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छपरा में 20 एकड़ बंजर जमीन पर मखाना प्रयोग सफल, किसानों को दोहरी आय

छपरा के जलालपुर प्रखंड के मंगोलपुर गाँव में पिछले दो वर्षों से चल रहा मखाना प्रयोग अब फल-फूल रहा है, जहाँ 20 एकड़ से अधिक बंजर जलजमाव वाली जमीन पर फसल तैयार हो चुकी है। यह पहल स्थानीय किसान समूह और कृषि वैज्ञानिकों के सहयोग से शुरू हुई, और अब इस क्षेत्र की आर्थिक स्थितियों में बदलाव की उम्मीद जताई जा रही है।

मंगोलपुर गाँव की यह जमीन सालभर पानी में डूबी रहती थी, जिससे पारंपरिक खेती असंभव थी। कई दशकों से किसान इसे बंजर मानते आए, जबकि आसपास के क्षेत्रों में धान, गेहूँ और मक्का जैसी फ़सलें उगाई जाती थीं। जलजमाव के कारण जमे हुए मिट्टी की कठोरता ने जुताई‑बुजाई को भी रोक दिया, जिससे कृषि आय में कमी आई और ग्रामीणों को रोजगार के अन्य साधनों की ओर झुकना पड़ा।

वर्ष 2022 की शरद ऋतु में, सतत कृषि विकास के तहत राज्य कृषि विश्वविद्यालय के एक वैज्ञानिक दल ने मखाना की संभावनाओं पर अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि मखाना (एपिनियम ग्रैस) जलजमाव वाले क्षेत्रों में उगाने योग्य है, क्योंकि इसकी जड़ें जल‑संकरीण मिट्टी में भी फलती-फूलती हैं। इस विज्ञान‑आधारित जानकारी ने स्थानीय किसान समूह को प्रयोग करने का प्रेरित किया।

पहला चरण 2022 की बासंत में शुरू हुआ, जब 12 किसानों ने मिलकर 10 एकड़ पर बीज बोए। प्रारम्भिक 6 महीने में जल स्तर को नियंत्रित करने हेतु नालियों की व्यवस्था की गई, और जैविक उर्वरकों का प्रयोग किया गया। बीज बोने के बाद जल‑निकासी की समस्या को दूर करने हेतु छोटे‑छोटे डैम बनाकर पानी का स्तर नियंत्रित किया गया, जिससे पौधों की जड़ें स्वस्थ हुईं।

दूसरे वर्ष, 2023 में, प्रयोग का विस्तार हुआ और अतिरिक्त 10 एकड़ भूमि को भी इस योजना में शामिल किया गया। इस बार कृषि वैज्ञानिकों ने उन्नत प्रबंधन तकनीकें जैसे टिलेज‑कवरेज, पत्ते‑पानी नियंत्रण और कीट‑नियंत्रण के लिए बायो‑पेस्टिसाइड्स का उपयोग किया। फसल के पहले दो महीने में ही मखाने की जड़ें गहरी तक पहुँच गईं, और जलजमाव की समस्या काफी हद तक घट गई।

2024 की शुरुआती महीनों में, मखाना की फसल ने परिपक्वता के संकेत दिखाए। किसानों ने कटाई के लिए विशेष मशीनरी का उपयोग किया, जिससे लगभग 15 टन मखाना प्राप्त हुआ। इस उत्पादन को स्थानीय मंडी में बेचा गया, जहाँ कीमतें सामान्य धान या गेहूँ से दो गुना अधिक थीं। इस सफलता ने गाँव के युवाओं को भी आकर्षित किया, जो अब खेती के नए स्वरूप को अपनाने के लिए उत्सुक दिखे।

प्रमुख किसान प्रतिनिधि राकेश कुमार ने बताया कि मखाना की खेती ने न केवल उनकी आय बढ़ाई, बल्कि जलजमाव वाले क्षेत्रों में जल‑संरक्षण के नए मॉडल भी पेश किए। उन्होंने कहा, “पहले हमें जल‑जमाव के कारण खेती नहीं हो पाती थी, लेकिन अब मखाना ने हमें एक नया विकल्प दिया है, जिससे हम आर्थिक रूप से सशक्त बन रहे हैं।”

राज्य के कृषि विभाग के अधिकारी शरण सिंह ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि मखाना जैसी जल‑संकरीण फसलें बिहार के कई बंजर क्षेत्रों में लागू की जा सकती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि अब सरकारी योजनाओं के तहत ऐसे किसानों को अतिरिक्त सब्सिडी और तकनीकी सहायता दी जाएगी, जिससे इस मॉडल को स्केल‑अप किया जा सके।

स्थानीय व्यापारियों ने भी इस फसल को सकारात्मक रूप से देखा। बाजार में मखाना की बढ़ती मांग के कारण, उन्होंने किसान समूह के साथ दीर्घकालिक अनुबंध करने की इच्छा जताई, जिससे दोनों पक्षों को स्थिर आय सुनिश्चित होगी। कुछ व्यापारियों ने निर्यात के संभावित बाजारों की ओर भी रुख किया, जिससे भविष्य में इस फसल के मूल्य में और वृद्धि हो सकती है।

सामाजिक दृष्टिकोण से, इस खेती ने ग्रामीण महिलाओं के रोजगार के अवसर भी बढ़ाए हैं। मखाना की सफाई, भुना और पैकेजिंग के लिए स्थानीय महिलाओं को विशेष प्रशिक्षण दिया गया, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय के स्रोत मिल रहे हैं। इससे गांव में महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में एक कदम आगे बढ़ा है।

आर्थिक प्रभाव को देखते हुए, स्थानीय बैंकों ने इस परियोजना को सुरक्षित ऋण प्रदान करने का प्रस्ताव रखा है। कृषि ऋ

Updated: September 9, 2026


Farming waterlogging as an asset, villagers in Chapra’s Jalalpur block turned 20 acres of barren land into profitable makhana fields through scientific intervention.
This model has doubled incomes, spurred youth interest, and empowered local women via processing jobs, prompting plans for wider replication and export potential.