्टर होता है ,लेकिन इसका आजतक रेजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है।

इसके सम्बन्ध में इन कलाकारों को जानकारी नहीं है।इसका लाभ बिचौलिए उठाते है। इस मामलें पर अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस- मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस- मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की। एक्टिंग चीफ जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने मामलें पर सुनवाई करते हुए पटना नगर निगम को विस्तृत जानकारी देने के लिए तीन सप्ताह का मोहलत दिया।

पटना नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि आधुनिक बूचडखाने के निर्माण और विकास के लिए स्थानों को चिन्हित कर लिया गया है।निविदा की कार्रवाई की जा रही है। पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करने के लिए पटना नगर निगम ने तीन सप्ताह की मोहलत मांगी,जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया।

ये जनहित याचिका अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने दायर की है। अधिवक्ता अंकिता कुमारी ने कोर्ट को बताया कि पटना समेत राज्य विभिन्न क्षेत्रों में अस्वास्थ्यकर और नियमों के विरुद्ध मांस मछली काटे और बेचे जाते हैं।

उन्होंने कहा कि इससे जहाँ आम आदमी के स्वास्थ्य पर पर बुरा असर पड़ता हैं, वहीं खुले में इस तरह से खुले में जानवरों के काटे जाने से छोटे लड़कों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

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याचिकाकर्ता के वकील अंकिता कुमारी ने कोर्ट से यह भी आग्रह किया था कि खुले और अवैध रूप से चलने वाले बूचडखानों को नगर निगम द्वारा तत्काल बंद कराया जाना चाहिए ।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि पटना के राजा बाज़ार, पाटलिपुत्रा , राजीव नगर, बोरिंग केनाल रोड , कुर्जी, दीघा , गोला रोड , कंकड़बाग आदि क्षेत्रों में नियमों का उल्लंघन कर खुले में मांस मछ्ली की बिक्री होती है।

उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी कि अस्वस्थ और बगैर उचित प्रमाणपत्र के ही जानवरों को मार कर इनका मांस बेचा जाता है ,जो कि जनता के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

उनका कहना था कि शुद्ध और स्वस्थ मांस मछ्ली उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आधुनिक सुविधाओं सुविधाओं के साथ बूचड़खाने बनाए जाने चाहिए,ताकि मांस मछली बेचने वालोंं को भी सुविधा मिले।

साथ ही जनता को भी स्वस्थ और प्रदूषणमुक्त मांस मछली मिल सके।इस मामलें पर अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद होगी।

पटना हाईकोर्ट में मुज़फ़्फ़रपुर के सरैया थाना चर्चित हत्याकांड में मृतक के परिजन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई 3 सप्ताह के लिए टल गई

पटना हाई कोर्ट ने मुज़फ़्फ़रपुर के सरैया थाना चर्चित हत्याकांड में मृतक निर्भया कुमारी (काल्पनिक नाम) के परिजन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई तीन सप्ताह के लिए टल गई। राज्य सरकार की ओर से जस्टिस अंशुमान की एकल पीठ को बताया गया कि वीडिओ जांच के लिए चंडीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब में भेजा गया है, लेकिन अभी रिपोर्ट नहीं आया है।

आज कोर्ट में उपस्थित सरैया के डीएसपी और सम्बंधित अनुसंधानकर्ता ने कोर्ट को ये जानकारी दी।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ओम प्रकाश कुमार ने कोर्ट से आग्रह किया गया है कि केस में नामजद अभियुक्तों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए। साथ ही केस को किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाया जाए।

इस केस में काम नही कर रहे पुलिस पदाधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही भी चलाया जाए। पिछले सुनवाई के दौरान मुज़फ़्फ़रपुर के एस एस पी ने शपथ पत्र दायर कर बताया कि इस केस में सिर्फ एक व्यक्ति ही संलिप्तता जांच में सामने आई है ।इसलिए बाकी अभियुक्तों को गिरफ्तार नही किया गया।

पूर्व की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जो शपथ पत्र एसएसपी ने दायर किया है, उसे देखने से प्रतीत होता है कि पुलिस अन्य अभियुक्तों को बचा रही है।

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कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए इस केस के डीएसपी और अनुसंधान कर्ता को अगली सुनवाई में कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया था।अधिवक्ता ओम प्रकाश ने बताया कि दिनांक 26 अप्रैल 2022 को याचिकाकर्ता की पुत्री अपने घर से बाहर गयी थी ,लेकिन वह वापस नही लौटी।

जिसके बाद परिजन वालों ने अपनी पुत्री को जा खोजबीन किया, परन्तु वह नही मिली। उसी दिन रात्रि 12.47 बजे एक कॉल आया, जिसमे याचिकाकर्ता की पुत्री की आवाज सुनाई दी।वह दर्द से कराह रही थी।

इसके बाद फोन कट गया और पुनः प्रयास करने पर मोबाइल बंद मिला।अगले दिन सुबह में ग्रामीण ने बताया कि याचिकाकर्ता की पुत्री की बॉडी पोखर में पड़ी हुई है।

इसके बाद परिजन घटना स्थल पर जाने के क्रम में देखे की गांव के ही मो0 वसीम खान के द्वारा याचिकाकर्ता की पुत्री को बोलेरो कार से लेकर कहीं जा रहा था।वह बोलेरो मोहम्मद वसीम के घर पर जाकर रुकती है।

फिर मोहम्मद वसीम के परिवार वाले गाड़ी में बैठते है। वे लोग वैष्णवी हॉस्पिटल, मुज़फ़्फ़रपुर याचिकाकर्ता की पुत्री को लेकर जाते हैं, जहाँ याचिकाकर्ता की पुत्री के परिजन भी पहुचते हैं ।

अपनी पुत्री से बात करते हैं, तो याचिकाकर्ता की पुत्री द्वारा बताया जाता है कि लगभग 8 लोग द्वारा बलात्कार किया गया और जहर पिलाया गया। इसमें उसने चार लोगों का नाम भी लिया था, जिसमे से एक व्यक्ति मोहम्मद वसीम खान को गिरफ्तार कर लिया गया है ।

लेकिन अभी भी तीन नामजद अभियुक्त पुलिस के गिरफ्त से बाहर है।इस मामलें पर पुनः तीन सप्ताह बाद सुनवाई की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने फोर लेन रजौली-बख्तियारपुर नेशनल हाइवे के प्रथम पैकज के निर्माण में हो रहे बिलम्ब पर NHAI को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया

पटना हाइकोर्ट ने फोर लेन रजौली बख्तियारपुर नेशनल हाइवे के प्रथम पैकज के निर्माण में हो रहे बिलम्ब पर एनएचएआई को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया। विपिन कुमार की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की।

कोर्ट को एनएचएआई के अधिवक्ता ने बताया कि ये एन एच 31 के 105 किलोमीटर को तीन पैकेज में बांटा गया है। पैकेज दो और तीन के कार्य चल रहे है।लेकिन पैकेज एक का कार्य नहीं हो पा रहा है।

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उन्होंने बताया कि इस पैकेज के निर्माण के वन व पर्यावरण विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र मिलना बाकी है।उन्होंने बताया कि इसके बाद पैकेज एक का काम प्रारम्भ हो सकेगा।

कोर्ट ने एनएचएआई को छह सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।इस मामलें पर अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद की जाएगी।

बिहार के तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद रॉय के विरुद्ध अदालती कार्रवाई पर तत्काल रोक

