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पटना हाईकोर्ट ने पंचायत मुखिया चुनाव में सरकारी‑नौकरी आरक्षण लागू नहीं, 1992 के स्थानीय आरक्षण अधिनियम को अनिवार्य ठहराया।

बिहार में अगले साल निर्धारित पंचायत चुनाव की तैयारी तेज़ी से चल रही है। इस बीच पटना हाईकोर्ट ने मुखिया पद के आरक्षण संबंधी एक महत्वपूर्ण फ़ैसला सुनाया, जिससे चुनावी प्रक्रियाओं में स्पष्टता आई है। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सरकारी नौकरियों में लागू आरक्षण नियम को पंचायत मुखिया चुनाव पर सीधे लागू नहीं किया जा

सकता। इस निर्णय ने उम्मीदवारों, दलों और निर्वाचन अधिकारियों के बीच काफी चर्चा को जन्म दिया है, क्योंकि पहले इस मुद्दे पर अस्पष्टता बनी हुई थी। हाईकोर्ट के इस आदेश का उद्देश्य चुनावी नियमों की समानता और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित करना है, ताकि आगामी चुनाव बिना अनावश्यक कानूनी उलझनों के आयोजित हो सके।

पिछले कुछ महीनों में बिहार

सरकार ने पंचायत चुनाव की रूपरेखा तैयार करने के लिए कई समितियों को गठित किया। इन समितियों ने विभिन्न सामाजिक वर्गों की प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की आवश्यकता को उठाया। 1991 के बिहार आरक्षण अधिनियम, जो सरकारी नौकरियों में शेड्यूलेड कास्ट, शेड्यूलेड ट्राइब और अन्य वर्गों के लिए आरक्षण निर्धारित करता है, को अक्सर पंचायत

चुनाव में भी लागू करने की मांग की गई थी। हालांकि, इस अधिनियम की प्रावधानें मुख्यतः सार्वजनिक सेवा के क्षेत्रों में लागू होती हैं, न कि स्थानीय निकायों के चुनावी प्रक्रिया में। इस पृष्ठभूमि को देखते हुए हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर विस्तृत सुनवाई की।

सुनवाई के दौरान कई सामाजिक संगठनों ने अपनी-अपनी दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। कुछ ने

तर्क दिया कि 1991 के अधिनियम को पंचायत चुनाव पर लागू करने से सामाजिक न्याय की प्राप्ति होगी और दलित व पिछड़ी वर्गों को सशक्त बनाने में मदद मिलेगी। वहीं, कुछ अन्य समूहों ने बताया कि स्थानीय निकायों की स्वायत्तता और चुनावी प्रक्रिया की विशिष्टता को देखते हुए अलग नियम बनाना आवश्यक है। इस परिप्रेक्ष्य में हाईकोर्ट

ने दोनों पक्षों के तर्कों को ध्यान में रखते हुए अपना निर्णय दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया कि मौजूदा राज्य पंचायत आरक्षण अधिनियम ही लागू होगा।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि बिहार पंचायत आरक्षण अधिनियम, 1992 में संशोधित होकर वर्तमान में लागू है, और यह पंचायत चुनाव में आरक्षण के प्रावधानों को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करता

है। इस अधिनियम के तहत मुखिया पद, उपमुखिया पद और अन्य पदों के लिए सामाजिक वर्गों के अनुसार आरक्षण निर्धारित किया गया है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के अनुसार आरक्षण का अनुपालन करना अनिवार्य है और किसी भी अन्य कानून से इसके प्रावधानों को प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इस निर्णय ने चुनावी

प्रक्रिया में कानूनी स्थिरता लाई है।

निर्णय के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने तुरंत इस आदेश को लागू करने की तैयारी शुरू कर दी। आयोग ने बताया कि अब से सभी उम्मीदवारों को 1992 के पंचायत आरक्षण अधिनियम के तहत निर्धारित वर्गीकरण के अनुसार ही आरक्षण के लिए पंजीकरण करना होगा। इसके अलावा, चयन प्रक्रिया में कोई भी

पक्ष 1991 के सरकारी नौकरी आरक्षण नियमों का हवाला नहीं दे सकेगा। आयोग ने इस दिशा में तकनीकी मार्गदर्शन जारी किया, जिससे चुनावी डेटाबेस को अपडेट किया जा सके और आरक्षण के अनुपालन को सटीक रूप से ट्रैक किया जा सके। यह कदम समयसीमा में देरी को रोकने के लिए आवश्यक माना गया।

उम्मीदवारों ने इस फैसले पर

मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कीं। कई दलों ने बताया कि अब उन्हें अपने उम्मीदवारों की चयन प्रक्रिया में आरक्षण के नियमों का सख़्ती से पालन करना पड़ेगा, जिससे उनके उम्मीदवारों की सूची में बदलाव हो सकता है। कुछ स्थानीय स्तर पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा कि यह निर्णय सामाजिक न्याय की दिशा में एक सकारात्मक कदम है,

क्योंकि इससे पिछड़े वर्गों को वास्तविक प्रतिनिधित्व मिलेगा। वहीं, कुछ प्रमुख पार्टी नेताओं ने इस बात पर ज़ोर दिया कि चुनावी रणनीति में अब आरक्षण की सीमाओं को ध्यान में रखकर ही प्रचार-प्रसार किया जाएगा। कुल मिलाकर, सभी ने इस निर्णय को कानूनी स्पष्टता के रूप में सराहा।

राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर अपने-अपने दृष्टिकोण रखे।

बीजेपी ने कहा कि अदालत ने संविधान के सिद्धांतों के अनुरूप निर्णय लिया है और अब सभी दलों को इस नियम के अनुसार ही चुनाव लड़ना चाहिए। कांग्रेस ने कहा कि आरक्षण के नियम सामाजिक समता को बढ़ावा देते हैं और इन्हें पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए। स्थानीय स्तर पर सक्रिय जेडीयू और आरएलपी ने

कहा कि यह निर्णय उनके दलों के लिए रणनीतिक बदलाव का संकेत है, क्योंकि उन्हें अब अधिक प्रतिनिधित्व वाले वर्गों के उम्मीदवारों को मैदान में लाना पड़ेगा। इस प्रकार, सभी प्रमुख राजनीतिक दलों ने अपने-अपने पक्ष में इस फैसले को अपनाया और आगामी चुनावों में इसके प्रभाव को लेकर तैयारियाँ शुरू कर दीं।

आर्थिक विश्लेषकों ने इस निर्णय

के संभावित प्रभावों पर टिप्पणी की। उन्होंने बताया कि यदि आरक्षण के नियम सख़्ती से लागू होते हैं, तो स्थानीय विकास परियोजनाओं में विविध वर्गों की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे सामाजिक बुनियाद मजबूत होगी। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में संतुलित निवेश की संभावना बढ़े

Updated: August 25, 2026

पटना हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन, पूर्व थानेदार पर एफआईआर

बिहार के बक्सर जिले में पुलिसिया जुल्म के एक मामले में पटना हाईकोर्ट ने बड़ा एक्शन लिया है। कोर्ट ने पूर्व थानेदार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है। यह मामला एक युवक की पुलिस हिरासत में मौत से जुड़ा है, जिसमें परिवार वालों ने पुलिसिया जुल्म का आरोप लगाया था। कोर्ट के इस फैसले से पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया है।पुलिसिया जुल्म के इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एक युवक को पुलिस ने हिरासत में लिया था। परिवार वालों का आरोप है कि पुलिस ने युवक को बिना किसी अपराध के गिरफ्तार किया और फिर उसकी पिटाई की। इस पिटाई के बाद युवक की मौत हो गई। परिवार वालों ने पुलिस पर जुल्म का आरोप लगाया और न्याय की मांग की।

इस मामले में पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें पुलिसिया जुल्म के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए पुलिस प्रशासन से जवाब तलब किया था। पुलिस प्रशासन ने अपना जवाब दाखिल किया, लेकिन कोर्ट ने उसे संतोषजनक नहीं पाया।

पटना हाईकोर्ट के जस्टिस ने इस मामले की सुनवाई की और पुलिस प्रशासन को फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि पुलिसिया जुल्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। कोर्ट ने पूर्व थानेदार पर एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया और पुलिस प्रशासन से रिपोर्ट मांगी।

इस मामले में पुलिस प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। पुलिस प्रशासन के अधिकारी इस मामले में अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोर्ट के फैसले से उन्हें बड़ा झटका लगा है। पुलिस प्रशासन को अब इस मामले में अपनी रिपोर्ट पेश करनी होगी और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।

पुलिसिया जुल्म के इस मामले में परिवार वालों ने न्याय की मांग की थी। कोर्ट के फैसले से उन्हें उम्मीद बंधी है कि अब उन्हें न्याय मिलेगा। परिवार वालों ने कहा कि वे कोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं और उम्मीद करते हैं कि दोषियों को सजा मिलेगी।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मामले में बयान दिया है। उन्होंने कहा कि पुलिसिया जुल्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार न्याय के साथ खड़ी है और दोषियों को सजा मिलेगी।

इस मामले में विपक्षी दलों ने भी बयान दिए हैं। उन्होंने कहा कि पुलिसिया जुल्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और परिवार वालों को न्याय दिलाना चाहिए।

पुलिसिया जुल्म के इस मामले में समाज की भी प्रतिक्रिया सामने आ रही है। लोगों ने कहा कि पुलिसिया जुल्म के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार को इस मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और परिवार वालों को न्याय दिलाना चाहिए।

पुलिसिया जुल्म के इस मामले में पटना हाईकोर्ट का फैसला न केवल पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि यह न्याय प्रणाली में आम आदमी के विश्वास को बढ़ाने में

सुप्रीम कोर्ट: बिहार के ठेकेदार को चार सप्ताह की गिरफ्तारी सुरक्षा

बिहार के एक ठेकेदार को सुप्रीम कोर्ट ने चार सप्ताह के लिए गिरफ्तारी से सुरक्षा प्रदान की है, जो एक टेंडर मामले में आरोपी हैं। यह मामला बिहार के एक प्रमुख ठेकेदार से जुड़ा हुआ है, जिसने राज्य सरकार के साथ कई परियोजनाओं पर काम किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ठेकेदार को गिरफ्तारी से बचाया जा सकेगा, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह सुरक्षा कितने समय तक चलेगी।बिहार में ठेकेदारों और सरकार के बीच टेंडर मामले में विवाद आम बात है। कई बार ठेकेदारों पर आरोप लगते हैं कि उन्होंने सरकार के नियमों का उल्लंघन किया है और अनियमित तरीके से टेंडर हासिल किए हैं। इस मामले में भी ऐसा ही आरोप लगाया गया है, जिसमें ठेकेदार पर आरोप है कि उसने टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह मामला और जटिल हो गया है।

