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कोविड टीकाकरण में पटना राप्ट्रीय स्तर पर 10 स्थान बरकरार

कोविड-19 टीकाकरण में पटना जिला ने न केवल बिहार प्रदेश में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल कर नया रिकॉर्ड कायम किया है। जिसका चरणबद्ध विवरण निम्नवत है-

1/ पूरे देश के 754 जिलों में पटना जिला का सर्वाधिक टीकाकरण में दसवां स्थान बरकरार है।
1/ मुंबई 8628757
2/बृहद मंगलूर 8326267
3/पुणे7111246
4/कोलकाता5288244
5/चेन्नई 4501791
6/अहमदाबाद4418468
7/थाणे 4176939
8/24 परगना3619551
9/हैदराबाद3538561
10/पटना3509731

2/ बिहार राज्य में टीकाकरण की सर्वाधिक प्रतिशतता (पहला एवं दूसरा दोनों डोज में) पटना नंबर वन जिला

पहला डोज
पटना 59.7%, भागलपुर 43.7%, पूर्णियां 40.9% शिवहर 40.2% नालंदा 39.5%

दूसरा डोज में भी सर्वाधिक प्रतिशतता
पटना 21%
शिवहर9.1%
नालंदा 8.8%
पूर्णिया 8.5%
भागलपुर 8.5%

टीकाकरण के पहला एवं दूसरा डोज की प्रतिशतता में पटना जिला की प्रतिशतता राज्य की प्रतिशतता से भी आगे।
पहला डोज
राज्य का 37.2%
पटना जिला का 59.7%
दूसरा डोज
राज्य का 7.3%
पटना जिला का 21%

3/ * 45 प्लस के टीकाकरण के पहले एवं दूसरे डोज में पटना जिला का राज्य स्तर पर पहला स्थान*

पहला डोज
पटना 66%
शिवहर 58.1%
नालंदा 53.6%
भागलपुर 17.3%
पूर्णिया 17.3%

45 प्लस के टीकाकरण के दूसरे डोज मे भी पटना जिला का पहला स्थान
पटना 32.2%
शिवहर 20.5%
नालंदा 17.8%
भागलपुर 17.3%
पूर्णिया17.3%

45 प्लस के टीकाकरण के पहला एवं दूसरा डोज मैं पटना जिला की प्रतिशतता राज्य से भी अधिक।
पहला डोज
राज्य का 46%
पटना जिला का 66%
45 प्लस का दूसरा डोज में
राज्य का 14%
पटना जिला का 32.2%

4/ 18 से 45 आयु वर्ग के व्यक्तियों के टीकाकरण के पहला एवं दूसरा दोनों ही डोज में राज्य स्तर पर पटना जिला का पहला स्थान

पहला डोज
पटना 51.2%
भागलपुर 36.73
सारण 32.2
पूर्णियां 31.06
पूर्वी चंपारण 30.88
18 से 45 आयु वर्ग के दूसरे डोज में पटना जिला का पहला स्थान
पटना 11.10%
पूर्वी चंपारण2.87%
पूर्णिया 2.61%
सारण2.57%
भागलपुर2.51%
18 से 45 आयु वर्ग के टीकाकरण के पहले एवं दूसरे डोज में पटना जिला की प्रतिशतता राज्य की प्रतिशतता से भी अधिक
पहला डोज
राज्य का 30.22%
पटना जिला का51.20%
द्वितीय डोज में
राज्य का 2.11%
पटना जिला का11.10%

5/ पटना शहर में शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य प्राप्त किया गया है। इसके तहत कूलर 1440613 व्यक्तियों का टीकाकरण किया गया जो लक्ष्य का 100.23% है।

जिला की महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए जिला अधिकारी डॉ चंद्रशेखर सिंह ने कर्मियों तथा जिला वासियों को बधाई दी है तथा दोगुने उत्साह से कार्य कर जिला को टीकाकरण से शत प्रतिशत आच्छादित करने को कहा है।

उक्त तमाम उपलब्धियों को प्राप्त करने हेतु जिलाधिकारी द्वारा लोगों की जरूरत एवं सुविधा को ध्यान में रखकर दूरदर्शी पहल करते हुए विशेष टीकाकरण केंद्र, 24×7 केंद्र की स्थापना, टीका एक्सप्रेस आदि शुरू किए गए तथा जिला वासियों एवं कर्मियों के समन्वित प्रयास से पटना जिला ने राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर अद्वितीय एवं अविस्मरणीय कीर्तिमान स्थापित किया है।

6/ विशेष टीकाकरण केंद्र
केंद्र की संख्या 17
टीकाकृत व्यक्ति 1004049
पहला डोज 729955
दूसरा डोज274094

7/24×7 केंद्र की स्थापना
ऐसे तीन केंद्र की स्थापना 6 जून को किया गया जिसका पटना वासी ने भरपूर फायदा उठाया तथा जिला प्रशासन की सुविधा एवं व्यवस्था की सराहना की।
24×7 के रूप में कार्यरत तीनों केंद्रों पर कुल 446700 व्यक्तियों को टीकाकृत किया गया जिसने फर्स्ट डोज 295 110 तथा सेकंड डोज 151590 है।
पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कंपलेक्स 187233
पाटलिपुत्रा अशोक 154324
पॉलिटेक्निक कॉलेज पाटलिपुत्रा 105143 है।

बाढ़ पीड़ितों को तत्काल राहत प्रदान करों।

किसानों को बाढ़ में नष्ट फसलों एवं घरों के धराषाई होनें के एवज में आर्थिक मुआवज दो। बाढ़ से निबटने की दीर्घकालीन योजना पर अमल करों। बिहार के बाढ़ पीड़ितों को राहत पहुँचाने में सरकार पूरी तरह विफल रही है। बेगुसराय, भागलपुर, कटिहार दरभंगा, पुर्वी, पष्चिमी चम्पारण जिलों से जो वीडियों एवं अन्य श्रोतो से सुचनाएँ प्राप्त हो रही हैं, वे मानवीय संवेदनाओं को विचलित करने वाली है।

बिहार सरकार की ओर से बाढ़ से निबटने एवं बाढ़ प्रभावित लोगों को अवासीयी सुविधाओं के साथ – साथ भोजन, शुद्ध पेयजल बीमारों को दबा, बच्चों को दूध उपलब्ध कराने के जो बड़े – बडे़ दावे किये जाते है, वह जमीनी स्तर पर कहीं दिखाई नहीं पड़ता है। बाढ़ पीड़ितों को भाग्य भरोसे छोड़ दिया गया है। खुद भाजपा के पटना से सांसद रामकृपाल यादव राहत सामग्रियों के बंदर बांट की बात कह रहे है।

