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चारो और घोर अंधेरा छाया हुआ है। कही से भी रोशनी दिखायी नहीं दे रही है।

बिहार एक ऐसे चौहारे पर आकर खड़ा है जहां तय नहीं कर पा रहा है कि जाये तो जाये कहा और यही अनिर्णय वाली स्थिति बिहार के बुनियाद को हिला कर रख दिया है ।बिहार की राजनीति को 2007 से देख रहे हैं 2010 के विधानसभा चुनाव में भले ही राजद का सूपड़ा साफ हो गया था लेकिन नेता प्रतिपक्ष के रूप में अब्दुल बारी सिद्दीकी का विधानसभा में दिया गया ।
वह भाषण आज भी मुझे याद है जहां तक मेरी समझ है अब्दुलबारी सिद्दकी का बजट सत्र के दौरान नेता प्रतिपक्ष के रुप में दिया गया भाषण और नीतीश कुमार का सिद्दीकी के भाषण पर सरकार का जवाब इतना स्तरीय भाषण बिहार विधानसभा में शायद अब देखने को नहीं ।

वो धार फिर कभी नीतीश कुमार में देखने को नहीं मिला भरे सदन में अब्दुल बारी सिद्दीकी लगभग डेढ़ घंटे तक सरकार के एक एक निर्णय का बखिया उखेरते रहे और पूरा सदन चुपचाप सुनता रहा और इतना ही सारे रिजनल चैनल लाइव चलाता रहा और कल होकर अखबार के मुख्य पेज पर पूरा भाषण छपा था । भाषण के दौरान अब्दुल बारी सिद्दीकी ने एक शब्द का इस्तेमाल किया था रॉयल ब्लड जिसके सहारे नीतीश कुमार पर सीधा आरोप लगाया था कि किस तरीके से राज्य सरकार के नौकरी में और अधिकारियों के पोस्टिंग में कुर्मी जाति को मदद किया जा रहा है, प्रेस दिर्घा में बैठे सारे पत्रकार रॉयल ब्‍लड का मिनिंग क्या होगा इसको लेकर अगल बगल झांकने लगे थे ।

कुछ नहीं बदला है वही नीतीश हैं ,वही जदयू हैं, वही बीजेपी हैं, वही राजद है वही मांझी लेकिन आज बहस किस बात को लेकर हो रही है मैं ब्राह्मण नहीं ब्राह्मणवाद के खिलाफ हूं इस पर डिबेट करने के बजाय लोग सड़क पर उतर गये जीभ काटने पर पुरस्कार का एलान तक कर दिया है एक सप्ताह तक दोनों और से घृणा फैलाने कि पूरी कोशिश हुई गांव गांव में तनाव पैदा हो इसको लेकर गोलबंदी शुरु हो गयी।

ये बिहार का एक नया चेहरा है जहां बहस की कोई गुंजाइश नहीं है बस कैसे एक दूसरे के खिलाफ जहर उगले और समाज में तनाव और द्वेष पैदा हो हर राजनीति दल इसी में लगा हुआ है।

इसका परिणाम क्या हो रहा है मूल मुद्दा जिस पर चर्चा होनी चाहिए था जिसके सहारे सरकार पर दबाव बनाया जा सकता था सबके सब गौण होते जा रहे हैं।

इस प्रदेश में मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद 27 लोगों की आंखों में गंभीर संक्रमण हो गया, 15 मरीजों की आंखें निकलनी पड़ी विधानसभा चल रहा था लेकिन कही से कोई आवाज सुनाई दिया क्या ,शराबबंदी कानून को लेकर सुप्रीमकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का जो बयान आया उस बयान को लेकर कही कोई चर्चा हो रही है क्या, इसी तरह सरकार की जो बहाली नीति है इस पर कोई बात करने को भी तैयार है क्या ,किस तरीके से राज्य सरकार ने बिहार पुलिस और प्रशासनिक सेवा के कैडर को एक रणनीति के तहत खत्म कर दिया इस तरह के कई बुनियादी सवाल है विश्वविधालय में कुलपति के नियुक्ति का ही मामला हो कही कोई चर्चा हो रही है ।

जैसे जातिवादी राजनीति ने बिहार के बुनियाद को हिला दिया था इसी तरह धर्मवादी राजनीति ने बिहार के इमारत को ही गिरा दिया है 30 वर्षो से मानो बिहार एक जगह आकर ठहर सा गया है जहां से तय नहीं कर पा रहा है जाये तो जाये कहां । क्यों कि पूरी व्यवस्था राजनीति को बनाये रखने में लगी हुई है कही से कोई आवाज नहीं उठ रहा है सोशल मीडिया से बदलाव की उम्मीद की जा रही थी लेकिन बुनियादी सवालों के मामले में ये मुख्यधारा की मीडिया से भी आगे निकल गया है । ऐसे में बुनियादी सवालों की और जनता का ध्यान कैसे आकृष्ठ हो इसके लिए बड़े स्तर पर काम करने कि जरुरत नहीं है क्यों कि जिस बुनियाद पर बिहार अभी तक चल रहा था वो अब दरक चुका है ।

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