बिहार सरकार ने इस मामले में ठेकेदार के खिलाफ जांच शुरू की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसने टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की है। इस जांच के बाद ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिसमें उसे गिरफ्तार करने की भी बात कही गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ठेकेदार को गिरफ्तारी से बचाया जा सकेगा।

इस मामले में कई प्रमुख घटनाक्रम हुए हैं। पहले, ठेकेदार के खिलाफ जांच शुरू की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसने टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की है। इसके बाद ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिसमें उसे गिरफ्तार करने की भी बात कही गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ठेकेदार को गिरफ्तारी से बचाया जा सकेगा।

बिहार सरकार ने इस मामले में ठेकेदार के खिलाफ जांच शुरू की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसने टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की है। इस जांच के बाद ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिसमें उसे गिरफ्तार करने की भी बात कही गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ठेकेदार को गिरफ्तारी से बचाया जा सकेगा।

इस मामले में कई संबंधित पक्षों की प्रतिक्रिया सामने आई है। बिहार सरकार ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन ठेकेदार के खिलाफ जांच जारी रखेगी। वहीं, ठेकेदार के वकील ने कहा है कि यह फैसला उनके मुवक्किल के लिए एक बड़ी राहत है।

बिहार सरकार ने इस मामले में ठेकेदार के खिलाफ जांच शुरू की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि उसने टेंडर प्रक्रिया में अनियमितता की है। इस जांच के बाद ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था, जिसमें उसे गिरफ्तार करने की भी बात कही गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ठेकेदार को गिरफ्तारी से बचाया जा सकेगा।

इस मामले का राजनीतिक और आर्थिक प्रभाव भी पड़ सकता है। बिहार सरकार ने कहा है कि वह सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करती है, लेकिन ठेकेदार के खिलाफ जांच जारी रखेगी।

यह फैसला बिहार के ठेकेदारों के लिए महत्वपूर्ण है. सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आगे की कार्यवाही को प्रभावित करेगा.

हाईकोर्ट के आदेश से हरसिद्धि के पन्नापुर में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई पूरी

हरसिद्धि के पन्नापुर में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने का काम पूरा हुआ है। यह कार्रवाई उन लोगों के खिलाफ की गई है जिन्होंने सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण किया था। हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई करते हुए अतिक्रमणकारियों के निर्माण को ध्वस्त कर दिया।

हरसिद्धि के पन्नापुर में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का मामला पुराना है।

यहां कई लोगों ने सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण कर लिया था, जिसे हटाने के लिए कई बार सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिए गए। लेकिन अतिक्रमणकारियों ने सरकारी निर्देशों की अवहेलना करते हुए अपने निर्माण को जारी रखा। इस मामले में हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने की मांग की गई थी।

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई के बाद सरकारी अधिकारियों को निर्देश दिए कि वे सरकारी जमीन पर किए गए सभी अवैध निर्माण को हटाएं। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशासन ने तेजी से कार्रवाई करते हुए अतिक्रमणकारियों के निर्माण को ध्वस्त कर दिया। इस कार्रवाई में कई अवैध निर्माण हटाए गए हैं और सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कर दिया गया है।

हरसिद्धि के पन्नापुर में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का मामला एक लंबे समय से चला आ रहा था। यहां के निवासी सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण के खिलाफ कई बार आंदोलन करते रहे हैं। उन्होंने सरकारी अधिकारियों से अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन सरकारी अधिकारी इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकारी अधिकारियों ने तेजी से कार्रवाई करते हुए अतिक्रमणकारियों के निर्माण को हटा दिया है। इस कार्रवाई में कई अवैध निर्माण हटाए गए हैं और सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कर दिया गया है। यह कार्रवाई उन लोगों के लिए एक बड़ा संदेश है जो सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण करते हैं और सरकारी निर्देशों की अवहेलना करते हैं।

हरसिद्धि के पन्नापुर में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सरकारी भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को स्थानीय निवासी स्वागत कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि यह कार्रवाई उन लोगों के लिए एक बड़ा संदेश होगी जो सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण करते हैं और सरकारी निर्देशों की अवहेलना करते हैं। स्थानीय निवासी सरकारी अधिकारियों से आगे भी इस तरह की कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं।

हरसिद्धि के पन्नापुर में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का मामला एक लंबे समय से चला आ रहा था। यहां के निवासी सरकारी जमीन पर अवैध निर्माण के खिलाफ कई बार आंदोलन करते रहे हैं। उन्होंने सरकारी अधिकारियों से अतिक्रमणकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन सरकारी अधिकारी इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं कर पा रहे थे।

यह कार्रवाई न केवल सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त करती है, बल्कि यह एक मजबूत संदेश भी देती है कि सरकारी निर्देशों की अवहेलना करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी ।

पटना हाईकोर्ट का बड़ा एक्शन: विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार समेत 42 विधायकों को नोटिस, चुनावी हलफनामे में गड़बड़ी के आरोप से मचा सियासी भूचाल

Patna High Court Notice to 42 MLAs: बिहार की राजनीति में उस समय भारी हलचल मच गई जब पटना उच्च न्यायालय ने एक साथ 42 विधायकों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया। इन विधायकों में कोई साधारण नाम नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा के अध्यक्ष प्रेम कुमार, वरिष्ठ मंत्री विजेंद्र यादव, विधायक चेतन आनंद, पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा और राजद विधायक अमरेंद्र प्रसाद जैसे प्रभावशाली चेहरे शामिल हैं।

इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल किए गए अपने नामांकन पत्र यानी चुनावी हलफनामे (Affidavit) में संपत्ति, आपराधिक मामलों और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियों को या तो छुपाया या गलत तरीके से प्रस्तुत किया। अदालत की इस सख्त कार्रवाई ने सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों खेमों में एक साथ हलचल पैदा कर दी है।

क्या है पूरा मामला? चुनावी हलफनामे से शुरू हुआ विवाद

यह पूरा मामला बिहार विधानसभा चुनाव के बाद दायर की गई चुनाव याचिकाओं से जुड़ा है। जिन सीटों पर हारने वाले प्रत्याशियों को पराजय का सामना करना पड़ा, उन्होंने अदालत में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि विजयी उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग को दिए गए हलफनामे में गलत या अधूरी जानकारी दी।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि—

  • कुछ विधायकों ने अपनी चल-अचल संपत्ति का पूरा विवरण नहीं दिया।
  • आपराधिक मामलों से संबंधित सूचनाएं स्पष्ट नहीं की गईं।
  • कुछ मामलों में शपथपत्र में तथ्यात्मक त्रुटियां या भ्रामक विवरण प्रस्तुत किए गए।
  • मतदान प्रक्रिया के दौरान भी अनियमितताओं के आरोप लगाए गए।

प्रारंभिक सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने इन आरोपों को प्रथम दृष्टया गंभीर मानते हुए संबंधित सभी 42 विधायकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है।

किन-किन दिग्गजों को मिला नोटिस?

नोटिस पाने वाले नेताओं में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के विधायक शामिल हैं। यह तथ्य इस मामले को और व्यापक बना देता है। प्रमुख नाम इस प्रकार हैं—

  • प्रेम कुमार – बिहार विधानसभा अध्यक्ष
  • विजेंद्र यादव – वरिष्ठ मंत्री
  • जीवेश मिश्रा – भाजपा विधायक
  • चेतन आनंद – विधायक
  • अमरेंद्र प्रसाद – राजद विधायक

सूत्रों के अनुसार अन्य कई विधायकों को भी नोटिस जारी हुआ है, जिनके मामलों की सुनवाई अलग-अलग याचिकाओं के आधार पर की जाएगी।

अदालत की टिप्पणी ने बढ़ाई गंभीरता

सुनवाई के दौरान अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि चुनावी हलफनामा केवल एक औपचारिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह मतदाताओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना स्रोत है।

अदालत ने स्पष्ट किया—

“मतदाता को यह जानने का अधिकार है कि उसका प्रतिनिधि बनने जा रहा व्यक्ति किस प्रकार की पृष्ठभूमि रखता है, उसकी संपत्ति कितनी है और उस पर आपराधिक मामले लंबित हैं या नहीं।”

यदि कोई उम्मीदवार जानबूझकर जानकारी छुपाता है या गलत जानकारी देता है, तो यह न केवल चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध भी है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: सभी ने कहा—कानून का करेंगे पालन

इस मामले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं।

राजद विधायक भाई वीरेंद्र ने कहा कि चुनाव परिणाम को अदालत में चुनौती देना लोकतांत्रिक अधिकार है। उनका कहना है कि यदि किसी प्रत्याशी को लगता है कि चुनाव में गड़बड़ी हुई है, तो वह न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। उन्होंने कहा कि अब यह मामला न्यायालय के विचाराधीन है और अंतिम निर्णय अदालत ही करेगी।

भाजपा विधायक जीवेश मिश्रा ने कहा कि अदालत के सवालों का जवाब अदालत में ही दिया जाएगा। उन्होंने इसे सामान्य कानूनी प्रक्रिया बताया।

कांग्रेस विधायक अभिषेक रंजन ने भी कहा कि यदि किसी को लगता है कि गलत हुआ है तो न्यायालय जाना उसका अधिकार है। जो भी कानूनी प्रक्रिया होगी, उसका पालन किया जाएगा।

राजनीतिक रूप से देखा जाए तो इस मामले में किसी एक दल को निशाना नहीं बनाया गया है, बल्कि विभिन्न दलों के विधायक इसमें शामिल हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि मामला विशुद्ध रूप से कानूनी और प्रक्रियात्मक है।

चुनावी हलफनामा क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

भारत में चुनाव लड़ने वाले प्रत्येक उम्मीदवार को नामांकन के साथ एक शपथपत्र देना अनिवार्य होता है। इसमें निम्नलिखित जानकारियां देना जरूरी है—

  • कुल चल और अचल संपत्ति का विवरण
  • जीवनसाथी और आश्रितों की संपत्ति
  • लंबित आपराधिक मामले
  • शैक्षणिक योग्यता
  • देनदारियां

इस शपथपत्र का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता पूरी जानकारी के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुन सके। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में भी यह स्पष्ट किया गया है कि पारदर्शिता लोकतंत्र की आत्मा है।

संभावित कानूनी परिणाम क्या हो सकते हैं?

