बिहार में इस प्रकार के आदेश की पृष्ठभूमि में पिछले कुछ वर्षों में कई मामलों की रिपोर्टें सामने आई थीं, जहाँ अधिकारियों और विधायकों के बीच असंगत व्यवहार और संवाद में टकराव की घटनाएँ दर्ज की गई थीं। इन घटनाओं ने प्रशासनिक कार्यों में बाधाएँ उत्पन्न कीं और सार्वजनिक भरोसे में गिरावट का कारण बनीं। सरकार ने इन समस्याओं को हल करने के लिए एक व्यापक समीक्षा प्रक्रिया शुरू की, जिसमें विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, विधायी मंच के प्रतिनिधि और स्वतंत्र विशेषज्ञ शामिल थे। इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, एक विस्तृत प्रोटोकॉल तैयार किया गया, जिसे अब सभी स्तरों के अधिकारी अनिवार्य रूप से अपनाएंगे।
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पिछले वर्ष में बिहार विधान सभा में दो प्रमुख विवाद उत्पन्न हुए, जिनमें एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने एक विधायिका सदस्य के प्रश्नों को अनदेखा किया और दूसरे में एक सरकारी अधिकारी ने विधायिका के नियमों के उल्लंघन की सूचना दी। इन मामलों ने न केवल प्रशासनिक कार्यवाही में देरी की, बल्कि सार्वजनिक मंच पर भी सरकार की छवि को प्रभावित किया। इन घटनाओं के बाद, राज्य सरकार ने यह मान्यता ली कि विधायी सदस्यों के साथ उचित शिष्टाचार और प्रोटोकॉल का पालन न करने से संस्थागत समन्वय में बाधा आती है। इसलिए, इस आदेश में स्पष्ट रूप से यह निर्धारित किया गया है कि सभी सरकारी कर्मचारियों को विधायकों के साथ संवाद में उचित अभिवादन, समय पर प्रतिक्रिया और दस्तावेजीकरण का पालन करना होगा।
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आदेश में यह भी कहा गया है कि विधायी सदस्यों के साथ बैठकों के लिए पूर्व सूचना देना अनिवार्य है और बैठक के एजेंडा की स्पष्ट रूपरेखा प्रस्तुत करनी होगी। इसके अतिरिक्त, अधिकारियों को विधायकों के प्रश्नों का उत्तर देने में शीघ्रता और स्पष्टता बरतनी होगी, तथा किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत या राजनीतिक टिप्पणी से बचना होगा। इस आदेश में विशेष रूप से यह उल्लेख किया गया है कि विधायकों को उनकी पदवी और सम्मान के अनुसार संबोधित किया जाए, और अनावश्यक प्रतीक्षा या अनुचित व्यवहार से बचा जाए।
विधायी प्रोटोकॉल के पालन को सुनिश्चित करने के लिए, सरकार ने एक नई निगरानी प्रणाली भी स्थापित की है। इस प्रणाली के तहत, प्रत्येक विभाग को एक प्रोटोकॉल अनुपालन रिपोर्ट हर तिमाही में प्रस्तुत करनी होगी, जिसमें विधायकों के साथ किए गए सभी संवाद और बैठकों का विस्तृत विवरण शामिल होगा। यदि किसी विभाग में प्रोटोकॉल के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो उस विभाग के जिम्मेदार अधिकारी को त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई करनी होगी, और बार-बार उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को दण्डात्मक कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा। यह प्रणाली राज्य के प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
बिहार के मुख्यमंत्री ने इस आदेश के जारी होने पर कहा कि विधायी संस्थान और प्रशासनिक शाखा दोनो को मिलकर ही राज्य की विकासशील नीतियों को सफलतापूर्वक लागू किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि यह आदेश केवल नियमों की घोषणा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक बदलाव की दिशा में कदम है, जिसमें सभी कर्मचारियों को सम्मान, अनुशासन और सहयोग की भावना से कार्य करने की प्रेरणा मिलेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस प्रकार के प्रोटोकॉल को अपनाने से न केवल कार्यकुशलता बढ़ेगी, बल्कि नागरिकों को भी सरकारी सेवाओं में तेज़ी और पारदर्शिता का अनुभव होगा।
विधायकों ने इस आदेश का स्वागत किया और कहा कि यह उनके साथ बेहतर संवाद स्थापित करने में सहायक होगा। कई विधायकों ने कहा कि अब वे सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर नीति निर्माण में अधिक सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे, क्योंकि स्पष्ट प्रोटोकॉल से संचार की बाधाएँ कम होंगी। वहीं, विधायकी सदन के प्रमुख ने इस आदेश को संतुलित प्रशासनिक संबंधों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम कहा और सभी सदस्यों को इस दिशा में सहयोग करने का आह्वान किया।
सरकारी अधिकारियों की ओर से भी सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई है। कई विभागीय प्रमुखों ने कहा कि प्रोटोकॉल के स्पष्ट दिशा-निर्देशों से उनके कर्मचारियों को कार्य करने में स्पष्टता मिली है और अब वे विधायकों के साथ संवाद में अनावश्यक भ्रम से बच सकते हैं।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने यह उल्लेख किया कि इस आदेश के बाद विभागीय मीटिंग्स की तैयारी और समयबद्धता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिससे कार्यप्रवाह अधिक सुगम हो गया है।
Updated: August 22, 2026
Bihar’s government issued a mandatory protocol directing all officials to observe prescribed etiquette when dealing with legislators, aiming to smooth administrative‑legislative relations and boost service efficiency. The move follows past confrontations, introduces quarterly compliance reporting and penalties, and has drawn praise from lawmakers and officials, though opposition questions its implementation.
Bihar’s new protocol isn’t just bureaucratic housekeeping; it signals a deliberate shift toward institutional cohesion, treating legislative respect as a performance metric for governance. If enforced consistently, this cultural reset could convert past friction into faster policy rollout and rebuild citizen trust in a state long marred by admin‑legislature
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