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बाढ़‑ग्रस्त पॉलावारम में MPTC‑ZPTC चुनाव का मतदान समय आधा, सुरक्षा को प्राथमिकता दिया गया.

पॉलावारम जिला के त्रि‑राज्य सीमा क्षेत्रों में बाढ़‑ग्रस्त पहाड़ी इलाकों की कठिन पहुँच के कारण, मतदान के लिये निर्धारित समय को आधा कर दिया गया है; चुनाव प्राधिकरण ने इस कदम को नागरिक सुरक्षा और सुगम मतदान सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक बताया। इस निर्णय से स्थानीय जनता और उम्मीदवार दोनों पर असर पड़ रहा है, क्योंकि कई मतदाता अब सीमित समय में अपने मतदान केंद्र तक पहुँचने को लेकर चिंतित हैं।

पोलावारम, गोदावरी क्षेत्र में इस वर्ष का MPTC‑ZPTC चुनाव मौसम की प्रतिकूलता से पहले ही शुरू हो चुका था। पिछले दो हफ्तों से लगातार वर्षा ने नदियों के जलस्तर को बढ़ा दिया, जिससे कई छोटे पुल और ग्रामीण सड़कों पर पानी जमा हो गया। इस क्षेत्र में अक्सर बाढ़‑संकट की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, और प्रशासनिक अधिकारियों ने पहले ही कई गांवों को आपातकालीन स्थिति घोषित कर दिया था।

जिला चुनाव अधिकारी ने बताया कि प्रारंभिक योजना के तहत मतदान के लिये छह घंटे की अवधि तय थी, परंतु अस्थिर मौसम और बाढ़‑ग्रस्त मार्गों के कारण यह समय घटाकर तीन घंटे कर दिया गया। यह परिवर्तन सुरक्षा बलों, पुलिस और स्थानीय स्वेच्छा सेवा संगठनों के समन्वय में किया गया, ताकि मतदाता सुरक्षित रूप से मतदान केंद्र तक पहुंच सकें और चुनाव प्रक्रिया में बाधा न आए।

पोलावारम के कई गांवों में सुबह से ही मतदान केंद्रों के पास अस्थायी बाढ़ प्रतिरोधी पथ बनाये गये। स्थानीय प्रशासन ने राफ़्ट और वाटर ट्रांसपोर्ट का इंतजाम किया, जिससे निचले इलाकों के मतदाताओं को वोट डालने की सुविधा मिली। मतदान केंद्रों पर अतिरिक्त सुरक्षा कर्मी तैनात किए गये, ताकि भीड़ नियंत्रण और चुनाव की पारदर्शिता बनी रहे।

नए समय‑सारिणी के तहत, प्रत्येक मतदान केंद्र को तीन घंटे के भीतर सभी मतदाताओं को मतदान करवाना अनिवार्य किया गया। इस दिशा में चुनाव अधिकारी ने कहा कि मतदान के लिये इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की संख्या बढ़ा कर हर केंद्र पर दो मशीनें रखी गईं, जिससे कतार कम हो और समय का बेहतर उपयोग हो सके। साथ ही, मतदान के बाद तुरंत मतगणना का कार्य शुरू किया गया, जिससे परिणामों की तेजी से घोषणा संभव हो सके।

इस बदलाव को लेकर कई स्थानीय नेताओं ने अपनी असंतोष व्यक्त किया। कुछ उम्मीदवारों ने कहा कि समय घटाने से ग्रामीण क्षेत्रों के कमजोर वर्गों को मतदान का अधिकार नहीं मिल पायेगा, जबकि अन्य ने बताया कि बाढ़‑ग्रस्त इलाकों में सुरक्षा के बिना मतदान का संचालन असंभव है। विपक्षी दल के प्रमुख ने कहा कि इस निर्णय से चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं, परन्तु उन्होंने यह भी माना कि प्राकृतिक आपदाओं के सामने कोई विकल्प नहीं है।

मुख्य विपक्षी नेता ने इस बारे में कहा, “हम समझते हैं कि बाढ़ की स्थिति में मतदाता की सुरक्षा प्राथमिकता है, परंतु हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि सभी नागरिकों को समान अवसर मिले। यदि कोई भी वर्ग मतदान से वंचित रहा, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ेंगी।” इस बयान के बाद, कई सामाजिक संगठनों ने मतदान के लिये विशेष सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें राफ़्ट, टेम्पररी शेल्टर और मोबाइल मतदान इकाइयों का उपयोग शामिल है।

केंद्र सरकार की चुनाव आयोग भी इस पर नज़र रख रही है। दिल्ली स्थित मुख्य चुनाव अधिकारी ने कहा कि “हमने सभी सुरक्षा बिंदुओं और मौसम विभाग की रिपोर्टों को मिलाकर यह निर्णय लिया है। किसी भी स्थिति में मतदाता सुरक्षा को प्राथमिकता देना हमारी जिम्मेदारी है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि यदि मौसम में सुधार होता है, तो मतदान अवधि को पुनः विस्तार करने की संभावना पर विचार किया जाएगा।

आर्थिक दृष्टिकोण से इस निर्णय का असर स्पष्ट है। कई छोटे व्यापारियों ने बताया कि मतदान केंद्रों के निकट स्थित बाजारों में ग्राहक संख्या घटने से आय में कमी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं, स्थानीय कृषि उत्पादन को भी बाढ़ के कारण नुकसान हुआ है, और मतदान के दौरान किसानों की उपस्थिति सीमित रह गई, जिससे कृषि संबंधी मुद्दों पर चर्चा कम हुई।

सामाजिक प्रभावों की बात करें तो, इस निर्णय ने महिलाओं और बुजुर्गों के मतदान को चुनौतीपूर्ण बना दिया। कई महिलाएं, जो अपने घर से दूर नहीं जा पातीं, उन्हें अब सीमित समय में मतदान केंद्र तक पहुंचना कठिन लग रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता ने कहा, “हमें महिलाओं और बुजुर्गों के लिये अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था करनी चाहिए, जैसे घर-पर-घर मतदान या मोबाइल मतदान इकाइयाँ।” इस बात को लेकर कई NGOs ने स्थानीय प्रशासन से सहयोग माँगा।

राजनीतिक विश्लेषकों ने कहा कि इस चुनाव में बाढ़‑ग्रस्त क्षेत्रों की भागीदारी कम होने से परिणामों में असंतुलन आ सकता है। उन्होंने यह भी नोट किया कि यदि अधिकांश ग्रामीण मतदाता मतदान नहीं कर पाते, तो शहरी और अधिक विकसित क्षेत्रों की आवाज़ें अधिक प्रमुख हो सकती हैं, जिससे नीति‑निर्धारण में ग्रामीण समस्याओं का प्रतिनिधित्व घट सकता है।

भविष्य में, इस तरह की प्राकृतिक आपदाओं के प्रति चुनाव प्रक्रिया की तैयारी को लेकर कई सुझाव उभरे हैं। कुछ विशेषज्ञों ने प्रस्ताव रखा कि “

Updated: November 4, 2026