पटना हाइकोर्ट ने बिहार के तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और वर्तमान केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद रॉय के विरुद्ध अदालती कार्रवाई पर तत्काल रोक लगाते हुए बड़ी राहत दी। जस्टिस संदीप कुमार ने नित्यानंद द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की।

उनके विरुद्ध अपने भाषण में सामुदायिक विद्वेष फैलाने का आरोप लगाया गया था।अंचलाधिकारी, नरपतगंज,ज़िला अररिया ने एक नरपतगंज थाने मे तत्कालीन बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद रॉय के विरुद्ध अपने 9 मार्च,2018 को अपने भाषण में साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की सूचना दी।

सीजेएम अररिया 13अप्रिल,2022 को पुलिस द्वारा 31अक्तुबर,2021 के दायर चार्जशीट पर सुनवाई करते हुए संज्ञान लिया।कोर्ट ने थाना प्रभारी को इनके विरुद्ध समन जारी करने का निर्देश दिया।

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निचली अदालत के इस आदेश के विरुद्ध केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद रॉय ने एक याचिका दायर की।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता नरेश दीक्षित ने कोर्ट को बताया कि जिन प्रावधानों के तहत उनके विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है, वह उन पर लागू ही नहीं होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि नित्यानंद रॉय ने किसी प्रकार से अपने भाषण में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने का काम नहीं किया है।उन्होंने विदेश के एक आतंकवादी के सन्दर्भ में बात कही थी।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि ये मामला 2018 का है,जबकि निचली अदालत ने इस मामले का संज्ञान 2022 में लिया।

इन तथ्यों को देखते हुए कोर्ट ने निचली अदालत के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दिया।इस मामलें पर अगली सुनवाई जुलाई,2023 में की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने वैशाली ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक लिमिटेड के निदेशक मंडल चुनाव की अंतिम मतदाता सूची से दिघी पूर्वी एवं दिघी पश्चिम नगर पंचायत प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति का नाम हटाने से संबंधित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने वैशाली ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक लिमिटेड के निदेशक मंडल चुनाव की अंतिम मतदाता सूची से दिघी पूर्वी एवं दिघी पश्चिम नगर पंचायत प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति का नाम हटाने से संबंधित याचिका पर सुनवाई की ।

जस्टिस सत्यव्रत वर्मा ने राकेश कुमार मिश्रा द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए इस मामले को बिहार सहकारिता विभाग के प्रधान सचिव के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है,ताकि इस मामले का निराकरण किया जा सके ।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एसबीके मंगलम ने कोर्ट को बताया कि प्रतिवादी सं. 12 और 14 दिघी पूर्व और दिघी पश्चिम पैक्स के सदस्य थे।ये अब हाजीपुर नगर परिषद के क्षेत्र में शामिल है ।इस तरह पैक्स ने नगरपालिका क्षेत्र में शामिल होने के बाद अपनी पहचान खो दी है।

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जो वैशाली जिला केंद्रीय सहकारी बैंक लिमिटेड, हाजीपुर द्वारा बनाए गए उपनियमों के संदर्भ में मतदाता और प्रतियोगी होने के लिए एक आवश्यक शर्त है। सुनवाई के दौरान स्टेट इलेक्शन अथॉरिटी के अधिवक्ता मुकेश कुमार ठाकुर ने कोर्ट को बताया कि नि:संदेह उपरोक्त 2 पैक्स को हाजीपुर की नगरपालिका सीमा के भीतर शामिल किया गया है।लेकिन फिर भी आज तक पैक्स के उपनियमों को दिनांक 24.11.2009 के पत्र संख्या 7477 के मद्देनजर संशोधित नहीं किया गया है।

रजिस्ट्रार, को-ऑपरेटिव सोसाइटी द्वारा, इस तरह, उपरोक्त 2 पैक्स अभी भी पैक्स की पहचान को बनाए रखते हैं । इस पर कोर्ट ने मामले को निष्पादित करते हुए इसे बिहार सहकारिता विभाग के प्रधान सचिव के समक्ष भेजने का निर्देश दिया।

बिहार में बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति के छात्रों द्वारा स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ दिए जाने के मामले पर पटना हाइकोर्ट में सुनवाई हुई

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में बड़ी संख्या में अनुसूचित जनजाति के छात्रों द्वारा स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ दिए जाने के मामले पर सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार लीगल सर्विसेज़ अथॉरिटी (बालसा) से रिपोर्ट तलब किया।

कोर्ट ने बालसा को ये बताने को कहा कि कितने बच्चों ने स्कूलों की पढ़ाई छोड़ दी है और कितने बच्चों ने दोबारा इन स्कूलों में जाना शुरू किया है ? बिहार आदिवासी अधिकार फोरम की लोकहित याचिका दायर की थी।

कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई करते हुए चिंता जताई कि इन बच्चों की पढ़ाई के लिए राज्य सरकार द्वारा क्या कार्रवाई की गई है।इसके साथ साथ खंडपीठ ने बालसा के एक सदस्य को लिए पश्चिम चम्पारण के हारनाटांड में स्थित स्कूल एवं कस्तूरबा गांधी विद्यालयों के विकास से संबंधित रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। गौरतलब है कि हाईकोर्ट इस मामले में लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है ।

इस मामले में पहले भी हाईकोर्ट ने वकीलों की एक टीम गठित कर निरीक्षण करने का निर्देश दिया था । इस टीम में अधिवक्ता सूर्या नीलांबरी, अधिवक्ता आकांक्षा मालवीय , अधिवक्ता आयुष अभिषेक एवं अन्य अधिवक्ता शामिल थे ।

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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया था कि बिहार में अनुसूचित जनजाति के बालिकाओं के लिए पश्चिम चम्पारण के हारनाटांड एकमात्र स्कूल है।पहले यहाँ पर कक्षा एक से लेकर कक्षा दस तक की पढ़ाई होती थी।

लेकिन जबसे इस स्कूल का प्रबंधन राज्य सरकार के हाथ में आया तबसे इस स्कूल की स्थिति बदतर होती गई।कक्षा सात और आठ में छात्राओं का एडमिशन बन्द कर दिया गया।

साथ ही कक्षा नौ और दस में छात्राओं का एडमिशन पचास फीसदी ही रह गया।यहाँ पर सौ बिस्तर वाला हॉस्टल छात्राओं के लिए था,जिसे बंद कर दिया गया।

इस स्कूल में पर्याप्त संख्या में शिक्षक भी नहीं है।इस कारण छात्राओं की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। हाईकोर्ट ने अनुसूचित जनजाति के छात्रों द्वारा इतनी बड़ी संख्या में स्कूल बीच में छोड़ने को गंभीर स्थिति का दर्जा दिया ।

इस मामले की अगली सुनवाई 11अप्रैल,2023 को होगी।

पटना हाइकोर्ट ने उचित सुनवाई का मौका दिये बगैर ही एक कम्पनी को पूरे बिहार में सरकारी कार्य ठेके से वंचित किये जाने के आदेश को निरस्त कर दिया

पटना हाइकोर्ट ने उचित सुनवाई का मौका दिये बगैर ही एक कम्पनी को पूरे बिहार में सरकारी कार्य ठेके से वंचित किये जाने के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने ग्रामीण कार्य विभाग के एक मुख्य अभियंता पर 10 हज़ार रुपये का हर्जाना लगाया है।जस्टिस पी बी बजनथ्री की खंडपीठ ने परमार कंस्ट्रक्शन की रिट याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने मुख्य सचिव को भी आदेश दिया कि वे राज्य सरकार के सभी विभागों को दिशानिर्देश जारी करें, ताकि कोई भी प्रशासनिक तौर पर कोई दंडात्माक आदेश देने से पहले सुनवाई का पर्याप्त अवसर दिया जाए।साथ ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन करने हेतु हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से पारित हुए आदेशों का अनुपालन करे।

