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नुवाकोट के बट्टार में त्रिशूली नदी बाढ़ से 309 शव निकले, 1,500 लापता

नेपाल के नुवाकोट जिले के बट्टार में स्थित ‘श्री नं. १ सैन्य प्रशिक्षण केंद्र’ की सीमाओं के भीतर 26 अगस्त की बाढ़ के बाद जो दृश्य उभर कर आया, वह लगभग एक मृत्युकालीन गलियारा (डेथ कॉरिडोर) की तरह दिख रहा था।
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तिब्बती सीमा से लेकर नारायणी नदी के संगम तक फैला यह 150 किलोमीटर लंबा खंड आजकल त्रिशूली नदी के जलधारा में बहते शवों और मलबे से भर चुका है। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि गुरुवार शाम तक 309 मृत शरीर निकाले जा चुके हैं, जबकि 1,500 से अधिक व्यक्ति अभी भी मलबे में लापता हैं। इस आपदा के कारण पूरे क्षेत्र में मानवीय संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है।बाढ़ से पहले त्रिशूली नदी का प्रवाह सामान्य था और आसपास के गाँवों में कृषि एवं मत्स्य पालन मुख्य जीवनयापन स्रोत थे। इस क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के कारण तेज़ी से बाढ़ की आवृत्ति बढ़ी थी, परन्तु 26 अगस्त की बाढ़ के तीव्रता में पहले के आँकड़े से कई गुना अधिक वृद्धि देखी गई। तिब्बती हिमनदों के पिघलने के साथ ही जलधारा में अचानक हुई वृद्धि ने निचले क्षेत्रों में स्थित बट्टार, सोल्कोट, और नारायणी सहित कई गांवों को बाढ़ के जल में डुबो दिया। इस अचानक उठते जल स्तर ने स्थानीय बुनियादी ढांचे को भी बुरी तरह क्षति पहुँचायी, जिससे कई पुल और सड़कों का उपयोग असंभव हो गया।बाढ़ के बाद स्थानीय बचाव दलों ने तुरंत ही राहत कार्य शुरू किया। सेना, पुलिस और नागरिक स्वयंसेवकों ने मिलकर प्रभावित क्षेत्रों में घुसपैठ की और बचे हुए लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में अस्थायी शिविर स्थापित कर भोजन, जल और चिकित्सा सहायता प्रदान की। हालांकि, बाढ़ के कारण बिचलित होने वाले जनसंख्या की संख्या बहुत अधिक होने के कारण राहत केंद्रों पर भी अत्यधिक दबाव बना हुआ है। कई परिवार अपने घरों को छोड़कर अस्थायी आश्रय में रहने के लिए मजबूर हुए हैं, जबकि कुछ ने अपने खोए हुए प्रियजनों की तलाश जारी रखी है।

प्रकाशन के समय तक त्रिशूली नदी के किनारे पर कई जगहों पर मृत शरीर बिखरे हुए मिले, जिनमें महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के शरीर भी शामिल हैं। स्थानीय निवासी बताते हैं कि बाढ़ के जल ने उनके घरों के दरवाजे तोड़ कर अंदर तक प्रवेश कर दिया, जिससे कई लोग अचानक जल में बह गए। कुछ क्षेत्रों में मलबे के नीचे फंसे लोगों को बचाने के लिए डाइविंग टीमों को भी तैनात किया गया है। स्थानीय अस्पतालों में चोटिल लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है, और कई मामलों में गंभीर जलजनित रोगों का खतरा भी मंडरा रहा है। चिकित्सा सुविधाओं की कमी के कारण कई घायल लोगों को निकटवर्ती शहरों में ले जाने की प्रक्रिया भी जारी है।

बाढ़ के बाद प्रभावित क्षेत्रों में कई सामाजिक संरचनाओं का क्षरण हुआ है। स्कूलों, बाजारों और स्वास्थ्य केंद्रों की इमारतें गंभीर रूप से नुकसानग्रस्त हैं, जिससे दैनिक जीवन के मूलभूत कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई है। स्थानीय प्रशासन ने बताया कि बाढ़ के बाद पुनः निर्माण कार्य के लिए विशेष बजट आवंटित किया जाएगा, परन्तु तत्काल राहत कार्य ही प्राथमिकता बना रहेगा। कई ग्रामीण परिवारों ने अपना सारा सम्पत्ति बाढ़ के जल में खो दिया है, और अब वे मौलिक जरूरतों को पूरा करने के लिए मदद की मांग कर रहे हैं। इस संकट ने क्षेत्रीय असमानताओं को भी उजागर कर दिया है, जहाँ कुछ समुदायों को अन्य की तुलना में अधिक समर्थन मिल रहा है।

बाढ़ के कारण प्रभावित क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों में भी ठहराव आया है। कृषि क्षेत्र में फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं और पशुधन भी बाढ़ के कारण मारा गया या भाग गया है। स्थानीय व्यापारियों ने बताया कि बाजार में वस्तुओं की उपलब्धता घट गई है और कीमतें आसमान छू रही हैं। इससे ग्रामीण आय पर सीधा असर पड़ा है और कई परिवारों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने तुरंत कृषि पुनर्वास योजना की घोषणा की है, परन्तु वास्तविक कार्यान्वयन में समय लग सकता है। इस बीच, कई परिवार अपने बची हुई वस्तुओं को बेचने के लिए मजबूर हैं, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ रहा है।

बाढ़ से प्रभावित लोगों के परिवारों ने स्थानीय प्रशासन और राष्ट्रीय स्तर पर तुरंत प्रतिक्रिया की माँग की है। कई परिजन अपने खोए हुए प्रियजनों की खोज में निरंतर प्रयास कर रहे हैं और उन्होंने सामाजिक मीडिया पर मदद की अपील की है। स्थानीय धार्मिक स्थलों में शोक समारोह आयोजित किए जा रहे हैं, जहाँ लोग मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। साथ ही, कई स्वयंसेवक समूह ने बचे हुए लोगों को भोजन और कपड़े प्रदान करने के लिए अपना सहयोग दिया है। इस मानवीय संकट के बीच, सामाजिक संगठनों ने आपसी सहयोग और एकजुटता की भावना को बढ़ावा दिया है।

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