पुल निर्माण का प्रस्ताव 2008 में दो राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के बीच समझौते के तहत आया था। प्रारम्भिक योजना में रेलवे और सड़क दोनों के लिये एकीकृत संरचना तैयार करने का इरादा था, जिससे घटकेसर गाँव को शहरी क्षेत्रों से जोड़ने में सुविधा होगी। इस परियोजना को राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना (NHDP) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया था और विशेष निधि आवंटन किया गया था।
परियोजना के प्रारम्भिक चरण में स्थानीय भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय मंजूरी में देरी हुई। कई किसान अपने खेतों को छोड़ने को तैयार नहीं थे, जिससे अधिग्रहण प्रक्रिया में कई बार रुकावटें आईं। इसके अतिरिक्त, जल निकासी और बाढ़ प्रबंधन के मुद्दों को सुलझाने में भी समय अधिक लगा, जिससे मूल कार्यकाल में चार साल की वृद्धि हुई।
2010 में कार्य प्रारम्भ हुआ, परन्तु प्रारम्भिक वर्ष में तकनीकी त्रुटियों और ठेकेदारों के बदलते क्रम ने काम को धीमा कर दिया। 2012 में प्रथम चरण के समाप्ति का लक्ष्य तय किया गया था, परन्तु निर्माण सामग्री की कमी और मौसम संबंधी बाधाओं ने इसे आगे बढ़ा दिया। इस दौरान, कई बार कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों का उल्लंघन भी दर्ज किया गया।
2014 में नई राज्य सरकार ने परियोजना को पुनर्जीवित करने का वादा किया और अतिरिक्त धनराशि प्रदान की। इसके तहत दो नई निर्माण कंपनियों को ठेका दिया गया, और कार्य गति बढ़ाने के लिये 24 घंटे निरंतर निर्माण का आदेश दिया गया। हालांकि, नई कंपनियों के बीच समन्वय की कमी और पुनः डिजाइन कार्य ने फिर से देरी का कारण बना।
2016 में पुल के आधे हिस्से का निर्माण पूरा होने की घोषणा हुई, परन्तु संरचनात्मक स्थिरता के परीक्षण में कई खामियां सामने आईं। विशेषज्ञों ने बताया कि मौजूदा डिजाइन में भूकंपीय प्रतिरोध पर्याप्त नहीं था, जिससे पुनः संशोधन आवश्यक हो गया। इस कारण से परियोजना की लागत में और 10 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ।
स्थानीय जनता ने इस देरी के खिलाफ कई बार प्रदर्शन किए। 2018 में गांव के प्रधान ने मीडिया को बताया कि रोज़ाना 50 मीटर की दूरी तय करने के लिये 4 किलोमीटर लंबी सड़कों से गुजरना पड़ता है, जिससे शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच कठिन हो रही है। ग्रामीणों ने राज्य सरकार से शीघ्र समाधान की मांग की।
राज्य के मुख्यमंत्री ने 2019 में सार्वजनिक सभा में कहा कि पुल का कार्य शीघ्रतम समय में पूर्ण होगा और अतिरिक्त बजट आवंटित किया गया है। उन्होंने कहा कि यह परियोजना न केवल यातायात को सुगम बनाएगी बल्कि क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी प्रोत्साहित करेगी। उन्होंने स्थानीय प्रशासन को कड़े समयसीमा का पालन करने का निर्देश दिया।
केंद्रीय सरकार ने भी इस मुद्दे पर ध्यान दिया और वित्तीय सहायता बढ़ाने का प्रस्ताव रखा। वित्त मंत्रालय ने कहा कि पुल का पूर्ण होना राष्ट्रीय परिवहन नेटवर्क की मजबूती के लिये आवश्यक है। इसके साथ ही, केंद्र ने एक स्वतंत्र ऑडिट टीम स्थापित करने का आदेश दिया, जिससे परियोजना की पारदर्शिता सुनिश्चित हो।
परियोजना की देरी के कारण स्थानीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान हुआ। बाजार तक पहुँचने में समय लगने से व्यापार का आयतन घट गया, और कई छोटे व्यवसायों को बंद होना पड़ा। इसके अलावा, शिक्षा संस्थानों के छात्रों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी, जिससे विद्यालय अनुपस्थिति बढ़ी। सामाजिक स्तर पर भी यह देरी तनाव का कारण बनी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पुल की देरी का मुख्य कारण प्रशासनिक असंगति और परियोजना प्रबंधन में कमी है। उन्होंने बताया कि कई सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी ने कार्य को जटिल बना दिया। इसके अलावा, बजट नियोजन में प्रारम्भिक अनुमान की त्रुटियों
A 700‑metre rail‑road bridge at Ghatekesar, slated in 2008 with a ₹35 crore budget, remains unfinished after 15 years, forcing villagers to detour four kilometres daily. Chronic land‑acquisition hurdles, design flaws, contractor changes and weak inter‑agency coordination have stalled the project, prompting local protests and renewed state and central funding commitments.
The 700‑metre rail‑road bridge at Ghatkesar is a key link in the National Highway Development Project, intended to connect the suburb directly to urban centres. Its prolonged incompletion forces residents to travel an extra four kilometres daily, affecting access to services.
Be First to Comment