एक तो राहत बाढ़ पीड़ितों तक पहुँच नही रहा है और जो पहुँच रहा है, वह भी भ्रष्टाचार की भेट चढ़ जाय तो इस तरह का प्रषासन किस काम का।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मॉ0) की बिहार राज्य कमिटी बिहार के तमाम पार्टी इकाइयों जिला कमिटीयों से बाढ़ पीड़ितों के हक में आवज उठाने एवं अपने स्तर से सम्भव सहायता प्रदान करने का आह्ावान करती है। पार्टी उन तमाम जिला इकाईयों का अभिन्दन करती है जिन्होनें बाढ़ पीड़ितों की दुर्दसा को सरकार के सामने लाया है और अपने स्तर से राहत प्रदान कर रहे है।

ऑनलाइन पोर्टल से आशा एवं आशा फैसिलिटेटर को ससमय भुगतान करने में बिहार को मिल रही सफलता

स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने शुक्रवार को यहां बताया कि अब बिहार भी आशा एवं आशा फैसिलिटेटर की प्रोत्साहन राशि ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से प्रदान करने वाले राज्यों में शामिल हो गया है। पहले आशा एवं आशा फैसिलिटेटर को अपने भुगतान के लिए कई प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता था, जिससे कई बार उन्हें कुछ महीने तक अपने भुगतान के लिए इंतजार करना पड़ता था। आशा कार्यकर्ताओं की इस समस्या को दूर करने के लिए बिहार सरकार ने दिसम्बर, 2020 से आश्विन पोर्टल की शुरुआत की। इस पोर्टल के माध्यम से अब आशा एवं आशा फैसिलिटेटर को न सिर्फ ससमय भुगतान हो रहा है, बल्कि वह अपने द्वारा की जा रही गतिविधियों का ब्यौरा भी पोर्टल पर फीड भी कर रही है।

श्री पांडेय ने बताया कि पहले आशा पिछले माह की 26 तारीख से वर्तमान माह की 25 तारीख तक किए गए कार्यों की प्रोत्साहन राशि का ब्यौरा भरती हैं। इसके बाद इसे आशा फैसिलिटेटर हस्ताक्षरित करती है। फिर सम्पूर्ण ब्यौरा माह के अंतिम कार्य दिवस यानी 30 या 31 तारीख तक आशा द्वारा आश्विन पोर्टल पर अपलोड किया जाता है। आशा दो तरह के कार्य करती हैं। पहला समुदाय आधारित एवं दूसरा संस्थान आधारित. दोनों स्तर पर अधिकतम 63 तरह की गतिविधियां होती हैं, जिसे एक आशा कर सकती है। यदि आशा द्वारा अपलोड की गई गतिविधियां सामुदायिक आधारित होती हैं, तो इसे संबंधित एएनएम 5 तारीख तक सत्यापित करती हैं। यदि गतिविधियां ब्लॉक या अनुमंडलीय फैसिलिटी स्तर की होती हैं तो इसे प्रखंड सामुदायिक उत्प्रेरक( बीसीएम) एवं जिला स्तरीय फैसिलिटी स्तर की गतिविधियां होने पर जिला सामुदायिक उत्प्रेरक(डीसीएम) सत्यापित करते हैं। इसके बाद संबंधित प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी आश्विन पोर्टल पर भरी गयी प्रोत्साहन राशि को सत्यापित कर राज्य स्तर पर भेज देते हैं। इस तरह प्रत्येक महीने के 12 तारीख तक पिछले माह में आशा एवं आशा फैसिलिटेटर द्वारा किए गए कार्यों का भुगतान सुनिश्चित हो जाता है।

श्री पांडेय ने बताया कि दिसम्बर, 2020 से अभी तक अश्विन पोर्टल से आशा एवं आशा फैसिलिटेटर को विगत माह तक 150 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन राशि की भुगतान की गई है, जो कि कुल देय प्रोत्साहन राशि का लगभग 94 फीसदी हैं। बिहार में फिलहाल 87699 आशा एवं 4261 आशा फैसिलिटेटर हैं। दिसम्बर, 2020 से पहले आशा को भुगतान मैन्युली किया जाता था, लेकिन आशा एवं आशा फैसिलिटेटर की इतनी बड़ी संख्या होने के कारण उनकी गतिविधियों का मैन्युली सत्यापन करने में कठिनाई होती थी, जिसके कारण उनका ससमय भुगतान नहीं हो पाता था, लेकिन आश्विन पोर्टल की शुरुआत होने से आशा एवं आशा फैसिलिटेटर की सभी गतिविधियों का पोर्टल के माध्यम से कम समय में सत्यापन हो रहा है। इससे भुगतान में आसानी हो रही है। आशा कार्यकर्ता उत्साहित हो अपने कार्य को और बेहतर तरीके से कर रही हैं।

एक गांव ऐसा जहां हिन्दू भी मुहर्रम मनाते हैं

बिहार के बांका जिले में एक गांव ऐसा भी है जहां एक भी घर मुस्लिम नहीं है फिर भी पूरा गांव बुराई पर अच्छाई की जीत , शहादत और कुर्बानी की प्रतीक #मुहर्रम पर्व पूरे धूमधाम से मनाता है हम बात कर रहे हैं बांका जिले के अमरपुर प्रखंड स्थित तारडीह गांव का जहां आज सुबह से ही पूरे गांव का नराजा बदला बदला सा दिख रहा है । पूरे गाँव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहने के बाबजूद वहाँ रह रहे हिन्दू परिवार पिछले कई वर्षों से मुहर्रम धूमधाम से मना रहे हैं l इस पर्व को मानाने की शुरुआत 1990 में अमरपुर विधानसभा से विधायक रहे स्व. माधो मण्डल के पिता ने की थी। तब से उनके बंशज इसे आज तक मनाते आ रहे हैं। माधो मण्डल के पुत्र शंकर मण्डल ने बताया कि उनके दादा जी को कोई संतान नहीं हो रही थी, तब उन्होंने मजार पर जाकर मन्नत मांगी और मन्नत पूरा होने पर इस पर्व की शुरुआत की गयी l इसमें ग्रामीणों का काफ़ी सहयोग मिलता है l इस पर्व में स्थानीय लोग मुस्लिम रीतिरिवाज के लिये गाँव में एक भी मुस्लिम परिवार नहीं रहने के कारण दूसरे गाँव से मौलवी को बुलाकर परम्परा का निर्वहन करते हैं l