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कोर्ट ने कहा कि अधिकारीगण पूर्व के न्याय आदेशों को बगैर ध्यान में रखे ही अवैध तरीके से प्रशासनिक आदेश जारी कर देते हैं।

पटना हाइकोर्ट ने नालंदा स्थित शिवपुरी जलाशय के निर्माण हेतु सरकारी ठेके मे सबसे कम लागत लगाने वाली कम्पनी को अवैध तरीके से अयोग्य करार देने के मामले पर लघु सिंचाई विभाग के वरीय अधिकारी व अभियंता पर 2 लाख रुपये का हर्जाना लगाया

पटना हाइकोर्ट ने नालंदा स्थित शिवपुरी जलाशय के निर्माण हेतु सरकारी ठेके मे सबसे कम लागत लगाने वाली कम्पनी को अवैध तरीके से अयोग्य करार देने के मामले पर सुनवाई की। हाई कोर्ट ने लघु सिंचाई विभाग के वरीय अधिकारी व अभियंता पर दो लाख रुपये का हर्जाना लगाया है।

जस्टिस पी बी बजंत्री की खंडपीठ ने राजीव कुमार की रिट याचिका पर सुनवाई की।कोर्ट ने हरजाने की राशि पटना हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी में दो सप्ताह में जमा करने का आदेश दिया।

याचिकाकर्ता के वकील प्रभात रंजन द्विवेदी ने कोर्ट को बताया कि बिना किसी आरोप के उनके मुवक्किल की कंपनी को नालंदा स्थित शिवपुरी जलाशय के निर्माण कार्य हेतु लगाई गई नीलामी में सबसे कम लागत की लगाने के बावजूद अयोग्य करार दे दिया गया।

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लघु सिंचाई विभाग के तकनीकी मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष व अभियंता प्रमुख ने याचिकाकर्ता को अयोग्य घोषित कर दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रभात ने आरोप लगाया कि पूरे विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने निजी स्वार्थ के लिए अधिक लागत की बोली लगाने वाली कंपनी को काम करने का ठेका दे दिया।जबकि याचिकाकर्ता ने काम के लागत राशि से 15 फ़ीसदी कम की बोली लगाई थी।

वही कमेटी के अधिकारियों ने उतनी ही लागत से 13 फ़ीसदी कम की बोली लगाने वाले को काम का ठेका दिया ।
इससे सरकारी राजकोष को इस पूरे काम के लागत यानि 460 करोड़ रुपए के 2 फी सदी का नुकसान झेलना पड़ा ।

कोर्ट ने सरकारी अधिकारी व अभियंताओं से इस मामलें में जवाब माँगा, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिला।

Patna High Court News: पिछले दो दशकों से राज्य के विभिन्न निचली अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक मुकदमों के मामलें पर सुनवाई अधूरी रही

पटना हाइकोर्ट में पिछले दो दशकों से राज्य के विभिन्न निचली अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित आपराधिक मुकदमों के मामलें पर सुनवाई अधूरी रही। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ कौशिक रंजन की जनहित याचिका पर सुनवाई की।

पिछली सुनवाई में Patna High Court ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार(बालसा)के सचिव को नेशनल जुडिशल ग्रिड और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के उपलब्ध आंकड़े को मूल रिकॉर्ड से जांच करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता कौशिक रंजन की अधिवक्ता शमा सिन्हा ने कोर्ट को बताया था कि बड़ी तादाद में आपराधिक मामलें लंबित पड़े है।उन्होंने बताया कि लगभग 67 हज़ार मामलें ऐसे है,जिनमें पार्टियां कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।

Patna High Court ने बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार व विभिन्न ज़िला विधिक सेवा प्राधिकार को ऐसे मामलों को चिन्हित कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।अधिवक्ता शमा सिन्हा ने कोर्ट को बताया कि वकीलों सहायता के अभाव में लगभग सात लाख आपराधिक मामलें लंबित है।

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Patna High Court ने इस सम्बन्ध में बिहार राज्य विधिक सेवा प्राधिकार को आंकड़े की जांच कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया।कोर्ट ने कहा कि इन मामलों में वकीलों की सहायता दिए जाने को गम्भीरता से लिया जाना चाहिए था।

अधिवक्ता शमा सिन्हा ने कोर्ट को बताया कि बहुत सारे मामलें काफी पुराने है,जिनमें अधिकांश सन्दर्भहीन हो चुके है।तीस चालीस साल पुराने मामलों का कोई अर्थ नहीं रह जाता है। याचिकाकर्ता के वकील शमा सिन्हा ने Patna High Court को बताया था कि ये आंकड़े नेशनल जुडिशल ग्रिड और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से मिले है।इन्ही आंकड़ों को कोर्ट के सामने पेश किया गया।

Patna High Court को यह भी बताया गया इतने पुराने लंबित मामले में आरोपी और परिवादी दोनों की जीवित रहने पर संदेह है, ऐसी स्थिति में या नहीं तो बेकार और कानूनी तौर पर औचित्य पड़े अपराधिक मामले को खत्म करने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए ।

इस मामलें पर सुनवाई कल भी जारी रहेगी।

Patna High Court News: दानापुर-बिहटा एलिवेटेड रोड के निर्माण से संबंधित लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बिहार सरकार, NHAI एवं रेलवे को हलफ़नामा दायर कर जवाब देने का निर्देश दिया

पटना हाई कोर्ट ने दानापुर – बिहटा एलिवेटेड रोड के निर्माण से संबंधित लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार, एनएचएआई एवं रेलवे को हलफ़नामा दायर कर जवाब देने का निर्देश दिया है। एसीजे जस्टिस चक्रधारी शरण सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की।

ये जनहित याचिका विपिन कुमार ने दायर किया है। याचिकाकर्ता ने इस जनहित याचिका के माध्यम से दानपुर – बिहटा एलिवेटेड रोड के निर्माण में प्रगति लाने के लिए ये जनहित याचिका को दायर किया है।

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कोर्ट ने इस याचिका में पूर्व मध्य रेलवे को भी प्रतिवादी बनाने का भी निर्देश दिया है।

इस मामले की अगली सुनवाई 10 अप्रैल,2023 को होगी ।

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था एवं अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था एवं अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार की ओर से कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत किया गया।

राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट को जानकारी देते हुए बताया गया कि तेरह स्थानों के लिए वकीलों के लिए भवन निर्माण और बुनियादी सुविधाओं के लिए टेंडर जारी कर दिया गया। बाकी अन्य जिलों में भी कार्रवाई चल रहा है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने भूमि उपलब्धता से सम्बंधित मामलें पर राज्य के विकास आयुक्त को अधिकारियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने राज्य सरकार को ये भी बताने को कहा था कि राज्य के 38 जिलों में से कितने जिलों में वकीलों के भवन निर्माण के लिए जिलाधिकारियों ने भूमि चिन्हित कर भूमि अधिग्रहण की कार्रवाई पूरी कर ली है।

