इंजीनियर से आईएस अधिकारी बनने की उनकी यात्रा कई कठिनाइयों से भरी रही। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने विभिन्न जिलों में कार्य किया, जहाँ ग्रामीण विकास, जल संरक्षण और शिक्षा सुधार के प्रोजेक्ट्स में हाथ बँटाया। विशेष रूप से जलालपुर में उन्होंने एक जलस्रोत पुनरुद्धार योजना को सफलतापूर्वक लागू किया, जिससे स्थानीय किसानों को सतत जल आपूर्ति मिली। इस अनुभव ने उन्हें सामाजिक परिवर्तन के लिए नीतिगत स्तर पर काम करने की दिशा में प्रेरित किया, और आज शराबबंदी के कार्यभार को संभालने का अवसर मिला है।
बिहार में शराबबंदी के प्रस्ताव का इतिहास कई दशक पुराना है, परंतु पिछले प्रयासों में सामाजिक प्रतिरोध और कार्यान्वयन में कमी के कारण लक्ष्य तक नहीं पहुंचा। राज्य सरकार ने 2022 में एक व्यापक योजना तैयार की थी, जिसमें शराब के उत्पादन, बिक्री और सेवन को रोकने के लिए कठोर नियमावली तैयार की गई थी। लेकिन स्थानीय व्यापारियों और उपभोक्ताओं की असंतोषजनक प्रतिक्रिया के कारण कार्यान्वयन में कई बाधाएँ उत्पन्न हुईं। इस पृष्ठभूमि को समझते हुए नई नियुक्ति का उद्देश्य योजना को सुदृढ़ करना और जनता के भरोसे को पुनः स्थापित करना है।
दिव्या शक्ति को इस भूमिका में नियुक्त करने से पहले उन्होंने कई राज्यों में समान प्रकार के निवारक कार्यक्रमों का अध्ययन किया। उन्होंने कहा कि शराबबंदी केवल प्रतिबंध नहीं, बल्कि वैकल्पिक रोजगार, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ समग्र विकास का पैकेज होना चाहिए। इस दिशा में उन्होंने पहले ही जिला स्तर पर 50 से अधिक महिलाओं को कौशल प्रशिक्षण देने की योजना तैयार की है, जिससे शराब की माँग घटेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को नया रूप मिलेगा।
शहरों के प्रमुख बाजारों में शराब के वितरण को रोकने के लिए नई नीतियों का मसौदा तैयार किया गया है, जिसमें लाइसेंस रद्दीकरण, कड़ाई से निरीक्षण और डिजिटल निगरानी प्रणाली शामिल है। इस प्रणाली के तहत प्रत्येक शराब दुकान को GPS‑टैग्ड डिवाइस से लैस किया जाएगा, जिससे उनकी गतिविधियों की वास्तविक‑समय में रिपोर्टिंग होगी। यह तकनीकी कदम भ्रष्टाचार को कम करने और कानून के निष्पादन को पारदर्शी बनाने की उम्मीद रखता है।
राजनीतिक पक्ष से इस निर्णय को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। ruling पार्टी के मुख्य मंत्री ने कहा कि दिव्या शक्ति की नियुक्ति से राज्य की शराबबंदी नीति में नई ऊर्जा आएगी और यह सामाजिक कल्याण की दिशा में एक बड़ा कदम है। वहीं विपक्षी दल के कुछ वरिष्ठ नेता ने इस कदम को राजनीतिक दिखावे के रूप में आलोचना की, यह कहते हुए कि वास्तविक प्रभाव तभी दिखेगा जब योजना का कार्यान्वयन पारदर्शी और न्यायसंगत हो।
व्यापारी संघों ने भी अपनी चिंता व्यक्त की, यह कहते हुए कि शराबबंदी से उनके रोजगार और आय पर गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने सरकार से कहा कि शराबबंदी के साथ वैकल्पिक व्यवसायिक अवसर प्रदान किए जाएँ, ताकि आर्थिक नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। इस बीच सामाजिक संगठनों ने इस कदम का स्वागत किया और कहा कि शराब की लत से ग्रस्त परिवारों को राहत मिलने से सामाजिक समरसता में वृद्धि होगी।
सामुदायिक स्तर पर कई NGOs ने पहले ही शराबबंदी के समर्थन में जागरूकता अभियान चलाना शुरू कर दिया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने 2023 में 10,000 से अधिक लोगों को शराब के दुष्प्रभावों के बारे में शिक्षित किया और पुनर्वास केंद्रों की स्थापना में सहयोग दिया। इन संगठनों का कहना है कि दिव्या शक्ति की अगुवाई में नीतियों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार ढालने से योजना की सफलता की संभावना बढ़ेगी।
आर्थिक दृष्टिकोण से शराबबंदी का प्रभाव स्पष्ट है; राज्य के टैक्स राजस्व में कमी आ सकती है, परंतु स्वास्थ्य खर्च में कमी और उत्पादकता में वृद्धि से दीर्घकालिक लाभ की उम्मीद है। उद्योग विशेषज्ञों ने बताया कि शराब उत्पादन
Bihar has appointed IAS officer Divya Shakti, a two‑time UPSC topper, to head its long‑stalled prohibition drive, emphasizing a tech‑enabled, community‑focused approach that pairs bans with skill training and health initiatives. The move draws praise from health activists and the ruling party, while traders and opposition warn that transparent implementation will be key to its success.
Divya Shakti’s appointment signals Bihar’s shift from punitive bans to a holistic development strategy—linking sobriety with job training and digital oversight—to win grassroots trust and curb corruption. The real test will be whether this tech-driven, community-anchored approach can outweigh the economic losses feared by critics and generate tangible benefits for households dependent on the informal economy. Its success will ultimately depend on transparent implementation, credible enforcement and sustained investment in alternative livelihoods. If these measures are backed by reliable data and regular public review, the government could demonstrate that social policy and economic development can move together rather than remain competing priorities.