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तमिलनाडु के “गाइडेंस” पर वित्तीय अनियमितताओं की जांच, सरकार ने नियंत्रण बोर्ड और पुनर्संरचना की माँग की।

तमिलनाडु के औद्योगिक नीति‑प्रवर्तक संस्थान “गाइडेंस” पर अब एक नई जंग छिड़ी है। राज्य के निवेश आकर्षण एजेंडे को संभालते हुए स्थापित यह संस्था, अपने मूल उद्देश्य से विचलित होते हुए, कई विवादों के मध्य फँस गई है। इस लेख में हम गाइडेंस के गठन से लेकर वर्तमान विवाद तक की क्रमबद्ध घटनाओं, विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाओं और संभावित निहितार्थों का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे, ताकि पाठकों को इस जटिल स्थिति की स्पष्ट समझ मिल सके।

गाइडेंस की स्थापना 15 जुलाई 1992 को तमिलनाडु गाइडेंस एंड एक्सपोर्ट प्रमोशन ब्यूरो के नाम से हुई थी। इसे एक गैर‑लाभकारी पंजीकृत सोसायटी के रूप में गठित किया गया था, जिसका प्राथमिक लक्ष्य राज्य में विदेशी एवं घरेलू निवेश को आकर्षित करना था। प्रारम्भिक वर्षों में इसने कई बड़े औद्योगिक प्रोजेक्टों को साकार करने में मदद की और निवेशकों के बीच अपनी विश्वसनीयता स्थापित की। इस दौरान राज्य सरकार ने गाइडेंस को वित्तीय सहायता और नीति समर्थन प्रदान किया, जिससे यह संस्थान निवेश‑पर्यावरण सुधार के प्रमुख स्तंभ बन गया।

समय के साथ गाइडेंस का दायरा विस्तार पाकर न केवल निवेश को आकर्षित करना, बल्कि निर्यात को बढ़ावा देना, उद्योगों की तकनीकी उन्नति करना और रोजगार सृजन में सहयोग देना भी शामिल हो गया। 2000 के दशक के मध्य में इसे विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मंचों पर तमिलनाडु की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। हालांकि, इस विस्तारित भूमिका ने संस्थान के प्रबंधन में जटिलता भी लाई, जिससे आंतरिक संरचनात्मक और वित्तीय मुद्दे उभरने लगे।

वर्ष 2023 के अंत में गाइडेंस के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों पर वित्तीय अनियमितताओं का आरोप लगा। एक जांच रिपोर्ट में पाया गया कि संस्थान ने कई निवेश प्रस्तावों के मूल्यांकन में पारदर्शिता नहीं बरती और कुछ परियोजनाओं को अनावश्यक रूप से प्राथमिकता दी। इस रिपोर्ट ने गाइडेंस के निदेशक मंडल को भी प्रश्नचिन्ह में डाल दिया, क्योंकि कई निर्णयों में सरकारी नियमों और स्वीकृत मानदंडों का उल्लंघन हुआ था।

इन आरोपों के बाद राज्य सरकार ने तत्काल गाइडेंस की कार्यवाहियों को स्थगित कर दिया और एक स्वतंत्र जांच आयोग का गठन किया। इस आयोग में वित्तीय विशेषज्ञ, प्रशासनिक अधिकारी और कानून के विशेषज्ञ शामिल किए गए, ताकि पूरी प्रक्रिया की जाँच की जा सके। आयोग ने प्रारम्भिक सुनवाई के दौरान गाइडेंस के कई विभागों में आंतरिक नियंत्रण की कमी और निधियों के असमान वितरण की ओर इशारा किया।

जांच के दौरान यह भी उजागर हुआ कि कुछ विदेशी निवेशकों को गाइडेंस द्वारा अनुचित लाभ प्रदान किया गया, जिससे प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में विकृति आई। इस बात को लेकर उद्योग संघों ने गाइडेंस के कार्यप्रणाली पर सार्वजनिक सवाल उठाए और पारदर्शिता एवं उत्तरदायित्व की माँग की। कई व्यापारियों ने कहा कि गाइडेंस की असंतुलित नीतियों ने छोटे और मध्यम उद्यमों को नुकसान पहुंचाया।