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वरीय अधिवक्ता श्री रमाकांत शर्मा ने कोर्ट को बताया था कि भवनों का निर्माण राज्य सरकार के भवन निर्माण भवन निर्माण विभाग करें,तो काम तेजी से हो सकेगा।ठेकेदारी के काम में बिलम्ब होने के अलावे लागत भी ज्यादा आएगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि राज्य के अदालतों की स्थिति अच्छी नहीं है।अधिवक्ता अदालतों में कार्य करते है,लेकिन उनके लिए न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न कार्य करने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

वकीलों के लिये शुद्ध पेय जल,शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती हैं।उन्होंने कोर्ट को बताया कि अदालतों के भवन के लिए जहां भूमि उपलब्ध भी है,वहां भूमि को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जहां भूमि उपलब्ध करा दिया गया है, वहां कार्य प्रारम्भ नही तो पाया हैं।

इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

बिहार में निबंधित और योग्य फार्मासिस्ट के पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के मामले पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा दिए गए जवाब पर असंतोष जाहिर किया

राज्य में निबंधित और योग्य फार्मासिस्ट के पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के मामले पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार द्वारा दिए गए जवाब पर असंतोष जाहिर किया।

कोर्ट ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में राज्य सरकार को पुनः जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।ये जनहित याचिका मुकेश कुमार ने दायर किया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रशान्त सिन्हा ने कोर्ट को बताया कि डॉक्टरों द्वारा लिखें गए पर्ची पर निबंधित फार्मासिस्टों द्वारा दवा नहीं दी जाती है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि बहुत सारे सरकारी अस्पतालों में अनिबंधित नर्स,एएनएम,क्लर्क ही फार्मासिस्ट का कार्य करते है।वे बिना जानकारी और योग्यता के ही मरीजों को दवा बांटते है।जबकि ये कार्य निबंधित फार्मासिस्टों द्वारा किया जाना है।

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उन्होंने कहा कि इस तरह से अधिकारियों द्वारा अनिबंधित नर्स,एएनएम,क्लर्क से काम लेना न केवल सम्बंधित कानून का उल्लंघन है,बल्कि आम आदमी के स्वास्थ्य के साथ खिलबाड़ है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि फार्मेसी एक्ट,1948 के तहत फार्मेसी से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के कार्यों के अलग अलग पदों का सृजन किया जाना चाहिए।लेकिन बिहार सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।इस आम लोगों का स्वास्थ्य और जीवन पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।

उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि फार्मेसी एक्ट,1948 के अंतर्गत बिहार राज्य फार्मेसी कॉउन्सिल के क्रियाकलापों और भूमिका की जांच के लिए एक कमिटी गठित की जाए।ये कमिटी कॉउन्सिल की क्रियाकलापों की जांच करें,क्योंकि ये गलत तरीके से जाली डिग्री देती है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि बिहार राज्य फार्मेसी कॉउन्सिल द्वारा बड़े पैमाने पर फर्जी पंजीकरण किया गया है।राज्य में बड़ी संख्या मे फर्जी फार्मासिस्ट कार्य कर रहे है।इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सहरसा में स्थापित किये जाने वाले एम्स अस्पताल को दरभंगा स्थानांतरित किये जाने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र व राज्य सरकार से जवाबतलब किया

पटना हाईकोर्ट ने बिहार के सहरसा में स्थापित किये जाने वाले एम्स अस्पताल को दरभंगा स्थानांतरित किये जाने के विरुद्ध दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने कोशी विकास संघर्ष मोर्चा की जनहित याचिका पर करते हुए केंद्र व राज्य सरकार से जवाबतलब किया है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार सिंह ने कोर्ट को बताया कि विभिन्न राज्यों में एम्स के स्तर के अस्पताल स्थापित करने की योजना तैयार की गई।बिहार के सहरसा में एम्स के तर्ज पर अस्पताल बनाए जाने का प्रस्ताव था।

इस अस्पताल के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि सहरसा में उपलब्ध है।2017 में सहरसा के जिलाधिकारी ने इस अस्पताल के लिए आवश्यक 217.74 एकड़ भूमि की उपलब्धता की जानकारी विभाग को दी थी।

कोर्ट को ये बताया कि इस क्षेत्र में एम्स स्तर का अस्पताल नहीं है।गंभीर बीमारियों के ईलाज के लिए इस क्षेत्र के लोगों को या तो पटना जाना पड़ता है या सिलिगुडी जाना पड़ता है।इसमें न सिर्फ लोगों को आने जाने में कठिनाई होती है,बल्कि आर्थिक बोझ भी पड़ता है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सहरसा में एम्स अस्पताल के निर्माण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध है,जबकि दरभंगा में एम्स अस्पताल के भूमि की कमी है।

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कोर्ट को एम्स अस्पताल के निर्माण के मानकों पर सहरसा ज्यादा खरा था,लेकिन राज्य सरकार ने 2020 में दरभंगा में एम्स अस्पताल स्थापित किये जाने की अनुशंसा कर दिया।यह इस क्षेत्र लोगों के साथ अन्याय किया गया।

कोर्ट को याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि सहरसा,पूर्णियां,कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले इस क्षेत्र में आते है।इस क्षेत्र की जनसंख्या के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए एम्स अस्पताल स्थापित की जानी चाहिए।

कोर्ट को बताया गया कि इस क्षेत्र के बहुत सारे लोग कैंसर समेत कई अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।आमलोग को बेहतर ईलाज के लिए इस क्षेत्र में एम्स स्तर के अस्पताल की सख्त आवश्यकता है।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कंचन कुमार सिंह ने कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत किया। इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

हाईकोर्ट से रोक के बाद भी निजी भूमि पर सड़क का निर्माण किए जाने पर पटना हाइकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की

पटना हाइकोर्ट ने निजी भूमि पर सड़क बनाने पर हाईकोर्ट से रोक के बाद ईट की सोलिंग कर सड़क का निर्माण किए जाने पर नाराजगी जाहिर की है। जस्टिस सत्यव्रत वर्मा ने नाग नारायण सिंह की याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने उपस्थित छपरा के जिलाधिकारी को हाई कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा कि वे स्वयं विवादित जमीन पर जाकर लगाए गए ईट की सोलिंग को अपने सामने हटवा दें। अगली सुनवाई में कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस सम्बन्ध में 20मार्च,2023 को इस बात की जानकारी शपथ पत्र पर जानकारी दी जाए।

सुनवाई के दौरान छपरा के जिलाधिकारी के साथ ही छपरा सदर के अंचलाधिकारी, और सड़क निर्माण कराने वाले इंजीनियर कोर्ट में उपस्थित थे।याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि याचिकाकर्ता के निजी जमीन पर सरकार द्वारा कराए जा रहे सड़क निर्माण पर हाईकोर्ट ने तत्काल प्रभाव से रोक लगा दिया था।

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हाई कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने की जानकारी याचिकाकर्ता ने छपरा के जिलाधिकारी के साथ ही छपरा सदर के अंचलाधिकारी और निर्माण करने वाले इंजीनियर को दे दिया था।

कोर्ट को डॉ आलोक कुमार सिन्हा ने बताया गया कि हाई कोर्ट द्वारा सड़क निर्माण पर लगाए गए रोक के बाद भी, याचिकाकर्ता की जमीन पर सरकार द्वारा ईट का सोलिंग लगाकर सड़क का निर्माण कर दिया गया है।यह अदालती आदेश की अवमानना है।इसी मामले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कोर्ट ने छपरा के जिलाधिकारी के साथ ही अन्य संबंधित अधिकारियों को हाई कोर्ट में तलब किया था।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 20मार्च, 2023 को की जाएगी।