यदि अदालत पाती है कि किसी विधायक ने जानबूझकर गलत जानकारी दी है, तो संभावित परिणाम हो सकते हैं—

  1. चुनाव निरस्त किया जा सकता है।
  2. संबंधित विधायक की सदस्यता रद्द हो सकती है।
  3. दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया जा सकता है।
  4. दंडात्मक कार्रवाई भी संभव है।

हालांकि यह सब अदालत के अंतिम निर्णय पर निर्भर करेगा।

बिहार की राजनीति पर क्या पड़ेगा असर?

बिहार की राजनीति पहले ही कई मुद्दों को लेकर गरम है। ऐसे में 42 विधायकों को एक साथ नोटिस मिलना बड़ा घटनाक्रम माना जा रहा है। यदि अदालत का फैसला कठोर आता है तो—

  • विधानसभा की संरचना प्रभावित हो सकती है।
  • सत्ताधारी गठबंधन की संख्या पर असर पड़ सकता है।
  • विपक्ष को राजनीतिक मुद्दा मिल सकता है।
  • चुनावी सुधार पर नई बहस शुरू हो सकती है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक जवाबदेही से भी जुड़ा है।

Pappu Yadav को कोर्ट से मिली जमानत; तीनों केस में कोर्ट से मिली बेल

पटना : पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव को शुक्रवार को बड़ी राहत मिली है। पटना की अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज तीनों मामलों में जमानत दे दी है। वे पिछले एक सप्ताह से बेऊर जेल में बंद थे और जमानत का इंतजार कर रहे थे। अब वे किसी भी वक्त जेल से बाहर आ सकते हैं।

कोर्ट ने जमानत देते हुए यह शर्त भी रखी है कि जब भी मामले की सुनवाई होगी, उन्हें सशरीर उपस्थित होना होगा।

📌 31 साल पुराने मामले में हुई थी गिरफ्तारी

पप्पू यादव की गिरफ्तारी 6 फरवरी को 31 साल पुराने एक मामले में हुई थी। इस केस में उन्हें पहले जमानत मिल चुकी थी, लेकिन बाद में दो अन्य मामले जोड़ दिए गए, जिसके बाद अदालत ने उन्हें दोबारा जेल भेज दिया था।

⚖️ लगातार चल रही थी सुनवाई

  • 9 जनवरी से पटना सिविल कोर्ट में उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई चल रही थी। हर तारीख पर बहस होती रही, लेकिन राहत नहीं मिल पा रही थी। उनके समर्थकों की नजर भी फैसले पर टिकी हुई थी। आखिरकार शुक्रवार को अदालत ने उन्हें राहत दे दी।

🚨 दो नए मामलों से बढ़ी थी मुश्किल

गुरुवार को पुलिस ने उनके खिलाफ दो और पुराने मामले जोड़ दिए थे। ये दोनों केस कोतवाली थाना क्षेत्र से जुड़े बताए जा रहे हैं।

  • एक मामला वर्ष 2017 का
  • दूसरा वर्ष 2019 में दर्ज

इन मामलों के जुड़ने से कानूनी स्थिति और जटिल हो गई थी। हालांकि अब जमानत मिलने के बाद राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है।

🗣️ Rahul Gandhi ने उठाए थे सवाल

पप्पू यादव की गिरफ्तारी के बाद बिहार की राजनीति गरमा गई थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने सरकार पर सवाल उठाए थे।

पप्पू यादव लगातार NEET छात्रा मौत मामले में सरकार की भूमिका पर भी आरोप लगाते रहे हैं।

अब आगे की सुनवाई और उनकी रिहाई को लेकर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

पटना हाईकोर्ट ने बिहार में जाति सर्वेक्षण के दौरान ट्रांसजेंडरओं को जाति की सूची में रखने के खिलाफ दायर हुई जनहित याचिका को निष्पादित करते हुए यह कहा है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को भूल वश ही जाति की सूची में दर्ज किया गया है

पटना हाईकोर्ट ने राज्य में जाति सर्वेक्षण के दौरान ट्रांसजेंडरओं को जाति की सूची में रखने के खिलाफ दायर हुई जनहित याचिका को निष्पादित करते हुए यह कहा है कि ट्रांसजेंडर समुदाय के सदस्यों को भूल वश ही जाति की सूची में दर्ज किया गया है। उन्हे इस सर्वेक्षण में एक जाति विशेष ना मानते हुए एक अलग ग्रुप माना जाए जिनकी अपनी एक निश्चित पहचान है।

चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ ने रेशमा प्रसाद की जनहित याचिका पर सुनवाई की।इन्ही ग्रुप के सदस्यों की सामाजिक आर्थिक और शैक्षणिक हालात से जुड़े जो आंकड़े जुटाए गए, वही तय करेंगे कि ट्रांस जेंडर के सामाजिक उत्थान के लिए उन्हे कल्याणकारी योजनाओं की कितनी ज़रूरत है ।

याचिकाकर्ता जो स्वयं एक ट्रांसजेंडर समुदाय से है, उसने हाई कोर्ट से अनुरोध किया कि जाति सर्वेक्षण के आंकड़े जुटाना में एन्यूमैरेटरों को जो फार्म दिया गया है, उस फॉर्म में ट्रांसजेंडर को जाति की सूची में उल्लेखित किया गया है।

Patnahighcourt

ये ट्रांसजेंडरों के अलग अस्तित्व एवं पहचान होने के मौलिक अधिकार का हनन है।राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि 24 अप्रैल,2023 को ही सभी जिला अधिकारियों को यह सूचित किया गया कि वह ट्रांसजेंडररो का जेंडर तय करने के लिए महिला पुरुष के साथ एक तीसरा विकल्प (बॉक्स )भी रखे,जो “अन्य” के नाम से जाना जाएगा ।

ट्रांसजेंडर इसी तीसरे विकल्प को भरेंगे।साथ ही वे जिस जाति से होंगे, वो जाति का उल्लेख करेंगे।

हाई कोर्ट ने कहा कि चूंकि जाति सर्वेक्षण पूरा हो चुका है, इसलिए जनहित याचिकाकर्ता को या उसके ट्रांसजेंडर समुदाय के किसी भी सदस्यों को यह छूट दिया कोर्ट ने कि वह अपने जेंडर को तीसरे विकल्प में और अपनी जाति, जिसमें वह आते हैं।उसे जाति का विकल्प चुनने के लिए राज्य सरकार को अलग से अर्ज़ी दे सकते है।

पटना हाईकोर्ट ने भागलपुर के पास अगवानी घाट पर गंगा नदी के ऊपर बन रहे पुल के ध्वस्त होने के मामलें पर सुनवाई करते हुए निर्माण कंपनी एस पी सिंगला को अंडरटेकिंग देने को कहा कि वह अपने खर्च से पुल के ध्वस्त भाग का निर्माण करेगा

पटना हाईकोर्ट ने भागलपुर के पास अगवानी घाट पर गंगा नदी के ऊपर बन रहे पुल के ध्वस्त होने के मामलें पर सुनवाई की। अधिवक्ता मणिभूषण सेंगर व ललन कुमार की जनहित याचिकायों पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए निर्माण कंपनी एस पी सिंगला को हलफ़नामा दायर कर अंडरटेकिंग देने को कहा कि वह अपने खर्च से इस पुल के ध्वस्त भाग का निर्माण करेगा। इस मामलें पर अगली सुनवाई 25 अगस्त,2023 को होगी।

विकास कुमार मेहता की ओर से कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत करते हुए वरीय अधिवक्ता एस डी संजय ने कहा कि राज्य सरकार की रिपोर्ट की कॉपी उन्हें दी जाये। उस रिपोर्ट की कॉपी का अध्ययन करने के बाद वे अपना पक्ष कोर्ट के समक्ष रखेंगे।

इससे पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार को घटना की पूरी जानकारी देते हलफ़नामा दायर करने का निर्देश दिया था। साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा दायर हलफ़नामा का जवाब देने के लिए याचिकाकर्ताओं को पुनः दो सप्ताह का समय दिया था।पिछली सुनवाई में कोर्ट में एस पी सिंगला कंपनी के एम डी एस पी सिंगला उपस्थित थे।

इससे पूर्व जस्टिस पूर्णेन्दु सिंह की सिंगल बेंच ने ग्रीष्मावकाश के दौरान ललन कुमार की याचिका पर सुनवाई की थी।उन्होंने गंगा नदी पर बन रहे खगड़िया के अगुबानी – सुल्तानगंज के निर्माणाधीन चार लेन पुल के ध्वस्त होने के मामलें को गंभीरता से लेते हुए निर्माण करने वाली कंपनी के एम डी को 21जून,2023 को कोर्ट में उपस्थित होने का निर्देश दिया था।

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इस मामलें में अधिवक्ता मणिभूषण प्रताप सेंगर ने एक जनहित याचिका दायर की थी।उन्होंने अपनी जनहित याचिका में कहा कि भ्रष्टाचार, घटिया निर्माण सामग्री और निर्माण कंपनी के घटिया कार्य से ये पुल दुबारा टूटा है।ये पुल 1700 करोड़ रुपए की लागत से बन रहा था ।

उन्होंने इस याचिका में कहा है कि इस मामलें की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराये जाने या न्यायिक जांच कराया जाये।जो भी दोषी और जिम्मेदार है,उनके विरुद्ध सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

उन्होंने अपने जनहित याचिका में ये मांग की है कि इस निर्माण कंपनी को लिस्ट कर इससे और अन्य जिम्मेदार और दोषी लोगों से इस क्षति की वसूली की जाये।

कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता एस डी संजय व राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही और सरकारी अधिवक्ता अमीश कुमार ने पक्ष प्रस्तुत किया। इन मामलों पर अगली सुनवाई 25 अगस्त, 2023 को की जाएगी।

