चाय, जो भारतीय संस्कृति में सर्दी-गर्मी के बीच ऊर्जा पुनः प्राप्त करने का साधन माना जाता है, इस यात्रा में प्राकृतिक रूप से एक आवश्यक सहारा बन गया है। स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि पिछले वर्षों में चाय की खपत में क्रमिक वृद्धि देखी गई थी, परन्तु इस साल का आंकड़ा पहले के सभी रिकॉर्ड को पीछे छोड़ रहा है।
मेले के आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार, सुलतानगंज नगर पालिका ने इस वर्ष मेले के लिए विशेष रूप से 150 से अधिक चाय स्टालों को अनुमति दी, जिसमें से लगभग दो तिहाई स्टाल सीधे गंगा घाट और बाबाधाम के बीच स्थित प्रमुख मार्गों पर स्थित हैं। इन स्टालों को स्वास्थ्य और स्वच्छता मानकों के अनुरूप स्थापित किया गया, और सभी विक्रेताओं को स्थानीय प्रशासन द्वारा जारी किया गया स्वच्छता प्रमाणपत्र प्राप्त है। स्टालों पर उपलब्ध चाय की विविधता में अदरक वाली मसाला चाय, काली चाय, हरी चाय तथा स्थानीय जड़ी-बूटी चाय शामिल हैं, जो यात्रियों की विविध पसंद को पूरा करती हैं।
मेले के दौरान, सुबह 6 बजे से लेकर शाम 9 बजे तक, चाय स्टालों पर लगातार भीड़ रहती है। रिपोर्टों के अनुसार, सुबह के शुरुआती घंटे में अधिकांश यात्रियों द्वारा काली चाय की माँग अधिक रहती है, जबकि दोपहर के भोजन के बाद अदरक मसाला चाय की लोकप्रियता में तेज़ी आती है। विशेष रूप से बाबाधाम के निकट स्थित स्टालों पर, जहाँ भक्तों की संख्या शिखर पर होती है, वहाँ प्रत्येक घंटे में लगभग 2,500 कप चाय बेची जाती है। इस तीव्र मांग को पूरा करने के लिए विक्रेताओं ने अतिरिक्त स्टाफ और मोबाइल पावर जेनरेटर की व्यवस्था की है।
स्थानीय चाय व्यवसायियों के संघ ने कहा कि इस तीव्र मांग को पूरा करने के लिए उन्होंने 5,000 किलो से अधिक कच्ची चाय पत्ती, 2,000 किलोग्राम अदरक और 1,500 किलोग्राम दालचीनी जैसी सामग्री मेले से पहले ही शहर के विभिन्न बाजारों से खरीदी। इन सामग्रियों को गंगा किनारे के बड़े टैंकों में स्टोर किया गया, जहाँ से दैनिक रूप से आवश्यक मात्रा में चाय बनाकर स्टालों तक पहुँचाई जाती है। इस प्रक्रिया में स्वच्छता और तापमान नियंत्रण पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे चाय की गुणवत्ता में कोई समझौता नहीं हुआ।
मेले के मुख्य आयोजक, सुलतानगंज नगर निगम के पर्यटकों एवं संस्कृति विभाग के प्रमुख ने कहा कि चाय की बिक्री में इस तरह का उछाल न केवल यात्रियों की सुविधा बढ़ाता है, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण प्रोत्साहन देता है। उन्होंने बताया कि इस साल मेले में कुल 2,500 रोजगार अवसर उत्पन्न हुए हैं, जिनमें विक्रेता, सप्लायर, सफाई कर्मी और सुरक्षा गार्ड शामिल हैं। इस आर्थिक लाभ को देखते हुए, नगरपालिका ने अगले वर्ष के लिए चाय स्टालों की संख्या में 20 प्रतिशत वृद्धि की योजना बनायी है।
भक्तों के बीच इस चाय के प्रति आकर्षण को देखते हुए, कई श्रद्धालु ने कहा कि थकान के बाद एक कप गरम चाय पीने से उनकी ऊर्जा पुनः बहाल हो जाती है और मन को शांति मिलती है। एक 45 वर्षीय कांवरी, जिसने पिछले दो वर्षों से इस यात्रा में भाग लिया है, ने कहा, “गंगा किनारे की ठंडी हवा और अदरक की खुशबू मिलकर एक अद्भुत अनुभव बनाती है; यह छोटी सी राहत ही हमारी यात्रा को संभव बनाती है।” इसी प्रकार, युवा छात्रों ने भी बताया कि चाय के बिना यात्रा की कठिनाइयाँ बढ़ जाती हैं, इसलिए उन्होंने अपने साथ अतिरिक्त कपों की व्यवस्था भी कर ली है।
उत्तर प्रदेश के सुलतानगंज श्रावणी मेले में पहले ही दिन लगभग एक लाख कप चाय बिकने की रिपोर्ट से यह पेय यात्रियों के लिए अत्यंत आवश्यक बन गया है।
स्थानीय प्रशासन ने साफ-सफाई मानकों को कड़ा करते हुए न केवल रिकॉर्ड बिजनेस देखा है, बल्कि क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण बूढ़ा तोड़कर भविष्य में
Insight: The surge to nearly 100,000 cups of tea on the fair’s opening day highlights the beverage’s logistical role in supporting large‑scale pilgrim movement. It also generates measurable revenue and temporary employment for local vendors and service providers.
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