लखीसराय: बिहार के लखीसराय स्थित प्रसिद्ध अशोक धाम मंदिर में हुई दर्दनाक भगदड़ को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। हादसे में श्रद्धालुओं की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की गई है। इसी बीच बांकीपुर से विधायक और जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर ने घटना को लेकर बिहार सरकार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। लखीसराय पहुंचकर घायलों और मृतकों के परिजनों से मुलाकात करने के बाद उन्होंने कहा कि केवल मुआवजा देकर इतनी बड़ी त्रासदी को समाप्त नहीं किया जा सकता। घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।
‘चार लाख देकर खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा’
प्रशांत किशोर ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी केवल मुआवजे की घोषणा करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उनके मुताबिक, सात लोगों की जान जाने जैसी गंभीर घटना में यह पता लगाना जरूरी है कि आखिर इतनी बड़ी भीड़ के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किए गए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि प्रशासन को पहले से पता था कि सावन के सोमवार को अशोक धाम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचेंगे, तो भीड़ नियंत्रण, बैरिकेडिंग, सुरक्षा व्यवस्था और आपातकालीन निकासी की पर्याप्त व्यवस्था क्यों नहीं की गई।
उन्होंने आरोप लगाया कि मुआवजा देकर पीड़ित परिवारों को शांत कराने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। प्रशांत किशोर के अनुसार, मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता मिलना जरूरी है, लेकिन उससे किसी की जान वापस नहीं आ सकती। इसलिए सरकार को हादसे की वास्तविक वजह की जांच कर यह तय करना चाहिए कि लापरवाही कहां हुई और उसके लिए कौन जिम्मेदार है।
घायलों से मिले प्रशांत किशोर
लखीसराय पहुंचे प्रशांत किशोर ने सदर अस्पताल जाकर भगदड़ में घायल श्रद्धालुओं से मुलाकात की और उनके स्वास्थ्य की जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने मृतकों के परिजनों से भी मुलाकात कर संवेदना व्यक्त की। इस दौरान उन्होंने इलाज की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि सरकारी अस्पताल में पर्याप्त इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण कुछ घायल मरीजों के परिजनों को उन्हें निजी अस्पतालों में ले जाना पड़ा।
प्रशांत किशोर ने दावा किया कि एक निजी नर्सिंग होम में कुछ घायल मरीजों को आईसीयू में भर्ती कराया गया है। उन्होंने कहा कि हादसे के बाद तत्काल चिकित्सा सुविधा और आपातकालीन प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए थी। उनके मुताबिक, ऐसी घटनाओं में शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं और प्रशासन को पहले से इसकी तैयारी रखनी चाहिए।
कैसे हुआ अशोक धाम में हादसा?
अशोक धाम मंदिर में सावन के तीसरे सोमवार को बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए पहुंचे थे। अधिकारियों के मुताबिक, उस समय अचानक श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ गई। रिपोर्टों में बताया गया है कि दो ट्रेनों के एक साथ आने से भीड़ में अचानक वृद्धि हुई। इसी बीच बिजली के खंभे से जुड़ी घटना और उससे फैली अफवाह के कारण लोगों में अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हो गई। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बैरिकेडिंग टूटने और लोगों के एक-दूसरे के ऊपर गिरने की बात भी कही है।
लखीसराय के जिलाधिकारी ने बताया कि बिजली के पोल से जुड़ी घटना के बाद यह अफवाह फैल गई कि बिजली गिर रही है। इससे श्रद्धालुओं में भय पैदा हुआ और भगदड़ की स्थिति बन गई। प्रशासन के अनुसार, घटना के पीछे अचानक बढ़ी भीड़ और अफरा-तफरी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
भीड़ प्रबंधन पर उठ रहे सवाल
इस हादसे ने बिहार में बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ प्रबंधन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सावन के सोमवार जैसे अवसरों पर मंदिरों में सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। ऐसे में प्रशासन को भीड़ के संभावित दबाव का अनुमान लगाकर प्रवेश और निकासी के अलग-अलग रास्ते, मजबूत बैरिकेडिंग, पर्याप्त पुलिस बल, मेडिकल टीम और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था करनी होती है।
