वर्षों में बगास की अनियंत्रित निकासी से पर्यावरणीय दुष्प्रभाव और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ भी बढ़ी थीं। इस बीच, केंद्र और राज्य सरकार ने नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता देते हुए बायो‑एनेर्जी को प्रोत्साहित करने की दिशा में कई योजना तैयार की थीं, परन्तु छोटे उद्योगों के लिए वित्तीय एवं तकनीकी बाधाएँ प्रमुख रही। इन समस्याओं के समाधान हेतु BERC ने 2024 के मध्य में विस्तृत परामर्श प्रक्रिया शुरू की, जिसमें उद्योग प्रतिनिधि, पर्यावरण विशेषज्ञ और उपभोक्ता समूहों को सम्मिलित किया गया।
नयी नियमावली में सबसे बड़ा परिवर्तन 15‑वर्ष के दीर्घकालिक खरीद अनुबंध को घटाकर 5‑वर्ष तक सीमित करना है। इससे राज्य को बाजार में लचीलापन मिलेगा और बिजली की कीमतें प्रतिस्पर्धात्मक रूप से निर्धारित की जा सकेंगी। साथ ही, छोटे प्लांटों को भी टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति होगी, जिससे निजी निवेशकों को आकर्षित किया जा सकेगा। यह बदलाव ऊर्जा उत्पादन की लागत को घटाने और उपभोगकर्ताओं को लाभ पहुँचाने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
नई नीति के तहत बगास‑बिजली संयंत्रों को पर्यावरणीय मंजूरी के मानकों को सख्ती से पालन करना होगा। BERC ने जलवायु परिवर्तन के मद्देनज़र कार्बन उत्सर्जन घटाने हेतु प्रत्येक प्लांट को वार्षिक रिपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है। इसके अलावा, राज्य की ऊर्जा विभाग ने तकनीकी सहायता के लिए एक विशेष हेल्पडेस्क स्थापित किया है, जहाँ छोटे मिलों को आवश्यक परामर्श, फाइनेंसिंग विकल्प और उपकरण चयन में मदद प्रदान की जाएगी।
इन बदलावों पर बिहार के प्रमुख चीनी मिल मालिकों ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। रायपुर स्थित श्रीग्राम शुगर के प्रबंध निदेशक ने कहा, “पहले 5 मेगावाट की सीमा के कारण हम बड़े प्लांट के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते थे। अब 2 मेगावाट तक के छोटे यूनिट बनाकर हम अतिरिक्त आय का स्रोत खोल सकते हैं, जिससे हमारी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ होगी।” इसी प्रकार, मुजफ़रपुर के “बिहारी एग्रीबायो” के संस्थापक ने बताया कि नई नीति से उन्होंने 1.5 मेगावाट क्षमता वाला बगास‑बिजली प्लांट स्थापित करने का प्रस्ताव तैयार किया है।
राज्य सरकार की ऊर्जा विभाग के प्रमुख ने कहा, “बगास‑बिजली को छोटे स्तर पर भी प्रोत्साहित करके हम न केवल कृषि अपशिष्ट का सदुपयोग करेंगे, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन भी होगा। यह कदम बिहार की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा और राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य में योगदान देगा।” विपक्षी दलों ने भी इस पहल को सराहा, परन्तु कुछ सांसदों ने कहा कि अनुदान और सब्सिडी की स्पष्ट योजना न होने से छोटे उद्यमियों को वास्तविक लाभ नहीं मिल पाएगा।
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि बगास‑बिजली के छोटे प्लांटों से राज्य की ग्रिड में अतिरिक्त 300 मेगावाट तक की शक्ति जुड़ सकती है, जिससे पीक लोड में कमी आएगी। इससे बिहार के औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली कटौती की संभावना घटेगी और उत्पादन लागत में कमी आएगी। इसके अतिरिक्त, बगास‑बिजली की कीमत को बाजार मूल्य के करीब लाने से उपभोक्ताओं को भी कम दर पर बिजली मिल सकेगी, जिससे घरेलू खर्च में राहत होगी।
Updated: August 21, 2026
The Bihar Electricity Regulatory Commission lowered the minimum capacity threshold, enabling small and medium sugar mills to generate bagasse power. This allows additional units to participate in energy auctions, diversifying revenue streams for the industry.