सुबह से ही तारडीह वाले गाँव से पांच किलोमीटर दूर मुस्लिम आबादी बाले गाँव में जाकर पहलाम करते हैं एवं आपस में भाईचारा का संदेश देते हैं l हालांकि इस बार कोविड नियमों की वजह से जुलूस का आदेश नहीं मिलने के कारण शांतिपूर्ण तरीके से गाँव में ही पहलाम करेंगे lहलाकि बिहार के कई इलाकों में मुस्लिम इसी तरीके से गांव के गांव छठ पर्व करते हैं ।

नागेन्द्र जी की छुट्टी सुशील मोदी युग का अंत माना जा रहा है, 2020 में एनडीए सरकार गठन के बाद नागेन्द्र जी सबसे मजबूत केन्द्र के रुप में उभरे थे।

बिहार प्रदेश बीजेपी के संगठन महामंत्री नागेन्द्र जी का बिहार से छुट्टी बिहार बीजेपी में सुशील मोदी युग के समापन के रुप में देखा जा रहा है । 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरीके से बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व ने नंद किशोर यादव, प्रेम कुमार और सुशील मोदी को मंत्री पद से बाहर का रास्ता दिखाया, उसी दिन से यह कयास लगाये जाने लगा था कि भाजपा अब बिहार में सुशील मोदी के प्रभा-मंडल से बाहर निकलना चाहता है। लेकिन सुशील मोदी की पार्टी ,संगठन और विधायक पर इतनी मजबूत पकड़ है कि चाह करके भी केन्द्रीय नेतृत्व बहुत कुछ नहीं कर पा रहा है।

इस बात को लेकर सुशील मोदी के खिलाफ जो एक गुट तैयार किया जा रहा है, वो नागेन्द्र जी से खासे नराज चल रहे थे क्योंकि नागेन्द्र जी संघ और बीजेपी के बीच सेतू के पद पर थे। इसलिए बिहार बीजेपी के नेता बहुत कुछ कर नहीं पा रहे थे क्योंकि नागेन्द्र जी 2011 से प्रदेश के संगठन महामंत्री हैं और आज बीजेपी की केन्द्रीय नेतृत्व पार्टी के जिस नेता को मोदी के खिलाफ खड़ा करना चाह रही है, वो नागेन्द्र जी के प्रभामंडल के सामने टिक नहीं पा रहे थे ।

ऐसे में केन्द्रीय नेतृत्व नागेन्द्र जी को बिहार से बाहर किये बगैर सुशील मोदी युग को खत्म नहीं कर पा रहा थे, वहीं नागेन्द्र जी की संघ के अंदर ऐसी छवि थी कि सीधे सीधे इनको हटाया भी नहीं जा सकता था। इसलिए इन्हें बिहार और झारखंड का क्षेत्रीय महामंत्री नियुक्त किया गया और इनका मुख्यालय पटना से रांची बना दिया गया। फिर इनके जगह पर जिन्हें लाया गया है, वो नरेन्द्र मोदी के करीबी हैं और गुजरात से हैं। ऐसे में नागेन्द्र जी उंचे ओहदे पर होने के बावजूद बहुत कुछ कर नहीं पायेंगे।

मतलब, बिहार में बीजेपी सभी स्तर पर ऐसे पदाधिकारी और नेता का कद छोटा करने में लगी है, जिनका रिश्ता सुशील मोदी और नीतीश कुमार से है। ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि बीजेपी बिहार में चाहती क्या है? नीतीश के साथ सरकार में है और वहीं नीतीश सहजता से सरकार ना चला सकें, ये भी खेल हो रहा है। देखिए, आगे आगे होता है क्या, लेकिन इतना तय है कि अब बीजेपी नीतीश को शासन व्यवस्था चलाने में खुली छुट देने के मूड में नहीं है।

भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के परिवार भीख मांगने को हुए मजबूर

दुनिया जिसे जानती है भोजपुरी के शेक्सपियर के रूप में आज भी उसके परिजन बने हुए हैं _भिखारी भोजपुरी के शेक्सपियर भिखारी ठाकुर के नाम पर हजारों लोग अमीर बन गए आज भी भिखारी ठाकुर के परिजन फटेहाल स्थिति में किसी तरह अपना गुजर-बसर कर रहे हैं उनकी सुध लेने की फुर्सत ना राज्य सरकार को है और ना ही उन संस्थाओं को जो भिखारी ठाकुर के नाम पर प्रतिवर्ष लाखों करोड़ों के अनुदान प्राप्त करते हैं.

लोक संस्कृति के वाहक कवि व भोजपुरी के शेक्सपियर माने जाने वाले भिखारी ठाकुर का जयंती 18 दिसंबर को मनाई जाती है ।लेकिन क्या कोई यकीन कर सकता है कि भक्तिकालीन भक्त कवियों व रीत कालीन कवियों के संधि स्थल पर कैथी लिपि में कलम चलाकर फिर रामलीला, कृष्णलीला, विदेशिया, बेटी-बेचवा, गबरघिचोरहा, गीति नाट्य को अभिनीत करने वाले लोक कवि भोजपुरी के शेक्सपीयर भिखारी ठाकुर के परिवार चीथड़ो में जी रहा हो। देश ही नहीं विदेशों में भोजपुरी के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने वाले मल्लिक जी के परिवार गरीबी का दंश झेल रहा है। यह सच है कि उनके जयंति व पुण्यतिथि पर कुछ गणमान्य पहुंचते हैं, कार्यक्रम भी आयोजित होते हैं, लेकिन यह सब मात्र श्रद्धांजलि की औपचारिकता तक सिमट कर रह जाते हैं। न तो ऐसे किसी आयोजन में भिखरी ठाकुर के गांववासियों का दर्द सुना जाता है न ही उनके दर्द की दवा की प्रबंध की बात होती है।कुतुबपुर दियारा स्थित मल्लिक जी का खपरैल व छप्पर निर्मित जीर्ण-शीर्ण घर आज भी अपने जीर्णोद्धार की बाट जोह रहा है? यही से भिखारी ठाकुर ने काव्य सरिता प्रवाहित की थी और उनकी प्रसिद्धि की गूंज आज भी अंतरराष्ट्रीय मंच पर सुनाई पड़ रही है।

भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील आज भी अदद चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए भटक रहा,कोई सुधी तक नहीं लेने वाला.भिखारी ठाकुर के प्रपौत्र सुशील कुमार आज एक अदद चतुर्थ श्रेणी की नौकरी के लिए मारा-मारा फिर रहा है। दर्द भरी जुबान से सुशील बतातें हैं कि अगर फुआ और फुफा नहीं रहते तो शायद मैं एमए तक पढ़ाई नहीं कर पाता। रोटी की लड़ाई में मेरी पढ़ाई नेपथ्य में चली गई रहती। समहरणालय में चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी की नौकरी के लिए वे आवेदन किये हैं। पैनल सूची में नाम भी है, लेकिन एक साल बीत गए, भगवान जाने नौकरी कब मिलेगी। हाल यह है कि विभिन्न कार्यक्रमों में उन्हें एवं उनके परिजन को मंच तक नहीं बुलाया जाता है।जिस दीपक की लौ से समाज में व्याप्त कुरीतियों और सामयिक संमस्याओं को उजागर करने का महती प्रयास भिखारी ठाकुर ने किया उनकी लौ में आज कई लोग रोटियां सेंक रहे हैं, लेकिन दीपक तले अंधेरे की कहावत चरितार्थ है। दबी जुबान से दिल की बात बाहर आती है कि भिखारी ठाकुर के नाम पर कई लोग वृद्धा पेंशन एवं सुख सुविधा का लाभ उठा रहे हैं। परिवार को हरेक जरूरत की दरकार है। एक ओर जहां सुशील जीवकोपार्जन के लिए दर-दर भटक रहे हैं वहीं, उनकी पुत्रवधू व सुशील की मां गरीबी का दंश झेल रही है।

भिखरी ठाकुर के इकलौते पुत्र शीलानाथा ठाकुर थे। वे भिखारी ठाकुर के नाट्य मंडली व उनके कार्यक्रमों से कोई रूची नहीं थी। उनके तीन पुत्र राजेन्द्र ठाकुर, हीरालाल ठाकुर व दीनदयाल ठाकुर भिखारी की कला को जिन्दा रखे। नाटक मंडली बनाकर जगह-जगह कार्यक्रम करने लगे। लेकिन इसी बीच उनके बाबू जी गुजर गये। फिर पेट की आग तले वह संस्कार दब गई।अब तो राजेन्द्र ठाकुर भी नहीं रहे। फिलवक्त भिखारी ठाकुर के परिवार में उनके प्रपौत्र सुशील ठाकुर, राकेश ठाकुर, मुन्ना ठाकुर एवं इनकी पत्नी रहती है। जीर्ण-शीर्ण हालात में किसी तरह सत्ता व सरकार को कोसते जिंदगी जिये जा रहे हैं उनके परिजन.लोक साहित्य व संस्कृति के पुरोधा, भोजपुरी के शेक्सपीयर के गांव कुतुबपुर काश, स्थानीय सांसद व केन्द्रीय राज्य मंत्री रहे राजीव प्रताप रूढी के सांसद ग्राम योजना के तहत गोद में होता तो शायद पुरोधा के गांव को तारणहार की प्रतिक्षा नहीं होती। गंगा नदी नाव से उस पर छपरा से करीब 25 किलोमीटर दूर स्थित कुतुबपुर गांव आज भी अंधेरे तले है। कार्यक्रमों की रोशनी व राजनेताओं का आश्वासन उस गांव को रोशन नहीं कर सका। शायद श्रद्धांजलि सभा और सांस्कृतिक समारोह भी कुछ लोगों तक सीमट कर है। वरन्, सरकार दो फूल चढ़ाने में भी भिखारी ही रहा है। आस-पास दर्जनों गांव, हजारों की बस्ती, तीन पंचायतों में एक मात्र अपग्रेड हाईस्कूल। वह भी प्राथमिक विद्यालय से अपग्रेड हुआ है। प्रारंभिक शिक्षक और पढ़ाई हाईस्कूल तक। आगे की पढ़ाई के लिए नदी इस पर आना होता है। कुछ बच्चे तो आ जाते हैं, बच्चियां कहाँ जाये।

कुतुबपुर से सटे कोट्वापट्टी रामपुर, रायपुरा, बिंदगोवा व बड़हरा महाजी अन्य पंचायतें हैं। लोगों की जीविका का मुख्य आधार कृषि है। अब नदी इनके खेतों को निगलने लगी है। 75 फीसद भूमिखंड में सरयू, गंगा नदी का राग है। टापू सदृश गांव है। 2010 से निर्माणाधीन छपरा आरा पुल से कुछ उम्मीद जगी है, लेकिन फिलहाल नाव से आने-जाने की व्यवस्था है। अस्पताल है ही नहीं। बाढ़ की तबाही अलग से झेलना पड़ता है। प्रत्येक साल किसानों को परवल की खेती में बाढ़ आने पर लाखों-करोड़ों रूपयों का घाटा सहना पड़ता है। सुविधा के नाम पर इस गांव में पक्की सड़क तक नहीं है।छपरा- लोक कलाकार भिखारी ठाकुर जो समाज के न्यूनतम नाई वर्ग में पैदा हुए थे, वे अपनी नाटकों, गीतों एवं अन्य कला माध्यमों से समाज के हाशिये पर रहने वाले आम लोगों की व्यथा कथा का वर्णन किया है। अपनी प्रसिद्ध रचना विदेशिया में जिस नारी की विरह वर्णन एवं सामाजिक प्रताड़ना का उन्होंने सजीव चित्रण किया है। वही नारी आज साहित्यकारों एवं समाज विज्ञानियों के लिए स्त्री-विमर्श के रूप में चिन्तन एवं अध्यन का केन्द्र-बिन्दु बनी हुई है। भिखारी ठाकुर ने अपने नाटकों के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, विषमता, भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया। इस तरह उन्होंने देश के विशाल भेजपुरी क्षेत्र में नवजागरण का संदेश फैलाया। बेमेल-विवाह, नशापान, स्त्रियों का शोषण एवं दमन, संयुक्त परिवार के विघटन एवं गरीबी के खिलाफ वे जीवनपर्यन्त विभिन्न कला माध्यमों के द्वारा संघर्ष करते रहे। यही कारण है कि इस महान कलाकार की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। कभी महापंडित राहुल सांकृत्यायन के जिन्हें साहित्य का अनगढ़ हीरा एवं भोजपुरी का शेक्सपीयर कहा था उस भिखारी ठाकुर का जन्म सरण जिले के छपरा जिले के सदर प्रखंड के कुतुबपुर दियारा में 18 दिसंबर 1887 को हुआ को हुआ था। उनके पिता का नाम दलश्रृंगार ठाकुर एवं माता का नाम शिवकली देवी था। भिखारी ठाकुर निरक्षर थे, परंतु उनकी साहित्य-साधना बेमिसाल थी। रोजी-रोटी कमने के लिए वे पश्चिम बंगाल के मेदनीपुर नामक स्थान पर गये जहां बंगाल के जातरा पाटियों के द्वारा किये जा रहे रामलीला के मंचन से वे काफी प्रभावित हुए, और उससे प्रेरणा पाकर उन्होंने नाच पार्टी का गठन किया।लोक कलाकार भिखारी ठाकुर के समस्त साहित्य का संकलन अब तक पूरा नहीं हो सका है। बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना के पूर्व निदेशक प्रो0 डॉ0 वीरेन्द्र नारायण यादव के प्रयास से परिषद ने रचनाओं का एक संकलन भिखारी ठाकुर ग्रंथावली के नाम से प्रकाशित किया है, परंतु अभी भी उनके लिए बहुत कुछ किये जाना बाकी है। विभिन्न विश्वविद्यालयों में उनपर शोध-कार्य चल रहे हैं। कई पुस्तकें भी उनसे प्रकाशित हुई है।