Breaking News : बिहार में जातिगत जनगणना पर पटना हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

पटना हाईकोर्ट द्वारा जातीय सर्वेक्षण के मामलें में 1अगस्त,2023 को दिये फैसले को अखिलेश कुमार ने एक याचिका दायर कर सुप्रीम कोर्ट चुनौती दी गयी है। सुप्रीम कोर्ट की वकील तान्याश्री व अधिवक्ता ऋतु राज ने अखिलेश कुमार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर किया है।

पटना हाईकोर्ट अपने फैसले में जातीय सर्वेक्षण को सही ठहराते हुए इसके विरुद्ध दायर सभी याचिकायों को रद्द कर दिया था।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने बताया था कि पटना हाईकोर्ट के इस मामलें में दिये गये फैसला का अध्ययन कर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।

इसके पूर्व राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में केवियट दायर कर सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इस सम्बन्ध में कोई आदेश पारित करने के पहले राज्य सरकार का भी पक्ष सुना जाये।राज्य सरकार ने पटना हाईकोर्ट के जातीय सर्वेक्षण के सम्बन्ध में आदेश आने के बाद बड़ी जोर शोर से पुनः जातीय सर्वेक्षण का कार्य प्रारम्भ कर दिया है ।

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इससे पूर्व पटना हाईकोर्ट ने मई,2023 में राज्य सरकार द्वारा जातीय सर्वेक्षण कराये जाने पर अंतरिम रोक लगा दी थी।इसके बाद राज्य सरकार द्वारा कराये जा रहे जातीय सर्वेक्षण पर तत्काल विराम लग गया।

पटना हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ ने 3 जुलाई,2023 से 7 जुलाई,2023 तक पांच दिनों की लम्बी सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रखा।1अगस्त,2023 को पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के जातीय सर्वेक्षण को सही ठहराते हुए इसके विरुद्ध दायर सभी याचिकायों को ख़ारिज कर दिया।

पटना हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी गयी है।इस मामलें पर सुप्रीम कोर्ट में शीघ्र सुनवाई किये जाने की संभावना है ।

बिहार सरकार द्वारा बिहार में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर 1अगस्त,2023 को पटना हाइकोर्ट निर्णय देगा

पटना हाइकोर्ट कल 1अगस्त,2023 को राज्य सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर निर्णय देगा। चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ ने इस सम्बन्ध में 3 जुलाई,2023 से पांच दिनों की लम्बी सुनवाई पूरी कर निर्णय सुरक्षित रखा था।

पिछली सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत किया था ।उन्होंने कहा कि ये सर्वे है,जिसका उद्देश्य आम नागरिकों के सम्बन्ध आंकड़ा एकत्रित करना,जिसका उपयोग उनके कल्याण और हितों के
किया जाना है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जाति सम्बन्धी सूचना शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश या नौकरियों लेने के समय भी दी जाती है।एडवोकेट जनरल शाही ने कहा कि जातियाँ समाज का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हर धर्म में अलग अलग जातियाँ होती है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि इस सर्वेक्षण के दौरान किसी भी तरह की कोई अनिवार्य रूप से जानकारी देने के लिए किसीको बाध्य नहीं किया जा रहा है ।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जातीय सर्वेक्षण का कार्य लगभग 80 फी सदी पूरा हो गया है।उन्होंने कहा कि ऐसा सर्वेक्षण राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र में है।

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इससे पहले हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार द्वारा की जा रही जातीय व आर्थिक सर्वेक्षण पर रोक लगा दिया था।कोर्ट ने ये जानना चाहा था कि जातियों के आधार पर गणना व आर्थिक सर्वेक्षण कराना क्या कानूनी बाध्यता है।

कोर्ट ने ये भी पूछा था कि ये अधिकार राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है या नहीं।साथ ही ये भी जानना कि क्या इससे निजता का उल्लंघन होगा।

पहले की सुनवाई में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार ने जातियों और आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत करते हुए अधिवक्ता दीनू कुमार ने बताया कि सर्वेक्षण कराने का ये अधिकार राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र के बाहर है।ये असंवैधानिक है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को ये भी बताया था कि राज्य सरकार जातियों की गणना व आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।उन्होनें ने बताया कि ये संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

उन्होंने कहा था कि प्रावधानों के तहत इस तरह का सर्वेक्षण केंद्र सरकार करा सकती है।ये केंद्र सरकार की शक्ति के अंतर्गत आता है।उन्होंने बताया था कि इस सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार पाँच सौ करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

Bihar Weather Update : बिहार में गर्मी से परेशान लोगों को राहत की बारिश का पूर्वानुमान; 3 अगस्त तक सभी जिलों में बारिश के आसार

मौसम विभाग के अनुसार बिहार के विभिन्न जिलों में अगले तीन-चार दिनों तक बारिश का सिलसिला जारी रहने की संभावना है। इस दौरान कुछ स्थानों पर वज्रपात की भी चेतावनी जारी की गई है। उत्तर बिहार में मानसून के सक्रिय होने से 3 अगस्त तक सभी जिलों में बारिश होने की उम्मीद की जा रही है। पटना समेत आसपास के कुछ स्थानों पर मेघ गर्जन व वज्रपात की संभावना है। पूरे बिहार में राहत की बारिश का पूर्वानुमान 29 से 3 अगस्त के लिए जारी किया गया है।

राज्य में अभी तक 35 फीसदी कम बारिश हुई है। कुछ जिलों में बारिश का अलर्ट है। वहीं, 29 जुलाई के बाद से भारी बारिश का अलर्ट है।

मौसम विज्ञान केन्द्र पटना के अनुसार अगले 24 घंटों के दौरान उत्तर पश्चिम बिहार, उत्तर मध्य बिहार, उत्तर पूर्व बिहार, दक्षिण पश्चिम बिहार, दक्षिण मध्य बिहार और दक्षिण पूर्व बिहार में बारिश के आसार हैं। इनमें कई इलाकों में भारी बारिश का अलर्ट भी जारी किया गया है। 28 जुलाई यानी शुक्रवार को बिहार के 32 जिलों में बारिश का अलर्ट जारी किया गया है। इनमें से पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, कटिहार, सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिले के कुछ स्थानों पर बारिश के आसार हैं।

वहीं पटना, गया, समेत 25 जिलों के एक या दो स्थानों पर बारिश होने की संभावना हैं। बक्सर, भोजपुर, रोहतास, भभुआ, औरंगाबाद, अरवल में मौसम शुष्क बने रहेंगे। यानी इन जिलों में आज गर्मी से लोग परेशान हैं। 

मौसम विज्ञान केन्द्र पटना के अनुसार 30 और 31 जुलाई को राज्य के अधिकांश हिस्सों में हल्के से मध्यम दर्जे की बारिश की संभावना है। इसे लेकर मौसम विभाग की ओर से येलो अलर्ट जारी किया गया है।

आज से उत्तर बिहार में मानसून के सक्रिय होने की संभावना है : इसके प्रभाव से दो अगस्त तक बारिश होने की उम्मीद की जा रही है। भारत मौसम विज्ञान केंद्र के अनुसार, हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। 30 जुलाई को कई जगहों पर अच्छी बारिश की संभावना जताई गई है। इस दौरान कुछ स्थानों पर वज्रपात भी हो सकता है। तापमान में उतार-चढ़ाव रहेगा और आसमान में बादल छाए रहेंगे।

3 अगस्त तक सभी जिलों में बारिश के आसार है : मौसम विभाग ने 29 जुलाई से 3 अगस्त राज्य सभी 38 जिलों के कई इलाकों में बारिश की संभावना जताई है। उत्तर पश्चिम बिहार, उत्तर मध्य बिहार, उत्तर पूर्व बिहार, दक्षिण पश्चिम बिहार, दक्षिण मध्य बिहार और दक्षिण पूर्व बिहार में बारिश के आसार हैं। इनमें कई इलाकों में भारी बारिश का अलर्ट भी जारी किया गया है। 

मौसम ने सावधानी बरतने की अपील की है : मौसम विभाग ने लोगों से अपील कि है कि खराब मौसम के दौरान अपने पशुधन और खुद को बाहर निकलने से बचें। मौसम साफ होने पर अपने काम संपादित करे। आंधी के दौरान संवेदनशील संरचनाओं से दूर रहें और मेघगर्जन के दौरान पेड़-पौधे के नीचे शरण न लें। ओलावृष्टि के समय सुरक्षित स्थान पर जाकर बैठ जाएं।

पटना हाईकोर्ट ने एलएन मिश्रा कॉलेज,मुजफ्फरपुर से एमबीए कर रही छात्रा यशी सिंह के अपहरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए एसपी, मुजफ्फरपुर को चार सप्ताह में अनुसंधान का ब्यौरा दायर करने का आदेश दिया

पटना हाईकोर्ट ने एलएन मिश्रा कॉलेज,मुजफ्फरपुर से एमबीए कर रही छात्रा यशी सिंह के अपहरण पर कड़ा रुख अपनाते हुए एसपी, मुजफ्फरपुर को चार सप्ताह में अनुसंधान का ब्यौरा दायर करने का आदेश दिया। जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा ने इस मामलें पर सुनवाई की।

साहेबगंज कॉलेज के पूर्व प्राचार्य राम प्रसाद राय की नतनी ऐसी सिंह का अपहरण 22 दिसंबर 2022 को कॉलेज जाते वक्त हो गया था।घटना के 6 माह बाद भी पुलिस अब तक छात्रा की बरामदगी नहीं कर पाई है।

लड़की के नाना,पिता, माता ने बिहार के मुख्यमंत्री, डीजीपी बिहार,आईजी मुजफ्फरपुर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग,राष्ट्रीय महिला आयोग, आर्थिक अपराध विभाग ,एसपी मुजफ्फरपुर को कई बार ज्ञापन दे चुके हैं।साथ ही उनसे मिलकर अपनी व्यथा सुना चुके हैं।

पर पुलिस ने अबतक कोई कार्रवाई नहीं की है।यहां तक कि पुलिस अनुसंधान में एक सोनू कुमार नाम के लड़के जो अपराधी किस्म का है, का नाम अपहरण के मामले में सामने आया है । उसने नशे की सुई देकर छात्रा को मुजफ्फरपुर की चतुर्भुज स्थान में जाकर बेच दिया है।