गाइडेंस के प्रमुख अधिकारियों ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि सभी कार्य वैध प्रक्रियाओं के तहत किए गए थे और कोई भी अनियमितता नहीं हुई। उन्होंने यह भी बताया कि संस्थान ने राज्य के आर्थिक विकास में योगदान दिया है और कई बड़े प्रोजेक्टों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। इस बीच, गाइडेंस के कई पूर्व कर्मचारियों ने भी अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि निर्णय प्रक्रियाओं में अक्सर राजनीतिक दबाव और निजी हितों का असर रहा है।

राज्य सरकार ने गाइडेंस की जांच के दौरान एक अस्थायी नियंत्रण बोर्ड स्थापित किया, जो संस्थान के सभी वित्तीय लेन‑देन की निगरानी करेगा। इस बोर्ड में वित्तीय मंत्रालय के अधिकारी, राज्य के उद्योग विभाग के प्रतिनिधि और एक स्वतंत्र ऑडिटर शामिल हैं। इस कदम को कई विशेषज्ञों ने संस्थान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में सकारात्मक माना, जबकि कुछ ने इसे केवल सतही उपाय कहा।

उद्योग संघों ने इस कदम को पर्याप्त नहीं माना और गाइडेंस की पूर्ण पुनर्संरचना की मांग की। उन्होंने कहा कि केवल वित्तीय नियंत्रण से समस्या का समाधान नहीं हो सकता; संस्थान की संरचना, नियुक्ति प्रक्रिया और कार्यप्रणाली में गहरा परिवर्तन आवश्यक है। कई व्यापारियों ने कहा कि निवेशकों के भरोसे को पुनः स्थापित करने के लिए गाइडेंस को पारदर्शी और उत्तरदायी बनाना अनिवार्य है।

राजनीतिक दृष्टिकोण से इस विवाद ने तमिलनाडु सरकार को भी

Updated: November 3, 2026

The G‑Guidance saga signals that Tamil Nadu’s investment engine has outgrown its original charter, and without a structural overhaul the agency risks becoming a politicised patronage hub rather than a credible attractor for capital.
If the state merely imposes financial watchdogs instead of revamping governance

तमिलनाडु सरकार ने सभी जिला जेलों के वॉचटावरों पर सशस्त्र रक्षक तैनात कर गोलीबारी की अधिकारिता दी।

थेनि जेल से हुए भाग्यावधि के बाद तमिलनाडु सरकार ने सभी जिला जेलों के वॉचटावरों पर सशस्त्र रक्षक तैनात करने का आदेश जारी किया है, जिससे उन पर गोलीबारी की अधिकारिता भी प्रदान की गई है। यह कदम सुरक्षा उपायों को सुदृढ़ करने और भविष्य में समान घटनाओं को रोकने के उद्देश्य से उठाया गया है, जबकि यह निर्णय जेल सुरक्षा में मौजूदा कमी को दर्शाता है।

थेनि जेल से 28 क़ैदीं की भागीदारी, जो 12 फरवरी को हुई, राज्य के जेल प्रबंधन की दीर्घकालिक समस्याओं को उजागर करती है। इस घटना में कई क़ैदीं ने टॉवर की छत से सीढ़ियों तक पहुँचकर मुख्य द्वार को तोड़ दिया, जिससे एक बड़े स्तर पर जेल सुरक्षा का प्रश्न उठ गया। भागने के बाद क़ैदीं को स्थानीय पुलिस ने पकड़ा, परंतु इस घटना ने तमिलनाडु के जेल प्रशासन में मौजूदा मानवीय और संरचनात्मक चुनौतियों को स्पष्ट किया।