जदयू के प्रदेश कार्यालय में प्रत्येक सप्ताह के 4 दिन विभिन्न विभागों के मंत्री गण करेंगे जनसुनवाई…उमेश सिंह कुशवाहा

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने एक बयान जारी कर कहा है कि नीतीश सरकार के विकास कार्यक्रमों को तेज गति से लागू करने और जनसमस्याओं को त्वरित समाधान करने के लिए पार्टी के प्रदेश कार्यालय में अगले सप्ताह से विभिन्न विभागों के मंत्री गण पार्टी कार्यालय में उपस्थित होकर जन समस्याओं की सुनवाई करेंगे इसके तहत प्रत्येक महीने के प्रत्येक सप्ताह में 4 दिन बिहार सरकार के विभिन्न विभागों के मंत्री गण जदयू के प्रदेश कार्यालय में उपस्थित रहेंगे और इस दौरान प्रत्येक सप्ताह के मंगलवार बुधवार गुरुवार और शुक्रवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं एवं अन्य लोगों से संवाद स्थापित करने एवं उनकी समस्याओं को सुनकर उनके निराकरण हेतु बिहार सरकार के विभिन्न विभागों के मंत्रीगण निर्धारित तिथि और समय पर उपस्थित रहेंगे।

इसके लिए बिहार सरकार के सभी माननीय मंत्रियों को पत्र लिखकर सूचित कर दिया गया है ताकि निर्धारित तिथि और समय पर सभी माननीय गण प्रदेश कार्यालय में उपस्थित रह सकें उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि इस कार्यक्रम के तहत निर्धारित तिथि के दिन 11:30 बजे से तीन विभागों के माननीय मंत्री पार्टी के प्रदेश कार्यालय में उपस्थित रहेंगे उन्होंने बताया कि इसको लेकर माननीय मंत्रियों की कार्यक्रमों की सूची जारी कर दी गई है इसके तहत प्रत्येक मंगलवार को दिन के 11:30 बजे से शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी खान एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के मंत्री लेसी सिंह और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री जमा खाँ उपस्थित रहेंगे वही बुधवार को दिन के 11:30 बजे दिन से ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार मध निषेध उत्पाद एवं निबंधन विभाग के मंत्री सुनील कुमार और ग्रामीण कार्य विभाग के मंत्री जयंत राज उपस्थित रहेंगे जबकि गुरुवार को दिन के 11:00 बजे से ऊर्जा विभाग तथा योजना एवं विकास विभाग के मंत्री विजेंद्र यादव परिवहन मंत्री श्रीमती शीला कुमारी और समाज कल्याण विभाग के मंत्री मदन सहनी उपस्थित रहेंगे उसके बाद सप्ताह के शुक्रवार को दिन के 11:30 बजे से भवन निर्माण मंत्री अशोक चौधरी जल संसाधन विभाग तथा सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री संजय कुमार झा और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के मंत्री सुमित कुमार उपस्थित रहेंगे।

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि बिहार सरकार के मंत्रियों की उपस्थिति में जन समस्याओं की सुनवाई की जाएगी उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ आम आदमी अपनी जन समस्याओं को माननीय मंत्री के समक्ष रख सकेंगे ताकि जन समस्याओं का त्वरित गति समाधान की जा सके इसके साथ ही माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में जो बिहार में विकास कार्यक्रमों को चलाया जा रहा है उसका लाभ जन-जन तक पहुंचाई जा सके उमेश सिंह कुशवाहा ने कहा कि जदयू के प्रदेश कार्यालय में माननीय मंत्रियों की उपस्थिति से बिहार में विकास की गति को तेज करने में सफलता मिलेगी इसी उद्देश्य से इस कार्यक्रम की शुरुआत की जा रही है उन्होंने बताया कि माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दिशा निर्देश में पार्टी कार्यालय में विभिन्न विभाग के माननीय मंत्रियों उपस्थिति को सुनिश्चित करने का फैसला किया गया है और इस कार्यक्रम के जरिए बिहार के विकास में तेजी लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

पंचायत चुनाव में प्रत्याशी आंन लाइन कर सकते हैं नांमकन

कोरोना को देखते हुए आयोग ने लिया निर्णय 24 सितंबर को है पहले चरण का मतदान, पंचायत चुनाव में प्रत्याशी आंन लाइन कर सकते हैं नांमकन

पंचायत चुनाव की घोषणा हो गई है। इसबार 11 चरणों में चुनाव होंगे। पहली बार पंचायत चुनाव के दौरान नामांकन प्रक्रिया पर विशेष जोर दिया गया और चुनाव में पहली बार आनलाइन आवेदन भी स्वीकार किया जायेगा । इसके लिए http://sec.bihar.gov.in साइट का इस्तेमाल किया जा सकता है।

इस बार छह पदों के लिए चुनाव होगा। इसमें से चार पद का चुनाव ईवीएम तथा दो पद का चुनाव बैलेट पेपर से होगा। इवीएम से जिला परिषद, ग्राम पंचायत मुखिया, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत के वार्ड सदस्य का चुनाव होगा। बैलेट पेपर से सरपंच और पंच का चुनाव होगा।