Patna High Court News: बिहार के स्कूलों में छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव, पर्याप्त सुरक्षा का प्रबन्ध नहीं होने के मामलें पर सुनवाई

पटना हाइकोर्ट ने राज्य के स्कूलों में छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाओं का अभाव, पर्याप्त सुरक्षा का प्रबन्ध नहीं होने के मामलें पर सुनवाई की। इस सम्बन्ध में दायर जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने कहा कि स्कूलों की अवस्था और व्यवस्था पर राज्य के शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव निगरानी रखेंगे।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि पटना समेत राज्य के सभी जिलों के अधिकतर स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा की कमी है। उन्होंने कहा कि राज्य में कई स्कूल ऐसे है,जो जर्जर मकान में चलते है। इनमेंं कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है।

इन स्कूलों में छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं है। शुद्ध पेय जल,शौचालय, जलपान गृह की व्यवस्था नहीं है।बहुत सारे स्कूलों में बिजली नहीं है,जिससे पढ़ाई में बाधा आती है।

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छात्रों की सुरक्षित आने जाने के लिए फुट ओवरब्रिज नहीं है। आग बुझाने के लिए संयंत्र स्कूलों में नहीं लगाए गए है,जिस कारण कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती है।

राज्य सरकार द्वारा विभिन्न हलफनामों के माध्यम से स्कूलों की स्थिति में का ब्यौरा दिया जाता रहा है। कोर्ट को बताया गया कि जो भी स्कूल भवन खराब या जर्जर हालत में है, उनकी मरम्मती और निर्माण किया गया है।

छात्रों को बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए भी काफी कार्रवाई की गई।साथ ही बहुत सारे स्कूलों मे विद्युतीकरण किया गया है। स्कूलों में आग बुझाने के लिए संयंत्र भी स्थापित किये गए है।

कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाई को संतोषप्रद माना, लेकिन स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए लगातार कार्रवाई होने की उम्मीद जताई। इसके साथ ही कोर्ट ने इस जनहित को निष्पादित कर दिया।

बिहार में बड़ी संख्या में फर्जी डिग्रियों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की बहाली मामलें पर सुनवाई पटना हाइकोर्ट में हुई

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में बड़ी संख्या में फर्जी डिग्रियों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की बहाली मामलें पर सुनवाई की। रंजीत पंडित की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की।

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह एक समय सीमा निर्धारित करें, जिसके तहत सभी सम्बंधित शिक्षक अपना डिग्री व अन्य कागजात प्रस्तुत करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि निर्धारित समय के भीतर कागजात व रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं करने वाले शिक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार से कार्रवाई रिपोर्ट तलब किया था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया कि बड़ी संख्या में जाली डिग्रियों के आधार पर शिक्षक राज्य में काम कर रहे हैं।साथ ही वे वेतन उठा रहे है।

इससे पूर्व कोर्ट ने 2014 के एक आदेश में कहा था कि जो इस तरह की जाली डिग्री के आधार पर राज्य सरकार के तहत शिक्षक है,उन्हें ये अवसर दिया जाता है कि वे खुद अपना इस्तीफा दे दें, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जाएगी।

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26अगस्त,2019 को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि इस आदेश के बाद भी बड़ी संख्या में इस तरह के शिक्षक कार्यरत है और वेतन ले रहे है।

कोर्ट ने मामलें को निगरानी विभाग को जांच के लिए सौंपा।उन्हें इस तरह के शिक्षकों को ढूंढ निकालने का निर्देश दिया।31जनवरी,2020 के सुनवाई दौरान निगरानी विभाग ने कोर्ट को जानकारी दी कि राज्य सरकार द्वारा इनके सम्बंधित रिकॉर्ड की जांच कर रही है,लेकिन अभी भी एक लाख दस हजार से अधिक शिक्षकों के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

साथ ही ये भी पाया गया कि 1316 शिक्षक बिना वैध डिग्री के नियुक्त किये गए।कोर्ट ने इस मामलें को काफी गम्भीरता से लिया।कोर्ट ने सम्बंधित विभागीय सचिव से हलफनामा दायर कर स्थिति का ब्यौरा देने का निर्देश दिया था।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अगली सुनवाई में अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा पेश करने का निर्देश दिया था।

इस मामलें पर अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों के स्थिति के सम्बन्ध दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों के स्थिति के सम्बन्ध दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ कुणाल कौशल की जनहित याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने राज्य के विश्वविद्यालयों के चान्सलर कार्यालय को हलफनामा दायर कर ये बताने को कहा कि राज्य में लॉ की पढ़ाई के लिए क्या-क्या सुधारात्मक कार्रवाई की गई। साथ ही ये भी बताने को कहा गया कि इन लॉ कालेजों में छात्रों को पढ़ाने के लिए यूजीसी मानक के तहत नेट/पीएचडी डिग्री वाले शिक्षकों की नियुक्ति की जा सकती है या नहीं।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया कि इन लॉ कालेजों में जो प्रिंसिपल और शिक्षक कार्य कर रहे है, वे यूजीसी के मानदंडों के अनुसार शैक्षणिक योग्यता नहीं रखते है। उन्होंने बताया कि ये शिक्षक यूजीसी द्वारा नेट की परीक्षा बिना पास किये पद पर बने हुए। इन लॉ कालेजों के प्रिंसिपल भी पीएचडी की डिग्री प्राप्त नहीं किया है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह बताने को कहा था कि राज्य में स्थित लॉ कॉलेजों में नेट की परीक्षा पास किए शिक्षकों को क्यों नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

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राज्य में स्थित लॉ कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव के मामलें पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की जा रही है।

कोर्ट ने बार कॉउन्सिल ऑफ इंडिया से ये जानना चाहा था कि राज्य के लॉ कॉलेज में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लॉ कालेजों में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति होना आवश्यक है।

कोर्ट को अधिवक्ता दीनू कुमार ने बताया कि राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों की स्थिति बहुत दयनीय है।वहां बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है।

बीसीआई के निर्देश और जारी किए गए गाइड लाइन के बाद भी बहुत सुधार नहीं हुआ है।बीसीआई के निरीक्षण के बाद भी बहुत सारे कालेज निर्धारित मानकों को नहीं पूरा कर रहे है।

इससे पूर्व कोर्ट ने बीसीआई के अनुमति/ अनापत्ति प्रमाण मिलने के बाद ही सत्र 2021- 22 के लिए राज्य के 17 लॉ कालेजों को अपने यहां दाखिला लेने के लिए अनुमति दी थी।

पूर्व में हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए बिहार के सभी 27 सरकारी व निजी लॉ कॉलेजों में नए दाखिले पर रोक लगा दी थी। बाद मे इस आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए 17 कॉलेजों में सशर्त दाखिले की मंजूरी दे दी थी।

उस समय हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि दाखिला सिर्फ 2021-22 सत्र के लिए ही होगा।कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अगले साल के सत्र के लिए बीसीआई से फिर मंजूरी लेनी होगी।

सुनवाई के समय समय याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दीनू कुमार एवं रितिका रानी, बीसीआई की ओर से अधिवक्ता विश्वजीत कुमार मिश्रा ने कोर्ट में अपने अपने पक्षों को प्रस्तुत किया।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 2 सप्ताह बाद फिर की जाएगी।

