पीरपैंती थर्मल पावर प्लांट की शुरुआत 2022 में राष्ट्रीय ऊर्जा नीति के हिस्से के रूप में की गई थी। इस परियोजना का लक्ष्य 1,320 MW की क्षमता के साथ बिहार की ऊर्जा आवश्यकता को पूर करने का है। प्रारंभिक चरण में 422 रैयतों की जमीन अधिग्रहित करने की योजना थी, जिसमें कृषि भूमि और आवासीय क्षेत्रों को शामिल किया गया था। परियोजना को पर्यावरणीय मंजूरी मिलने के बाद, जल स्रोत की उपलब्धता को लेकर कई प्रश्न उठे, विशेषकर गंगा नदी से जल ले जाने की तकनीकी और आर्थिक चुनौतियों को लेकर।
वर्षों से जल संसाधन की कमी और जल गुणवत्ता के मुद्दे इस परियोजना के मुख्य विवाद बिंदु रहे हैं। पिछले रिपोर्टों में बताया गया था कि प्लांट को 2 क्यूबिक मीटर/सेकंड पानी की आवश्यकता होगी, जिसके लिए गंगा से सीधे पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव रखा गया था। हालांकि, इस योजना को लागू करने में भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय प्रभाव, और स्थानीय समुदाय की स्वीकृति जैसी बाधाएँ थीं। इन समस्याओं को हल करने के लिए सरकार ने विशेष अधिसूचना जारी की, जिसमें जलापूर्ति के लिए वैकल्पिक मार्ग और अधिग्रहित भूमि की सीमा को पुनः निर्धारित किया गया।
अधिसूचना जारी होते ही कई रैयतों ने विरोध प्रदर्शन किया, यह दावा करते हुए कि उन्हें पर्याप्त पारिश्रमिक नहीं दिया गया था। स्थानीय प्रशासन ने तुरंत स्थिति को शांत करने के लिए कई मीटिंगें आयोजित कीं। पुलिस ने सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था स्थापित की, जबकि प्रशासन ने प्रभावित परिवारों को वैकल्पिक आवास और पुनर्वास योजना प्रस्तुत की। इन प्रयासों के बावजूद, कुछ रैयतों ने भूमि की वैधता को लेकर कानूनी कदम उठाने का इरादा जाहिर किया।
प्लांट के मुख्य अनुबंधकर्ता, एनर्जी सॉल्यूशंस लिमिटेड, ने अधिसूचना के बाद अपने कार्यकाल को पुनः समायोजित करने की घोषणा की। कंपनी ने कहा कि जलापूर्ति के लिए गंगा से पाइपलाइन बिछाने की तकनीकी योजना को पुनः जांचा जाएगा और यदि आवश्यक हो तो वैकल्पिक जल स्रोतों का उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही, कंपनी ने रैयतों को उचित मुआवजा देने के लिए एक स्वतंत्र मूल्यांकन समिति स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
बिहार सरकार ने इस चरण को ऊर्जा सुरक्षा के साथ सामाजिक न्याय का संतुलन बनाने का अवसर बताया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जलापूर्ति के लिए गंगा जल का उपयोग राष्ट्रीय जल नीति के अनुरूप है, परन्तु स्थानीय हितों का ध्यान रखना अनिवार्य है। राज्य जल संसाधन विभाग ने भी इस निर्णय की पुष्टि की और कहा कि जलापूर्ति की योजना को पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप तैयार किया जाएगा।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने इस विकास को राष्ट्रीय ऊर्जा लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में सराहा। मंत्रालय ने कहा कि पीरपैंती थर्मल पावर प्लांट को जलापूर्ति की नई व्यवस्था के साथ जल्द ही संचालन में लाया जा सकता है, जिससे राज्य में बिजली की कमी दूर होगी। साथ ही, मंत्रालय ने जल उपयोग में दक्षता बढ़ाने के लिए तकनीकी सहायता प्रदान करने का आश्वासन दिया।
स्थानीय राजनीतिक दलों ने इस विकास को लेकर विभिन्न राय व्यक्त की। राष्ट्रीय जनता दल (राष्ट्रवादी) ने कहा कि जलापूर्ति के लिए गंगा जल का उपयोग उचित है, परन्तु जमीन अधिग्रहण में पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठाए। भारतीय जनता पार्टी ने कहा कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए इस परियोजना को आगे बढ़ाना आवश्यक है, परन्तु रैयतों के अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।
वाणिज्यिक संगठनों ने भी इस परियोजना के आर्थिक प्रभावों पर ध्यान दिया। बिहार उद्योग संघ ने कहा कि प्लांट के संचालन से स्थानीय उद्योग और रोजगार में वृद्धि होगी, परन्तु जल आपूर्ति की लागत को नियंत्रण में रखने के लिए सरकार को स्पष्ट नीतियां बनानी होंगी। कृषि संघ ने चेतावनी दी कि अगर जल निकासी सही तरीके से नहीं की गई तो खेती पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।
समाजशास्त्रियों ने कहा कि इस तरह की बड़ी ऊर्जा परियोजनाएं सामाजिक संरचना में बदलाव लाती हैं। उन्होंने बताया कि जल संसाधन के प्रबंधन में सामुदायिक भागीदारी आवश्यक है, जिससे सामाजिक असंतोष को कम किया जा सकता है।
Updated: August 23, 2026
The halt on acquiring 34.92 acres links the power‑plant’s water supply to Ganga resources, affecting project timelines and land‑owner compensation.
It also underscores the need to align large‑scale energy infrastructure with local water‑resource management and regulatory compliance.
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