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पटना हाइकोर्ट में पटना स्थित ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान के भवन को हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई अगले सप्ताह तक टली

पटना हाइकोर्ट में पटना स्थित ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान के भवन को हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई अगले सप्ताह तक टली। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने अधिवक्ता प्रियंका सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई करते हुए 3 जनवरी,2023 तक राज्य सरकार को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने कोर्ट को बताया था कि पटना हाइकोर्ट के पश्चिम में हाईकोर्ट की काफी भूमि है।पटना हाईकोर्ट का लगातार विस्तार हो रहा है।

उन्होंने कोर्ट से कहा कि ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान को पटना के मीठापुर स्थित पुराने बस स्टैंड की भूमि में स्थानांतरित किया जा सकता है। वह क्षेत्र शैक्षणिक हब के रूप में विकसित किया जा रहा है।

उन्होंने बताया था कि हाईकोर्ट के प्रशासनिक विस्तार के साथ ही यहाँ वकीलों, उनके स्टाफ और कई लोग हाईकोर्ट में काम करने वालों की संख्या काफी बढ़ी है।

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उन्होंने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के पूर्वी सीमा पर भी हाईकोर्ट की भूमि है।हाईकोर्ट के विस्तार को देखते हुए हाईकोर्ट को इन भूमि की आवश्यकता है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि बड़ी तादाद में वैसे वकील है, जिन्हें हाईकोर्ट में बैठने और कार्य करने की व्यवस्था नहीं है।उन्हें बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध हो रही है।

उन्होंने बताया कि जो पूर्वी सीमा पर मूल रूप से हाईकोर्ट को भूमि आवंटित की गई थी, राज्य सरकार ने उस पर एमएलए और सरकारी अधिकारियों के फ्लैट निर्माण कर लिया है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को हाईकोर्ट की पूर्वी सीमा से वीरचन्द पटेल पथ तक की भूमि के बदले हाईकोर्ट को भूमि उपलब्ध करानी चाहिए।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 30जनवरी,2023 को की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति के छात्रों को केंद्र सरकार की “पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम” का लाभ नहीं दिए जाने के मामलें में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार से जवाब तलब किया

पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति के छात्रों को केंद्र सरकार की “पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम ” का लाभ नहीं दिए जाने के मामलें में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। चीफ जस्टिस संजय करोल और जस्टिस पार्थसारथी की खंडपीठ ने राजीव कुमार और अन्य की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की

कोर्ट ने केंद्रीय सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय के सचिव सहित राज्य के शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और एससी एवं एसटी कल्याण विभाग के प्रधान सचिव को 6 हफ्ते के अंदर जवाब देने का निर्देश दिया है ।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि केंद्र सरकार की इस फ्लैगशिप योजना , जिसके तहत अनुसूचित जाति के छात्रों को मैट्रिक के बाद कॉलेज और यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने हेतु एक “फ्रीशिप कार्ड ” दिया जाता है ।इसके अंतर्गत लाभुक विद्यार्थी को बिना दाखिले फीस, ट्यूशन फीस हॉस्टल चार्ज बगैर ही 5 वर्षों तक पढ़ाई करने का अवसर मिलता है।

कार्डधारी के बैंक अकाउंट में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मोड के तहत केंद्र सरकार से स्कॉलरशिप राशि डाल दी जाती है ,जिसे सम्बन्धित कॉलेज अथवा यूनिवर्सिटी के अकाउंट से भी जोडा जाता है। इस प्रकार दाखिला ,ट्यूशन, हॉस्टल बगैर के चार्ज जमा हो जाता है।

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याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जब राज्य सरकार के समक्ष पिछले साल जून में उसने एक प्रतिवेदन देकर आग्रह किया कि सुबह के अनुसूचित जाति के छात्रों को फ्रीशिप कार्ड मुहैया कराने जाए, तो राज्य सरकार की तरफ से इसे ना मंजूरी देते हुए यह कहा गया कि 2016 से ही राज्य सरकार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना लागू किए हुए है।

इसके तहत बिना किसी अड़चन के शिक्षा ऋण मुहैया होता है जिसे छात्र बाद में नौकरी लगने पर वापस अदायगी करते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील विकास पंकज का कहना था कि राज्य सरकार ने मनमाने तरीके से छात्रवृत्ति को शिक्षा ऋण से बराबर मिलान कर केंद्र सरकार के इस कल्याणकारी स्कीम का लाभ बिहार के अनुसूचित जाति के छात्रों को देने से रोका है।

कोर्ट ने इन आरोपों पर संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को जवाब देने का कहा।
इस मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च,2023को होगी

बगैर क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के गठन किये खिलाड़ियों के चयन नहीं किये जाने को लेकर बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को आदेश देने को लेकर दायर याचिका पर पटना हाईकोर्ट ने सुनवाई की

बगैर क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी के गठन किये खिलाड़ियों के चयन नहीं किये जाने को लेकर बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को आदेश देने को लेकर दायर याचिका पर पटना हाई कोर्ट ने सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने अजय नारायण शर्मा की याचिका पर सुनवाई करते कहा कि यदि नए सिरे याचिका दायर की जाती है, तो इस मामलें पर यथासंभव जल्दी सुनवाई करने के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

कोर्ट ने सुनवाई करते हुए प्रतिवादियों के नामों को हटाकर उनके पद का नाम देते हुए नए सिरे से याचिका दायर करने के लिए छूट याचिकाकर्ता अजय नारायण शर्मा को दिया है।

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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता जगन्नाथ सिंह ने बताया कि बिहार क्रिकेट एसोसिएशन द्वारा कथित रूप से किये रहे तमाम धांधली व एसोसिएशन के अध्यक्ष द्वारा सचिव और क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी का पद खुद में समाहित करने तथा खिलाड़ियों के चयन में बरती जा रही धांधली के विरुद्ध पटना हाई कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ता को सभी प्रतिवादियों के नामों को हटाकर पद से याचिका दायर करने का निर्देश कोर्ट ने दिया है।

पटना हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान, PMCH के प्रभारी निदेशक डा. सुनील कुमार को नोटिस जारी किया

पटना हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान, पीएमसीएच के प्रभारी निदेशक डा. सुनील कुमार को नोटिस जारी किया है । चीफ जस्टिस संजय क़रोल एवं जस्टिस पार्थ सारथी की खंडपीठ ने ब्रज भूषण की लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा देने का निर्देश दिया है ।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव कुमार सिंह ने खंडपीठ को बताया कि पीएमसीएच के इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान (आईजीआईसी) के पूर्व डायरेक्टर डा. एसएस चटर्जी 31.12.2019 को अपने पद से सेवानिवृत हुए थे । उनकी सेवानिवृत्ति के बाद दिनांक 01.01.20 को डा. सुनील कुमार को आईजीआईसी का प्रभारी निदेशक बना दिया गया।

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करीब तीन साल से वह अपने पद पर बने हुए हैं, जबकि उक्त पद पर नियुक्ति हेतु कम से कम डिप्लोमा इन मेडिसिन या एमसीएच की न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए।वर्तमान के प्रभारी निदेशक के पास नहीं है ।इस पर कोर्ट ने प्रतिवादी डा.सुनील कुमार को नोटिस जारी करते हुए राज्य सरकार को अपना जवाबी हलफनामा चार सप्ताह में देने का निर्देश दिया है ।

इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी ।

जिला अपीलीय प्राधिकार शिक्षक नियोजन में पीठासीन अधिकारी के रिक्त पड़े पदों को 1 फरवरी, 2023 के पहले नियुक्ति किया जाए: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि जिला अपीलीय प्राधिकार शिक्षक नियोजन में पीठासीन अधिकारी के रिक्त पड़े पदों को 1 फरवरी, 2023 के पहले नियुक्ति कर दिया जाए। जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने अमरेश कुमार द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने कहा कि अगर इस अवधि तक शिक्षक नियोजन अपीलीय प्राधिकार में पीठासीन अधिकारी के रिक्त पड़े पदों पर नियुक्ति नहीं की जाती है ,तो राज्य के मुख्य सचिव समेत शिक्षा विभाग के अतिरिक्त प्रधान सचिव को अदालत में उपस्थित होकर अपना स्पष्टीकरण देना होगा।

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कोर्ट को याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि जिला अपीलीय प्राधिकार शिक्षक नियोजन में पीठासीन अधिकारी के पद पर नियुक्ति करने के लिए सरकार द्वारा सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। लेकिन अभी तक रिक्त पड़े पदों पर नियुक्ति नहीं की गई है। इससे शिक्षकों से संबंधित बहुत सारे मामले सुनवाई के लिए लंबित पड़े हुए हैं।

राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता विनय कुमार पाण्डेय ने बताया कि सरकार इस मामले में कार्रवाई कर रही है।

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था ऐवं अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था ऐवं अन्य बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल एवं जस्टिस पार्थ सारथी की खंडपीठ ने वरीय अधिवक्ता रमाकांत शर्मा की लोकहित याचिका पर सुनवाई करते हुए वकीलों के लिए बनने वाले भवनों के निर्माण से संबंधित अद्यतन रिपोर्ट माँगी है।

श्री शर्मा ने कोर्ट को बताया कि भवनों का निर्माण राज्य सरकार के भवन निर्माण भवन निर्माण विभाग करें,तो काम तेजी से हो सकेगा।ठेकेदारी के काम में बिलम्ब होने के अलावे लागत भी ज्यादा आएगा।

याचिकाकर्ता का कहना है कि राज्य के अदालतों की स्थिति अच्छी नहीं है।अधिवक्ता अदालतों में कार्य करते है,लेकिन उनके लिए न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न कार्य करने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

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वकीलों के लिये शुद्ध पेय जल,शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती हैं। कोर्ट को बताया कि अदालतों के भवन के लिए जहां भूमि उपलब्ध भी है,वहां भूमि को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जहां भूमि उपलब्ध करा दिया गया है, वहां कार्य नहीं प्रारम्भ नहीं हो पाया हैं।

इस मामलें पर अगली सुनवाई एक सप्ताह बाद होगी।

Patna High Court ने गोपालगंज के हथवा प्रखंड के वीडियो और प्रखंड पंचायत राज अफसर पर एकमुश्त 20 हज़ार रुपये का हर्जाना लगाया; जाने क्या है पूरा मामला ?

पटना हाई कोर्ट से स्थगन आदेश होने के बावजूद निचली अदालत के आदेश को जारी रखते हुए अवैध तरीके से शिक्षक से काम लेने और उन्हें वेतन देने के मामले पर Patna High Court ने कड़ा रुख अपनाते हुए गोपालगंज के हथवा प्रखंड के वीडियो और प्रखंड पंचायत राज अफसर पर एकमुश्त 20 हज़ार रुपये का हर्जाना लगाया है। जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने अरविंद कुमार सिंह की रिट याचिका को सुनते हुए हरजाने की उक्त रकम को विधिक सेवा प्राधिकार में जमा करने का आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता के वकील राजीव कुमार सिंह ने Patna High Court का ध्यान पिछले आदेश के सम्बन्ध में बताया कि हथुआ प्रखंड के सिंघिया ग्राम पंचायत के अंतर्गत प्रारंभिक विद्यालय मैं उनका मुवक्किल बतौर पंचायत शिक्षक नियुक्त हुआ था। नियुक्ति के मामले में एक अन्य शिक्षक अशोक कुमार ने भी अपना दावा किया था।

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दोनों पक्षकारों की लड़ाई राज्य अपील प्राधिकार तक गई, जहां अशोक कुमार को शिक्षक नियुक्त होने का आदेश दिया गया।प्राधिकार के आदेश के खिलाफ जब अरविंद कुमार सिंह Patna High Court आया, तब विपक्षी अशोक कुमार को नोटिस निर्गत करते हुए कोर्ट ने राज्य अपीलीय प्राधिकार के आदेश पर रोक लगा दिया था।

स्थगन आदेश के बावजूद विपक्षी अशोक कुमार काम करते रहे और उन्हें वेतन मिलता रहा। Patna High Court के आदेश की अवज्ञा पर हैरानी जताते हुए हाईकोर्ट ने इन दोनों अफसरों को तलब किया था। दोनों ऑफिसर हाई कोर्ट को यह बताने में असफल रहे कि किन परिस्थिति में हाई कोर्ट आदेश का उल्लंघन हुआ।

इस मामलें पर सुनवाई आगे की जाएगी।

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के इंतज़ार मे जेल में बंद एक पाकिस्तानी नागरिक को रिहा करने के मामले में पटना हाईकोर्ट ने संज्ञान लेते हुए गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से जवाब तलब किया

पटना हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिकता प्राप्त करने के इंतज़ार मे पिछले तीन साल से जहानाबाद के जेल में बंद एक पाकिस्तानी नागरिक को रिहा करने के मामले में संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के से जवाब तलब किया है । जस्टिस ए एम बदर और जस्टिस संदीप कुमार की खंडपीठ ने अफसाना नगर की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त आदेश दिया।