बिहार की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मधुबनी पेंटिंग की सरकारी उपेक्षा और कलाकारों की दयनीय अवस्था पर पटना हाइकोर्ट में सुनवाई की

पटना । पटना हाइकोर्ट ने राज्य की प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित मधुबनी पेंटिंग की सरकारी उपेक्षा और कलाकारों की दयनीय अवस्था पर सुनवाई की। आत्मबोध की जनहित याचिका पर एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने कला व संस्कृति सचिव व उद्योग विभाग के निर्देशक को पटना एयरपोर्ट परिसर में बने मधुबनी पेंटिंग का निरीक्षण कर कल कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत करें।

याचिकाकर्ता के वकील डा. मौर्य विजय चन्द्र ने कोर्ट को बताया कि मधुबनी पेंटिंग सरकारी उपेक्षा का शिकार तो है ही, साथ ही मधुबनी पेंटिंग करने वाले कलाकारों का शोषण भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि मधुबनी पेंटिंग की ख्याति देश विदेश में है,लेकिन मधुबनी पेंटिंग के कलाकार गरीबी में जीवन बिता रहे है।

उन्होंने बताया कि मधुबनी पेंटिंग के कलाकारों को अपने कानूनी अधिकारों का ज्ञान नहीं है।इसी का लाभ बिचौलिए उठाते है।उनकी पेंटिंग का बाहर ले जा कर महंगे दामों में बेचते है, जबकि उन कलाकारों को थोड़ी सी रकम दे देते है।

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उन्होंनेे कोर्ट को बताया कि उन्हें 2005 में ही जीआई टैग भारत सरकार से लगाने की अनुमति प्राप्त हुई। ये भौगोलिक क्षेत्र के तहत रजिस्टर होता है लेकिन इसका आजतक रेजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है। इसके सम्बन्ध में इन कलाकारों को जानकारी नहीं है।इसका फायदा बिचौलिए उठा लेते है।

इस मामलें पर अगली सुनवाई कल की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट में होली अवकाश 6 मार्च, 2023 से 10 मार्च, 2023 तक; 13 मार्च, 2023 को खुलेंगे कोर्ट

पटना हाईकोर्ट में 6 मार्च, 2023 से 10 मार्च, 2023 तक होली अवसर पर बंद रहेगा। पटना हाईकोर्ट 13 मार्च, 2023 को होली के अवकाश के बाद खुल जाएगा।

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इस बीच किसी प्रकार का न्यायिक कार्य हाईकोर्ट में नहीं किया जाएगा।

पटना हाइकोर्ट के जज जस्टिस अनिल कुमार उपाध्याय का आज सुबह चेन्नई में निधन हो गया

पटना हाइकोर्ट के जज जस्टिस अनिल कुमार उपाध्याय का आज सुबह चेन्नई में निधन हो गया।जस्टिस उपाध्याय किडनी की समस्या से पीड़ित थे और उनका ईलाज चल रहा था।

जस्टिस उपाध्याय का जन्म 4 दिसम्बर,1962 को हुआ था।उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी से एल एल बी और एल एल एम की डिग्री ली।उन्होंने पटना के कामर्स कालेज में अंशकालिक शिक्षक के रूप में शिक्षण कार्य किया।उन्होंने पटना लॉ कॉलेज, पटना में भी अंशकालिक शिक्षक के रूप में कार्य किया।

चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में 2007 से 2017 कार्य किया।राज्य सरकार कर स्टैंडिंग कॉउन्सिल के पद पर 2010 से 2017 तक कार्य किया।

उन्होंने 22 मई, 2017 को पटना हाइकोर्ट के जज के रूप कार्यभार ग्रहण किया।उनकी प्रतिभा,विद्वता और कार्य करने की क्षमता की बहुत थी।इसी बीच उन्हें किडनी की बीमारी का पता चला।उनके किडनी का प्रत्यारोपण हो गया था। लेकिन आज सुबह उनका निधन हो गया।

पटना हाईकोर्ट में राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों के स्थिति के सम्बन्ध दायर जनहित याचिका पर 2 मार्च,2023 को सुनवाई होगी

पटना हाईकोर्ट में राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों के स्थिति के सम्बन्ध दायर जनहित याचिका पर 2 मार्च,2023 को सुनवाई होगी। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ कुणाल कौशल की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया कि इन लॉ कालेजों में जो प्रिंसिपल और शिक्षक कार्य कर रहे है, वे यूजीसी के मानदंडों के अनुसार शैक्षणिक योग्यता रखते है।उन्होंने बताया कि ये शिक्षक यूजीसी द्वारा नेट की परीक्षा बिना पास किये पद पर बने हुए।इन लॉ कालेजों के प्रिंसिपल भी पीएचडी की डिग्री प्राप्त नहीं किया है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को यह बताने को कहा था कि राज्य में स्थित लॉ कॉलेजों में नेट की परीक्षा पास किए शिक्षकों को क्यों नियुक्त नहीं किया जा सकता है।

राज्य में स्थित लॉ कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव के मामलें पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की जा रही है।

कोर्ट ने बार कॉउन्सिल ऑफ इंडिया से ये जानना चाहा था कि राज्य के लॉ कॉलेज में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लॉ कालेजों में योग्य शिक्षकों की नियुक्ति होना आवश्यक है।

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कोर्ट को अधिवक्ता दीनू कुमार ने बताया कि राज्य के सरकारी और निजी लॉ कालेजों की स्थिति बहुत दयनीय है।वहां बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है।

बीसीआई के निर्देश और जारी किए गए गाइड लाइन के बाद भी बहुत सुधार नहीं हुआ है।बीसीआई के निरीक्षण के बाद भी बहुत सारे कालेज निर्धारित मानकों को नहीं पूरा कर रहे है।

इससे पूर्व कोर्ट ने बीसीआई के अनुमति/ अनापत्ति प्रमाण मिलने के बाद ही सत्र 2021- 22 के लिए राज्य के 17 लॉ कालेजों को अपने यहां दाखिला लेने के लिए अनुमति दी थी।

पूर्व में हाई कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए बिहार के सभी 27 सरकारी व निजी लॉ कॉलेजों में नए दाखिले पर रोक लगा दी थी। बाद मे इस आदेश में आंशिक संशोधन करते हुए 17 कॉलेजों में सशर्त दाखिले की मंजूरी दे दी थी।

उस समय हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि दाखिला सिर्फ 2021-22 सत्र के लिए ही होगा।कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि अगले साल के सत्र के लिए बीसीआई से फिर मंजूरी लेनी होगी।

उस समय कोर्ट ने इन कालेजों का निरीक्षण कर बार काउंसिल ऑफ इंडिया को तीन सप्ताह में रिपोर्ट देने का आदेश देते हुए कहा था कि जिन लॉ कालेजों को पढ़ाई जारी करने की अनुमति दी गई है, वहां की व्यवस्था और उपलब्ध सुविधाओं को भी देखा जायेगा।

सुनवाई के समय समय याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता दीनू कुमार एवं रितिका रानी, बीसीआई की ओर से अधिवक्ता विश्वजीत कुमार मिश्रा ने कोर्ट में अपने अपने पक्षों को प्रस्तुत किया।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 2 मार्च, 2023 को फिर की जाएगी।

राज्य के विभिन्न अधिवक्ता संघों में होने जा रहे चुनाव में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों पर पटना हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने कड़ा विरोध जताया है