जेल प्रणाली की इस कमजोरी की पृष्ठभूमि में कई कारक सम्मिलित हैं। पहले, जेलों में सुरक्षा टॉवरों को केवल निगरानी के लिए उपयोग किया जाता था, जबकि सशस्त्र रक्षकों की कमी के कारण उन्हें खाली छोड़ दिया जाता था। इसके अलावा, जेल कर्मचारियों की कमी, प्रशिक्षण की अपर्याप्तता और बजटीय प्रतिबंधों ने सुरक्षा प्रोटोकॉल को कमजोर किया। इन सब कारणों से जेलों में असंतोष और क़ैदीं में उथल-पुथल की स्थिति बनी रही, जो अंततः थेनि जेल में इस बड़े उछाल का कारण बनी।

नए आदेश के तहत, प्रत्येक जिला जेल के वॉचटावर में दो सशस्त्र रक्षक तैनात किए जाएंगे, जो आपात स्थिति में गोलीबारी करने का अधिकार रखेंगे। यह प्रावधान विशेष रूप से उन परिस्थितियों के लिए बनाया गया है, जहाँ क़ैदीं द्वारा हिंसक कार्रवाई या जेल से भागने का प्रयास हो। रक्षकों को विशेष प्रशिक्षण, आधुनिक हथियार और संचार उपकरण प्रदान किए जाएंगे, जिससे वे तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें।

इस निर्णय की घोषणा के साथ ही जेल प्रबंधन ने अतिरिक्त सुरक्षा उपायों की सूची भी प्रकाशित की। इसमें इलेक्ट्रॉनिक मोशन सेंसर, एंटी-ड्रोन तकनीक, और टॉवर के चारों ओर सघन बाड़ों का निर्माण शामिल है। साथ ही, जेल कर्मचारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम को विस्तारित किया जाएगा, जिससे वे आपात स्थितियों में बेहतर निर्णय ले सकें। इन सभी उपायों का उद्देश्य जेल की भीतर की व्यवस्था को स्थिर रखना और क़ैदीं के अधिकारों के संरक्षण को संतुलित करना है।

वॉचटावरों पर सशस्त्र रक्षक तैनात करने का प्रस्ताव पहले कई राज्यों में चर्चा का विषय रहा, परंतु मानवाधिकार समूहों और जेल सुधारकों द्वारा इसे अत्यधिक बल प्रयोग के रूप में देखा गया था। अब तमिलनाडु सरकार ने इस दिशा में कदम बढ़ाते हुए बताया कि यह केवल अत्यंत आपातकालीन स्थितियों में ही प्रयोग किया जाएगा, और रक्षकों को अत्यधिक सतर्कता और कानूनी मानकों का पालन करना अनिवार्य होगा।

इस निर्णय पर तमिलनाडु के मुख्य मंत्री ने कहा कि सुरक्षा के साथ मानवीय मानकों को भी बनाए रखना राज्य की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि जेलों में सुरक्षा को सुदृढ़ करने के साथ-साथ क़ैदीं के पुनर्वास कार्यक्रमों को भी मजबूत किया जाएगा, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की संभावना कम हो।

राज्य पुलिस के मुख्य अधिकारी ने बताया कि थेनि जेल से भागने के बाद एक विस्तृत जांच चल रही है, और इस जांच में जेल प्रबंधन की लापरवाही और सुरक्षा खामियों को उजागर किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में सभी जेलों में समान सुरक्षा मानक लागू किए जाएंगे, और यदि कोई उल्लंघन पाया गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

केन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय ने इस कदम को राष्ट्रीय स्तर पर जेल सुरक्षा के मानक सुधार के रूप में देखा और कहा कि यह अन्य राज्यों के लिए एक उदाहरण स्थापित कर सकता है। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि जेल प्रणाली को आधुनिक तकनीक और सशस्त्र सुरक्षा के साथ संतुलित करना आवश्यक है, ताकि सार्वजनिक सुरक्षा और मानवाधिकार दोनों की रक्षा हो सके।