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फिर भी मुजफ्फरपुर पुलिस को कोई सफलता नहीं मिली है। बिहार के सभी सम्बन्धित वरीय अधिकारियों से मिलकर उनके माता-पिता थक चुके हैं।याचिकाकर्ता के वकील अरविंद कुमार ने बताया कि मेरी बात सम्बन्धित आईओ से हुई, तो उन्होंने बताया कि सोनू कुमार को पकड़ा गया था ।दो-तीन दिन रखने के बाद मैंने उसे छोड़ दिया,क्योंकि उसके खिलाफ मुझे कोई सबूत नहीं मिले।जबकि सोनू का नाम अपहरणकर्ता में जांच के दौरान आ चुका है।

अंत में पटना हाई कोर्ट में अपनी याचिका दायर की।इस पर कोर्ट ने संज्ञान लेते हुए मुजफ्फरपुर के एसपी को पूरे अनुसंधान का ब्यौरा 4 सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।इस मामलें पर अगली सुनवाई 4 सप्ताह बाद की जाएगी।

बिहार में 34540 सहायक शिक्षकों की बहाली के बचे सीट पर कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक बहाली नहीं किये जाने से पटना हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर की

पटना हाईकोर्ट ने राज्य में 34540 सहायक शिक्षकों की बहाली के बचे सीट पर कोर्ट के आदेश के बावजूद अब तक बहाली नहीं किये जाने से नाराजगी जाहिर की। जस्टिस पी बी बजनथ्री की खंडपीठ ने इस याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने शिक्षा विभाग के सम्बन्धित सचिव और प्राथमिक शिक्षा के निदेशक को अगली तारीख पर कोर्ट में उपस्थित हो कर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि अगली तारीख पर दोनों अधिकारियों के खिलाफ अदालती आदेश के अवमानना के दोषी के लिए आरोप तय किया जायेगा।

कोर्ट का कहना था कि 19 अकटुबर, 2016 को हाई कोर्ट ने छह माह के भीतर सहायक शिक्षक के बचे हुये 2213 सीट पर बहाली प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया था।लेकिन करीब सात साल के बाद भी बहाली नहीं की जा सकी।

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कोर्ट ने कोर्ट में उपस्थित निदेशक से जानना चाहा कि सहायक शिक्षक की बहाली करने के अधिकारी कौन हैं।कोर्ट के सवाल पर उन्होंने बताया कि जिला शिक्षा अधिकारी सहायक शिक्षक को बहाली करने के अधिकारी हैं।

इस पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जिला शिक्षा अधिकारी जिला में बहाली करने के लिए अधिकृत हो सकते हैं।लेकिन यह मामला पूरे राज्य का हैं।

कोर्ट ने इस मामले पर अगली सुनवाई दो सप्ताह के बाद की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने औरंगाबाद जिले के नाउरगढ़ में खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों व अन्य पुरातत्विक महत्त्व की सामग्रियों के रख रखाव व सरंक्षण के लिए की जा रही कार्रवाई का ब्यौरा तलब किया

पटना हाईकोर्ट ने औरंगाबाद जिले के नाउरगढ़ में खुदाई के दौरान मिली मूर्तियों व अन्य पुरातत्विक महत्त्व की सामग्रियों के रख रखाव व सरंक्षण के लिए की जा रही कार्रवाई का ब्यौरा तलब किया है। अवधेश पाण्डेय की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ ने सुनवाई की।

याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि औरंगाबाद जिले के नाउरागढ़ में भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई के दौरान बड़ी तादाद में मूर्तियां व अन्य ऐतिहासिक महत्त्व की सामग्रियां प्राप्त हुई थी।लेकिन उनका उचित ढंग से रख रखाव और संरक्षण नहीं किया जा रहा है।इस प्रकार के महत्त्व की मूर्तियां और ऐतिहासिक महत्त्व धरोहरों की उपेक्षा की जा रही है।

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अधिवक्ता विनय कुमार पाण्डेय ने बताया कि इस तरह की पुरातत्विक महत्त्व और ऐतिहासिक मूर्तियों और अन्य सामग्रियों को निकाला गया।वहां पर एक स्टेडियम बनाया जाने लगा।इस पर कोर्ट ने रोक लगा दी है ।साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया ।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 8अगस्त,2023 को होगी।

पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के खिलाफ कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया

पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के खिलाफ कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया है। जस्टिस पीवी बजंत्री की खंडपीठ ने एक अवमानना के सिलसिले में श्री पाठक के विरुद्ध जमानतीय वारंट जारी किया।

एक शिक्षिका सुकृति कुमारी को नियमित शिक्षक का वेतन नहीं दे कर नियोजित शिक्षक का वेतन दिया गया,जबकि कोर्ट ने उन्हें नियमित शिक्षक का वेतन देने का निर्देश दिया था ।

अपर मुख्य शिक्षा सचिव के के पाठक की ओर से अधिवक्ता नरेश दीक्षित ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने जून, 2023 में पदभार ग्रहण किया है।तब से वे अदालती अवमानना से सम्बन्धित मामलों पर कार्रवाई कर रहे है।

याचिकाकर्ता शिक्षिका सुकृति कुमारी के मामलें में अदालती आदेश का पालन किया जा चुका है।लेकिन कोर्ट ने अदालती आदेश के पालन में हुए बिलम्ब को गंभीरता से लेते हुए जमानतीय वारंट जारी किया।

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अधिवक्ता नरेश दीक्षित ने कोर्ट को बताया कि पूर्व में कोर्ट द्वारा जारी जमानतीय वारंट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है,जिस पर कल सुनवाई होना तय हुआ है।इस मामलें को भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा जायेगा।

इस मामलें पर अगली सुनवाई अगले सप्ताह की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट में पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस-मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई 18 जुलाई,2023 तक टली

पटना हाईकोर्ट में पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस-मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई 18 जुलाई,2023 तक टली। चीफ जस्टिस के वी चन्द्रन की खंडपीठ इस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने इस बारे में पटना नगर निगम को विस्तृत जानकारी देने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया था। पटना नगर निगम की ओर से कोर्ट को बताया कि आधुनिक बूचडखाने के निर्माण और विकास के लिए स्थानों को चिन्हित कर लिया गया है।

साथ ही निविदा की कार्रवाई की जा रही है। पूरा ब्यौरा प्रस्तुत करने के लिए पटना नगर निगम ने तीन सप्ताह की मोहलत मांगी,जिसे कोर्ट ने मंजूर कर लिया था।ये जनहित याचिका अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने दायर की है।

पिछली सुनवाई में अधिवक्ता मानिनी जायसवाल ने कोर्ट को बताया था कि पटना समेत राज्य विभिन्न क्षेत्रों में अस्वास्थ्यकर और नियमों के विरुद्ध मांस मछली काटे और बेचे जाते हैं।उन्होंने कहा कि इससे जहाँ आम आदमी के स्वास्थ्य पर पर बुरा असर पड़ता हैं, वहीं खुले में इस तरह से खुले में जानवरों के काटे जाने से छोटे लड़कों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

याचिकाकर्ता के वकील मानिनी जयसवाल ने कोर्ट से यह भी आग्रह किया था कि खुले और अवैध रूप से चलने वाले बूचडखानों को नगर निगम द्वारा तत्काल बंद कराया जाना चाहिए ।

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उन्होंने कोर्ट को बताया था कि पटना के राजा बाज़ार, पाटलिपुत्रा , राजीव नगर, बोरिंग केनाल रोड , कुर्जी, दीघा , गोला रोड , कंकड़बाग आदि क्षेत्रों में नियमों का उल्लंघन कर खुले में मांस मछ्ली की बिक्री होती है।

अधिवक्ता मानिनी जयसवाल ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि अस्वस्थ और बगैर उचित प्रमाणपत्र के ही जानवरों को मार कर इनका मांस बेचा जाता है ,जो कि जनता के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

उनका कहना था कि शुद्ध और स्वस्थ मांस मछ्ली उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आधुनिक सुविधाओं सुविधाओं के साथ बूचड़खाने बनाए जाने चाहिए,ताकि मांस मछली बेचने वालोंं को भी सुविधा मिले।

इस मामलें पर अब अगली सुनवाई 18 जुलाई, 2023 को की जाएगी।

राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कॉलेजों में छात्रों के हॉस्टलों की दयनीय हालत पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को इन हॉस्टलों की स्थिति में सुधार के लिए ठोस कार्रवाई करने का निर्देश दिया

राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कॉलेजों में छात्रों के हॉस्टलों की दयनीय हालत पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई की। विकास चंद्र उर्फ़ गुड्डू बाबा की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस के वी कृष्णन की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को इन हॉस्टलों की स्थिति में सुधार के लिए ठोस कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामलें को निष्पादित कर दिया।

राज्य सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि इस मुद्दे पर राज्य सरकार ने विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से विचार विमर्श किया।उन्होंने भी हॉस्टालों की स्थिति के सम्बन्ध में अपना रिपोर्ट दिया।राज्य सरकार इस मामलें पर कार्रवाई की योजना बना रही है।

याचिकाकर्ता विकास चंद्र उर्फ़ गुड्डू बाबा ने अपनी जनहित याचिका में बताया था कि राज्य के विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कालेजों में छात्रों के हॉस्टलों की स्थिति काफी दयनीय है।उन हॉस्टलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

छात्रों के लिए साफ सुथरे और अच्छे कमरे,स्वच्छ शौचालयों,शुद्ध पेय जल,कैंटीन,बिजली आदि सुविधायें उपलब्ध नहीं है।
याचिका में ये भी कहा गया कि इससे छात्रों को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता हैं ।

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इसका प्रभाव उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य पर पड़ता है ।इस याचिका ये अनुरोध किया गया कि छात्रों के लिए नये हॉस्टलों का निर्माण किया जाये,जिनमें उनके लिए सारी सुविधाएं उपलब्ध हो,ताकि उन्हें रहने और पढ़ने लिए सही माहौल मिले।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि इस मामलें में 23 अक्टूबर,2019 को बिहार सरकार के मुख्य सचिव और सभी सबंधित पक्षों को दिया गया।इसमें ये कहा गया कि छात्रों के लिए साफ सुथरे कमरे,स्नानघर, शौचालयों,बिजली आदि की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया।लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी।