राज्य के विभिन्न अधिवक्ता संघों में होने जा रहे चुनाव में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों पर पटना हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने कड़ा विरोध जताया है।इन दिशानिर्देशों को बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने बिहार स्टेट बार काउंसिल द्वारा जारी किया गया है ।

श्री वर्मा ने बिहार स्टेट बार काउंसिल द्वारा जारी उन दिशानिर्देशों पर आपत्ति जताई है, जिसमें आगामी अधिवक्ता संघों के चुनाव में केवल उन्हीं अधिवक्ताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की बात कही गई है जो अधिवक्ता पिछले पाँच वर्षों में प्रत्येक साल कम से कम पाँच मामलों में अपनी हाजिरी दे चुके हैं ।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने यह दिशानिर्देश फर्जी मतदाताओं को मतदान से रोकने के लिए जारी किया है।बार काउंसिल का यह कथन है कि जो अधिवक्ता लाइसेंस लेकर दूसरे व्यवसाय में लगे हुए हैं ,उन्हें मतदाता सूची में शामिल नहीं किया जाना चाहिए ।

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वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने बार काउंसिल द्वारा जारी इस दिशानिर्देश पर कहा कि यह एडवोकेट्स एक्ट एवं बार काउंसिल नियमों के विरुद्ध है । उन्होंने कहा कि जो भी अधिवक्ता स्टेट बार काउन्सिल में नामांकित हैं,उन्हें वोट देने का अधिकार है । ऐसे दिशानिर्देशों को परिपत्र के माध्यम से अस्तित्व में नहीं लाया जा सकता, जब तक कानून में संशोधन न किया जाए।

उन्होंने इन दिशानिर्देशों को वकीलों के अहित में बताया।
उन्होंने कहा कि अगर ये सर्कुलर लाना था,तो अधिवक्ता संगठनों से व्यापक विचार विमर्श करना चाहिए था। ।

पटना हाइकोर्ट ने पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई करते हुए निर्माण कम्पनियों को बताने को कहा है कि निर्माण कार्य कब तक पूरा हो जाएगा

पटना हाइकोर्ट ने पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई की। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्माण कम्पनियों को बताने को कहा है कि निर्माण कार्य कब तक पूरा हो जाएगा।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र,राज्य सरकार,एनएचएआई और अन्य सम्बंधित पक्षों को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था।सम्बंधित पक्षों ने कोर्ट के समक्ष हलफनामा दायर किया है।

पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य कर रही कम्पनियों ने कोर्ट को बताया कि 31मार्च,2023 तक फेज एक का अधिकांश कार्य पूरा कर लिया जाएगा।साथ ही इस राजमार्ग के निर्माण कार्य को लगभग 30 जून, 2023 तक पूरा कर लिया जाएगा।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता मनीष कुमार ने कोर्ट को बताया कि जिस गति से काम किया जा रहा है, ऐसे में तय समय सीमा में निर्माण कार्य पूरा होना कठिन है।उन्होंने कहा कि तय समय सीमा में कार्य पूरा करने के लिए संसाधनों और कार्य करने वाले लोगों की संख्या बढ़ाने की जरूरत हैं।

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इससे पूर्व अधिवक्ताओं की टीम ने खंडपीठ के समक्ष पटना गया डोभी एनएच का निरीक्षण कर कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत किया था।पिछली सुनवाई में कोर्ट ने वकीलों की टीम को इस राजमार्ग के निर्माण कार्य का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने फेज 2 के निर्माण में उत्पन्न कर रही बाधाओं और अतिक्रमण को राज्य सरकार शीघ्र हटाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने इसके लिए आवश्यक पुलिस बल और व्यवस्था मुहैया कराने का निर्देश सबंधित ज़िला प्रशासन को दिया है।

पूर्व में भी राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण करने वाली कंपनी ने इसका निर्माण कार्य 30 जून,2023 तक पूरा करने का अश्वासन कोर्ट को दिया था।साथ ही कोर्ट ने इस फेज के निर्माण में बाधा उत्पन्न होने वाले सभी अवरोधों को तत्काल हटाने का निर्देश सम्बंधित अधिकारियों को दिया था।

कोर्ट को पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में लगी निर्माण कंपनी ने बताया था कि पटना गया डोभी एनएच के निर्माण में कई जगह बाधा उत्पन्न किया जा रहा है।

इस मामलें पर 3अप्रैल,2023 को फिर सुनवाई की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में एयरपोर्ट के स्थापित करने,विकास, और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को राज्य के एयरपोर्ट और हवाई पट्टियों के आस पास अवैध अतिक्रमणों को हटाने का निर्देश दिया

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में एयरपोर्ट के स्थापित करने,विकास, और सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सुनवाई की।एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने इन मामलों पर सुनवाई राज्य सरकार को राज्य के एयरपोर्ट और हवाई पट्टियों के आस पास अवैध अतिक्रमणों को हटाने का निर्देश दिया। साथ ही अगली सुनवाई में कार्रवाई रिपोर्ट तलब किया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया इस मामलें में कार्रवाई करने के लिए केंद्रीय उड्डयन मंत्रालय के सम्बंधित अधिकारी से सहयोग करेंगे।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से ये बताने को कहा कि राज्य में नए एयरपोर्ट बनाए जाने के मामलें क्या कार्रवाई की गई।दोनों सरकारों को बताने को कहा गया कि वे बताए कि इनके सम्बन्ध में क्या प्रस्ताव बना रहे है।

पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने जानना चाहा था कि कार्यरत एयरपोर्ट पटना,गया,बिहटा और दरभंगा के एयरपोर्ट के विकास,विस्तार और सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की क्या योजना है।बहुत सारी सुविधाओं की कमी है।इन्हें बेहतर बनाने के क्या कार्रवाई की जा रही है।

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इससे पूर्व में हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए केंद्र और राज्य सरकार को पटना और बिहटा में एक ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने पर विचार करने को कहा था। तत्कालीन चीफ संजय करोल की खंडपीठ ने इस सम्बन्ध में अभिजीत कुमार पाण्डेय की जनहित याचिका पर फैसला सुनाया था।

कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्य की जनता को विकसित और सुरक्षित हवाई यात्रा की सुविधा दिया जाना मौलिक अधिकारों के अंतर्गत आता है।केंद्र और राज्य सरकार इन्हें विकसित और सुरक्षित हवाई यात्रा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस मामलें पर अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में बड़ी संख्या में फर्जी डिग्रियों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की बहाली मामलें पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से कार्रवाई रिपोर्ट तलब किया

पटना हाइकोर्ट ने राज्य में बड़ी संख्या में फर्जी डिग्रियों के आधार पर नियुक्त शिक्षकों की बहाली मामलें पर सुनवाई की। रंजीत पंडित की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए एसीजे जस्टिस सी एस सिंह ने राज्य सरकार से कार्रवाई रिपोर्ट तलब किया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया कि बड़ी संख्या में जाली डिग्रियों के आधार पर शिक्षक राज्य में काम कर रहे हैं।साथ ही वे वेतन उठा रहे है।

इससे पूर्व कोर्ट ने 2014 के एक आदेश में कहा था कि जो इस तरह की जाली डिग्री के आधार पर राज्य सरकार के तहत शिक्षक है,उन्हें ये अवसर दिया जाता है कि वे खुद अपना इस्तीफा दे दें, तो उनके विरुद्ध कार्रवाई नहीं की जाएगी।

26अगस्त,2019 को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि इस आदेश के बाद भी बड़ी संख्या में इस तरह के शिक्षक कार्यरत है और वेतन ले रहे है।कोर्ट ने मामलें को निगरानी विभाग को जांच के लिए सौंपा।उन्हें इस तरह के शिक्षकों को ढूंढ निकालने का निर्देश दिया।