अंतरराष्ट्रीय मानवीय संगठनों ने इस निर्णय को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ व्यक्त कीं। जबकि कुछ ने कहा कि सशस्त्र रक्षक तैनात करना सुरक्षा के लिहाज़ से आवश्यक हो सकता है, अन्य ने संभावित दुरुपयोग और क़ैदीं के अधिकारों के उल्लंघन की चेतावनी दी। इन संगठनों ने सरकार से अनुरोध किया कि रक्षकों को

Updated: October 28, 2026

तमिलनाडु में सरकारी अस्पतालों में जन्मे नवजातों को मिलेगी सोने की अंगूठी, ‘थाई मामन थंगा मोथिरम’ योजना की शुरुआत

तमिलनाडु सरकार ने 28 सितंबर को ‘थाई मामन थंगा मोथिरम’ योजना की आधिकारिक शुरुआत की, जिसमें राज्य के सरकारी अस्पतालों में जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं को एक ग्राम शुद्ध सोने की अंगूठी प्रदान की जाएगी।
इस घोषणा को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने मुख्यमंत्री कार्यालय में आयोजित समारोह में किया, जहाँ योजना के प्रथम चरण में 1.28 लाख अंगूठियों की खरीदारी की पुष्टि हुई। योजना का उद्देश्य सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपयोगिता बढ़ाना और नवजात शिशु मृत्यु दर को घटाना है, साथ ही सामाजिक सुरक्षा के एक नए आयाम को स्थापित करना भी शामिल है।‘थाई मामन थंगा मोथिरम’ योजना का मूलभूत ढांचा 2024‑25 वित्तीय वर्ष से लागू किया जाएगा, और यह तमिलनाडु के स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं सामाजिक न्याय विभाग के अंतर्गत कार्यान्वित होगी। योजना के अनुसार, प्रत्येक पात्र नवजात शिशु को जन्म के 14 दिन के भीतर उसकी माँ के पास सोने की अंगूठी पहुँचाई जाएगी। इस पहल को पहले चरण में 1.28 लाख अंगूठियों की आपूर्ति के साथ शुरू किया गया है, जिससे अनुमानित 12 लाख बच्चों को लाभ पहुँचाने का लक्ष्य रखा गया है। योजना के लिए आवश्यक निधि राज्य बजट के स्वास्थ्य प्रावधान में अलग से आवंटित की गई है।

योजना का पात्रता मानदंड स्पष्ट किया गया है: केवल वही नवजात शिशु इस योजना के तहत लाभान्वित होंगे, जिनका जन्म तमिलनाडु के किसी भी सरकारी अस्पताल में हुआ हो और उनकी माँ को राज्य की स्थायी निवासी प्रमाणपत्र या मतदाता पहचान पत्र उपलब्ध हो। इस प्रक्रिया में बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र, मातृ पहचान प्रमाणपत्र और अस्पताल से जारी किए गए जन्म पंजीकरण दस्तावेज़ को मूलभूत दस्तावेज़ के रूप में स्वीकार किया जाएगा। इस प्रकार, योजना का लाभ केवल उन परिवारों तक सीमित रहेगा, जिनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कमजोर मानी जाती है।

योजना की घोषणा के साथ ही तमिलनाडु सरकार ने इस कार्यक्रम को ‘गर्भावस्था से नवजात सुरक्षा’ के व्यापक पहल के हिस्से के रूप में पेश किया। इस संदर्भ में, पिछले वर्ष राज्य ने सार्वजनिक स्वास्थ्य में कई सुधारात्मक कदम उठाए थे, जिनमें मातृ स्वास्थ्य के लिए विशेष बीमा योजना और निवारक स्वास्थ्य देखभाल का विस्तार शामिल है।

‘थाई मामन थंगा मोथिरम’ योजना को इन मौजूदा नीतियों के साथ समन्वयित किया जाएगा, जिससे मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए एक सुदृढ़ ढांचा तैयार हो सके। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में इस नई पहल की शुरुआत से अस्पताल में प्रवेश की दर में संभावित वृद्धि की भी उम्मीद की जा रही है।

