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सुननी महल्लु फेडरेशन ने शेख अल‑हफिज़ के फ़ैसलों पर सार्वजनिक चेतावनी जारी की

सन् 2024 के मध्य में, सुन्नी महल्लु फेडरेशन (SMF) ने कान्थापुरम शेख अल-हफिज़ साहब के आलोचकों को सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी, जिसमें उन्होंने धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप को रोकने का अनुरोध किया।
यह बयान फेडरेशन की एक विशेष सभा में दिया गया, जहाँ उन्होंने कहा कि “धार्मिक विद्वान अपने अनुयायियों के लिए फ़ैसले जारी करते हैं और ऐसे फ़ैसले उन लोगों पर अनिवार्य नहीं होते जो उनका अनुसरण नहीं करते।” इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया और कई समाचार पोर्टलों ने इस विषय पर विस्तृत चर्चा शुरू कर दी, जिससे इस विवाद का दायरा राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच गया।कान्थापुरम शेख अल-हफिज़, जो भारतीय सुन्नी समुदाय के एक प्रमुख धार्मिक नेता हैं, को पिछले कई वर्षों से विभिन्न धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने मत व्यक्त करने के लिए जाना जाता है। उनका प्रभाव विशेष रूप से कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु के मुस्लमानों में गहरा है। 2022 में उन्होंने एक विवादास्पद फ़ैसला जारी किया, जिसमें उन्होंने कुछ धार्मिक अनुष्ठानों को प्रतिबंधित करने की बात कही थी, जिससे कई मुस्लिम संगठनों ने असहजता व्यक्त की। इस समय के बाद, शेख साहब के विरोधी समूहों ने उनकी वैधता और अधिकार को चुनौती देना शुरू किया, जिससे धार्मिक संवाद में तनाव बढ़ा।

पिछले दो साल में, SMF ने कई बार शेख अल-हफिज़ के फ़ैसलों को सार्वजनिक रूप से समर्थन दिया और उन्हें मुस्लिम समुदाय में एकजुटता के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। फेडरेशन का कहना है कि उनका उद्देश्य मुस्लिम जनसंख्या को एकजुट रखना और बाहरी या आंतरिक दबावों से बचाना है। इस दिशा में उन्होंने कई कार्यक्रम आयोजित किए, जहाँ शेख साहब के विचारों को प्रमुखता दी गई और उनके अनुयायियों को उनके फ़ैसलों की पवित्रता का अहसास कराया गया। इस पृष्ठभूमि ने आज के बयान को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया।

फेडरेशन द्वारा जारी किए गए बयान में कई प्रमुख बिंदु उभरे। पहला, उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक फ़ैसले केवल उन लोगों के लिए हैं जो उस विद्वान के अनुयायी हैं, और इन्हें सभी मुस्लमानों पर थोपना अनुचित है। दूसरा, उन्होंने शेख साहब की आलोचनाओं को “धार्मिक मामलों में बाहरी हस्तक्षेप” के रूप में लेबल किया और इसे रोकने का आग्रह किया। तीसरा, उन्होंने यह कहा कि फेडरेशन सभी धार्मिक नेताओं के साथ संवाद करने के लिए तैयार है, लेकिन वह केवल सम्मानजनक और रचनात्मक चर्चा को स्वीकार करेगा। इस बयान में इन बिंदुओं को दोहराते हुए उन्होंने अपने अनुयायियों को शांति एवं एकता बनाए रखने का निर्देश भी दिया।

शेख अल-हफिज़ के समर्थकों ने इस बयान का स्वागत किया, यह कहते हुए कि यह फेडरेशन ने सही दिशा में कदम रखा है। कई स्थानीय मस्जिदों और धार्मिक स्कूलों के प्रमुखों ने इस बयान को “समुदाय में समरसता बनाए रखने की आवश्यकता” बताया। उन्होंने कहा कि धार्मिक फ़ैसले व्यक्तिगत विश्वास का हिस्सा हैं और इन्हें सार्वभौमिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता। इस बीच, शेख साहब के आलोचक, जो मुख्य रूप से युवा मुस्लमानों और कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलकर बने हैं, ने इस बयान को “धार्मिक अधिकारों का दमन” कहकर नकारा।

आलोचक समूह ने इस मुद्दे को सामाजिक न्याय के व्यापक संदर्भ में रखा। उन्होंने कहा कि धार्मिक नेताओं को सामाजिक परिवर्तन के लिये सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, न कि केवल पारंपरिक मान्यताओं को संरक्षित करना चाहिए। इस समूह के प्रमुख ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि “धार्मिक अधिकारों को सामाजिक अधिकारों के साथ संतुलित करना आवश्यक है,” और शेख अल-हफिज़ के फ़ैसलों को “आधुनिक भारत के मूल्यों के विरुद्ध” मानते हुए उन्हें चुनौती देने का इरादा जताया। उन्होंने यह भी कहा कि फेडरेशन का बयान “धार्मिक बहुलता को रोकने की कोशिश” है।

कान्थापुरम शेख अल-हफिज़ ने फेडरेशन के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को एकजुट करना और बाहरी राजनीतिक दबावों से बचाना है। उन्होंने अपने आधिकारिक बैनर पर लिखा कि “धर्म एक व्यक्तिगत चयन है, लेकिन जब वह समुदाय को प्रभावित करता है, तो जिम्मेदारी बढ़ती है।” शेख साहब ने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी बाहरी समूह के साथ संवाद करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते कि वह संवाद सम्मानजनक ढंग से हो। उन्होंने फेडरेशन को “धार्मिक स्वतंत्रता के संरक्षक” कहा और उनके समर्थन को “समुदाय की शक्ति” के रूप में सराहा।

केंद्र सरकार के धार्मिक मामलों के मंत्रालय ने इस विवाद पर तटस्थ स्वर में टिप्पणी की, यह कहते हुए कि “भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, जहाँ सभी धार्मिक संस्थाओं को स्वतंत्रता और जिम्मेदारी दोनों मिलती है।” उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी धार्मिक फ़ैसले को कानून के दायरे में आना चाहिए और यदि कोई फ़ैसला सामाजिक व्यवस्था को बाधित करता है तो उसका उचित कानूनी परिक्षण होना चाहिए।


The Sunni Mahallu Federation warned critics of Sheikh Al‑Hafiz to stop meddling in religious matters, stressing that fatwas apply only to his followers and urging respectful dialogue. The statement sparked nationwide debate, with supporters praising its call for communal harmony while opponents accuse it of stifling progressive religious voices.