याचिकाकर्ता के पति सैयद नक्वी आलम उर्फ नकवी इमाम का जन्म भारत में ही सन 1973 में हुआ था और 11 साल की उम्र में वह अपनी नानी के साथ 1984 में पाकिस्तान चला गया।वहीं पढ़ाई लिखाई करते हुए पाकिस्तानी नागरिकता हासिल कर बस गया था।

अपनी पिता तबीयत खराब हो जाने की खबर पर आलम उन्हें देखने के लिए 1 साल का पासपोर्ट वह पाकिस्तान से भारत आया।बिहार के अरवल में अपने पिता की देखरेख करने लगा पासपोर्ट की मियाद फरवरी 2012 में खत्म होने के बाद आलम को ओवर स्टे प्रभावी कानून को तोड़ने की जुर्म में बिहार पुलिस में आलम पर क्रिमिनल मुकदमा दर्ज किया।

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इसमें आलम को 3 साल कैद की सजा होगी सजा के खिलाफ अपील दायर कर जमानत पर रिहा होने के कारण आलम 2016 में याचिकाकर्ता के साथ मुस्लिम रीति रिवाज से शादी भी कर बैठा । याचिकाकर्ता के वकील नारायण ने कोर्ट को बताया की आलम अपने पिता की खराब स्वास्थ्य के आधार पर भारत में ही रहने हेतु भारत की नागरिकता के लिए पासपोर्ट की मियाद खत्म होने से पहले ही सक्षम पदाधिकारी के सामने आवेदन दे चुका था।

वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी उच्चायोग ने आलम को पाकिस्तानी नागरिक मानने से इनकार भी कर दिया। ऐसी स्थिति में केंद्र और राज्य सरकार आलम को डिटेंशन सेंटर में, जो जहानाबाद जेल में स्थित है, फरवरी 2020 से बंद कर रखा है।

कोर्ट ने बिहार सरकार से यह पूछा है कि डिटेंशन सेंटर जेल के अंदर क्यों है इस मामले की अगली सुनवाई 3 हफ्ते बाद होगी।

राज्य सरकार की ओर से किसी अपील या अन्य मामले को विलंबित दायर करना करदाताओं से मिले राजस्व का दुरुपयोग: पटना हाईकोर्ट

पटना हाईकोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की ओर से किसी अपील या अन्य मामले को विलंबित दायर करना राजकोष की बर्बादी या करदाताओं के मिले राजस्व का दुरुपयोग है। जस्टिस पी बी बजनथ्री और जस्टिस अरुण कुमार झा की खंडपीठ विश्वविद्यालय सेवा से जुडी एक अपील पर सुनवाई कर रही थी।

इस अपील को राज्य सरकार ने हाई कोर्ट की एकलपीठ के आदेश के 823 दिनों बाद दायर किया था।कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए मुख्य सचिव को आदेश दिया कि राज्य में सरकार के मुकदमें को समय सीमा के अंतर्गत दायर करना सुनिश्चित करने हेतु एक मॉनिटरिंग प्रणाली विकसित करें ।

इस मामलें मे कोर्ट ने राज्य सरकार को 14 सूत्री दिशा निर्देश दिया, जिसकेअन्तर्गत हाई कोर्ट के किसी भी आदेश का अनुपालन दो सप्ताह में करने या उस आदेश के खिलाफ अपील दायर करने हेतु एक प्रस्ताव 4 हफ्ते में अग्रसारित करने का निर्देश है।

इस मॉनिटरिंग सिस्टम के अंतर्गत सरकार के अन्य बोर्ड , व कॉरपोरेशन व अनुषांगिक संस्थानों की तरफ से हाईकोर्ट में दायर होने वाले मुकदमे के हर चरण की मॉनिटरिंग होगी।

इसके लिए एक रजिस्टर रखा जाएगा।इस रजिस्टर में किस दिन हाई कोर्ट आदेश की जानकारी मिली, किस दिन कोर्ट आदेश कि अभी प्रमाणित प्रतिलिपि निकाली गई।

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साथ ही इसके विरुद्ध अपील दायर करने या आदेश का अनुपालन करने का विचार कितने दिनों के अंदर किया गया, वह किस किस अधिकारियों के जरिए किया गया सब बात की जानकारी उस रजिस्टर में रहेगी।

इस तरह से खंडपीठ ने मुख्य सचिव को मॉनिटरिंग रजिस्टर के जरिए यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि सरकार के मुकदमे को देर से दायर करने के लिए कौन अफसर या कौन सरकारी वकील जिम्मेदार है, उसकी भी जवाबदेही तय हो।

कोर्ट ने कहा कि यदि जरूरत पड़े ,तो सरकारी अफसरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को निर्धारित करने वाली नियमावली में भी संशोधन करें। इससे विलंबित मुकदमे दायर करने के आरोपी अफसरों के खिलाफ भी समय अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सके।

गौरतलब है कि इस 14 सूत्री दिशा निर्देश में हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को यह भी आदेश दिया है कि हर सरकारी विभाग के पास विभागीय कार्य को संचालित करने वाली संबंधित नियम नियमावली और कानून का एक विधि कोष (रिपोजिटरी) विभागीय वेब पोर्टल पर हो, ताकि हाईकोर्ट के आदेश से क्षुब्ध होकर यदि कोई विभाग हाईकोर्ट में ही यह सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का प्रस्ताव दे ,तो संबंधित कानून की विवेचना भी उसी प्रस्ताव में कर दे ।

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साथ ही साथ कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि किसी भी सरकारी अपील अथवा याचिका को दायर करने से पहले सरकारी वकील को एफिडेविट करने वास्ते एडवांस कॉपी अग्रसारित करें।

इन सभी दिशा निर्देशों का अनुपालन करने और समय पर मुकदमा दायर हो,इसकी मॉनिटरिंग प्रणाली प्रारम्भ करने के लिए कोर्ट ने मुख्य सचिव को 2 हफ्ते का समय दिया है।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के वैशाली जिला अंतर्गत पड़ने वाले ऐतिहासिक सरसाई पोखर के जीर्णोद्धार को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाई कोर्ट ने राज्य के वैशाली जिला अंतर्गत पड़ने वाले ऐतिहासिक सरसाई पोखर के जीर्णोद्धार को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की। जस्टिस आशुतोष कुमार व जस्टिस सत्यव्रत वर्मा की खंडपीठ ने राजीव रंजन सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए वैशाली के जिलाधिकारी को वन विभाग व लघु सिंचाई विभाग के साथ समन्वय कर उक्त पोखर के सौंदर्यीकरण करने व पर्यावरण बनाये रखने को लेकर छह महीने में कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

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कोर्ट ने ये आदेश वैशाली के जिलाधिकारी द्वारा गठित की गई तीन सदस्यीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर दिया गया है। इसके पूर्व, कोर्ट ने वैशाली के जिलाधिकारी को स्वयं जाकर स्थल निरीक्षण करने को कहा था।

इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को निष्पादित कर दिया।

पटना हाईकोर्ट में पटना के गायघाट स्थित आफ्टर केअर होम की घटना के मामले पर सुनवाई 30 जनवरी,2023 को होगी

पटना हाईकोर्ट में पटना के गायघाट स्थित आफ्टर केअर होम की घटना के मामले पर सुनवाई 30 जनवरी,2023 को होगी। जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ इस मामलें पर सुनवाई कर रही है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने जांच की प्रगति पर असंतोष जाहिर किया था।

पूर्व की सुनवाई में कोर्ट में एस एस पी, पटना और एस आई टी जांच टीम का नेतृत्व करने वाली सचिवालय एएसपी काम्या मिश्रा भी कोर्ट में उपस्थित रही थी।

कोर्ट ने कहा था कि इस मामलें की समग्रता में जांच नहीं की जा रही हैं।पुलिस अधिकारियों को विस्तार और गहराई से जांच पड़ताल करने की आवश्यकता है।

अधिवक्ता मीनू कुमारी ने बताया कि कोर्ट अब तक एस आई टी द्वारा किये गए जांच और कार्रवाई के सम्बन्ध में सम्बंधित अधिकारी से जानकारी प्राप्त करना चाहता था।उन्होंने बताया था कि आफ्टर केअर होम में रहने वाली महिलाओं की स्थिति काफी खराब हैं।

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पिछली सुनवाई में कोर्ट ने एस आई टी टीम का नेतृत्व करने वाली पुलिस अधिकारी को कोर्ट ने अब तक की गई कार्रवाई का ब्यौरा देने को कहा था।

पहले की सुनवाई में कोर्ट ने अनुसंधान को डी एस पी रैंक की महिला पुलिस अधिकारी से कराने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने जांच रिपोर्ट भी तलब किया था।

हाई कोर्ट ने इस याचिका को पटना हाई कोर्ट जुवेनाइल जस्टिस मोनिटरिंग कमेटी की अनुशंसा पर रजिस्टर्ड किया था। कमेटी में जस्टिस आशुतोष कुमार चेयरमैन थे, जबकि जस्टिस अंजनी कुमार शरण और जस्टिस नवनीत कुमार पांडेय इसके सदस्य के रूप में थे।

इस मामले की अगली सुनवाई में 30जनवरी,2023 को की जाएगी।

फार्मेसी में डिप्लोमाधारी ही फार्मेसिस्ट पद के योग्य हैं: पटना हाईकोर्ट

पटना हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया कि फार्मेसी में डिप्लोमाधारी ही फार्मेसिस्ट पद के योग्य हैं। जस्टिस पी बी बजनथ्री की खंडपीठ ने अरविन्द कुमार की याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि
बी फर्मा व एम फार्म के डिग्रीधारी इस पद के योग्य नहीं है। कोर्ट ने बिहार फार्मेसिस्ट कैडर नियमावली के नियम 6 का हवाला देते हुए कहा कि फार्मेसिस्ट पद के लिए जीव विज्ञान एवं गणित विषय में इंटर पास छात्र तीन पार्ट वाले फार्मेसी में डिप्लोमा किये को ही फार्मेसिस्ट पद के लिए योग्य हैं।

कोर्ट ने कहा कि प्रावधानों के अंतर्गत जो छात्र बी फर्मा व एम फार्म कोर्स में डिग्री लिये है, वे इस पद के लिये योग्य नहीं है।डिप्लोमाधारी छात्र अरविन्द कुमार की ओर से वरीय अधिवक्ता पीके शाही और अधिवक्ता शशि भूषण सिंह ने पक्ष रखा।

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गौरतलब है कि हाई कोर्ट के एकलपीठ ने बी फर्मा व एम फार्म के डिग्रीधारी छात्रों को इस पद के योग्य करार देते हुए कहा था कि इस पद के लिए सॉफ्टवेयर में बदलाव कर छात्रों का आवेदन तुरंत स्वीकार करें।

इस आदेश की वैधता को राज्य सरकार एवं डिप्लोमाधारी छात्र ने अपील दायर कर चुनौती दी।लंबी सुनवाई के बाद खंडपीठ ने एकलपीठ के फैसला को पलट दिया।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के निःशक्त बच्चों के लिए बने विशेष विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के मामले पर स्टाफ सेलेक्शन कमीशन को पार्टी बनाने का निर्देश दिया

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के निःशक्त बच्चों के लिए बने विशेष विद्यालयों में शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने के मामले पर सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए स्टाफ सेलेक्शन कमीशन को पार्टी बनाने का निर्देश दिया ।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता वृषकेतु शरण पांडेय ने कोर्ट को बताया कि 2014 में विज्ञापित पदों पर अब तक नहीं भरा जा सका है। यह अपने आप में राज्य का उदासीन रवैया दर्शाता है।

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गौरतलब है कि इस मामले में शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव ने हलफनामा दायर कर बताया था कि निःशक्त बच्चों से जुड़ी सभी परियोजनाएं तीन महीनों के भीतर कार्यरत हो जाएंगे ।

इस पर हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को हलफनामा दायर कर अपनी कार्य परियोजना बताने के लिए कहा है । इस मामले की अगली सुनवाई 14 फरवरी,2023 को होगी।

पटना हाइकोर्ट ने अधिवक्ता निरंजन कुमार के विरुद्ध चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की एक छात्रा के विरुद्ध लगाए गए छेड़छाड़ आरोप के मामलें पर अधिवक्ता संघो के प्रस्ताव पर स्वयम संज्ञान लेते हुए सुनवाई की

पटना हाइकोर्ट ने अधिवक्ता निरंजन कुमार के विरुद्ध चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय की एक छात्रा के विरुद्ध लगाए गए छेड़छाड़ आरोप के मामलें पर अधिवक्ता संघो के प्रस्ताव पर स्वयम संज्ञान लेते हुए सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने मामलें पर सुनवाई करते हुए उक्त आरोपी अधिवक्ता को नोटिस जारी किया है।साथ ही बिहार स्टेट बार कॉउन्सिल को इस सम्बन्ध में की जा रही कार्रवाई का ब्यौरा तलब किया।

इससे पूर्व बिहार राज्य बार कॉउन्सिल की जनरल बॉडी की बैठक बुलाई गई थी। इसमें कॉउन्सिल के सभी सदस्यों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया किया इस मामले में तथ्य का पता लगाने के लिए तीन अधिवक्ताओं की एक कमेटी का गठन किया जाएगा।इस कमिटी में दो पुरुष व एक महिला अधिवक्ता होंगी।

