हाईयर एजुकेशन के लिए छात्र‑क्रेडिट कार्ड योजना 2015 में शुरू हुई थी, जिसका मुख्य लक्ष्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को स्नातक, डिप्लोमा और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिये आसान ऋण सुविधा प्रदान करना था। इस योजना के तहत छात्र को 15 % तक सब्सिडी, 0 % ब्याज और 15 % बीमा कवरेज मिलता है। पहले की सीमा 4 लाख रुपये थी, जिसे 19 अगस्त को अचानक 2 लाख रुपये कर दिया गया था, जिससे कई छात्रों ने अपने शिक्षा खर्च को लेकर अस्थिरता महसूस की।
सरकार ने 19 अगस्त को सीमा घटाने का कारण वित्तीय अनियमितताओं को रोकना और लोन वितरण की निगरानी को सुदृढ़ करना बताया था। हालांकि, इस अचानक बदलाव से कई विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और छात्र संघों में गहरी असंतुष्टि पैदा हुई। अभिभावकों ने कहा कि इससे छात्रों के उच्च शिक्षा के सपने टुटने का खतरा बढ़ गया है, जबकि कई छात्रों ने पहले ही लोन के लिए दस्तावेज़ तैयार कर रखे थे। इस बीच, विपक्षी दल ने सरकार की इस नीति को असंगत और चुनावी लाभ के लिये किया गया कदम कहा।
बिहार की शिक्षा विभाग ने 29 अगस्त को जारी आदेश में स्पष्ट किया कि 4 लाख रुपये की लोन सीमा पुनः लागू की जा रही है और यह सभी सरकारी तथा निजी मान्य संस्थानों में मान्य होगा। विभाग के एक प्रवक्ता ने बताया कि लोन की स्वीकृति प्रक्रिया में कोई अतिरिक्त देरी नहीं होगी और ऑनलाइन आवेदन पोर्टल पर पहले से जमा किए गए दस्तावेज़ों को वही मान्य किया जाएगा। साथ ही, नई सीमा के तहत अधिकतम 4 लाख रुपये तक की राशि एक ही बार में दी जा सकती है, जबकि पुनः भुगतान की अवधि 7 साल तक बढ़ा दी गई है।
नई घोषणा के बाद कई छात्र‑छात्राएँ तुरंत अपना आवेदन पुनः जमा करने के लिए प्रेरित हुए। पटना के एक कॉलेज के छात्र, राजीव कुमार, ने बताया कि पहले की सीमा घटने के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई के लिये वैकल्पिक फंडिंग खोजने की कोशिश की थी, लेकिन अब उन्हें राहत मिली है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय न केवल उनकी पढ़ाई जारी रखने में मदद करेगा, बल्कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति को भी स्थिर रखेगा। इसी तरह, कई अभिभावकों ने बताया कि लोन की पुनः वृद्धि से उनके घर की कुल खर्च में संतुलन बना रहेगा।
विपक्षी दल ने फिर भी इस कदम को पर्याप्त नहीं माना और कहा कि सरकार को शिक्षा वित्तीय सहायता के लिये एक स्थायी नीति बनानी चाहिए। बिहार के मुख्य opposition नेता, सुशील यादव, ने विधान सभा में सवाल उठाते हुए कहा कि लोन सीमा में बार‑बार बदलाव छात्रों के भविष्य को अनिश्चित बना देते हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि भविष्य में ऐसी नीतियों में पारदर्शिता और स्थिरता लाने के लिये एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाए।
वित्त मंत्रालय के एक प्रतिनिधि ने कहा कि छात्र‑क्रेडिट कार्ड योजना के तहत लोन की पुनः सीमा बढ़ाना वित्तीय संस्थानों की क्षमता और ऋण पोर्टफोलियो के जोखिम को देखते हुए किया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों को उच्च शिक्षा तक पहुंचाना है, और इस दिशा में सरकार ने कई बार लोन नियमों को संशोधित किया है।
बिहार के आर्थिक विशेषज्ञ, प्रोफेसर अनिल प्रसाद, ने कहा कि शिक्षा ऋण की सीमा पुनः 4 लाख तक बढ़ाने से उच्च शिक्षा में प्रवेश दर में संभावित वृद्धि हो सकती है। उन्होंने बताया कि उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय बाधा को कम करना सामाजिक-आर्थिक असमानता को घटाने में मदद करेगा, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े वर्गों में। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि लोन की पुनः वृद्धि से दीर्घकालिक आर्थिक लाभ भी हो सकते हैं, क्योंकि शिक्षित कार्यबल का उत्पादन राष्ट्रीय आर्थिक विकास को तेज़ करेगा।
सामाजिक स्तर पर इस निर्णय से छात्र वर्ग में उत्साह की लहर दौड़ी है। कई छात्र संघों ने कहा कि अब वे अपने करियर प्लान में बदलाव कर अधिक महंगे और गुणवत्तापूर्ण कोर्स चुन सकते हैं। विशेष रूप से इंजीनियरिंग, मेडिकल और प्रबंधन क्षेत्रों में छात्र इस लोन का उपयोग करके अपने शैक्षणिक लक्ष्य को साकार करने की योजना बना रहे हैं। इसके अलावा, महिलाओं के शिक्षा में बढ़ोतरी की संभावना भी देखी जा रही है, क्योंकि आर्थिक समर्थन से अधिक परिवार लड़कियों की पढ़ाई को प्राथमिकता दे सकते हैं।
राजनीतिक रूप से यह कदम बिहार सरकार को
Updated: August 30, 2026
Bihar’s sudden loan‑limit rollback and swift restoration to ₹4 lakh signals a political gambit—an attempt to quell backlash while projecting a “student‑first” image ahead of elections. Yet the frequent policy swings expose a deeper fragility: without a stable, transparent framework, students
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