इस योजना के कार्यान्वयन में तमिलनाडु के स्वास्थ्य विभाग ने प्रमुख अस्पतालों में विशेष काउंटर स्थापित करने का निर्देश दिया है, जहाँ जन्म पंजीकरण के साथ ही अंगूठी का वितरण किया जाएगा। इसके अलावा, योजना के तहत वितरण प्रक्रिया को डिजिटल रूप से ट्रैक करने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल भी तैयार किया गया है, जहाँ प्रत्येक लाभार्थी की जानकारी को अद्यतन किया जाएगा। इस पोर्टल के माध्यम से परिवार अपनी अंगूठी के वितरण की स्थिति ऑनलाइन देख सकेंगे, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि होगी। विभाग ने यह भी कहा कि किसी भी प्रकार की भ्रष्टाचार या देरी को रोकने हेतु कड़ी निगरानी रखी जाएगी।

मुख्य विरोधी दल और सामाजिक संगठनों ने योजना की शुरुआत पर विभिन्न प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की हैं। कुछ सामाजिक कार्यकर्ता इसे ‘सुरक्षा जाल’ के रूप में देखते हुए, लाभार्थियों की आर्थिक स्थिति को सुधारने के बजाय केवल प्रतीकात्मक लाभ देने की आलोचना कर रहे हैं। वहीं, कई विपक्षी दलों के प्रमुख ने इस योजना को ‘राजनीतिक प्रदर्शन’ के रूप में खारिज किया, यह दावा करते हुए कि यह वास्तविक

स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में मदद नहीं करेगा। इन आलोचनाओं के बावजूद, तमिलनाडु सरकार ने कहा कि योजना का उद्देश्य केवल आर्थिक प्रोत्साहन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति जनविश्वास बढ़ाना है।

राज्य सरकार की ओर से योजना के समर्थन में कई स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी टिप्पणी की। एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने बताया कि नवजात शिशु के जन्म के समय सोने की अंगूठी जैसी वस्तु प्रदान करने से परिवार में स्वास्थ्य देखभाल की महत्ता को पुनः स्थापित करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि इस पहल को सही ढंग से लागू किया जाए तो यह मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य संकेतकों में सकारात्मक परिवर्तन लाने की संभावना रखती है। इस संदर्भ में, राज्य ने स्वास्थ्य देखभाल के साथ-साथ पोषण एवं टीकाकरण कार्यक्रमों को भी सुदृढ़ करने का आश्वासन दिया है।

आर्थिक विशेषज्ञों ने योजना के वित्तीय प्रभाव का मूल्यांकन किया है। उन्होंने बताया कि सोने की अंगूठी की लागत वर्तमान बाजार मूल्य पर अनुमानित 3,500 रुपये प्रति ग्राम है, जिससे कुल बजट का अनुमान 4.5 अरब रुपए तक पहुँच सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस निवेश से दीर्घकालिक सामाजिक लाभ अधिक हो सकते हैं, क्योंकि इससे स्वास्थ्य सेवाओं में जन भागीदारी बढ़ेगी और सरकारी अस्पतालों में रोगी संख्या में स्थिर वृद्धि होगी।


Tamil Nadu launched the “Thai Maman Thanga Mothiram” scheme, giving a pure‑gold ring to newborns in government hospitals to boost facility usage and cut infant mortality. The program, earmarked for 12 million infants and backed by a dedicated budget, aims to strengthen maternal‑child health while sparking debate over its symbolic versus substantive impact.

The gold‑ring scheme signals a shift from symbolic charity to a tactical trust‑building tool: by tying a tangible asset to a state‑run hospital, Tamil Nadu hopes to lure more births into public facilities and normalize institutional care. If the rollout stays transparent, the initiative could quietly boost demand for maternal services—