कोर्ट ने आज इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से उम्मीद जाहिर की कि वह विभिन्न विश्वविद्यालयों के हॉस्टलों की स्थिति सुधारने के उचित व प्रभावी कदम उठाएगी।इसके साथ ही कोर्ट ने इस जनहित को निष्पादित कर दिया।

पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के खिलाफ कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया

पटना हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव केके पाठक के खिलाफ कोर्ट में उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए जमानती वारंट जारी करने का आदेश दिया है। जस्टिस पीवी बजंत्री की खंडपीठ ने एक अवमानना के सिलसिले में पाठक को

कोर्ट ने आज 13 जुलाई,2023 को निश्चित रूप से कोर्ट में स्वयं उपस्थित होने का आदेश दिया था।लेकिन किसी कारणवश के के पाठक स्वयं उपस्थित नहीं होकर,अपने वकील के जरिए हाजिर हुए।

कोर्ट ने इसे आदेश की अवमानना करार देते हुए उनकी हाजिरी को सुनिश्चित करने हेतु जमानती वारंट जारी करने का निर्देश दिया।

अपर मुख्य शिक्षा सचिव की ओर से कोर्ट के समक्ष उपस्थित अधिवक्ता नरेश दीक्षित ने बताया कि श्री पाठक ने जून, 2023 में अपने पद पर योगदान दिया।नालंदा जिला के एक शिक्षक घनश्याम प्रसाद सिंह को हेड मास्टर के पद पर प्रोन्नत का आदेश जारी किया गया।

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उन्होंने बताया कि अपर मुख्य सचिव पाठक ने नालंदा के जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र लिख कर आदेश का पालन किये जाने का निर्देश दिया ।

जिला शिक्षा पदाधिकारी,नालंदा ने आदेश का पालन कर विभाग को सूचित किया।उस शिक्षक ने भी आदेश के अनुपालन होने को स्वीकार भी किया।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 20 जुलाई,2023 को होगी।

बिहार सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पटना हाइकोर्ट में सुनवाई 7 जुलाई, 2023 को भी जारी रहेगी, जाने क्या हुआ आज की सुनवाई में

पटना हाइकोर्ट में राज्य सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई अधूरी रही।इस मामलें पर कल 7जुलाई,2023 को भी सुनवाई जारी रहेगी। इस मामलें में दायर याचिकायों पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।

आज भी राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि ये सर्वे है,जिसका उद्देश्य आम नागरिकों के सम्बन्ध आंकड़ा एकत्रित करना,जिसका उपयोग उनके कल्याण और हितों के
किया जाना है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जाति सम्बन्धी सूचना शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश के समय भी दी जाती है।जातियाँ समाज का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हर धर्म में अलग अलग जातियाँ होती है।

उन्होंने बताया कि इस सर्वेक्षण के दौरान किसी भी तरह की कोई अनिवार्य रूप से जानकारी देने के लिए किसीको बाध्य नहीं किया जा रहा है ।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जातीय सर्वेक्षण का कार्य लगभग 80 फी सदी पूरा हो गया है।उन्होंने कहा कि ऐसा सर्वेक्षण राज्य सरकार के अधिकार में है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि इससे सर्वेक्षण से किसी के निजता का उल्लंघन नहीं हो रहा है।महाधिवक्ता शाही ने कहा कि बहुत सी सूचनाएं पहले से ही सार्वजनिक होती हैं।

इससे पहले हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार द्वारा की जा रही जातीय व आर्थिक सर्वेक्षण पर रोक लगा दिया था।कोर्ट ने ये जानना चाहा था कि जातियों के आधार पर गणना व आर्थिक सर्वेक्षण कराना क्या कानूनी बाध्यता है।

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कोर्ट ने ये भी पूछा था कि ये अधिकार राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है या नहीं।साथ ही ये भी जानना कि इससे निजता का उल्लंघन होगा क्या।

पहले की सुनवाई में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने जातियों और आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।

उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण कराने का ये अधिकार राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र के बाहर है।ये असंवैधानिक है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार जातियों की गणना व आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।उन्होनें ने बताया कि ये संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

उन्होंने कहा था कि प्रावधानों के तहत इस तरह का सर्वेक्षण केंद्र सरकार करा सकती है।ये केंद्र सरकार की शक्ति के अंतर्गत आता है।उन्होंने बताया था कि इस सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार पाँच सौ करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इस मामलें पर कल 6 जुलाई,2023 को भी सुनवाई जारी रहेगी।इस मामलें पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता दीनू कुमार, ऋतिका रानी,अभिनव श्रीवास्तव और राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट के समक्ष पक्षों को प्रस्तुत किया।

बिहार सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पटना हाइकोर्ट में सुनवाई कल 6 जुलाई, 2023 को भी जारी रहेगी, जाने क्या हुआ आज की सुनवाई में

पटना हाइकोर्ट में राज्य सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कल 6 जुलाई,2023 को भी जारी रहेगी। इस मामलें में दायर याचिकायों पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।

आज राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट के समक्ष पक्ष प्रस्तुत किया।उन्होंने कहा कि ये सर्वे है,जिसका उद्देश्य आम नागरिकों के सम्बन्ध आंकड़ा एकत्रित करना,जिसका उपयोग उनके कल्याण और हितों के लिए किया जाना है।

उन्होंने बताया कि इस सर्वेक्षण के दौरान किसी भी तरह की कोई अनिवार्य रूप से जानकारी देने के लिए किसीको बाध्य नहीं किया जा रहा है ।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि जातीय सर्वेक्षण का कार्य लगभग 80 फी सदी पूरा हो गया है।उन्होंने कहा कि ऐसा सर्वेक्षण राज्य सरकार के अधिकार में है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि इससे सर्वेक्षण से किसी के निजता का उल्लंघन नहीं हो रहा है।महाधिवक्ता शाही ने कहा कि बहुत सी सूचनाएं पहले से ही सार्वजनिक है ।

इससे पहले हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार द्वारा की जा रही जातीय व आर्थिक सर्वेक्षण पर रोक लगा दिया था।कोर्ट ने ये जानना चाहा था कि जातियों के आधार पर गणना व आर्थिक सर्वेक्षण कराना क्या कानूनी बाध्यता है।

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कोर्ट ने ये भी पूछा था कि ये अधिकार राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है या नहीं।साथ ही ये भी जानना कि इससे निजता का उल्लंघन होगा क्या।

कल की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार ने जातियों और आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।

उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण कराने का ये अधिकार राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र के बाहर है।ये असंवैधानिक है और समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार जातियों की गणना व आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।उन्होनें ने बताया कि ये संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

उन्होंने कहा था कि प्रावधानों के तहत इस तरह का सर्वेक्षण केंद्र सरकार करा सकती है।ये केंद्र सरकार की शक्ति के अंतर्गत आता है।उन्होंने बताया था कि इस सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार पाँच सौ करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

इस मामलें पर कल 6 जुलाई,2023 को भी सुनवाई जारी रहेगी ।

बिहार सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पटना हाइकोर्ट में सुनवाई कल 4 जुलाई,2023 को भी जारी रहेगी, जाने क्या हुआ आज की सुनवाई में

पटना हाइकोर्ट में राज्य सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कल 4 जुलाई,2023 को भी जारी रहेगी। इन मामलों में दायर याचिकायों पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।

इससे पूर्व हाईकोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए राज्य सरकार द्वारा की जा रही जातीय व आर्थिक सर्वेक्षण पर रोक लगा दिया था।

कोर्ट ने ये जानना चाहा था कि जातियों के आधार पर गणना व आर्थिक सर्वेक्षण कराना क्या कानूनी बाध्यता है।कोर्ट ने ये भी पूछा है कि ये अधिकार राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में है या नहीं।साथ ही ये भी जानना कि इससे निजता का उल्लंघन होगा क्या।

आज की सुनवाई में याचिकाकर्ता की अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कोर्ट को बताया था कि राज्य सरकार जातियों और आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है। उन्होंने बताया कि सर्वेक्षण कराने का ये अधिकार राज्य सरकार के अधिकारक्षेत्र के बाहर है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार जातियों की गणना व आर्थिक सर्वेक्षण करा रही है।उन्होनें ने बताया कि ये संवैधानिक प्रावधानों के विपरीत है।

अधिवक्ता अपराजिता सिंह ने कोर्ट को बताया कि प्रावधानों के तहत इस तरह का सर्वेक्षण केंद्र सरकार करा सकती है।ये केंद्र सरकार की शक्ति के अंतर्गत आता है।उन्होंने बताया कि इस सर्वेक्षण के लिए राज्य सरकार पाँच सौ करोड़ रुपए खर्च कर रही है।

दूसरी तरफ राज्य सरकार राज्य सरकार का कहना था कि जन कल्याण की योजनाएं बनाने और सामाजिक स्तर सुधारने के लिए ये सर्वेक्षण किया कराया जा रहा है।

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इससे पूर्व राज्य सरकार ने पटना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों पर सुनवाई करते हुए जातीय जनगणना सम्बन्धी मामलें पर पटना हाइकोर्ट के आदेश पर रोक लगाने इंकार कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को अपना पक्ष 3 जुलाई,2023 को पटना हाइकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा था ।सुप्रीम कोर्ट में जातीय जनगणना से सम्बंधित मामलें पर अगली सुनवाई 14 जुलाई,2023 निर्धारित की गयी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाइकोर्ट में इस मामलें पर 3 जुलाई,2023 को सुनवाई की तिथि निर्धारित होने को देखते हुए ये 14जुलाई,2023 की तिथि तय की थी।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस राजेश बिंदल की खंडपीठ ने इन मामलों पर सुनवाई की थी।सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार ने पटना हाइकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी,जिसमें कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा राज्य में जातियों की गणना एवं आर्थिक सर्वेक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीघ्र सुनवाई करने सम्बन्धी याचिका को रद्द कर दिया था।