इसबार 11 चरणों में होगा चुनाव मंगलवार को कैबिनेट ने बिहार पंचायत चुनाव का ऐलान कर दिया। इसबार 11 चरणों में वोट डाले जाएंगे। 24 सितंबर को पहले चरण का चुनाव होगा। इसके बाद 29 सितंबर, 8 अक्टूबर, 20 अक्टूबर, 24 अक्टूबर, 3 नवंबर, 15 नवंबर, 24 नवंबर, 8 दिसंबर और 12 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। बाढ़ को लेकर पंचायत चुनाव टलने की आशंका जताई जा रही थी। पहले चरण में उन जिलों में वोटिंग होगी जहां बाढ़ का असर कम है। इसके बाद अन्य जिलों में चुनाव कराए जाएंगे।

राज्य सरकार का बड़ा फैसला बीपीएससी से बहाल होंगे 45892 प्रधान शिक्षक व प्रधानाध्यापक, प्रभारी प्रिसपल युग का होगा अंत

राज्य के प्राथमिक व उच्च माध्यमिक विद्यालयों में 45 हजार 892 हेडमास्टरों की कमीशन से सीधी नियुक्ति होगी। इनमें 40558 पद प्राथमिक स्कूलों के प्रधान शिक्षकों की जबकि 5334 प्रधानाध्यापक के पद उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालयों के होंगे। शिक्षा विभाग के प्रधान शिक्षक व प्रधानाध्यापकों की नियुक्ति व सेवाशर्त नियमावली-2021 के दो अलग-अलग प्रस्तावों को मंगलवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में मंजूरी दी गई। शिक्षा मंत्री विजय कुमार चौधरी ने बताया कि बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) इन पदों पर नियुक्ति के लिए सीधी भर्ती की प्रतियोगिता परीक्षा आयोजित करेगा। खास बात यह है कि प्राथमिक स्कूलों में पहली बार प्रधान शिक्षक नियुक्त किये जायेंगे। अबतक ऐसे स्कूलों में सबसे वरीय शिक्षक विद्यालय का संचालन करते थे।

पंचायती राज विभाग की अधिसूचना के अनुसार राज्य में पंचायत चुनाव 11 चरण में होंगे

पंचायती राज विभाग की अधिसूचना के अनुसार राज्य में पंचायत चुनाव 11 चरण में होंगे

24 सितंबर 29 सितंबर 8 अक्टूबर 20 अक्टूबर 24 अक्टूबर 3 नवंबर 15 नवंबर 24 नवंबर 29 नवंबर 8 दिसंबर और 12 दिसंबर को मतदान संपन्न हो जाएगा

बाढ़ से बिहार का हाल बेहाल

सीएम ने किया हवाई सर्वेक्षण एनडीआरएफ के हवाले हुआ तीन जिले ,बाढ़ प्रभावित प्रति परिवार को मिलेगा 6000हजार रुपया ,राहत शिविर में जन्म लेने वाली बेटी को राज्य सरकार देगी 15 हजार रुपया

मुख्यमंत्री श्नीतीश कुमार ने आज बाढ़ प्रभावित इलाकों का हवाई सर्वेक्षण किया एवं नवगछिया प्रखंड स्थित रामधारी इंटर स्तरीय उच्च विद्यालय, पकरा एवं गोपालपुर प्रखंड के उच्च विद्यालय, मकनपुर में बाढ़ राहत शिविरों का निरीक्षण किया। निरीक्षण के क्रम में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को आवश्यक दिषा-निर्देश दिए।

रामधारी इंटर स्तरीय उच्च विद्यालय के बाढ़ राहत शिविर के निरीक्षण के क्रम में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से बाढ़ राहत चिकित्सा शिविर, समुदायिक रसोई केंद्र, आंगनबाड़ी केंद्र द्वारा बाढ़ प्रभावित परिवारों के बच्चों को पढ़ाने की सुविधा आदि के संबंध में पूरी जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने बाढ़ राहत शिविर, पकरा के निरीक्षण के क्रम में आवासित लोगों से बातचीत की और उनकी समस्याओं से अवगत हुए।

निरीक्षण के दौरान जिलाधिकारी को निर्देश देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बाढ़ राहत शिविर का पूरा प्रबंधन ठीक रखें। उन्होंने कहा कि हवाई सर्वेक्षण के क्रम में हमने देखा है कि भागलपुर जिले में काफी संख्या में लोग बाढ़ से प्रभावित हुए हैं इसलिए जरूरत के मुताबिक राहत शिविरों की संख्या बढ़ायें ताकि प्रभावित लोगों को किसी प्रकार की कोई दिक्कत न हो। बाढ़ राहत षिविरों में लोगों की संख्या भी सीमित रखें ताकि लोगों को रहने में कोई असुविधा न हो।

पकरा बाढ़ राहत षिविर के निरीक्षण के पश्चात् मुख्यमंत्री गोपालपुर प्रखंड स्थित उच्च विद्यालय, मकनपुर बाढ़ राहत शिविर पहुॅचे। मुख्यमंत्री ने बाढ़ राहत शिविर में रह रहे लोगों से सामुदायिक रसोई में मिलने वाले भोजन के संबंध में जानकारी ली। बाढ़ राहत चिकित्सा शिविर, सामुदायिक रसोई आदि का जायजा लेने के बाद मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को कई जरूरी निर्देश दिए।

निरीक्षण के पष्चात पत्रकारों से बात करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि बाढ़ प्रभावित इलाकों का हम लगातार दौरा कर रहे हैं। इसके साथ ही स्थल निरीक्षण कर बाढ़ राहत षिविरों की स्थिति की भी जानकारी ले रहे हैं। हम प्रतिदिन बाढ़ प्रभावित इलाकों की स्थिति की जानकारी लेते रहते हैं और आवश्यक गाइडलाइन्स भी जारी किये जाते हैं। सभी प्रभावित लोगों को राहत मिले, इसके लिए हर जरूरी इंतजाम किये जा रहे हैं। राज्य सरकार की तरफ से बाढ़ प्रभावित प्रति परिवार को 6,000 रुपये की आर्थिक मदद दी जाती है। बाढ़ राहत शिविरों में सभी प्रभावित लोगों के आवासन, भोजन आदि का प्रबंध किया गया है। इसके अलावा गर्भवती महिलाओं का विशेष रूप से ख्याल रखा जा रहा है। राहत शिविरों में रह रहीं गर्भवती महिलाओं को बेटा होने पर 10 हजार रुपये और बेटी होने पर 15 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार के खजाने पर पहला हक आपदा पीड़ितों का है। राज्य सरकार की तरफ से प्रभावित लोगों को राहत देने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए जा रहे हैं।

