राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार, हर 1,000 जनसंख्या पर कम से कम एक पूर्ण‑कालिक डॉक्टर की उपलब्धता अनिवार्य है, परन्तु बिहार में यह अनुपात लगभग 3,000 जनसंख्या पर एक डॉक्टर तक घट गया है। 2022 में स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस असंतुलन को सुधारने का लक्ष्य रखा था, लेकिन वर्तमान आंकड़े दिखाते हैं कि लक्ष्य से काफी दूर रहे हैं।
बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, राज्य के 1,200 से अधिक सरकारी अस्पतालों में कुल 7,500 चिकित्सक कार्यरत हैं, जबकि वार्षिक रोगी प्रवाह 30 मिलियन से अधिक है। इस असंगति के कारण कई विभागों में डॉक्टरों का कार्यभार अत्यधिक बढ़ गया है, जिससे उनका शारीरिक और मानसिक तनाव भी बढ़ रहा है।
पिछले साल के अंत में पटना के एक बड़े सरकारी अस्पताल में रोगी सूची में 250 से अधिक नाम दर्ज थे, जबकि उपलब्ध डॉक्टरों की संख्या केवल सात थी। इस परिदृश्य में डॉक्टरों को प्रत्येक रोगी को केवल दो‑तीन मिनट का समय देना पड़ता है, जिससे विस्तृत जांच‑परिचय और सही निदान संभव नहीं हो पाता।
समान परिस्थितियां दरभंगा, गयावर और भागलपुर के मुख्य अस्पतालों में भी देखी गईं। इन अस्पतालों में रोगी पंजीकरण के बाद प्रतीक्षा काल अक्सर दो घंटे से अधिक हो जाता है, और कुछ मामलों में रोगी को अपने लक्षणों का संक्षिप्त विवरण ही देना पड़ता है। इससे उपचार में त्रुटियों की संभावना बढ़ जाती है, विशेषकर जटिल बीमारियों में।
डॉक्टरों की कमी के अलावा, नर्सिंग स्टाफ और तकनीकी सहायक कर्मियों की भी कमी है, जिससे परीक्षण, दवा वितरण और फॉलो‑अप देखभाल में और देरी होती है। कई मामलों में रोगियों को निजी क्लीनिकों में उपचार के लिए भेजा जाता है, जिससे आर्थिक बोझ भी बढ़ जाता है।
राज्य स्वास्थ्य मंत्री ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार ने पिछले दो वर्षों में 1,200 अतिरिक्त डॉक्टरों को भर्ती करने का प्रयास किया है, लेकिन योग्य उम्मीदवारों की कमी और आवासीय सुविधाओं की अपर्याप्तता इस प्रक्रिया में बाधा बन रही है। उन्होंने बताया कि आगामी बजट में चिकित्सा कॉलेजों की संख्या बढ़ाने और ग्रामीण क्षेत्रों में टेली‑मेडिसिन को प्रोत्साहित करने की योजना है।
डॉक्टर संघ के प्रतिनिधि ने कहा कि वे सरकार से तत्काल उपायों की मांग कर रहे हैं, जिसमें अस्पतालों में डॉक्टर‑नर्स अनुपात को राष्ट्रीय मानकों के अनुसार सुधारा जाए। उन्होंने यह भी जोड़ते हुए कहा कि वर्तमान स्थिति में डॉक्टरों को बर्न‑आउट का खतरा है, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की दीर्घकालिक स्थिरता पर प्रश्न उठता है।
रोगी अधिकार संगठनों ने इस समस्या को सामाजिक न्याय के प्रश्न के रूप में उठाया है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण और कम आय वाले वर्ग के लोग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें निजी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच नहीं है। संगठनों ने सरकार से आपातकालीन उपाय जैसे मोबाइल क्लिनिक और अस्थायी हेल्थ कैम्प स्थापित करने की अपील की है।
आर्थिक दृष्टिकोण से यह स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि का कारण बन रही है। जब रोगी देर से उपचार पाते हैं तो जटिलताओं की संभावना बढ़ जाती है, जिससे अधिक महंगे उपचार और अस्पताल में भर्ती की जरूरत पड़ती है। इस प्रकार, प्राथमिक स्तर पर अनदेखी की गई स्वास्थ्य सेवाएँ दीर्घकालिक आर्थिक बोझ बन रही हैं।
सामाजिक प्रभाव भी व्यापक है; स्वास्थ्य सेवा की असमानता से शिक्षा और रोजगार में बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं। कई माता‑पिता अपने बच्चों की बीमारियों को लेकर स्कूल छोड़ देते हैं, और कामकाजी वर्ग को अनिवार्य रूप से कार्यस्थल से अनुपस्थिति बनानी पड़ती है, जिससे उत्पादन क्षमता घटती है।
राजनीतिक रूप से यह मुद्दा चुनावी मंचों पर भी प्रमुख बन गया है। विभिन्न विपक्षी पार्टियों ने बिहार सरकार पर स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार न करने का आरोप लगाया है, जबकि सरकार ने कहा कि वह इस दिशा में कई योजनाओं को कार्यान्वित कर रही है। आगामी विधानसभा चुनावों में इस विषय पर चर्चा बढ़ने की संभावना है।
स्वास्थ्य नीति विश्लेषक डॉ. अंशुल सिंह ने बताया कि डॉक्टर‑मरीज अनुपात में सुधार के लिए दीर्घकालिक रणनीति आवश्यक है। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य को सार्वजनिक‑निजी भागीदारी (PPP) मॉडल अपनाकर निजी क्लीनिकों को सरकारी अस्पतालों के साथ जोड़ना चाहिए, साथ ही टेली‑हेल्थ प्लेटफ़ॉर्म को विस्तृत रूप से लागू करना चाहिए, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषज्ञ परामर्श आसानी से मिल सके।
भविष्य में, यदि सरकार इस असंतुलन को समय पर नहीं सुधरती है, तो रोगी मृत्यु दर में वृद्धि
Updated: November 4, 2026
The draconian doctor‑to‑patient ratio is turning Bihar’s public hospitals into triage corridors, where rushed exams become a systemic fault line that will amplify diagnostic errors and burnout. If the gap isn’t closed now, the hidden cost will be a surge in preventable complications that erode public trust and cripple
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