साथ ही राज्य सरकार ने पटना हाइकोर्ट द्वारा 4 मई, 2023को पारित अंतरिम आदेश को भी चुनौती दी गई है। चीफ जस्टिस के वी चन्द्रन की खंडपीठ ने राज्य सरकार के 3 जुलाई,2023 के पूर्व सुनवाई करने की याचिका को कोर्ट ने 9मई,2023 को सुनवाई करने के बाद खारिज कर दिया था।

इस आदेश विरुद्ध को राज्य सरकार ने एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर कर की है।पटना हाइकोर्ट ने इन मामलों पर सुनवाई की तिथि 3 जुलाई,2023 ही रखा।

9 मई, 2023 को सुनवाई करने के बाद हाईकोर्ट ने इन मामलों पर सुनवाई की तिथि 3 जुलाई,2023 ही निश्चित किया था।गौरतलब कि पहले 4मई,2023 को कोर्ट ने अंतरिम आदेश देते हुए जातीय जनगणना पर रोक लगा दी थी।

इन मामलों पर कल भी सुनवाई जारी रहेगी।

बिहार में निबंधित और योग्य फार्मासिस्ट के पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के मामले पर पटना हाईकोर्ट में सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी

पटना हाईकोर्ट में राज्य में निबंधित और योग्य फार्मासिस्ट के पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर होने वाले असर के मामले पर सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी। चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ इस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आलोक में राज्य सरकार को पुनः जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया था।ये जनहित याचिका मुकेश कुमार ने दायर किया है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रशान्त सिन्हा ने कोर्ट को बताया था कि डॉक्टरों द्वारा लिखें गए पर्ची पर निबंधित फार्मासिस्टों द्वारा दवा नहीं दी जाती है।

उन्होंने कोर्ट को बताया था कि बहुत सारे सरकारी अस्पतालों में अनिबंधित नर्स,एएनएम,क्लर्क ही फार्मासिस्ट का कार्य करते है।वे बिना जानकारी और योग्यता के ही मरीजों को दवा बांटते है।जबकि ये कार्य निबंधित फार्मासिस्टों द्वारा किया जाना है।

उन्होंने कहा कि इस तरह से अधिकारियों द्वारा अनिबंधित नर्स,एएनएम,क्लर्क से काम लेना न केवल सम्बंधित कानून का उल्लंघन है,बल्कि आम आदमी के स्वास्थ्य के साथ खिलबाड़ है।

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उन्होंने कोर्ट को बताया कि फार्मेसी एक्ट,1948 के तहत फार्मेसी से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के कार्यों के अलग अलग पदों का सृजन किया जाना चाहिए।लेकिन बिहार सरकार ने इस सम्बन्ध में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।

इस आम लोगों का स्वास्थ्य और जीवन पर खतरा उत्पन्न हो रहा है।उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया था कि फार्मेसी एक्ट,1948 के अंतर्गत बिहार राज्य फार्मेसी कॉउन्सिल के क्रियाकलापों और भूमिका की जांच के लिए एक कमिटी गठित की जाए।

ये कमिटी कॉउन्सिल की क्रियाकलापों की जांच करें,क्योंकि ये गलत तरीके से जाली डिग्री देती है।उन्होंने कोर्ट को बताया था कि बिहार राज्य फार्मेसी कॉउन्सिल द्वारा बड़े पैमाने पर फर्जी पंजीकरण किया गया है।

राज्य में बड़ी संख्या मे फर्जी फार्मासिस्ट कार्य कर रहे है।इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अंततः विधवा ज्योति कुमारी को दरभंगा जिला प्रशासन ने दिया साढ़े चार लाख रुपए का मुआवजा दिया

पटना हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अंततः विधवा ज्योति कुमारी को दरभंगा जिला प्रशासन ने दिया साढ़े चार लाख रुपए का मुआवजा दिया। दरअसल कोविड के दौरान पति की मृत्यु हो गई थी।

लेकिन उसकी विधवा पत्नी को जिला प्रशासन ने राज्य सरकार द्वारा घोषित मुआवजे की राशि का भुगतान नहीं किया।बार बार गुहार लगाने के बाद भी जब दरभंगा जिला प्रशासन ने कोई ध्यान नहीं दिया, तो बाध्य होकर विधवा ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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अधिवक्ता रतन कुमार कुमर ने रिट याचिका दायर कर यह मामला उठाया।जस्टिस मोहित कुमार शाह ने सुनवाई की।कोर्ट के कड़े रुख के बाद दरभंगा के समाहर्त्ता ने विधवा ज्योति कुमारी के नाम से जारी साढ़े चार लाख रुपए का चेक दिया।

इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को निष्पादित कर दिया।

राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कॉलेजों में छात्रों के हॉस्टलों की दयनीय हालत पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई ई करते हुए राज्य सरकार को जवाब देने के लिए 14 जुलाई,2023 तक का मोहलत दिया

राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कॉलेजों में छात्रों के हॉस्टलों की दयनीय हालत पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई की। विकास चंद्र उर्फ़ गुड्डू बाबा की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस के वी कृष्णन की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को जवाब देने के लिए 14 जुलाई,2023 तक का मोहलत दिया है।

याचिकाकर्ता विकास चंद्र उर्फ़ गुड्डू बाबा ने अपनी जनहित याचिका में बताया कि राज्य के विश्वविद्यालयों व उनके अंतर्गत कालेजों में छात्रों के हॉस्टलों की स्थिति काफी दयनीय है।उन हॉस्टलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

छात्रों के लिए साफ सुथरे और अच्छे कमरे,स्वच्छ शौचालयों,शुद्ध पेय जल,कैंटीन,बिजली आदि सुविधायें उपलब्ध नहीं है।
याचिका में ये कहा गया कि इससे छात्रों को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता हैं ।

इसका प्रभाव उनकी पढ़ाई और स्वास्थ्य पर पड़ता है ।इस याचिका ये अनुरोध किया गया कि छात्रों के लिए नये हॉस्टलों का निर्माण किया जाये,जिनमें उनके लिए सारी सुविधाएं उपलब्ध हो,ताकि उन्हें रहने और पढ़ने लिए सही माहौल मिले।

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याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि इस मामलें में 23 अक्टूबर,2019 को बिहार सरकार के मुख्य सचिव और सभी सबंधित पक्षों को दिया गया।इसमें ये कहा गया कि छात्रों के लिए साफ सुथरे कमरे,स्नानघर, शौचालयों,बिजली आदि की बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया।लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी।

कोर्ट ने आज इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को अबतक की गयी कार्रवाई का ब्यौरा राज्य को 14 जुलाई,2023 प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।इस मामलें पर अब अगली सुनवाई 14 जुलाई, 2023 को होगी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ पटना सिविल कोर्ट में दायर परिवाद पत्र पर जल्द सुनवाई करने के गुहार परिवादी पटना हाई कोर्ट से लगाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ पटना सिविल कोर्ट में दायर परिवाद पत्र पर जल्द सुनवाई करने के गुहार परिवादी पटना हाई कोर्ट से लगाई है।कोर्ट ने दायर याचिका में त्रुटियों को दो सप्ताह के भीतर दूर करने का आदेश दिया है।

कांग्रेस कमेटी के मानवाधिकार विभाग के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद की ओर से दायर आपराधिक रिट याचिका पर जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा ने सुनवाई की।

कोर्ट ने दायर याचिका में हाई कोर्ट प्रशासन की ओर से उठाई गई आपत्तियों को दो सप्ताह के भीतर दूर करने का आदेश दिया। अधिवक्ता इंद्रदेव प्रसाद ने अर्जी दायर कर कोर्ट से केस को जल्द निष्पादित करने के लिए पटना सिविल कोर्ट के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी को आदेश देने की मांग।

उनका कहना है कि बगैर किसी तैयारी के और बिना किसी पूर्व सूचना के 24 मार्च, 20 को देश को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने सम्पूर्ण देश में 21 दिनों का लॉक डाउन लगाने की घोषणा कर दी थी ।प्रधानमंत्री ने अपने सम्बोधन में यह भी कहा कि दो माह के अध्ययन के बाद प्रभावी मुकाबले एक मात्र विकल्प सोशल डिस्टेंसिंग एक दूसरे से दूरी बना कर रखना अपने घरों में बंद रहना लागू कर दिये।

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उनका कहना है कि सम्बोधन देश वासियों को आतंकित करने वाली झूठी सूचनाओं पर आधारित हैं।एक वर्ष के अध्ययन से कोरोना का संक्रमण उस तरह से नहीं फैली, जिस तरह से फैलने की बात सम्बोधन में कही गई थी।

सिविल कोर्ट में केस दायर किये जाने के बाद 12 मई, 2021 तक तारीख दी गई।उसके बाद इस केस में कोई तारीख नहीं दी जा रही हैं।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी मेडिकल कालेजों समेत ज़िला अस्पतालों में वेंटीलेटर,एमआरआई मशीन,सिटी स्कैन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के मामलें पर सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी मेडिकल कालेजों समेत ज़िला अस्पतालों में वेंटीलेटर,एमआरआई मशीन,सिटी स्कैन जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के मामलें पर सुनवाई की। चीफ जस्टिस के वी चन्द्रन की खंडपीठ ने रणजीत पंडित की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को 11अगस्त,2023 तक की गयी कार्रवाईयों का ब्यौरा निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता दीनू कुमार ने कोर्ट को बताया राज्य के बहुत सारे प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रो के अपने भवन नहीं है।इसके लिए राज्य सरकार को भूमि उपलब्ध करा कर अपने भवन प्राथमिक चिकित्सा केंद्र हेतु बनाने की आवश्यकता है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य के सभी नौ सरकारी मेडिकल कालेजों में जो सिटी स्कैन मशीन लगाए गए हैं, वे पीपीपी मोड पर लगाए गए है।इन्हें मेडिकल कॉउन्सिल ऑफ इंडिया मान्यता नहीं देता है।

इसी तरह से राज्य के पाँच मेडिकल कालेजों में एमआरआई मशीन लगाया है, जो कि पीपीपी मोड पर लगाया गया कि।उन्होंने कोर्ट को बताया कि कोर्ट के बार बार आदेश देने बाद भी सिटी स्कैन और एमआरआई मशीन नहीं लगाया गया।

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कोर्ट के 3 अगस्त,2022 के आदेश के छह महीने पूरा होने के बाद भी इन्हें अस्पतालों में अबतक नहीं लगाया गया है।