इसमें कॉउंसिल के सदस्य नहीं रहेंगे। कमेटी दस दिनों के भीतर अपना रिपोर्ट दे देगी। कॉउन्सिल ने मीडिया रिपोर्ट और प्राथमिकी के अनुसार अधिवक्ता निरंजन कुमार को शो – कॉज नोटिस जारी करने का निर्णय लिया था।

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पटना हाइकोर्ट के अधिवक्ता निरंजन कुमार पर चाणक्य राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पटना की एक छात्रा ने उनके विरुद्ध अपने साथ छेड़खानी
करने का आरोप लगाया था।

बार कॉउन्सिल ऑफ इंडिया ने इस मामलें को गम्भीरता से लेते हुए आरोपी अधिवक्ता निरंजन कुमार को तत्काल प्रभाव से उनके प्रैक्टिस करने के अधिकार को निलंबित कर दिया है।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 11जनवरी,2023 को की जाएगी।

विकास के मुद्दे पर भी पीएम के विरुद्ध राजनीति कर रहे नीतीश: सुशील मोदी

पटना । पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने कहा कि बिहार के विकास का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नहीं मिले, केवल इसलिए नीतीश कुमार दरभंगा में एम्स की स्थापना और सड़क निर्माण की बड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसे विकास कार्यों पर भी राजनीति कर रहे हैं।

  • दरभंगा एम्स के लिए 200 एकड़ जमीन नहीं दे पायी सरकार
  • 1200 करोड़ से बिहार के लिए दूसरा एम्स प्रस्तावित
  • दरभंगा हवाई अड्डे के विस्तार के लिए भी असहयोग का रवैया

श्री मोदी ने कहा कि यदि राज्य सरकार ने जमीन उपलब्ध करायी होती , तो 1200 करोड़ की लागत से दरभंगा में एम्स की स्थापना हो गई होती और जम्मू-कश्मीर के बाद बिहार दूसरा राज्य होता, जहाँ दो आयुर्विज्ञान संस्थान होते।

उन्होंने कहा कि दरभंगा और महाराष्ट्र के नागपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) बनाने के लिए शिलान्यास एक साथ हुआ था। नागपुर एम्स तैयार हो गया, लेकिन दरभंगा एम्स के लिए 200 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने में राज्य सरकार 6 साल से टालमटोल कर रही है।

श्री मोदी ने कहा कि पटना के बाद राज्य का दूसरा एम्स दरभंगा में होता, जिससे उत्तर बिहार की बड़ी आबादी को बाहर जाने की जहमत नहीं उठानी पड़ती।

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उन्होंने कहा कि पहले तो नीतीश सरकार नया एम्स बनाने के बजाय दरभंगा मैडिकल कालेज हॉस्पिटल (डीएमसीएच) को ही एम्स के रूप में अपग्रेड करने की दलील देकर जमीन देने से बचना चाहती थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इसे नीतिगत आधार पर अमान्य कर दिया।

श्री मोदी ने कहा कि महीनों बाद डीएमसीएच परिसर में ही एम्स के लिए मात्र 50 एकड़ भूमि दी गई। फिर अशोक पेपर मिल के विवादास्पद परिसर में 200 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने का प्रस्ताव किया गया। अब कहीं और भूमि देने की बात है।

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने जमीन देने का फैसला करने में ही इतनी देर कर दी कि एम्स की स्थापना का काम सालों पिछड़ गया।

श्री मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार की तत्परता से दरभंगा हवाई अड्डे से विमान सेवाएँ शुरू तो हो गईं, लेकिन इसके विस्तार के लिए जमीन देने में फिर राज्य सरकार हीला-हवाली कर रही है, ताकि इसका श्रेय केंद्र को न मिलने पाए।

पटना हाइकोर्ट में पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई की गई

पटना हाइकोर्ट में पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई की गई।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान फेज एक का निर्माण कार्य के प्रगति रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।साथ ही कोर्ट ने निर्माण कार्य में लगायी गई मशीन और मानव संसाधन का भी ब्यौरा पेश करने का निर्देश दिया।

इससे पूर्व कोर्ट ने फेज 2 के निर्माण में आ रही बाधाओं और अतिक्रमण को राज्य सरकार शीघ्र हटाना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने इसके लिए आवश्यक पुलिस बल और व्यवस्था मुहैया कराने का निर्देश सबंधित ज़िला प्रशासन को दिया है।

पिछली सुनवाई में इस राष्ट्रीय राजमार्ग का निर्माण करने वाली कंपनी ने इसका निर्माण कार्य 30 जून,2023 तक पूरा करने का अश्वासन कोर्ट को दिया था।इससे पूर्व में भी कोर्ट ने इस फेज के निर्माण में बाधा उत्पन्न होने वाले सभी अवरोधों को तत्काल हटाने का निर्देश सम्बंधित अधिकारियों को दिया।

इस राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में बाधा बने धार्मिक स्थलों सहित स्कूल तथा अन्य अवरोध को हटाने के लिए कोर्ट ने जहानाबाद तथा गया के डीएम एवं एसपी को दिया था।

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कोर्ट ने उन्हें को तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करने का आदेश दिया है।कोर्ट ने फेज दो के 39 किलोमीटर से 83 किलोमीटर के बीच सभी प्रकार के अतिक्रमण को तेजी से हटाने का आदेश दिया।वही फेज तीन के 83 किलोमीटर से 127 किलोमीटर के बीच के अतिक्रमण को भी हटाने का आदेश दिया।

पिछली सुनवाई कोर्ट ने पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में लगी निर्माण कंपनी ने कोर्ट को बताया कि पटना गया डोभी एनएच के निर्माण में कई जगह बाधा उत्पन्न किया जा रही है।उनका कहना था कि स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर लिया ।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा था कि इस मामलें पर कई बार सुनवाई की गई हैं,लेकिन कभी भी अतिक्रमण किये जाने तथा जमीन नहीं देने की जानकारी नहीं दी गई थी

इस मामलें पर 19 जनवरी,2023 को फिर सुनवाई की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के पश्चिम चम्पारण ज़िला स्थित हारनाटांड स्थित अनुसूचित जनजाति के बालिकाओं के लिए एकमात्र स्कूल की दयनीय अवस्था पर सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के पश्चिम चम्पारण ज़िला स्थित हारनाटांड स्थित अनुसूचित जनजाति के बालिकाओं के लिए एकमात्र स्कूल की दयनीय अवस्था पर सुनवाई की चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई की।कोर्ट ने पूर्व में गठित वकीलों की कमिटी को राज्य के शिक्षा विभाग के अधिकारियों से शिक्षा की समस्याओं पर विचार विमर्श करने का निर्देश दिया।

वकीलों की कमिटी इस सम्बन्ध में अगली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।साथ ही हारनाटांड स्थित अनुसूचित जनजाति के लड़कियों के लिए एकमात्र स्कूल के स्थिति के बारे में भी रिपोर्ट अगली सुनवाई में पेश किया जाएगा।

इस सम्बन्ध में आज राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट पर कोर्ट ने असंतोष जाहिर किया।पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के निदेशक और समाज कल्याण विभाग के निदेशक को स्थिति स्पष्ट करने के लिए तलब किया था।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विकास पंकज ने कोर्ट को बताया कि बिहार में अनुसूचित जनजाति की बालिकाओं के लिए पश्चिम चम्पारण के हारनाटांड ही एकमात्र स्कूल है।उन्होंने कोर्ट को बताया कि पहले यहाँ पर कक्षा एक से ले कर कक्षा दस तक की पढ़ाई होती थी।

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लेकिन जबसे इस स्कूल का प्रबंधन सरकार के हाथों में गया,इस स्कूल की स्थिति बदतर होती गई।उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी कि कक्षा सात और आठ में छात्राओं का एडमिशन बन्द कर दिया गया।साथ ही कक्षा नौ और दस में छात्राओं का एडमिशन पचास फीसदी ही रह गया।

यहाँ पर सौ बिस्तर वाला हॉस्टल छात्राओं के लिए था,जिसे बंद कर दिया गया।इस स्कूल में पर्याप्त संख्या में शिक्षक भी नहीं है।इस कारण छात्राओं की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।

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कोर्ट ने जानना चाहा कि इतनी बड़ी तादाद में छात्राएं स्कूल जाना क्यों बंद कर दे रही है।पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि जब इस स्कूल के लिए केंद्र सरकार पूरा फंड देती है,तो सारा पैसा स्कूल को क्यों नहीं दिया जाता हैं।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 23 जनवरी,2023 को की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने बेली रोड स्थित एल एन मिश्र इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक डेवलपमेंट एंड सोशल चेंज, पटना के भवन को स्थानांतरित करने से सम्बंधित लोकहित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाइकोर्ट ने बेली रोड स्थित एल एन मिश्र इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक डेवलपमेंट एंड सोशल चेंज, पटना के भवन को स्थानांतरित करने से सम्बंधित लोकहित याचिका पर सुनवाई की । चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने बताया कि मौजूदा परिस्थितों के मद्देनजर हाईकोर्ट कैंपस का विस्तार ज़रूरी हो गया है।

उन्होंने कहा कि इसलिए एलएन मिश्र इंस्टीट्यूट को अन्यत्र स्थानांतरित किये जाने की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि वकीलों, उनके स्टाफ और हाईकोर्ट में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या काफी बढ़ी है। राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह न्यायपालिका के विस्तार से संबंधित उचित कदम उठाये ।

गौरतलब है कि एलएन मिश्रा इंस्टीट्यूट के अधिवक्ता आरके शुक्ला ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा था।उन्होंने कहा कि इससे एलएन मिश्र इंस्टीट्यूट में पढ़ाई कर रहे छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा ।

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उन्होंने कोर्ट को बताया था कि जो पूर्वी सीमा पर मूल रूप से हाईकोर्ट को भूमि आवंटित की गई थी, राज्य सरकार ने उस पर एमएलए और सरकारी अधिकारियों के फ्लैट निर्माण कर लिया है। ऐसे में इंस्टीट्यूट को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाना एक मुश्किल फ़ैसला है।

इस इंस्टिट्यूट के पदेन अध्यक्ष माननीय मुख्यमंत्री हैं। उनके समक्ष इस पूरे मामले को रखना जरूरी है ताकि कोई फ़ैसला लिया जा सके ।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता ललित किशोर ने बताया कि राज्य को अपना पक्ष रखने के लिए फिलहाल 2 सप्ताह का समय दिया जाना चाहिए । इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी ।

पटना हाइकोर्ट ने सीतामढी ज़िला के आर्थिक रूप से कमज़ोर और शारीरिक अपंगता लड़कियों की जांच रिपोर्ट कल तक एम्स,पटना को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया

पटना हाइकोर्ट ने सीतामढी ज़िला के आर्थिक रूप से कमज़ोर और शारीरिक अपंगता लड़कियों की जांच रिपोर्ट कल तक एम्स,पटना को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने स्वयं संज्ञान लेते हुए इन दिव्यांग लड़कियों की अपंगता की जांच के लिए एम्स,पटना को भेजा।

गौरतलब है कि सीतामढी के ज़िला व सत्र न्यायाधीश ने इनके सम्बन्ध में पटना हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पत्र लिखा था।इसमें ये बताया गया कि दो लड़कियों को हड्डी रोग की समस्या है,जबकि एक लड़की नेत्र की समस्या से ग्रस्त है।इनके आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण इनके माता पिता इनका ईलाज नही करवा पा रहे थे।इनके ईलाज में अस्पताल और ईलाज का खर्च काफी होता है, जो कि इनके वश में नहीं था।

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कोर्ट ने इनके ईलाज के क्रम में जांच के लिए पटना के एम्स अस्पताल भेजा।एम्स के अधिवक्ता विनय कुमार पाण्डेय ने कोर्ट को बताया कि एम्स अस्पताल में जांच का कार्य हो गया है।कल तक एम्स अस्पताल से रिपोर्ट मिल जाने की संभावना है।

इस मामलें की सुनवाई के क्रम में कोर्ट ने एम्स अस्पताल, पटना व राज्य सरकार समाज कल्याण विभाग को पार्टी बनाने का आदेश दिया।इस मामलें पर 10 जनवरी,2023 को फिर सुनवाई होगी।

पटना हाईकोर्ट ने मुज़फ़्फ़रपुर के सरैया थाना चर्चित हत्याकांड में मृतक के परिजन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सरैया के डीएसपी और सम्बंधित अनुसंधानकर्ता को अगली सुनवाई में तलब किया

पटना हाई कोर्ट ने मुज़फ़्फ़रपुर के सरैया थाना चर्चित हत्याकांड में मृतक निर्भया कुमारी (काल्पनिक नाम) के परिजन द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सरैया के डीएसपी और सम्बंधित अनुसंधानकर्ता को अगली सुनवाई में तलब किया है।जस्टिस चन्द्रशेखर झा ने पुलिस द्वारा बलात्कारियों को केस से बरी करने के विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई की।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ओम प्रकाश कुमार ने कोर्ट से आग्रह किया गया है कि केस में नामजद अभियुक्तों को जल्द से जल्द गिरफ्तार किया जाए। साथ ही केस को किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच करवाया जाए। इस केस में काम नही कर रहे पुलिस पदाधिकारियों पर विभागीय कार्यवाही भी चलाया जाए।