इस अवसर पर सांसद श्री अजय कुमार मंडल, विधायक श्री गोपाल मंडल, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री दीपक कुमार, जल संसाधन विभाग के सचिव श्री संजीव कुमार हंस, आपदा प्रबंधन विभाग के विषेष कार्य पदाधिकारी श्री संजय अग्रवाल, आयुक्त भागलपुर प्रमंडल श्री प्रेम सिंह मीणा, आई0जी0 भागलपुर श्री सुजीत कुमार, जिलाधिकारी श्री सुब्रत कुमार सेन एवं नवगछिया के पुलिस अधीक्षक श्री सुशांत कुमार सरोज सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

लालू प्रसाद की अग्नि परीक्षा शुरु चारा घोटाले के सबसे बड़े मामले में बचाव पक्ष की और से दी गयी दलील

,डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये की हुई थी अवैध निकासी, लालू प्रसाद की अग्नि परीक्षा शुरु चारा घोटाले के सबसे बड़े मामले में बचाव पक्ष की और से दी गयी दलील। इस मामले में 108 आरोपी ट्रायल फेसकर रहे हैं ।

बिहार के बहुचर्चित चारा घोटाला (Fodder Scam) मामले में आज रांची के सीबीआइ कोर्ट में बचाव पक्ष की ओर से बहस शुरु हो गयी है आज अभियुक्त पूर्व आईएएस अधिकारी वो तत्कालीन वित्त सचिव डॉ फूल चंद सिंह के अधिवक्ता ने रखा पक्ष है इस मामले में अगली सुनवाई 19 अगस्त को होगी।चारा घोटाले के सबसे बड़े मामले RC 47A/96 में जिसमें डोरंडा कोषागार से 139.35 करोड़ रुपये की हुई थी अवैध निकासी ।इस मामले में 108 आरोपी ट्रायल फेसकर रहे हैं ।

इससे पहले सात अगस्‍त को अभियाेजन पक्ष की बहस पूरी कर ली गई थी। इस मामले में बिहार के पूर्व सीएम लालू प्रसाद, डॉ जगन्‍नाथ मिश्र, पूर्व सांसद जगदीश शर्मा समेत 110 लोगों को आरोपित बनाया गया था। इस मामले में आरोपित डॉ जगन्‍नाथ मिश्र समेत 37 आरोपितों का निधन हो चुका है। इस मामले में अभियोजन पक्ष ने 575 गवाहों के बयान दर्ज कराए थे। वहीं बचाव पक्ष की ओर से 27 आरोपितों की गवाही होनी है। इसके आधार पर बहस पूरी होगी। रांची के सिविल कोर्ट परिसर में स्थित सीबीआइ की विशेष कोर्ट में मामले की सुनवाई चल रही है।डोरंडा कोषागार (RC 47A/96) से अवैध निकासी मामले की सुनवाई विशेष कोर्ट में चल रही है। कोर्ट ने कहा था कि जो फिजिकल मोड में बहस करना चाहते हैं, वे अदालत में व्‍यक्तिगत रूप से उपस्थित हों। कोरोना गाइडलाइन के अनुरूप वे बहस कर सकते हैं। इस दौरान अधिकतम पांच लोग मौजूद रह सकते हैं। वहीं जो वर्चुअल मोड में बहस चाहते हैं वे कोर्ट की अनुमति ले लें। दस्‍तावेजों को देख लें और तब बहस करें। बहस के लिए दोनों विकल्‍प हैं। मालूम हो कि लालू प्रसाद समेत 77 आरोपितों ने फिजिकल कोर्ट शुरू होने तक सुनवाई टालने का आग्रह किया था। लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। बचाव पक्ष ने कहा था कि पिछले आदेश के आलोक में वे हाईकोर्ट जाएंगे। इसलिए उन्‍हें समय मिलना चाहिए लेकिन कोर्ट ने समय देने से साफ इनकार कर दिया। हालांकि अदालत ने इस मामले में प्रतिदिन सुनवाई का निर्णय लिया।

इस सुनवाई पर सब की नजर है क्यों कि लालू प्रसाद इन दिनों जमानत पर हैं लेकिन इस मामले में अगर सजा होती है तो उन्हें फिर जेल जाना पड़ सकता है। ऐसे में लालू के परिवार के साथ साथ बिहार की राजनीति के लिए डोरंडा कोषागार अवैध निकासी मामला काफी महत्वपूर्ण है ।

भोजपुरी अश्लील क्यों बन गई ?

वो साठ का दशक था,तब मनोरंजन के इतने साधन नहीं थे। ले-देकर दशहरा के समय दरभंगा और अयोध्या से आने वाली रामलीला मण्डली का आसरा था। कहीं से गाँव के खेलावन बाबा को पता चलता कि इस महीने गाँव में होने वाली यज्ञ में वृन्दावन से रासलीला मण्डली आ रही है,फिर तो उनके चेहरे की ख़ुशी देखते बनती थी।

इधर लोगो को यशादी-ब्याह के मौसम में आने वाली नाच और मेले-ठेले में होने वाली नौटकी का बड़ी जोर-शोर से इंतजार रहता था।

उधर गाँव के कुछ उत्साही सनूआ-मनूआ द्वारा दशहरा-
दीपावली में ड्रामा भी किया जाता था।

हां, गाँव-जवार में बिजली अभी ठीक से आई नहीं थी।

दूरदर्शन के दर्शन की कल्पना भी बेमानी थी। किसी गाँव में डेढ़ मीटर लम्बी रेडियो आ जाए तो आस-पास गाँव वाले साइकिल से सुनने पहुंच जाते थे।

तब भोजपुरी के पहले सुपरपस्टार भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता आसमान छू रही थी। छपरा से लेकर बंगाल और आसाम से लेकर आसनसोल तक वो जहाँ भी,जिस मौके पर जाते,वहाँ खुद-ब-खुद मेला लग जाता था।

उनके इंतजार में लोग ऊँगली पर दिन गिनना शुरू कर देते थे। उनका नाटक गबरघिचोर हो या गंगा स्नान, विदेसिया हो या बेटीबेचवा लोग हंसते-हंसते कब रोने लगते,किसी को कुछ पता नहीं चलता था।

“करी के गवनवा भवनवा में छोड़ी करs
अपने परइलs पुरूबवा बलमुआ..”

