कांग्रेस ने 1937 की कार्यसमिति के ऐतिहासिक निर्णयों को दोहराते हुए कहा कि राष्ट्रगान और वंदे मातरम पार्टी के लिए भावनात्मक मुद्दे हैं, न कि मात्र चुनावी हथियार। वेणुगोपाल ने कहा कि महात्मा गांधी, पंडित नेहरू और सरदार पटेल ने उस समय राष्ट्रीय गीतों को लेकर जो समझौता किया था, वह आज भी पार्टी की नीति है। यह निर्णय पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर वायरल हुए सोनिया गांधी के ‘वंदे मातरम’ वीडियो के बाद आया।
सोनिया गांधी द्वारा प्रकाशित वीडियो में उन्होंने वंदे मातरम के पूर्ण गीत गाए थे, जिससे विपक्षी दलों और कुछ दर्शकों में असंतोष उत्पन्न हुआ। कई राजनैतिक विश्लेषकों ने इसे ‘कम्युनिकेशन गैप’ कहा, जबकि कांग्रेस के भीतर यह चर्चा चल रही थी कि इस तरह के राष्ट्रीय गीतों को कैसे प्रस्तुत किया जाए। वीडियो के बाद कई समाचार चैनलों ने इस पर विशेष कार्यक्रम चलाए, जिससे मुद्दे की जटिलता बढ़ गई।
वेदरगोपाल ने बताया कि यह ‘कम्युनिकेशन गैप’ अब समाप्त हो चुका है और अब पार्टी पूरी तरह से 1937 की नीति पर अडिग रहेगी। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम और राष्ट्रगान को केवल भावनात्मक रूप से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। कांग्रेस के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने भी इस बात को दोहराया कि भविष्य में केवल दो छंद गाए जाएंगे, जिससे गीत की पवित्रता बनी रहे।
साथ ही, कांग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय से पार्टी के भीतर किसी भी प्रकार की असहमति नहीं होगी। पार्टी के प्रमुख कार्यकर्ता राजीव गुप्ता ने कहा कि सभी स्तरों पर इस नीति का पालन किया जाएगा और किसी भी विवाद को रोकने के लिए विशेष मार्गदर्शिकाएँ जारी की जाएँगी। उन्होंने यह भी बताया कि इस नीति को लागू करने के लिए एक विशेष समिति बनायी गयी है, जो सभी सार्वजनिक मंचों पर इस दिशा-निर्देशों का पालन सुनिश्चित करेगी।
बीजेपी ने इस कदम पर तीखा विरोध जताया और इसे ‘राजनीतिक दिखावा’ कहा। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि वंदे मातरम और राष्ट्रगान सभी भारतीयों के लिए समान भावनात्मक मूल्य रखते हैं, और उन्हें किसी भी पार्टी के लिये विशेष रूप से उपयोग नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की यह नीति केवल चुनावी लाभ के लिये बनाई गई है और इससे राष्ट्रीय एकता में बाधा उत्पन्न हो सकती है।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को अपने चुनावी रैली में उठाया। अंबेडकर राष्ट्रीय पार्टी (जैन) के अध्यक्ष ने कहा कि राष्ट्रीय गीतों को सीमित करना सांस्कृतिक विविधता के विरुद्ध है। कई सामाजिक संगठनों ने भी इस पर टिप्पणी की, कुछ ने इसे ‘इतिहास का पुनः प्रयोग’ कहा, जबकि अन्य ने इसे राष्ट्रीय भावना की सुरक्षा के रूप में सराहा।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखे तो इस निर्णय का कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिख रहा है। हालांकि, विज्ञापन उद्योग और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में संभावित बदलाव की आशंका है। राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीतों के उपयोग पर नई नीतियों की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे विज्ञापनदाता और आयोजकों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।
सामाजिक प्रभाव के संदर्भ में, इस कदम से विभिन्न वर्गों में प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न हो रही है। छात्र संघों ने इसे राष्ट्रीय गौरव की सुरक्षा माना, जबकि कुछ कलाकारों ने इसे रचनात्मक स्वतंत्रता के प्रति प्रतिबंध कहा। सामाजिक मीडिया पर इस विषय पर विभिन्न रायें उभरीं, जहाँ कई उपयोगकर्ताओं ने इस कदम को ‘जिम्मेदार’ कहा, जबकि अन्य ने इसे ‘राजनीतिक दबाव’ कहा।
राजनीतिक विश्लेषकों ने इस निर्णय को आगामी चुनावों के संदर्भ में देखा। कई विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस इस कदम से अपने कोर वोटर बेस को मजबूत
Updated: August 19, 2026
Summary: Congress has reaffirmed its 1937 policy to sing only the first two verses of “Vande Mataram,” framing it as a safeguard of national sentiment rather than a campaign gimmick, while opponents accuse the move of politicising a patriotic song. The decision, sparked by a viral Sonia Gandhi video, has drawn sharp criticism from rival parties and cultural groups, raising concerns over artistic freedom and event‑organiser costs.
By clamping “Vande Mataram” to a two‑verse rule, Congress turns a national anthem into a political safety‑net—re‑locking old party orthodoxy while sidestepping the very public debate that could have modernised its image. The move risks being read
Be First to Comment