पिछले सुनवाई के दौरान मुज़फ़्फ़रपुर SSP ने शपथ पत्र दायर कर बताया कि इस केस में सिर्फ एक व्यक्ति ही संलिप्तता जांच में सामने आई है ।इसलिए बाकी अभियुक्तों को गिरफ्तार नही किया गया।

आज सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि जो शपथ पत्र एसएसपी ने दायर किया है, उसे देखने से प्रतीत होता है कि पुलिस अन्य अभियुक्तों को बचा रही है।

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कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए इस केस के DSP और अनुसंधान कर्ता को अगली सुनवाई में कोर्ट में हाजिर होने का आदेश दिया है।

अधिवक्ता ओम प्रकाश ने बताया कि दिनांक 26 अप्रैल 2022 को याचिकाकर्ता की पुत्री अपने घर से बाहर गयी थी ,लेकिन वह वापस नही लौटी।

जिसके बाद परिजन वालों ने अपनी पुत्री को जा खोजबीन किया, परन्तु वह नही मिली। उसी दिन रात्रि 12.47 बजे एक कॉल आया, जिसमे याचिकाकर्ता की पुत्री की आवाज सुनाई दी।वह दर्द से कराह रही थी।इसके बाद फोन कट गया और पुनः प्रयास करने पर मोबाइल बंद मिला।

अगले दिन सुबह में ग्रामीण ने बताया कि याचिकाकर्ता की पुत्री की बॉडी पोखर में पड़ी हुई है। इसके बाद परिजन घटना स्थल पर जाने के क्रम में देखे की गांव के ही मो0 वसीम खान के द्वारा याचिकाकर्ता की पुत्री को बोलेरो कार से लेकर कहीं जा रहा था।

वह बोलेरो मोहम्मद वसीम के घर पर जाकर रुकती है और फिर मोहम्मद वसीम के परिवार वाले गाड़ी में बैठते है। वे लोग वैष्णवी हॉस्पिटल, मुज़फ़्फ़रपुर याचिकाकर्ता की पुत्री को लेकर जाते हैं, जहाँ याचिकाकर्ता की पुत्री के परिजन भी पहुचते हैं ।

अपनी पुत्री से बात करते हैं, तो याचिकाकर्ता की पुत्री द्वारा बताया जाता है कि लगभग 8 लोग द्वारा बलात्कार किया गया और जहर पिलाया गया। इसमें उसने चार लोगों का नाम भी लिया था, जिसमे से एक व्यक्ति मोहम्मद वसीम खान को गिरफ्तार कर लिया गया है ।

लेकिन अभी भी तीन नामजद अभियुक्त पुलिस के गिरफ्त से बाहर है।इस मामलें पर पुनः दस दिनों बाद सुनवाई की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने बिहार सरकार पर लगाया 10 लाख रुपए का अर्थदंड

पटना हाईकोर्ट ने स्टेट एंप्लॉयमेंट कमिटी और मैनेजिंग कमिटी मानीसना वेज बोर्ड, बिहार पटना के अध्यक्ष का वेतन निर्धारण के मामले में राज्य सरकार द्वारा स्पष्ट जवाब नहीं दिए जाने राज्य सरकार पर दस लाख रुपए का अर्थदंड लगाया है।

जस्टिस पी वी बजंत्री की खंडपीठ ने विजय कुमार सिंह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित दिया।

याचिकाकर्ता स्टेट एंप्लॉयमेंट कमेटी के साथ-साथ मैनेजिंग कमेटी मनीसना वेज बोर्ड बिहार के अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे। इन्होंने हाईकोर्ट में स्टेट एंप्लॉयमेंट कमेटी के चेयरमैन के वेतन और भत्ते के लिए पहले एक याचिका दायर की थी।

इनकी याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट के निर्देशानुसार राज्य के मुख्य सचिव के वेतन के समान इन्हें वेतन भत्ता और सुविधा दिया गया। जब यह उस पद से हटे, तो मैनेजिंग कमेटी मनीसना वेज बोर्ड के चेयरमैन के पद पर कार्य करने की अवधि का वेतन के लिए हाई कोर्ट में याचिका दायर किया।

इसी मामले पर राज्य सरकार का पक्ष जानने के लिए हाई कोर्ट ने 20 दिसंबर 2022 को संबंधित अधिकारियों को कोर्ट में तलब किया था।

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आज सुनवाई के दौरान जो अधिकारी कोर्ट में उपस्थित हुए थे, उनके द्वारा हाईकोर्ट द्वारा पूछे गए प्रश्नों का जब जवाब नहीं दिया गया। इस हाई कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त करते हुए राज्य सरकार पर दस लाख रुपये का अर्थदंड लगाया।

पटना हाइकोर्ट ने पटना के ललित नारायण मिश्र इंस्टीट्यूट के भवन को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की

पटना हाइकोर्ट ने पटना के ललित नारायण मिश्र इंस्टीट्यूट के भवन को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की । चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई की।

याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने बताया कि मौजूदा परिस्थितों के मद्देनजर हाईकोर्ट कैंपस का विस्तार ज़रूरी हो गया है। वकीलों, उनके स्टाफ और हाईकोर्ट में काम करने वाले कर्मचारियों की संख्या काफी बढ़ी है। राज्य सरकार का कर्तव्य है कि वह न्यायपालिका के विस्तार से संबंधित उचित कदम उठाये ।

उन्होंने कोर्ट से कहा कि ललित नारायण मिश्र संस्थान को पटना के मीठापुर स्थित पुराने बस स्टैंड की भूमि में स्थानांतरित किया जा सकता है। बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के लिए नए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत बढ़ गई है ।

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सुनवाई के दौरान एलएन मिश्रा इंस्टीट्यूट की ओर से अधिवक्ता आरके शुक्ला ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि इससे एलएन मिश्र इंस्टीट्यूट में पढ़ाई कर रहे छात्रों का भविष्य प्रभावित होगा । उन्होंने कोर्ट को बताया कि जो पूर्वी सीमा पर मूल रूप से हाईकोर्ट को भूमि आवंटित की गई थी, राज्य सरकार ने उस पर एमएलए और सरकारी अधिकारियों के फ्लैट निर्माण कर लिया है।

उन्होंने कहा कि ऐसे में इंस्टीट्यूट को अन्यत्र स्थानांतरित किया जाना एक मुश्किल फ़ैसला है । इस इंटिट्यूट के पदेन अध्यक्ष माननीय मुख्यमंत्री हैं, उनके समक्ष इस पूरे मामले को रखना जरूरी है, ताकि कोई फ़ैसला लिया जा सके ।

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इस बात पर कोर्ट ने सहमति जताते हुए मामले को 9 जनवरी,2023 को सुनवाई की तिथि निर्धारित किया है।

पटना हाइकोर्ट ने राज्य सरकार के वकीलों की फीस में पिछले 14 सालों से कोई बढ़ोतरी नहीं होने के मामलें पर सुनवाई की

पटना हाइकोर्ट ने राज्य सरकार के वकीलों की फीस में पिछले 14 सालों से कोई बढ़ोतरी नहीं होने के मामलें पर सुनवाई की।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने अधिवक्ता सत्यम शिवम सुंदरम की जनहित याचिका पर सुनवाई की।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सुनवाई करते हुए पूर्व महाधिवक्ता पी के शाही समेत पाँच वरीय अधिवक्ताओं को राज्य के मुख्य कार्यपालक ( मुख्य मंत्री) से मिल कर इस सम्बन्ध में विचार करने का निर्देश दिया था।

वरीय अधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट को बताया कि 29 दिसम्बर,2022 को अधिवक्ताओं की टीम ने मुख्यमंत्री से भेंट कर सरकारी वकीलों के फीस बढोतरी के सम्बन्ध में चर्चा की।

उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री ने उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किया। उन्होंने इस सम्बन्ध में प्रस्ताव देने को कहा।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने पूर्व महाधिवक्ता पी के शाही के नेतृत्व में पाँच वरीय अधिवक्ताओं को राज्य के मुख्यमंत्री से मिल कर सरकारी वकीलों की फीस बढ़ाने के मामलें में विचार करने को कहा था।

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पिछली सुनवाई में कोर्ट को बताया गया था कि केंद्र सरकार सहित अन्य राज्य राज्य सरकार के वकीलों की तुलना में यहाँ के सरकारी वकीलों को काफी कम फीस का भुगतान किया जाता है।

याचिककर्ता की ओर से पूर्व महाधिवक्ता एवं सीनियर एडवोकेट पी के शाही ने बहस करते हुए कहा था कि पटना हाई कोर्ट में ही केंद्र सरकार के वकीलों की जहाँ रोजाना फीस न्यूनतम 9 हज़ार रुपये है, वहाँ बिहार सरकार के वकीलों को इसी हाई कोर्ट में रोजाना अधिकतम फीस रू 2750 से 3750 तक ही है।

वरीय अधिवक्ता पी के शाही ने कोर्ट को जानकारी दी कि पंजाब व हरियाणा, दिल्ली सहित पड़ोसी राज्य झारखंड और बंगाल में भी वहाँ के सरकारी वकीलों का फीस बिहार के सरकारी वकीलों से ज्यादा है।

एडवोकेट विकास कुमार ने कोर्ट को बताया कि केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण ( कैट) पटना बेंच में तो मूल वाद पत्र दायर कर उसपे बहस करने वाले केंद्र सरकार के वकीलों को रोजाना हर मामले पर 9 हज़ार रुपये फीस मिलता है।

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सबसे दयनीय स्थिति राज्य के सहायक सरकारी वकीलों की है, जिन्हे रोजाना मात्र 1250 रुपये फीसही काम करना पड़ता है।

बिहार में राज्य सरकारों के वकीलों के फीस में वृद्धि 14 साल पहले बिहार के तत्कालीन महाधिवक्ता पी के शाही के ही कार्यकाल में ही हुई थी।

इस मामले पर अगली सुनवाई 24 जनवरी, 2023 को की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट में राज्य के पश्चिम चम्पारण ज़िला स्थित हारनाटांड स्थित अनुसूचित जनजाति के बालिकाओं के लिए एकमात्र स्कूल की दयनीय अवस्था पर सुनवाई एक सप्ताह बाद की जाएगी

पटना हाईकोर्ट में राज्य के पश्चिम चम्पारण ज़िला स्थित हारनाटांड स्थित अनुसूचित जनजाति के बालिकाओं के लिए एकमात्र स्कूल की दयनीय अवस्था पर सुनवाई एक सप्ताह बाद की जाएगी। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के निदेशक और समाज कल्याण विभाग के निदेशक को स्थिति स्पष्ट करने के लिए तलब किया था।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता विकास पंकज ने कोर्ट को बताया कि बिहार में अनुसूचित जनजाति की बालिकाओं के लिए पश्चिम चम्पारण के हारनाटांड ही एकमात्र स्कूल है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि पहले यहाँ पर कक्षा एक से ले कर कक्षा दस तक की पढ़ाई होती थी।लेकिन जबसे इस स्कूल का प्रबंधन सरकार के हाथों में गया,इस स्कूल की स्थिति बदतर होती गई।

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उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी कि कक्षा सात और आठ में छात्राओं का एडमिशन बन्द कर दिया गया।साथ ही कक्षा नौ और दस में छात्राओं का एडमिशन पचास फीसदी ही रह गया।यहाँ पर सौ बिस्तर वाला हॉस्टल छात्राओं के लिए था,जिसे बंद कर दिया गया।

इस स्कूल में पर्याप्त संख्या में शिक्षक भी नहीं है।इस कारण छात्राओं की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।कोर्ट ने जानना चाहा कि इतनी बड़ी तादाद में छात्राएं स्कूल जाना क्यों बंद कर दे रही है।

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पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि जब इस स्कूल के लिए केंद्र सरकार पूरा फंड देती है,तो सारा पैसा स्कूल को क्यों नहीं दिया जाता हैं।इस मामलें पर अगले सप्ताह सुनवाई की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई कल तक के लिए टली

पटना हाईकोर्ट में राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई कल तक के लिए टली। वरीय अधिवक्ता रमाकांत शर्मा की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई की जा रही है।

कोर्ट ने इससे पहले सुनवाई करते हुए राज्य के विधि सचिव को विभिन्न जिलों के ज़िला जजों,डी एम व बार के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया था।

कोर्ट ने उन्हें इस बैठक के सम्बन्ध में भूमि उपलब्धता के सन्दर्भ में अगली सुनवाई में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता बिहार राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष रमाकांत शर्मा ने कोर्ट को बताया कि राज्य के अदालतों की स्थिति अच्छी नहीं है।वरीय अधिवक्ता शर्मा ने कोर्ट को बताया कि राज्य में लगभग एक लाख से भी अधिवक्ता अदालतों में कार्य करते है।लेकिन उनके लिए न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही कार्य करने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।