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31जनवरी,2020 के सुनवाई दौरान निगरानी विभाग ने कोर्ट को जानकारी दी कि राज्य सरकार द्वारा इनके सम्बंधित रिकॉर्ड की जांच कर रही है,लेकिन अभी भी एक लाख दस हजार से अधिक शिक्षकों के रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।

साथ ही ये भी पाया गया कि 1316 शिक्षक बिना वैध डिग्री के नियुक्त किये गए।कोर्ट ने इस मामलें को काफी गम्भीरता से लिया।कोर्ट ने सम्बंधित विभागीय सचिव से हलफनामा दायर कर स्थिति का ब्यौरा देने का निर्देश दिया था।

आज कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अगली सुनवाई में अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा तलब किया।इस मामलें पर अगली सुनवाई 13मार्च,2023 को होगी।

मात्र 200ML शराब पकड़े जाने के आरोप में एक नई गाड़ी को नीलाम व राज्यसात कर देने के मामले पर पटना हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई

पटना हाइकोर्ट ने मात्र 200 मिलीलीटर शराब पकड़ जाने के आरोप में एक नई मारुति वैगनआर गाड़ी को नीलाम व राज्यसात कर देने के मामले पर पटना हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने बेगूसराय के डीएम को आदेश दिया कि वह गाड़ी के मालिक को 50 हज़ार रुपये मुआवजा के साथ उस गाड़ी के इंश्योरेंस मूल्य के बराबर की रकम भी गाड़ी के मालिक को दें।

याचिकाकर्ता अंजनी झा की रिट याचिका को मंजूर करते हुए ये फैसला सुनाया।ये मामला बेगूसराय के मुफस्सिल थाना अंतर्गत जून, 2021 में जब्त हुए मारुति वैगनआर को शराबबंदी कानून की आड़ मे आनन-फानन में नीलाम करने का है।

याचिकाकर्ता जप्त हुए गाड़ी का मालिक था। इस मारुति वैगन आर गाड़ी को पुलिस ने इस आरोप पर पकड़ा था कि उस पर सवार सात व्यक्ति के पास 200 मिलीलीटर विदेशी शराब थी।

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कोर्ट ने पूरी नीलामी प्रक्रिया को शराबबन्दी कानून के खिलाफ मानते हुए उक्त कारवाही को अवैध ठहराया।हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को यह भी निर्देश दिया है कि वह इस मामले की जांच करें और जिस भी अफसर की गलती पकड़ी जाए ,उसके खिलाफ कार्रवाई करें ।

PatnaHighCourt News: कोर्ट ने पटना स्थित क्षेत्रीय पासपोर्ट ऑफिस को याचिकाकर्ता के लिए फ्रेस पासपोर्ट जारी करने के आवेदन पर विचार करने का आदेश दिया

पटना हाईकोर्ट ने पासपोर्ट जारी करने के लिए याचिकाकर्ता के आवेदन पर निर्णय लेने के मामले पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के आवेदन पर विचार करने का आदेश दिया है। जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह की पीठ ने निदा अमीना अहमद द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश को पारित किया।

कोर्ट ने पटना स्थित क्षेत्रीय पासपोर्ट ऑफिस को याचिकाकर्ता के लिए फ्रेस पासपोर्ट जारी करने के आवेदन पर विचार करने का आदेश दिया है। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता की जन्म तिथि को आईसीएसई द्वारा जारी बर्थ सर्टिफिकेट के आधार पर चार सप्ताह में सुधार करने को कहा है।

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याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता अमित श्रीवास्तव ने बताया कि कोर्ट ने म्यूनिसिपल ऑथोरिटी को भी याचिककर्ता के सही जन्म तिथि को रिकॉर्ड करने को कहा है। इतना ही नहीं, कोर्ट ने ऐसे लंबित आवेदन समेत भविष्य में आने वाले ऐसे आवेदन पर कार्रवाई करने हेतु उम्मीद जताया है।

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाइकोर्ट के सात जजों के GPF अकाउंट बंद होने के मामलें पर केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा

पटना हाइकोर्ट के सात जजों के जीपीएफ अकाउंट बंद होने के मामलें पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। इस मामलें पर चीफ जस्टिस डी बाई चन्द्रचूड़ की डिवीजन बेंच ने सुनवाई की।सुप्रीम कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई के लिए आज की तिथि निर्धारित की थी।

पिछली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष ये मामला जब आया, तो उन्होंने पूछा कि मामला क्या है।जजों के जीपीएफ अकाउंट बंद कर दिया गया है।

कोर्ट ने जानना चाहा कि ये याचिका किसके द्वारा दायर की गई,तो याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने चीफ जस्टिस चन्द्रचूड को बताया गया था कि पटना हाइकोर्ट के सात जजों ने याचिका दायर की है।

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पटना हाइकोर्ट के सात जजों ने जीपीएफ अकाउंट बंद होने के मामलें में याचिका दायर की है।इनके नाम जस्टिस शैलेन्द्र सिंह, जस्टिस अरुण कुमार झा, जस्टिस जीतेन्द्र कुमार, जस्टिस आलोक कुमार पाण्डेय, जस्टिस सुनील दत्त मिश्रा,जस्टिस चन्द्रप्रकाश सिंह और जस्टिस चन्द्रशेखर झा है।

पटना हाइकोर्ट में पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई 27 फरवरी,2023 को की जाएगी

पटना हाइकोर्ट में पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई 27फरवरी,2023 को की जाएगी। एसीजे जस्टिस सी एस सिंह की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने केंद्र,राज्य सरकार,एनएचएआई और अन्य सम्बंधित पक्षों को हलफनामा दायर करने के लिए 24फरवरी,2023 तक का समय दिया था।

इससे पूर्व अधिवक्ताओं की टीम ने खंडपीठ के समक्ष पटना गया डोभी एनएच का निरीक्षण कर कोर्ट में रिपोर्ट प्रस्तुत किया था।पिछली सुनवाई में कोर्ट ने वकीलों की टीम को इस राजमार्ग के निर्माण कार्य का निरीक्षण कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।

वकीलों की टीम राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य के निरीक्षण किया था। कोर्ट ने निर्माण कार्य में लगायी गई मशीन और मानव संसाधन के सम्बन्ध में भी रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा था।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने फेज 2 के निर्माण में उत्पन्न कर रही बाधाओं और अतिक्रमण को राज्य सरकार शीघ्र हटाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने इसके लिए आवश्यक पुलिस बल और व्यवस्था मुहैया कराने का निर्देश सबंधित ज़िला प्रशासन को दिया है।

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पिछली सुनवाइयों में राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण करने वाली कंपनी ने इसका निर्माण कार्य 30 जून,2023 तक पूरा करने का अश्वासन कोर्ट को दिया था।साथ ही कोर्ट ने इस फेज के निर्माण में बाधा उत्पन्न होने वाले सभी अवरोधों को तत्काल हटाने का निर्देश सम्बंधित अधिकारियों को दिया था।

पिछली सुनवाई कोर्ट ने पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में लगी निर्माण कंपनी ने कोर्ट को बताया था कि पटना गया डोभी एनएच के निर्माण में कई जगह बाधा उत्पन्न किया जा रहा है।

इस मामलें पर 27फरवरी,2023 को सुनवाई की जाएगी।