इस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता दीनू कुमार और अधिवक्ता रितिका रानी ने याचिकाकर्ता की ओर से और एडवोकेट जनरल ने राज्य सरकार की ओर से पक्षों को प्रस्तुत किया।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 11अगस्त,2023 को की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने अदालती आदेश की अवमानना से जुड़े मामले को गंभीरता से लेते हुए इंडियन बैंक के चीफ मैनेजर को 7 जुलाई,2023 को कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश दिया हैं

पटना हाईकोर्ट ने अदालती आदेश की अवमानना से जुड़े मामले को गंभीरता से लेते हुए इंडियन बैंक के चीफ मैनेजर को 7 जुलाई,2023 को कोर्ट में उपस्थित रहने का निर्देश दिया हैं ।जस्टिस राजीव राय ने हरिंदर कौर की अवमानना मामलें पर सुनवाई की।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आदेश का अनुपालन 7 जुलाई,2023 तक नहीं किया गया, तो इंडियन बैंक के चीफ मैनेजर स्वयं कोर्ट में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देना होगा ।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आरके शुक्ला ने कोर्ट को बताया कि दिनांक 21मार्च,2017 को पटना हाई कोर्ट ने एक आदेश पारित कर याचिकाकर्ता के पति द्वारा इलाहाबाद बैंक (वर्तमान में इंडियन बैंक)में जमा कराये गए 17 लाख रुपये को ब्याज समेत याचिकाकर्ता को लौटाने का आदेश दिया था ।

आदेश के अनुपालन में इलाहाबाद बैंक द्वारा 17 लाख रुपये तो लौटा दिये गए ,लेकिन उसका ब्याज नहीं याचिकाकर्ता को नहीं लौटाया गया।

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कोर्ट ने जब ब्याज देने के संबंध में बैंक के अधिवक्ता से स्पष्टीकरण माँगा, तो उन्होंने पटना हाई कोर्ट द्वारा पारित फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ब्याज देना बैंक की देनदारी नहीं है।चूँकि इस राशि को बैंक द्वारा इस्तेमाल नहीं किया गया है ।

उन्होंने कोर्ट से कहा कि आदेश के अनुपालन में मूल राशि लौटा दी गई है। इस पर कोर्ट ने असहमति जताते हुए बैंक को ब्याज की राशि याचिकाकर्ता को लौटाने का आदेश दिया ।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अगली सुनवाई तक इस आदेश का पालन नहीं किया गया, तो इंडियन बैंक के चीफ मैनेजर अदालत में स्वयं उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देंगे । इस मामले की अगली सुनवाई 7 जुलाई,2023 को होगी ।

राज्य कर नगर निकाय चुनाव में ओबीसी/ईबीसी को दिए गए आरक्षण मामले की सुनवाई अब पटना हाई कोर्ट के दो जजों की खंडपीठ करेगी

राज्य कर नगर निकाय चुनाव में ओबीसी/ईबीसी को दिए गए आरक्षण मामले की सुनवाई अब पटना हाई कोर्ट के दो जजों की खंडपीठ करेगी। जस्टिस राजीव रॉय ने इस मामले को दो जजों की खंडपीठ को भेजने का निर्देश दिया।

गौरतलब है कि समर्पित आयोग की ओर से राज्य सरकार को दी गई रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी।सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को हाई कोर्ट के समक्ष रखने का आदेश दिया था।

जिसके बाद हाई कोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी गई।इस याचिका पर जस्टिस सत्यव्रत वर्मा सुनवाई कर रहे थे।

इस दौरान राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से दायर अर्जी पर सवाल उठाते हुये कहा गया कि इस केस को दो जजों की खंडपीठ को करना चाहिये।उन्होंने इस केस को खंडपीठ के समक्ष भेजने का अनुरोध किया।

कोर्ट ने इस मामले में गर्मी की छुट्टी के बाद कोई निर्णय लेने का आदेश दिया था विदित है कि पटना हाईकोर्ट ने नगर निकाय चुनाव में ओबीसी/ईबीसी को दिए गए आरक्षण को गैरकानूनी करार देते हुए आरक्षित सीट को सभी के लिए खोलने का आदेश दिया था।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर निकाय चुनाव को स्थगित कर दिया।नगर निकाय का चुनाव दो चरणों में होना था। पहले चरण का चुनाव 10 अक्टूबर,2022 को और दूसरे चरण का चुनाव 20 अक्टूबर,2022 को होना था।

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इसी बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने हाई कोर्ट में पुनर्विचार अर्जी दायर की। लेकिन बाद में इस अर्जी को वापस ले ली।

हाई कोर्ट में आवेदकों की ओर से कोर्ट को बताया गया था कि नगर निकाय चुनाव में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नजरअंदाज किया जा रहा है। पिछड़ी जाति को नगर निकाय चुनाव में आरक्षण नही दिया जा रहा है।

जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के लिए समर्पित आयोग बना निर्णय लेने के बाद ही चुनाव कराने का आदेश दिया है।लेकिन राज्य सरकार पिछड़ी जाति को आरक्षण दिये बिना चुनाव कराने का निर्णय लिया है।

वही राज्य सरकार का पक्ष रखते हुए कोर्ट को बताया गया कि पंचायत चुनाव के समय ही पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ देने के लिए पिछड़ी जातियों का डाटा कलेक्शन किया गया था।उसी डाटा के आधार पर नगर निकाय का चुनाव कराने का फैसला लिया गया है।

राजधानी पटना समेत राज्य के कई अन्य शहरों में बने बड़ी और बहुमंजिली ईमारतों में आग बुझाने की पर्याप्त और प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के मामलें में पटना हाईकोर्ट में दो सप्ताह बाद की जाएगी

राजधानी पटना समेत राज्य के कई अन्य शहरों में बने बड़ी और बहुमंजिली ईमारतों में आग बुझाने की पर्याप्त और प्रभावी व्यवस्था नहीं होने के मामलें में पटना हाईकोर्ट में दो सप्ताह बाद की जाएगी।अधिवक्ता मणिभूषण प्रताप सेंगर की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस के वी चंद्रन की खंडपीठ सुनवाई कर रही है।

उन्होंने अपनी जनहित याचिका में बताया कि पटना समेत राज्य के कई शहरों में बड़ी ईमारतों में आग बुझाने की प्रभावी व्यवस्था न के बराबर है।उन्होंने बताया कि इन ईमारतों में बिजली के शॉर्ट सर्किट होने या किसी अन्य कारण से आग लगने पर आग बुझाने की सही व्यवस्था नहीं होने के कारण अक्सर जान माल की बड़े पैमाने पर क्षति होती है।

उन्होंने बताया कि शहरों में शहरों में नियमों का उल्लंघन करने के कारण आग बुझाने में काफी कठिनाई होती है।सड़कों व गलियों मे होने वाले अतिक्रमणों के कारण चौड़ाई कम होती जा रही है।इससे भी आग बुझाने वाले फायर ब्रिगेड के कर्मचारियों को बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

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उन्होंने ये भी जानकारी दी है कि पटना में 51 ईमारतों को आग बुझाने की व्यवस्था की जांच के बाद अस्थायाई अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया गया है।जबकि 12 ईमारतों को उनके आग बुझाने की व्यवस्था की जांच कर स्थायी अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया गया है ।

उन्होंने बताया कि पटना में हजार से अधिक ऐसी ईमारतें है, जिन्हें आग बुझाने की व्यवस्था का अनापत्ति प्रमाणपत्र नहीं दिया गया है ।इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट में पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस- मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के बाद होगी

पटना हाईकोर्ट में पटना एवं राज्य के अन्य क्षेत्रों में खुले आम नियमों का उल्लंघन कर मांस- मछली बेचने पर पाबन्दी लगाने सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के बाद होगी। चीफ जस्टिस के वी चन्द्रन की खंडपीठ ने मामलें पर सुनवाई करते हुए पटना नगर निगम को विस्तृत हलफनामा दायर करने के लिए पुनः दो सप्ताह का समय दिया।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने इस बारे में पटना नगर निगम को विस्तृत जानकारी देने के लिए तीन सप्ताह का समय मांगा था। पटना नगर निगम ने कोर्ट को बताया था कि आधुनिक बूचडखाने के निर्माण और विकास के लिए स्थानों को चिन्हित कर लिया गया है।

ये जनहित याचिका अधिवक्ता संजीव कुमार मिश्र ने दायर की है। अधिवक्ता मानिनी जयसवाल ने कोर्ट को बताया कि पटना समेत राज्य विभिन्न क्षेत्रों में अस्वास्थ्यकर और नियमों के विरुद्ध मांस मछली काटे और बेचे जाते हैं।

उन्होंने सुनवाई के दौरान बताया था कि इससे जहाँ आम आदमी के स्वास्थ्य पर पर बुरा असर पड़ता हैं, वहीं खुले में इस तरह से खुले में जानवरों के काटे जाने से छोटे लड़कों के मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

याचिकाकर्ता के वकील मानिनी जयसवाल ने कोर्ट से यह भी आग्रह किया था कि खुले और अवैध रूप से चलने वाले बूचडखानों को नगर निगम द्वारा तत्काल बंद कराया जाना चाहिए ।

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उन्होंने कोर्ट को बताया था कि पटना के राजा बाज़ार, पाटलिपुत्रा , राजीव नगर, बोरिंग केनाल रोड , कुर्जी, दीघा , गोला रोड , कंकड़बाग आदि क्षेत्रों में नियमों का उल्लंघन कर खुले में मांस मछ्ली की बिक्री होती है।

अधिवक्ता मानिनी जायसवाल ने कोर्ट को जानकारी दी थी कि अस्वस्थ और बगैर उचित प्रमाणपत्र के ही जानवरों को मार कर इनका मांस बेचा जाता है ,जो कि जनता के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

उनका कहना था कि शुद्ध और स्वस्थ मांस मछ्ली उपलब्ध कराने के लिए सरकार को आधुनिक सुविधाओं सुविधाओं के साथ बूचड़खाने बनाए जाने चाहिए,ताकि मांस मछली बेचने वालोंं को भी सुविधा मिले।

साथ ही जनता को भी स्वस्थ और प्रदूषणमुक्त मांस मछली मिल सके।इस मामलें पर अगली सुनवाई दो सप्ताह के बाद होगी।