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उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी कि भवन की भी काफी कमी है। बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है।उन्होंने कोर्ट को बताया गया कि वकीलों को बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है। शुद्ध पेय जल,शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती हैं।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि अदालतों के भवन के लिए जहां भूमि उपलब्ध भी है,वहां भूमि को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जहां भूमि उपलब्ध करा दिया गया है, वहां कार्य नहीं प्रारम्भ नहीं हो पाया हैं।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर गंभीर रुख अपनाते हुए राज्य के विधि सचिव को तलब किया था।उन्होंंने कोर्ट को बताया कि इस सम्बन्ध में कार्रवाई की जा रही है।

कोर्ट ने जानना चाहा था कि केंद्र सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई गई है, किंतु अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है।कोर्ट ने भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया।

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कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध धनराशि का उपयोग नहीं होगा,तो अगले वित्तीय वर्ष में ये धनराशि उपलब्ध नहीं हो पाएगी।इस मामलें पर अगली सुनवाई 3जनवरी,2023 को की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने पटना स्थित ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान के भवन को हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए 3 जनवरी, 2023 तक राज्य सरकार को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया

पटना हाइकोर्ट ने पटना स्थित ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान के भवन को हाईकोर्ट को स्थानांतरित करने से सम्बंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने अधिवक्ता प्रियंका सिंह की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए 3 जनवरी,2023 तक राज्य सरकार को स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता योगेश चंद्र वर्मा ने कोर्ट को बताया कि पटना हाइकोर्ट के पश्चिम में हाईकोर्ट की काफी भूमि है। पटना हाईकोर्ट का लगातार विस्तार हो रहा है।

उन्होंने कोर्ट से कहा कि ललित नारायण मिश्र आर्थिक विकास और सामाजिक परिवर्तन संस्थान को पटना के मीठापुर स्थित पुराने बस स्टैंड की भूमि में स्थानांतरित किया जा सकता है। वह क्षेत्र शैक्षणिक हब के रूप में विकसित किया जा रहा है।

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उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट के प्रशासनिक विस्तार के साथ ही यहाँ वकीलों, उनके स्टाफ और कई लोग हाईकोर्ट में काम करने वालों की संख्या काफी बढ़ी है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के पूर्वी सीमा पर भी हाईकोर्ट की भूमि है।हाईकोर्ट के विस्तार को देखते हुए हाईकोर्ट को इन भूमि की आवश्यकता है।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि बड़ी तादाद में वैसे वकील है, जिन्हें हाईकोर्ट में बैठने और कार्य करने की व्यवस्था नहीं है।उन्हें बुनियादी सुविधाएँ नहीं उपलब्ध हो रही है।

उन्होंने बताया कि जो पूर्वी सीमा पर मूल रूप से हाईकोर्ट को भूमि आवंटित की गई थी, राज्य सरकार ने उस पर एमएलए और सरकारी अधिकारियों के फ्लैट निर्माण कर लिया है।उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को हाईकोर्ट की पूर्वी सीमा से वीरचन्द पटेल पथ तक की भूमि के बदले हाईकोर्ट को भूमि उपलब्ध करानी चाहिए।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 3 जनवरी, 2023 को की जाएगी।

पुलिस के भू माफिया के साथ कथित रूप से मिलीभगत और अवैध रूप से मकान ध्वस्त करने के मामलें पर पटना हाइकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

पटना हाइकोर्ट ने पुलिस के भू माफिया के साथ कथित रूप से मिलीभगत और अवैध रूप से मकान ध्वस्त करने के मामलें पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा। जस्टिस संदीप कुमार ने सजोगा देवी की याचिका पर सुनवाई पूरी कर 4 जनवरी,2023 को फैसला देने की तिथि निर्धारित किया है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने सुनवा करते हुए याचिकाकर्ता को घटना की वीडिओ को पेनड्राइव में राज्य सरकार के अधिवक्ता और प्रतिवादियों को देने का निर्देश दिया।

पूर्व की सुनवाई में कोर्ट में पूर्वी पटना के एस पी, पटना सिटी के सी ओ और अगमकुआं थाना के एस एच ओ के साथ इस घटना में गए पुलिस अधिकारियों कोर्ट में उपस्थित हो कर अपनी स्थिति स्पष्ट की थी।

कोर्ट ने कहा कि बिना किसी न्यायिक या अर्ध न्यायिक आदेश के मकान तोड़ा जाना अवैध है।उन्होंने कहा कि अगर इसी तरह पुलिस कार्रवाई करेगी,तो अराजकता फैलेगी।

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पिछली सुनवाई में कोर्ट ने अवैध रूप से मकान ध्वस्त करने पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब ऐसे ही पुलिस काम करेगी,तो सिविल कोर्ट बंद कर दिया जाए।

कोर्ट में राज्य सरकार की ओर से इस बात से इंकार किया कि इस घटना में बुलडोजर का इस्तेमाल किया गया।उन्होंने कोर्ट को घटना की तस्वीरें भी दिखाई गई।

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पिछली सुनवाई में कोर्ट ने पुलिस के मनमाने रवैए पर सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि क्या यहाँ भी बुलडोजर चलेगा।पुलिस थाने मे पैसा दे कर मनमाने काम करवाए जा सकते है।क्या सारी ताकत पुलिस को मिल गई है क्या।

पूर्व की सुनवाई में कोर्ट को बताया गया कि भू माफिया के शह पर याचिकाकर्ता व उसके परिवार वालो के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज किया गया है। कोर्ट ने इस प्राथमिकी पर कोई कार्रवाई नहीं करने का आदेश देते हुए उन्हें गिरफ्तार नहीं करने का आदेश दिया था।

अदालती आदेश का उल्लंघन करने के मामले में तत्कालीन आईजी कारा एवं सुधार सेवा के मिथिलेश मिश्रा के खिलाफ अवमानना का मामला शुरू

पटना हाईकोर्ट ने अदालती आदेश का उल्लंघन करने के मामले में कड़ा रुख अख्तियार करते हुए तत्कालीन आईजी कारा एवं सुधार सेवा के मिथिलेश मिश्रा के खिलाफ अवमानना का मामला शुरू किया है। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने अल्लाउद्दीन अंसारी की आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करने बाद ये आदेश दिया।

साथ ही गत वर्ष 27 अगस्त को हुई बैठक का प्रस्ताव तथा गत वर्ष 19 फरवरी को जारी आदेश की प्रति रिकॉर्ड पर रखने का आदेश दिया।कोर्ट ने माना कि आईजी ने अदालती आदेश का पालन नहीं किया है।

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कोर्ट ने हाईकोर्ट प्रशासन को तत्कालीन आईजी को नोटिस जारी करने का आदेश दिया। वही आईजी को चार सप्ताह के भीतर अपना स्पष्टीकरण दाखिल करने का आदेश दिया है।इस मामलें पर अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद होगी।

पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई के दौरान निर्माण कंपनी ने पटना हाइकोर्ट को आश्वास्त किया कि फेज दो का निर्माण कार्य 30 जून,2023 तक पूरा हो जाएगा

पटना हाइकोर्ट में पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के मामलें पर सुनवाई की गई। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ द्वारा सुनवाई के दौरान निर्माण कंपनी ने आश्वास्त किया कि फेज दो का निर्माण कार्य 30 जून,2023 तक पूरा हो जाएगा।

कोर्ट ने इस फेज के निर्माण में बाधा उत्पन्न होने वाले सभी अवरोधों को तत्काल हटाने का निर्देश सम्बंधित अधिकारियों को दिया।इस राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में बाधा बने धार्मिक स्थलों सहित स्कूल तथा अन्य अवरोध को हटाने के लिए कोर्ट ने जहानाबाद तथा गया के डीएम एवं एसपी को दिया।कोर्ट ने उन्हें को तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने फेज दो के 39 किलोमीटर से 83 किलोमीटर के बीच सभी प्रकार के अतिक्रमण को तेजी से हटाने का आदेश दिया। वही फेज तीन के 83 किलोमीटर से 127 किलोमीटर के बीच के अतिक्रमण को भी हटाने का आदेश दिया।

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पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के फेज दो व तीन के निर्माण में लगी निर्माण कंपनी ने कोर्ट को बताया कि पटना गया डोभी एनएच के निर्माण में कई जगह बाधा उत्पन्न किया जा रहा है।उनका कहना था कि स्थानीय लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है।

जिला प्रशासन ने धार्मिक स्थल तथा स्कूल के लिए भूमि नहीं दिया है।इस पर कोर्ट ने निर्माण कम्पनी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि इस बात की शिकायत कोर्ट से क्यों नहीं की गई।

कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि इस मामलें पर कई बार सुनवाई की गई हैं,लेकिन कभी भी अतिक्रमण किये जाने तथा जमीन नहीं देने की जानकारी नहीं दी गई।कोर्ट ने निर्माण कम्पनी को कब तक निर्माण कार्य पूरा कर लेने के बारे में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया।

कोर्ट के कड़े रुख के बाद निर्माण कम्पनी ने 30 जून,2023 तक निर्माण कार्य पूरा कर लेने की बात कही।वही कोर्ट ने फेज दो व तीन पर बाधा बने स्थलों की जांच के लिए युवा वकीलों की टीम को जाने का आदेश दिया।

कोर्ट ने निर्माण में बाधा बनी बिजली टावर को हटाने का आदेश दिया।साथ ही आरओबी का निर्माण जल्द करने का आदेश दिया। इस मामलें पर आगे भी सुनवाई की जाएगी।

12वीं कक्षा पास उम्मीदवार भी अब अमीन बन सकते हैं: पटना हाइकोर्ट

पटना हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में राज्य में अमीनों की बहाली का रास्ता साफ कर दिया है । जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने अपने निर्णय मे स्पष्ट किया कि 12वीं कक्षा पास उम्मीदवार भी अब अमीन बन सकते हैं, क्योंकि राज्य सरकार ने अमीनों की बहाली के लिए वर्ष 2016 – 17 में जो संशोधन किया है ,उसके अनुसार बारहवीं पास उम्मीदवार को भी इस पद के लिये योग्य माना गया।

कोर्ट ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार द्वारा दायर अपील और चुने गए उन उम्मीदवारों द्वारा दायर हस्तक्षेप याचिका, जिनकी नियुक्ति इस पद पर चयन के बाद भी नहीं की गई थी, पर कोर्ट ने सुनवाई की।

कोर्ट ने कहा कि एकल पीठ ने वर्ष 2013 के रूल के अनुसार ही अमानत डिग्री प्राप्त उम्मीदवारों को अमीन के पद पर नियुक्ति करने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा इस पद पर किए गए नियुक्ति के लिए वर्ष 2016-17 में किए गए संशोधन की जानकारी सिंगल बेंच को नहीं दी गई थी ,जिसके कारण कोर्ट ने 12वीं पास उम्मीदवारों को आमीन के पद पर नियुक्ति के लिए योग्य नहीं माना था।

इससे पूर्व जस्टिस पी.बी.बजनथरी की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार के राजस्व विभाग द्वारा राज्य में 1767 अमीन के रिक्त पड़े पदों पर बहाली के लिए जनवरी,2020 में निकाले गए विज्ञापन को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह नए सिरे अमीनो के रिक्त पड़े 1767 पदों पर बहाली के लिए तीन माह में नए सिरे से विज्ञापन प्रकाशित कर नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करे।

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यह निर्देश जस्टिस पी बी बजन्थरी ने याचिकाकर्ता राम बाबू आजाद व अन्य द्वारा दायर कई रिट याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया था।

याचिकाकर्ता के ओर से कोर्ट को बताया गया था कि अमीन के पद पर बहाली के लिए शैक्षणिक योग्यता के लिए जो योग्यता राज्य सरकार ने विज्ञापन में प्रकाशित किया था, वह प्रावधानों के अनुरूप नहीं था। बिहार अमीन कैडर रूल के अनुसार उम्मीदवार को +2 उत्तीर्ण होने के साथ ही अमानत की डिग्री या आई टी आई द्वारा सर्वेयर की डिग्री प्राप्त होना चाहिए।

राज्य सरकार के राजस्व विभाग द्वारा निकाले गए विज्ञापन में जो शैक्षणिक योग्यता रखी गई थी, उसके अनुसार उम्मीदवार को मात्र +2 ही उत्तीर्ण होना ही पर्याप्त था।

इसी मामले को लेकर अमीन की डिग्री लिए उम्मीदवारों ने राज्य सरकार द्वारा प्रकाशित इस विज्ञापन को पटना हाईकोर्ट में रिट दायर कर चुनौती दिया था।

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कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद इस विज्ञापन को रद्द करते हुए नए सिरे से विज्ञापन निकाल कर नियुक्ति करने का निर्देश राज्य सरकार को दिया।

हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा अमीन की बहाली के लिए दिए गए आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि केवल अमानत डिग्री प्राप्त उम्मीदवार ही नहीं, बल्कि 12वीं पास उम्मीदवार भी इस पद पर नियुक्ति के लिए योग्य माने जाएंगे।

पटना हाइकोर्ट में पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण पर में हो रहे विलम्ब के मामलें पर सुनवाई की गई