अशोक धाम हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इन सभी व्यवस्थाओं का पर्याप्त इंतजाम किया गया था। यदि किया गया था तो फिर भीड़ अचानक नियंत्रण से बाहर कैसे हुई? और यदि व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी या विभाग की बनती है? इन्हीं सवालों का जवाब अब सरकार से मांगा जा रहा है।
‘जिम्मेदारी तय किए बिना न्याय अधूरा’
प्रशांत किशोर ने सरकार से मांग की कि हादसे की निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच में केवल घटना के तत्काल कारणों पर ही नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक तैयारी पर भी ध्यान दिया जाए। उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना के बावजूद सुरक्षा व्यवस्था में कोई कमी क्यों रह गई।
उनका कहना है कि किसी भी बड़े हादसे के बाद सिर्फ राहत राशि जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। यदि लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित विभाग के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। इससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने में मदद मिलेगी।
सरकार ने घोषित की आर्थिक सहायता
बिहार सरकार ने हादसे में जान गंवाने वाले श्रद्धालुओं के परिजनों को चार-चार लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। घटना के बाद प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य शुरू किया तथा घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। हादसे में कई श्रद्धालुओं के घायल होने की जानकारी सामने आई है।
हालांकि, राजनीतिक दलों की ओर से अब सरकार से केवल आर्थिक सहायता से आगे बढ़कर जवाबदेही तय करने की मांग की जा रही है। सीपीआईएम ने भी मुआवजे के अतिरिक्त सहायता, घायलों के इलाज और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है।
हादसे से प्रशासन के सामने बड़ी चुनौती
अशोक धाम की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिहार में बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ नियंत्रण को लेकर और अधिक प्रभावी रणनीति की जरूरत है। रेलवे स्टेशन, मंदिर परिसर और आसपास के रास्तों पर एक साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की आवाजाही होने पर अलग-अलग एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए प्रशासन को भीड़ की वास्तविक समय में निगरानी, पर्याप्त पुलिस बल, मेडिकल इमरजेंसी टीम, स्पष्ट प्रवेश-निकास मार्ग और अफवाहों पर तत्काल नियंत्रण जैसी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही किसी भी अप्रत्याशित घटना की स्थिति में श्रद्धालुओं को सुरक्षित तरीके से बाहर निकालने की योजना पहले से तैयार करनी होगी।
अब जांच और जवाबदेही पर नजर
अशोक धाम भगदड़ के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल अब यही है कि जांच का दायरा कितना व्यापक रखा जाता है। क्या केवल भगदड़ के तत्काल कारणों की जांच होगी या प्रशासनिक तैयारियों और भीड़ नियंत्रण की पूरी व्यवस्था की भी समीक्षा की जाएगी? प्रशांत किशोर ने सरकार से इसी व्यापक जवाबदेही की मांग की है।
हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के लिए चार लाख रुपये की सहायता तत्काल राहत जरूर है, लेकिन त्रासदी की जिम्मेदारी तय करना उससे अलग और जरूरी प्रक्रिया है। आने वाले दिनों में सरकार और प्रशासन की कार्रवाई यह तय करेगी कि इस घटना को केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा माना जाता है या इससे सबक लेते हुए व्यवस्था में ठोस बदलाव भी किए जाते हैं।
अशोक धाम भगदड़ ने बिहार में धार्मिक आयोजनों के दौरान भीड़ प्रबंधन और प्रशासनिक जवाबदेही को फिर बहस के केंद्र में ला दिया है। मुआवजा पीड़ित परिवारों को तत्काल आर्थिक सहारा दे सकता है, लेकिन भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हादसे के कारणों की पारदर्शी जांच और जिम्मेदारी तय करना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
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