ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी सैन्य अभियान को लेकर अमेरिका और उसके पारंपरिक यूरोपीय सहयोगियों के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ब्रिटेन और स्पेन की आलोचना करते हुए कहा कि वह “यूके से भी खुश नहीं हैं” और विशेष रूप से स्पेन को निशाने पर लेते हुए कड़े आर्थिक कदमों की चेतावनी दी। यह बयान ऐसे समय आया जब मध्य-पूर्व में तनाव लगातार बढ़ रहा है और पश्चिमी गठबंधन के भीतर रणनीतिक मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं।
व्हाइट हाउस में तीखा बयान
व्हाइट हाउस में जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिख मर्ज के साथ संयुक्त प्रेस वार्ता के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका को अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उन्होंने कहा कि कुछ यूरोपीय देश “स्पष्ट रुख लेने से बच रहे हैं” जबकि अमेरिका निर्णायक कार्रवाई कर रहा है।
ट्रंप ने सीधे तौर पर ब्रिटेन और स्पेन का नाम लेते हुए कहा कि सहयोग में देरी और सीमित समर्थन से अभियान की गति प्रभावित हुई। उनका यह बयान ट्रांस-अटलांटिक संबंधों में दरार का संकेत माना जा रहा है।
स्पेन पर सबसे कड़ा प्रहार
ट्रंप ने विशेष रूप से स्पेन की आलोचना की। उनका आरोप था कि स्पेन ने अपने सैन्य ठिकानों का उपयोग अमेरिकी हमलों के लिए करने की अनुमति देने से इनकार किया। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज़ की सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी सैन्य कार्रवाई में भागीदारी अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के सिद्धांतों के अनुरूप ही होगी।
रिपोर्टों के अनुसार, स्पेन ने अपने प्रमुख नौसैनिक अड्डों — रोता और मोरॉन — को ईरान के खिलाफ सीधे हमलों के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। ट्रंप ने इसे “अस्वीकार्य” बताते हुए कहा कि अमेरिका “स्पेन के साथ व्यापारिक संबंधों की समीक्षा” करेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि सहयोग नहीं मिला तो व्यापार पर प्रतिबंध जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।
स्पेन सरकार ने जवाब में कहा कि वह नाटो का प्रतिबद्ध सदस्य है, लेकिन हर देश को अपनी संप्रभुता और कानूनी दायित्वों के तहत निर्णय लेने का अधिकार है।
ब्रिटेन पर भी नाराज़गी
ट्रंप ने यह भी कहा कि वह “यूके से भी खुश नहीं हैं।” उनका इशारा उस देरी की ओर था, जब ब्रिटेन ने अमेरिकी विमानों को अपने ठिकानों के उपयोग की अनुमति देने में समय लिया। खासकर हिंद महासागर स्थित रणनीतिक अड्डा डिएगो गार्सिया चर्चा का केंद्र रहा।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने स्पष्ट किया कि उनका देश अंतरराष्ट्रीय कानून और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन अमेरिका का करीबी सहयोगी है, लेकिन हर सैन्य कार्रवाई का कानूनी मूल्यांकन आवश्यक है।
ट्रंप ने तीखी टिप्पणी करते हुए स्टार्मर की तुलना ऐतिहासिक नेता विंस्टन चर्चिल से की और कहा कि “आज का नेतृत्व वैसा नहीं है।” इस बयान ने ब्रिटेन की राजनीतिक हलकों में बहस छेड़ दी।
जर्मनी और यूरोप का संतुलित रुख
जर्मनी ने अपेक्षाकृत संतुलित रुख अपनाया है। चांसलर फ्रेडरिख मर्ज ने कहा कि जर्मनी अमेरिका की सुरक्षा चिंताओं को समझता है, लेकिन यूरोप में किसी भी सैन्य कदम के लिए संसदीय स्वीकृति आवश्यक है। उन्होंने कूटनीतिक समाधान पर भी बल दिया।
यूरोपीय संघ के भीतर भी इस मुद्दे पर एकरूपता नहीं दिखी। कुछ देशों ने अमेरिका का समर्थन किया, जबकि अन्य ने ईरान पर हमलों को क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाने वाला कदम बताया। विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति यूरोप की “रणनीतिक स्वायत्तता” की बहस को फिर तेज कर सकती है।
व्यापारिक तनाव की आशंका
ट्रंप द्वारा व्यापारिक संबंधों की समीक्षा की चेतावनी ने आर्थिक हलकों में चिंता बढ़ा दी है। स्पेन और अमेरिका के बीच कृषि, फार्मास्यूटिकल और रक्षा क्षेत्रों में महत्वपूर्ण व्यापार होता है। यदि अमेरिका कोई कठोर कदम उठाता है तो उसका असर व्यापक यूरोपीय संघ–अमेरिका व्यापार पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक यूरोपीय देश पर एकतरफा व्यापार प्रतिबंध लगाना कानूनी और कूटनीतिक रूप से जटिल होगा, क्योंकि व्यापार समझौते प्रायः यूरोपीय संघ स्तर पर होते हैं।
नाटो के भीतर बढ़ती दरार?
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब नाटो पहले ही रक्षा व्यय और रणनीतिक प्राथमिकताओं को लेकर बहस से गुजर रहा है। ट्रंप लंबे समय से यूरोपीय देशों से रक्षा बजट बढ़ाने की मांग करते रहे हैं। स्पेन पर उन्होंने आरोप लगाया कि वह रक्षा खर्च के लक्ष्य से पीछे है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो इससे नाटो की एकजुटता प्रभावित हो सकती है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य अस्थिर है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
स्पेन में सरकार ने ट्रंप के बयान को “अत्यधिक और अनुचित” बताया। वहीं ब्रिटेन में विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों ने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की बात कही। अमेरिका में भी कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति के सख्त रुख का समर्थन किया, जबकि अन्य ने सहयोगियों के साथ संवाद बढ़ाने की सलाह दी।
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