पटना हाइकोर्ट में पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण पर में हो रहे विलम्ब के मामलें पर सुनवाई की गई। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ के समक्ष निर्माण कंपनी के अधिकारियों ने आश्वास्त किया कि पटना गया डोभी के फेज एक का निर्माण 31 मार्च,2023 तक पूरा हो जाएगा।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने इस राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो रहे विलम्ब पर कड़ी नाराजगी जाहिर की थी।प्रतिज्ञा नामक संस्था द्वारा ये जनहित याचिका पर दायर किया है।

कोर्ट ने पिछली सुनवाई में मामलें को गम्भीरता से लेते हुए निर्माण कार्य का जायजा लेने के लिए अधिवक्ता मनीष कुमार समेत एक दर्जन वकीलों की एक टीम गठित किया था।इनकी तीन टीमें तीनो फेज के निर्माण कार्य का जायजा ले कर कोर्ट को रिपोर्ट करने का निर्देश दिया था।

आज कोर्ट में इन्होने रिपोर्ट दिया।इन्होने अपने रिपोर्ट में कहा कि सड़क निर्माण का कार्य अपेक्षित गति से नहीं हो रहा है।जितनी मजदूर और मशीनें लगायी जानी चाहिए, उतना नहीं लगाया गया है।

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कोर्ट ने ये भी निर्देश दिया था कि निरीक्षण के दौरान वकीलों की सहायता के लिए सम्बंधित जिले के अधिकारीगण मौजूद रहेंगे।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कार्य की धीमी गति पर कॉन्ट्रेक्टर को फटकार लगायी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह से तय समय सीमा के तहत सड़क निर्माण का कैसे कार्य पूरा हो पायेगा।

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आज निर्माण कंपनी की ओर से बताया गया कि इस फेज में तीन आरओबी की समस्या के कारण सड़क निर्माण में बाधा है,लेकिन इस फेज के निर्माण का कार्य निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा कर लिया जाएगा।

गौरतलब है कि इस सड़क निर्माण के तय समय सीमा 31मार्च ,2023 है।कोर्ट ने कहा कि जितने भी आदमी और मशीनों की जरूरत हो,उन्हें इस सड़क निर्माण के कार्य में लगा कर समय पर कार्य पूरा किया जाए।इस मामलें पर अगली सुनवाई 21दिसम्बर,2022 को की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट में जल्द ही कुछ पाबन्दियों में छूट के साथ पूर्व की तरह काम प्रारम्भ हो जाएगा

पटना हाइकोर्ट में जल्द ही कुछ पाबन्दियों में छूट के साथ पूर्व की तरह काम प्रारम्भ हो जाएगा। कोर्ट सोमवार से गुरुवार तक फिजिकल तथा शुक्रवार को वर्चुअल चलता रहेगा।

मिली जानकारी के तहत हाई कोर्ट परिसर अवस्थित तीन कैंटीन को शर्तो के साथ खोलने की अनुमति दी गई है। वही रेलवे आरक्षण केंद्र पूर्व की तरह सुबह आठ बजे से दोपहर बाद दो बजे तक काम करेगा।

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मौजूदा समय में आरक्षण केंद्र सुबह आठ बजे से पौने दस बजे तक काम कर रहा था ।कोरोना संक्रमण को लेकर जारी एसओपी में थोड़ा बदलाव किया गया है। लेकिन बदलाव के बाद जारी हर दिशा निर्देशों को कड़ाई से पालन करने की जिम्मेवारी हाई कोर्ट के सुरक्षा में लगे पुलिस को दी गई है।

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वकील और उनके मुंशी को गेट संख्या दो एंव तीन से प्रवेश करने की अनुमति होंगी ।वही वकील हाई कोर्ट कर्मी एंव अन्य को गेट संख्या तीन से प्रवेश कर सकेंगे।जबकि मुवक्किल पास के द्वारा ही हाई कोर्ट में प्रवेश कर सकेंगे।सभी को हर दिशा निर्देश का पालन करना होगा।

पटना हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर बाढ़ के एसडीएम द्वारा कई लोगों पर समन जारी किये जाने के मामले पर कड़ी टिप्पणी की

पटना हाईकोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर बाढ़ के एसडीएम द्वारा कई लोगों पर समन जारी किये जाने के मामले पर कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने संतोष ऊर्फ संतोष सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इलेक्शन के समय में आप क्रिमिनल बना देंगे लोगों को…, अगर आपको कोर्ट का समन मिले, तो आप घर जाकर खाना भूल जाइएगा” ।

कोर्ट ने इस मामलें के जांच का जिम्मा सीआईडी को दे दिया है।अगली सुनवाई में कोर्ट ने सीआईडी कार्रवाई रिपोर्ट देने को कहा।

याचिकाकर्ता द्वारा आरोप लगाया गया है कि मोकामा स्थित समयागढ़ ओपी के एएसआई प्रमोद बिहारी सिंह ने अपने बल का दुरूपयोग कर उन्हें सीआरपीसी की धारा 107 के तहत जारी नोटिस को वारंट का दर्जा देते हुए उस पर गिरफ्तारी का दबाब बनाने लगे ।

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जब याचिकाकर्ता के भाई ने इस पर आपत्ति जताई ,तो पुलिस वाले उनसे गाली गलौज करने लगे। फिर देर रात सैकड़ो की संख्या में पुलिसकर्मियों ने पूरे गाँव पर रेड कर दिया और याचिकाकर्ता के भाई को घसीट कर ले गए और उसे छत की रेलिंग से धक्का दे दिया ।

जब कोर्ट ने जानना चाहा कि आखिर किस आधार पर बाढ़ के एसडीएम द्वारा याचिकाकर्ता एवं अन्य लोगों पर समन जारी किया गया,तो कोर्ट में हाजिर एसडीएम संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए ।

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हाईकोर्ट ने एसडीएम के कार्यकलाप पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि “क्या आपने सीआरपीसी की धारा 107 को पढ़ा है ? आप क्या पुलिस के कहने से कुछ भी कर देंगे।अगर ऐसा रहा तो समाज में अराजकता फैलेगी। इस मामले पर अगली सुनवाई 4जनवरी,2023 को होगी।

पटना हाईकोर्ट ने व्यवसायिक जमीन को कथित रूप से अवैध तरीके से बंदोबस्त कर दिये जाने के मामले में कटिहार निगम के पूर्व चीफ कॉउंसलर समेत अन्य को नोटिस जारी किया

पटना हाईकोर्ट ने व्यवसायिक जमीन को कथित रूप से अवैध तरीके से बंदोबस्त कर दिये जाने के मामले में कटिहार निगम के पूर्व चीफ कॉउंसलर समेत अन्य को नोटिस जारी किया है।

चीफ जस्टिस संजय करोल व जस्टिस पार्थ सारथी की खंडपीठ ने विभाष चंद्र चौधरी की जनहित याचिका पर वर्चुअल रूप से सुनवाई करते हुए ये आदेश को पारित किया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि ये जमीन वर्ष 2007 से 2016 तक कटिहार नगर निगम क्षेत्र में पड़ता था, जिसकी जांच सीबीआई या भारत सरकार के ईडी से कार्रवाई जानी चाहिए।

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याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव कुमार सिंह व प्रणव झा का कहना है कि ऐसे सभी जमीनों को निगम और जिला प्रशासन को अपने कब्जे में लेना चाहिए। कोर्ट ने पूर्व डिप्टी चीफ काउंसलर मंजूर खान, कटिहार नगर निगम के पूर्व मेयर बिजय सिंह व पूर्व डिप्टी मेयर श्रीमती पुष्पा देवी को भी नोटिस जारी किया है।

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याचिककर्ता के अधिवक्ता ने बताया कि ये घोटाला लगभग 500 करोड़ का है।इस मामलें पर आगे भी सुनवाई की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट में लोक अभियोजक के उपस्थित नहीं रहने के कारण 100 जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो सकी

आज पटना हाइकोर्ट में जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा के समक्ष ऑनलाइन सुनवाई के लिए सौ जमानत याचिकाएं लिस्ट किया गया था। लेकिन वीडिओ कॉन्फ्रेन्सिंग सुनवाई के दौरान इनचार्ज लोक अभियोजक के उपस्थित नहीं रहने के कारण इन जमानत याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो सकी।

इन सौ जमानत याचिकाओं में मात्र दो जमानत याचिकाओं पर ही सुनवाई हो सकी, जिनमें लोक अभियोजक उपस्थित रहे। कोर्ट का मानना था कि बिना सरकारी पक्ष को सुने इन जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करना उपयुक्त नहीं होता।

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कोर्ट ने इसे काफी गम्भीरता से लेते हुए इन सभी जमानत याचिकाओं को 20दिसंबर,2022 को नियमित बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया।

साथ कोर्ट ने इस आदेश की प्रति महाधिवक्ता को प्रेषित करने का निर्देश दिया, ताकि वे अपने स्तर पर कार्रवाई करें।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें में ए राज्य सरकार को विभिन्न जिलों में भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया

पटना हाईकोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने वरीय अधिवक्ता रमाकांत शर्मा की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को विभिन्न जिलों में भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने का निर्देश दिया है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य के विधि सचिव को सभी जिलों के ज़िला जज,डी एम और अधिवक्ता एसोसिएशनों के साथ बैठक कर अगली सुनवाई में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था।कोर्ट ने उन्हें इस बैठक के सम्बन्ध में भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया।

याचिकाकर्ता बिहार राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष रमाकांत शर्मा ने कोर्ट को बताया कि राज्य के अदालतों की स्थिति अच्छी नहीं है।उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य में लगभग एक लाख से भी अधिवक्ता अदालतों में कार्य करते है।

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लेकिन उनके लिए न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही कार्य करने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है। उनके लिए पर्याप्त भवन नही है। बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है।

उन्होंने कोर्ट को बताया गया कि वकीलों को बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है। शुद्ध पेय जल,शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती हैं।

उन्होंने कोर्ट को जानकारी दी कि अदालतों के भवन के लिए जहां भूमि उपलब्ध भी है,वहां भूमि को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जहां भूमि उपलब्ध करा दिया गया है, वहां कार्य नहीं प्रारम्भ नहीं हो पाया हैं।

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पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि केंद्र सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई गई है, किंतु अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है।कोर्ट ने भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया है।इस मामलें पर अगली सुनवाई 21दिसंबर,2022 को होगी।

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पटना हाईकोर्ट ने बिहार राजकीकृत प्रारम्भिक स्कूल हेड मास्टर की ( नियुक्ति , स्थानांतरण अनुशासनात्मक कार्यवाही व अन्य सेवा शर्तें) नियमावली को निष्प्रभावी करार देते हुए उसे नियमावली प्रारूप माना

पटना हाईकोर्ट ने एक फैसले में राज्य के प्रारंभिक राजकीयकृत स्कूलों के हेड मास्टरों की नियुक्ति एवं अन्य सेवा शर्तों को निर्धारित करने वाली नई नियमावली को निष्प्रभावी करार देते हुए उसे नियमावली प्रारूप माना है।

जस्टिस पी वी वैजंत्री की खंडपीठ ने अब्दुल बाकी अंसारी की रिट याचिका को निष्पादित कर दिया।

साथ ही शिक्षा विभाग को निर्देश दिया कि 18 अगस्त, 2021 को जारी की गयी बिहार राजकीकृत प्रारम्भिक स्कूल हेड मास्टर उसकी ( नियुक्ति , स्थानांतरण अनुशासनात्मक कार्यवाही व अन्य सेवा शर्तें) नियमावली को प्रारूप के तौर परकमी उस प्रकाशित करें।

साथ ही उस पर अगले दो महीने में सार्वजनिक टिप्पणी और सलाह आमन्त्रित कर उस पर पूरे विचार विमर्श कर उस कानून या अंतिम नियमावली तैयार कर अधिसूचित करें।

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याचिकाकर्तागण उर्दू टीईटी परीक्षा में उत्तीर्ण हुए थे और 2021 में जारी की गई इस नियमावली में अनुभव की न्यूनतम 8 वर्ष की अवधि को मनमाना पूर्ण कहते हुए इस हेड मास्टर नियुक्ति नियमावली की संवैधानिकता को चुनौती दिया था।

कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव से पूछा था कि 18 अगस्त 2021 को जारी की गई उक्त नियमावली को कानून का दर्जा देने से पहले क्या इसके प्रारूप को प्रकाशित कर सार्वजनिक सलाह आमंत्रित किया गया था या नहीं?

राज्य सरकार ने अपने जवाब में कहा कि ऐसी कोई प्रक्रिया नही पूरी की गयी थी।

कोर्ट ने कहा कि ऐसी नियमावली एक बड़े और व्यापक पैमाने के शिक्षक और उनके वर्ग को प्रभावित करेगी। इस तरह के नियम को जारी करने से पहले या उसे कानूनी जामा पहनाने से पहले सरकार को खुले आम लोगों के बीच में उनसे सलाह मशविरा करना चाहिए था ।

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इसीलिए हाई कोर्ट ने 18 अगस्त, 2021 को जारी इस नियमावली को बेअसर करार देते हुए इसे ड्राफ्ट रूल का दर्जा दिया है। कानून बनने से पहले कानून का मसविदा जो तैयार होता है, वही दर्जा अब इस नियमावली को तत्काल 2 महीने तक रहेगा।

इस दौरान राज्य के 10 हज़ार से भी अधिक प्रारंभिक स्कूलों जो राजकीयकृत होने के बाद पंचायत एवं प्रखंड स्तर पर चल रहे हैं ,वहां के हेड मास्टर नियुक्ति प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ेगा।

पटना हाइकोर्ट ने पटना-गया-डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो रहे विलम्ब पर गहरी नाराजगी जाहिर की

पटना हाइकोर्ट ने पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण में हो रहे विलम्ब पर गहरी नाराजगी जाहिर की है।प्रतिज्ञा नामक संस्था द्वारा दायर जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई की।

कोर्ट ने मामलें को गम्भीरता से लेते हुए निर्माण कार्य का जायजा लेने के लिए वकीलों की तीन टीम गठित की हैं।अधिवक्ता मनीष कुमार इन टीमों के साथ पटना गया डोभी राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण कार्य का निरीक्षण करेंगे।

इस टीम सदस्य अलग अलग निर्माण कार्यों का निरीक्षण करेंगे।कोर्ट ने निरीक्षण के दौरान वकीलों की सहायता के लिए सम्बंधित जिले के अधिकारीगण मौजूद रहेंगे। ये टीम निरीक्षण करने के बाद अगली सुनवाई में कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट पेश करेगी।

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कोर्ट ने कार्य की धीमी गति पर कॉन्ट्रेक्टर को फटकार लगायी।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह से तय समय सीमा के तहत सड़क निर्माण का कार्य पूरा नहीं हो पायेगा।

गौरतलब है कि इस सड़क निर्माण के तय समय सीमा 31मार्च ,2023 हैं।एनएचएआई के क्षेत्रीय अधिकारी भी कोर्ट में उपस्थित थे।उन्होंने आश्वास्त किया कि सड़क निर्माण का कार्य में दो तीन माह का विलम्ब हो सकेगा,लेकिन जल्दी पूरा करने का पूरा कोशिश किया जाएगा।

कोर्ट ने कहा कि जितने भी आदमी और मशीनों की जरूरत हो,उन्हें इस सड़क निर्माण के कार्य में लगा कर समय पर कार्य पूरा किया जाए।इस मामलें पर अगली सुनवाई 19 दिसम्बर,2022 को की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट ने नाबालिग का नाम उजागर करने के मामले में राज्य के डीजीपी को तीन सप्ताह के भीतर पुलिस अधिकारियों को दिशानिर्देश जारी करने का आदेश दिया है

कोर्ट ने बच्चों और उसके परिवार की पहचान को सार्वजनिक नहीं करने का निर्देश दिया।साथ ही पुलिस अधिकारी या कोई अन्य जो क़ानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने में शामिल पाया जाता है, उसके खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई की जाए।जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने नाबालिग के माँ की ओर से दायर अर्जी पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया।

आवेदिका की ओर से कोर्ट को बताया गया कि पूर्वी चम्पारण के पुलिस ने नाबालिग एंव उसके परिजनों का नाम उजागर कर दिया। एक सोशल मीडिया हाउस ने उसे पूरी खबर बना कर चला दी,जबकि पॉक्सो कानून के तहत किसी का निजता और गोपनीयता बनाए रखने का नियम है ।

इन नियमों के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन सभी को करना अनिवार्य है, लेकिन प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया जा रहा हैं।प्रक्रियाओं का पालन नहीं किये जाने के परिणामस्वरूप, अपराध के शिकार नाबालिग का नाम उजागर किया जा रहा है।

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उनका कहना था कि पॉक्सो कानून की धारा 23 का उल्लंघन किया जा रहा हैं। मीडिया पीड़िता का पहचान का खुलासा कर समाचार प्रकाशित करने में संयम नहीं दिखा रहे हैं।

पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ मीडिया भी पोक्सो के प्रावधानों और उसके तहत नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं।

इस मामलें पर तीन सप्ताह बाद सुनवाई की जाएगी।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के पटना समेत राज्य के अन्य एयरपोर्ट के निर्माण,विकास व सुरक्षा के मामले की सुनवाई 15 दिसंबर,2022 को होगी

पटना हाईकोर्ट ने राज्य के पटना समेत राज्य के अन्य एयरपोर्ट के निर्माण,विकास व सुरक्षा के मामले सुनवाई 15 दिसंबर,2022 को होगी।चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ द्वारा अभिजीत कुमार पाण्डेय की जनहित याचिका पर सुनवाई की जा रही है।

पिछली सुनवाई में पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने कोर्ट में अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि बिहार जैसे बड़ी आबादी वाले राज्य में न तो एक अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट है और ना ही ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट है।उन्होंने बताया कि देश के कई बड़े शहरों में अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट है,बल्कि छोटे छोटे शहरों में भी अंतराष्ट्रीय एयरपोर्ट है।

साथ कई शहरों में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट की सुबिधा उपलब्ध है। उन्होंने कोर्ट को बताया था कि पटना का एयरपोर्ट सुरक्षा के लिहाज से बहुत सही नहीं है।राजगीर,बिहटा और पुनपुन में एयरपोर्ट के विकल्प के रूप में विचार तो हुआ,लेकिन अंततः अंतिम रूप से कोई परिणाम नहीं आया।

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राज्य सरकार की ओर से पक्ष प्रस्तुत करते हुए एडवोकेट जनरल ललित किशोर ने कहा कि याचिकाकर्ता की ये माँग सही नहीं है कि खास जगह ही एयरपोर्ट बने या यात्रा के साधन का कैसे विकास हो।ये नीतिगत विषय होते है,जिस पर सरकार ही विचार कर कार्रवाई कर सकती है।केंद्र सरकार के अधिवक्ता के एन सिंह ने कोर्ट को बताया कि राज्य में ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट हो कि नहीं, ये विचार का मुद्दा हो सकता है,लेकिन यात्रा किसी विशेष रूप हो,ये विचार के योग्य नहीं है।

पिछली सुनवाई में रूडी ने कहा था कि गया अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट पर भी आज तक कोई अंतर्राष्ट्रीय विमान का परिचालन नहीं हुआ है।अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट होने के बावजूद यहां अंतर्राष्ट्रीय विमान नहीं चलते हैं ।

उन्होंने कहा था कि राज्य सरकार भी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट बनाने पर अपना स्थिति स्पष्ट नहीं कर रही है । पूर्व की सुनवाई में कोर्ट ने सभी पक्षों से जानना चाहा था कि ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट एवं अंतर्राष्ट्रीय एयरपोर्ट स्थापित करने के लिए क्या क्या अनिवार्यता हैं ?

इस मामलें पर अगली सुनवाई 15 दिसंबर,2022 को होगी।

पटना हाइकोर्ट ने वैध प्रमाण पत्र नहीं होने के बावजूद बिहार स्टेट फार्मेसी कॉउन्सिल के सदस्य के लिए चुनाव हेतु वोटर लिस्ट में नाम शामिल किए जाने के मामलें पर सुनवाई की

पटना हाइकोर्ट ने वैध प्रमाण पत्र नहीं होने के बावजूद बिहार स्टेट फार्मेसी कॉउन्सिल के सदस्य के लिए चुनाव हेतु वोटर लिस्ट में नाम शामिल किए जाने के मामलें पर सुनवाई की। इसकी जांच करवाने को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पटना हाई कोर्ट ने राज्य सरकार व फार्मेसी कॉउंसिल से जवाब तलब किया है।

चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुबोध कुमार की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुरेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि कुछ मामले में तो फार्मासिस्ट के तौर पर निबंधन भी रद्द होता है।

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इसकी वजह से फार्मेसी के हजारों विद्यार्थी वोट के अधिकार से वंचित रह जाते हैं।इस मामलें पर चार सप्ताह बाद सुनवाई की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट में राज्य के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गो के निर्माण,विकास और मरम्मती से सम्बंधित मामलों पर सुनवाई हुई

पटना हाइकोर्ट में राज्य के विभिन्न राष्ट्रीय राजमार्गो के निर्माण,विकास और मरम्मती से सम्बंधित मामलों पर सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने इन मामलों पर सुनवाई की।

कोर्ट ने मुजफ्फरपुर बरौनी राष्ट्रीय राजमार्ग का डीपीआर अब तक नहीं तैयार किये जाने पर राज्य के विकास आयुक्त और एनएचएआई के क्षेत्रीय अधिकारी को कल तलब किया है।

कोर्ट को जानकारी दी गई कि छपरा सिवान गोपालगंज रोड के निर्माण का कार्य पूरा हो चुका है।इस राजमार्ग का उदघाटन होना बाकी है।जोगबनी फारबिसगंज एन एच बन चुका है और इस पर वाहनों का आना जाना शुरू हो चुका है।

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पटना बख्तियारपुर एन एच का कार्य पूरा होने की जानकारी दी गई,लेकिन ये कार्य पूरा नहीं हुआ है।साथ मुंगेर के पास गंगा नदी पर बने पुल के पहुँच पथ के पास तीन हाई पावर ट्रांसमिशन री- लोकेट का मामला है।

इन मामलों पर 20दिसंबर,2022 को सुनवाई की जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के कालेजियम ने आज अपने बैठक में सुप्रीम कोर्ट में पाँच जजों की बहाली की अनुशंसा की है

सुप्रीम कोर्ट के कालेजियम ने आज अपने बैठक में सुप्रीम कोर्ट में पाँच जजों की बहाली की अनुशंसा की है।

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राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पंकज मित्तल,पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय करोल, मणिपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पी वी संजय कुमार,पटना हाईकोर्ट के जज जस्टिस अहसानउद्दीन अमानुल्लाह और इलाहाबाद के जज जस्टिस मनोज मिश्रा को सुप्रीम कोर्ट के जज बनाए जाने की अनुशंसा की है।

स्थानीय निकाय/ नगरपालिका में वार्ड सदस्यों समेत अन्य पदों के लिए राज्य में होने जा रहे चुनाव में आचार संहिता लागू करने के लिए एक जनहित याचिका पटना हाई कोर्ट में दायर की गई है

स्थानीय निकाय/ नगरपालिका में वार्ड सदस्यों समेत अन्य पदों के लिए राज्य में होने जा रहे चुनाव में आचार संहिता लागू करने के लिए एक जनहित याचिका पटना हाई कोर्ट में दायर की गई है। ये जनहित याचिका शम्भू सिद्धार्थ ने दायर किया है।

इस जनहित याचिका में सरकार, मंत्रियों, विधानसभा व विधान परिषद के सदस्यों समेत अधिकारियों द्वारा सत्ताधारी महागठबंधन से जुड़े उमीदवारों को फायदा पहुंचाने हेतु सत्ता का दुरुपयोग किये जाने की अनुमति नहीं देने की माँग की गई है।

याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता एस डी संजय ने बताया कि जनहित याचिका में ये आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार द्वारा सत्ता का दुरुपयोग करते हुए विभिन्न प्रकार के योजनाओं का उदघाटन किया जा रहा है।साथ ही स्थानीय निकाय के चुनाव की घोषणा के बाद भी आचार संहिता का उल्लंघन कर खास वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए योजनाओं की घोषणा और प्रचार – प्रसार किया जा रहा है।

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राजगीर में 27 नवंबर, 2022 को गंगा वाटर सप्लाई स्कीम योजना का उदघाटन,राजकीय दंत चिकित्सा महाविद्यालय व अस्पताल का नालंदा जिला में 12 दिसंबर, 2022 को उदघाटन किया गया।साथ ही, 13 दिसंबर, 2022 को मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्ति पत्र वितरण सह उन्मुखीकरण कार्यक्रम कथित रूप से आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए आयोजित किया गया।

इस मामलें में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करने के लिए आदेश देने का अनुरोध किया गया है।

याचिकाकर्ता के वरीय अधिवक्ता एस डी संजय का यह भी कहना है कि एक ओर आदर्श अचार सहिंता का पालन करवाने के लिए टीम का गठन किया गया है, वही दूसरी ओर मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री द्वारा इसका उल्लंघन किया जा रहा है।राज्य चुनाव आयोग आंख बंद करके बैठा हुआ है और आयोग द्वारा कोई कार्रवाई नहीं कि जा रही है।

पटना हाईकोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की

पटना हाईकोर्ट ने राज्य की निचली अदालतों में वकीलों के बैठने और कार्य करने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं होने के मामलें सुनवाई की। वरीय अधिवक्ता रमाकांत शर्मा की जनहित याचिका पर चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए राज्य के विधि सचिव को विभिन्न जिलों के ज़िला जजों,डी एम व बार के प्रतिनिधियों के साथ बैठक करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने उन्हें इस बैठक के सम्बन्ध में भूमि उपलब्धता के सन्दर्भ में अगली सुनवाई में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। याचिकाकर्ता बिहार राज्य बार काउंसिल के अध्यक्ष रमाकांत शर्मा ने कोर्ट को बताया कि राज्य के अदालतों की स्थिति अच्छी नहीं है।

वरीय अधिवक्ता शर्मा ने कोर्ट को बताया कि राज्य में लगभग एक लाख से भी अधिवक्ता अदालतों में कार्य करते है।लेकिन उनके लिए न तो बैठने की पर्याप्त व्यवस्था है और न ही कार्य करने की सुविधाएं उपलब्ध नहीं है।भवन की भी काफी कमी है। बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है।

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उन्होंने कोर्ट को बताया गया कि वकीलों को बुनियादी सुविधाओं का काफी अभाव है। शुद्ध पेय जल,शौचालय और अन्य बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं होती हैं।

उन्होंने कोर्ट को बताया कि अदालतों के भवन के लिए जहां भूमि उपलब्ध भी है,वहां भूमि को स्थानांतरित नहीं किया गया है। जहां भूमि उपलब्ध करा दिया गया है, वहां कार्य नहीं प्रारम्भ नहीं हो पाया हैं।

कोर्ट ने इस मुद्दे पर गंभीर रुख अपनाते हुए राज्य के विधि सचिव को तलब किया।उन्होंंने कोर्ट को बताया कि इस सम्बन्ध में कार्रवाई की जा रही है।

कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा धनराशि उपलब्ध कराई गई है, किंतु अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है।कोर्ट ने भूमि उपलब्धता के सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी देने का निर्देश राज्य सरकार को दिया।

कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध धनराशि का उपयोग नहीं होगा,तो अगले वित्तीय वर्ष में ये धनराशि उपलब्ध नहीं हो पाएगी।इस मामलें पर अगली सुनवाई 15दिसंबर,2022 को की जाएगी।

बिहार के सरकारी विद्यालयों में फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नियोजित शिक्षकों पर बर्खास्तगी के साथ-साथ प्राथमिकी भी दर्ज होगी

बिहार के सरकारी विद्यालयों में फर्जी प्रमाण पत्र के आधार पर नियोजित 77 हजार 57 शिक्षकों पर बर्खास्तगी के साथ-साथ प्राथमिकी भी दर्ज होगी।

पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर विजिलेंस ब्यूरो ने प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति मांगी है क्योंकि शिक्षकों से कई बार प्रमाण पत्र मांगे जाने पर भी उसे उपलब्ध नहीं करा रहे हैं।

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जांच के लिए निगरानी विभाग को 77 हजार 57 शिक्षकों के सर्टिफिकेट के फोल्डर नहीं मिले है। न्यायालय के आदेश के आलोक में शिक्षा विभाग ने प्रमाण पत्र के फोल्डर नहीं देने वाली नियोजन इकाइयों पर प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दे रखा है।

पटना हाइकोर्ट में हर्ष फायरिंग को रोकने हेतु दायर जनहित याचिका की सुनवाई हुई

पटना हाइकोर्ट में हर्ष फायरिंग को रोकने हेतु दायर जनहित याचिका की सुनवाई हुई। इस सम्बन्ध में हाईकोर्ट ने राज्य के 11 जिलों के डिस्ट्रिक्ट व सेशन जजों से उनके जिलों में हुए हर्ष फायरिंग की घटनाओं के सिलसिले में दर्ज प्राथमिकी के अनुसंधान और ट्रायल का रिपोर्ट तलब किया है।

चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने राजीव रंजन सिंह की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई की।

कोर्ट ने इस मामलें पर सुनवाई करते हुए पटना सहित बिहार के 11 जिले के डिस्ट्रिक्ट और सेशन जज को आदेश दिया था कि वह अपने-अपने जिला में हुए हर्ष फायरिंग की घटनाओं पर दायर मामले की त्वरित अनुसंधान और उस मामले में मुकदमे की त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।साथ ही एक समय सीमा के अंदर कार्य योजना तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

हाई कोर्ट ने पिछली सुनवाई में भी पटना, वैशाली ,सुपौल ,पूर्वी और पश्चिम चंपारण, मधेपुरा पूर्णिया ,जमुई ,लखीसराय सहित अन्य जिलों के डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज को निर्देश दिया था कि वे अपने-अपने जिलों के डीएम और एसपी के साथ एक बैठक कर यह समयसीमा को सुनिश्चित करें।

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उनके जिलों में हर्ष फायरिंग पर हुए एफ आई आर के अनुसंधान को एक समय सीमा के भीतर पूरा कर आरोपियों को ट्रायल हेतु भेजा जाए।

वही पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के साथ सुनवाई करते हुए जिला अधिकारी को यह निर्देश दिया गया कि वे सुनिश्चित करें कि हर्ष फायरिंग के आरोपियों के खिलाफ चल रहे ट्रायल की हो सके ,तो रोज़ाना सुनवाई हो और गवाही में विलम्ब नही हो।

हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों के तहत में इन सभी जिलों के डिस्ट्रिक्ट व सेशन जज ने बैठक में क्या क्या निर्णय लिए और इस बैठक कहां तक प्रभावकारी रहा, इस पर भी रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।

इस मामलें पर अगली सुनवाई,13फरवरी,2023 को होगी।

पटना हाइकोर्ट ने लखीसराय के बालिका विद्यापीठ के पूर्व सचिव स्व. कुमार शरद चन्द्र के चर्चित हत्याकांड की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया

पटना हाइकोर्ट ने लखीसराय के बालिका विद्यापीठ के पूर्व सचिव स्व. कुमार शरद चन्द्र के चर्चित हत्याकांड की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया है।जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद ने उषा शर्मा की याचिका पर सुनवाई करने के बाद आदेश दिया।

कोर्ट ने इससे पूर्व जांच कर रही जांच एजेंसी सीआईडी को आदेश के दो सप्ताह में सारे रिकॉर्ड और कागजात सीबीआई को उपलब्ध कराने का आदेश दिया।

कोर्ट ने सीबीआई के निर्देशक को ये निर्देश दिया कि वे शीघ्र एक योग्य अधिकारी के नेतृत्व में टीम गठित कर इस मामलें की निष्पक्ष और त्वरित जांच कराए।इसकी रिपोर्ट सम्बंधित निचली अदालत को सौंपने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने कहा कि इस हत्याकांड की जांच में पहले आठ साल का विलम्ब हो गया है।इसलिए इस मामलें की जांच त्वरित गति से किये जाने की जरूरत है।

ये घटना 2अगस्त,2014 को घटी थी, जब दो लोग कुमार शरद चन्द्र के घर में घुस कर गोली मार कर हत्या कर दी थी।उनकी पत्नी उषा शर्मा घटना के समय घर में थी।उन्होंने गोली मारने वाले को पहचान भी लिया था।

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इस सम्बन्ध में लखीसराय पुलिस थाने में कांड संख्या 443/ 2014/ दर्ज कराई गई।उनकी हत्या के पीछे बालिका विद्यापीठ के संपत्ति और भूमि का विवाद था।

इस मामलें शम्भू शरण सिंह, श्याम सुंदर प्रसाद और राजेंद्र सिंघानिया को निजी प्रतिवादी बनाया गया।कुछ दिनों की जांच के बाद इस मामलें की जांच का जिम्मा सीआईडी को 2014 में सौंप दिया गया।

लेकिन सीआईडी द्वारा मामलें की जांच में कोई तत्परता नहीं दिखाई गई।2016 से 2019 तक तो केस डायरी भी नहीं लिखी गई।2014 में ये हत्या हुई थी,लेकिन दिसंबर,2022 तक इस मामलें में कोई प्रगति नहीं हुई।चूंकि इस मामलें प्रभावशाली लोग शामिल थे,इसलिए जांच में कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पायी।आठ सालों में इस हत्याकांड की जांच नहीं पूरी हुई।

हाईकोर्ट ने इस मामलें को गंभीरता से लेते हुए जांच का सीबीआई को सौंपते हुए सीआईडी को दो सप्ताह के भीतर सारे रिकॉर्ड और कागजात सीबीआई को उपलब्ध कराने को कहा।इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामलें को निष्पादित कर दिया।

पटना हाईकोर्ट में पटना मुख्य नहर के बांध व चार्ट भूमि पर अतिक्रमणकारियों द्वारा किये गए अतिक्रमण के मामले पर सुनवाई 13 दिसंबर,2022 को की जाएगी

चीफ जस्टिस संजय करोल की खंडपीठ ने राज किशोर श्रीवास्तव की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

कोर्ट ने इससे पूर्व की सुनवाई में स्पष्ट किया किया था कि अतिक्रमणकारियों को पूरा अतिक्रमित भूमि खाली करनी होगी।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सुरेंद्र कुमार सिंह ने बताया था कि कोर्ट ने कहा कि अतिक्रमणकारियों को ये पूरी जमीन को हर हाल में खाली करना होगा।

कोर्ट को भी सहानुभूति है, लेकिन इस सरकारी जमीन को खाली करना होगा। इस मामले में कोर्ट ने पूर्व में ही कोर्ट ने दानापुर के अंचलाधिकारी को अतिक्रमण हटाकर अनुपालन के संबंध में हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया था।

इस नहर बांध व चार्ट भूमि पर अतिक्रमण की स्थिति को दानापुर के अंचलाधिकारी ने भी स्वीकार किया है। सम्बंधित अंचलाधिकारी ने 5 मई, 2022 को ही कोर्ट को स्वयं बताया था कि अगले चार सप्ताह में कम से कम 70 फीसदी अतिक्रमण को हटा दिया जाएगा।

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सोन नहर प्रमंडल, खगौल, पटना द्वारा अतिक्रमण वाद दायर करने के लिए दानापुर के अंचलाधिकारी को लिखा गया था, लेकिन अभी तक इसे नहीं हटाया गया।

सोन नहर प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता द्वारा दानापुर के अंचलाधिकारी को अतिक्रमणकारियों की सूची भी अंचलाधिकारी को दी गई है।

कार्यपालक अभियंता ने अपने पत्र में विभागीय मुख्य नहर के बांध व चार्ट भूमि पर किये गए अतिक्रमण को अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध अतिक्रमण वाद दायर कर ठोस अग्रेतर कार्रवाई करने हेतु अनुरोध किया था, ताकि विभागीय भूमि अतिक्रमणकारियों से मुक्त हो सके।

इस मामलें पर 13 दिसंबर,2022 को सुनवाई की जाएगी।

पटना हाइकोर्ट में बिहार राज्य में मानसिक स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं से सम्बंधित मामलें पर सुनवाई 14 दिसंबर,2022 को की जाएगी

पटना हाइकोर्ट में बिहार राज्य में मानसिक स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं से सम्बंधित मामलें पर सुनवाई 14 दिसंबर,2022 को की जाएगी।चीफ जस्टिस संजय क़रोल की खंडपीठ द्वारा आकांक्षा मालवीय की जनहित याचिका पर सुनवाई की जा रही है।

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा की गई कार्रवाई पर गहरा असंतोष जाहिर किया था। कोर्ट ने पूर्व की सुनवाई में राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को अबतक की गई कार्रवाई का ब्यौरा देने का निर्देश दिया था।

याचिका पर सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अधिवक्ता आकांक्षा मालवीय ने कोर्ट को बताया कि कोर्ट ने जो भी आदेश दिया,उस पर राज्य सरकार के द्वारा कोई प्रभावी और ठोस कदम नहीं उठाए गए है।

कोर्ट ने पिछली सुनवाई में इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता को पूरी जानकारी देने को कहा था। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को राज्य में मानसिक स्वास्थ्य सेवा में क्या क्या कमियों के सम्बन्ध में ब्यौरा देने को कहा था।

साथ ही कोर्ट ने इसमें सुधारने के उपाय पर सलाह देने को कहा था।याचिकाकर्ता की अधिवक्ता आकांक्षा मालवीय ने बताया कि नेशनल मेन्टल हेल्थ प्रोग्राम ही के अंतर्गत राज्य के 38 जिलों में डिस्ट्रिक्ट मेन्टल हेल्थ प्रोग्राम चल रहा हैं।लेकिन इसमें स्टाफ की संख्या नाकाफी ही है। हर जिले में सात सात स्टाफ होने चाहिए।

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उन्होंने बताया था कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह मेन्टल हेल्थ केयर एक्ट के तहत कानून बनाए।साथ ही इसके लिए मूलभूत सुविधाएं और फंड उपलब्ध कराए।लेकिन अबतक कोई ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है।

कोर्ट को ये भी बताया गया था कि सेन्टर ऑफ एक्सलेंस के तहत हर राज्य में मानसिक रोग के अध्ययन और ईलाज के लिए कॉलेज है।लेकिन बिहार ही एक ऐसा राज्य हैं,जहां मानसिक रोग के अध्ययन और ईलाज के लिए कोई कालेज नहीं है।

जबकि प्रावधानों के तहत राज्य सरकार का ये दायित्व हैं।पिछली सुनवाई में कोर्ट को बताया गया था कि केंद्र सरकार की ओर से दिए जाने वाले फंड में कमी आयी है,क्योंकि फंड का राज्य द्वारा पूरा उपयोग नहीं हो रहा था।

पहले की सुनवाई में याचिकाकर्ता की अधिवक्ता आकांक्षा मालवीय ने कोर्ट को बताया कि बिहार की आबादी लगभग बारह करोड़ हैं।उसकी तुलना में राज्य में मानसिक स्वास्थ्य के लिए बुनियादी सुविधाएँ नहीं के बराबर है।

इस मामलें पर अगली सुनवाई 14 दिसंबर,2022 को होगी।