ये बच्चे-बच्चे को जबानी याद था। क्योंकि इन नाटकों के गीत महज गीत नहीं थे। इन नाटकों के संवाद महज संवाद नहीं थे।

वो मनोरंजन भी केवल मनोरंजन नहीं था,बल्कि वो मनोरंजन का सबसे उदात्त स्वरूप था, जहाँ भक्ति, प्रेम और वात्सल्य के साथ हास्य-व्यंग्य का उच्चस्तरीय स्तर मौजूद था।

जहाँ स्त्री विमर्श की गहन पड़ताल थी, तो सामाजिक- आर्थिक विसंगतियों पर एक साथ चोट की जा रही थी। कुल मिलाकर तब भिखारी सिर्फ एक कलाकार न होकर एक समाज-सुधारक की भूमिका में थे।

वही दौर था भिखारी के समकालीन छपरा के महेंदर मिसिर का। दोनों में खूब दोस्ती थी।

बच्चा-बच्चा जानता कि भिखारी खाली समय में अगर कुतुबपुर में नहीं हैं,तो वो पक्का मिश्रौलिया में होंगे। अपने समय के दो महान कलाकारों की इस गाढ़ी मित्रता की कल्पना मेरे जैसे कई संगीत के विद्यार्थियों के चित्त आनंदित करती है…

“अंगूरी के डसले बिया नगिनिया रे ए ननदी संइयाँ के बोला द..”

“भला कौन पूरबिया होगा भला जिसे इतना याद न होगा..” ?

लेकिन साहेब भिखारी-महेंदर मिसिर के बाद एक झटके में जमाना बदला। तब सिनेमा जवान हो रहा था। भोजपुरी में भी तमाम फिल्में बननें लगीं थी।

गाजीपुर के नाजिर हुसैन और गोपलगंज के चित्रगुप्त नें चित्रपट में ऐसा जादू उतारा कि आज भी वो फ़िल्में, वो संगीत मील का पत्थर हैं।

लेकिन हम इस लेख में मुम्बई और सिनेमा की बात नही करेंगे..क्योंकि तब गाँव में धड़ल्ले से नांच पार्टी खुल रहीं थीं।

हर जिले में ढोलक के साथ बीस जोड़ी झाल लेकर गवनई पार्टी वाले व्यास जी लोग आ गए थे। ये व्यास जी लोग “मोटकी गायकी” के व्यास कहे जाते थे।

ये व्यास लोग रात भर रामायण महाभारत की कथा को वर्तमान सन्दर्भों के साथ जोड़कर सुनाते। सवाल-जबाब का लम्बा-लम्बा प्रसङ्ग चलता। बिहार के गायत्री ठाकुर जब हवा में झाल लहरा के गाते…

“चलत डहरिया पीरा जाला पाँव रे
जोन्हीयो से दूर बा बलमुआ के गाँव रे…”

तो श्रोताओं के हाथ अपने आप जुड़ जाते थे, क्योंकि इस गीत में बलमुआ का मतलब उनके पतिदेव से नहीं, बल्कि ईश्वर से था।

इधर उनके जोड़ीदार बलिया यूपी के बिरेन्द्र सिंह ‘धुरान’ भी माथे पर पगड़ी बांध,मूँछों पर ताव देकर ललकारते…तो अस्सी साल के बूढों की बन्द पड़ी धमनियों का रक्त संचरण अपने आप बढ़ जाता।

ये जोड़ी पुरे भोजपुरिया जगत में प्रसिद्ध थी। इन दोनों के चाहने वालों की लिस्ट में टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार भी शामिल थे।

और इन गायत्री-धुरान नामक दो घरानों नें भोजपुरी को सैकड़ों गायक दिए..ये परम्परा आज वटवृक्ष का आकार ले चुकी है।

फिर आते हैं..भोजपुरी की मेहीनी परम्परा में..धीरे-धीरे समय बदला.. अस्सी का दशक आया…मुन्ना सिंह और नथुनी सिंह का,

भला कौन होगा,जिसे ये गाना याद न होगा ?

“जबसे सिपाही से भइले हवलदार हो
नथुनिए पर गोली मारे संइयाँ हमार हो..”

तब तब टेपरिकार्डर और आडियो कैसेट मार्किट में आ गए थे।
शहरों से निकलकर गाँव-गाँव इनकी पहुंच आसान हो गई थी।

उस समय कैसेट गायकों को बड़े ही सम्मान के साथ देखा जाता था। क्योंकि गायक बनना आसान नहीं था और कैसेट कलाकार बनना तो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि थी।

तब वीनस और टी-सीरीज जैसी म्यूजिक कम्पनियाँ कलाकारों को बुलाकर रिकॉर्डिंग करातीं थीं.

और ये म्यूजिक कम्पनियां उन्ही गायकों का कैसेट बनातीं थीं जिनकी आवाज में कुछ ख़ास होता था।

जिनको दो-चार हजार लोग जानते-पहचानते थे। शायद इसी वजह से जिस गायक का बाजार में कैसेट होता था, उसका मार्किट टाइट हो जाता था।

उसे फटाफट दूर-दूर से प्रोग्राम के ऑफर आने लगते थे। बाकी लोग उससे हड़कते थे, “अरेs मरदे कैसेट के कलाकार हवन…दूर रहा…”
.
उसी समय कुछ अच्छे गाने वाले हुए..बिहार में शारदा सिन्हा जी का गाना..

“पटना से बैदा बोलाई दs हो, नज़रा गइली गुईयाँ”

जब कुसुमावती चाची सुनतीं तो उनका चेहरा ऐसा खिल जाता,मानों किसी ने उनके दिल की बात कह दी हो…उसी दौर में भरत शर्मा व्यास जब गाते…

“कबले फिंची गवना के छाड़ी,हमके साड़ी चाहीं.”

तो छपरा जिला के रेवती गाँव में गवना करा के आई मनोहर बो अपने मनोहर को याद करके चार दिन तक खाना-पीना छोड़ देतीं।

वहीं नया-नया दहेज हीरो होंडा पाया सिमंगल का रजेसवा जब गांजा के बाद ताड़ी पीने में महारत हासिल कर लेता तो कहीं दूर हार्न से भरत शर्मा की आवाज आती..

“बन्हकी धराइल होंडा गाड़ी
हमार पिया मिलले जुआड़ी.”

फिर इन्हीं भरत शर्मा की ऊँगली थामकर निकले कुछ और गायक…जिनमे हमारे बलिया की शान मदन राय,गोपाल राय और रविन्द्र राजू जैसे गायक हैं…आज भी मेरे प्रिय गायक गोपाल राय गाते हैं…

“झुमका झुलनी चूड़ी कंगन हार बनववनी
उपरा से निचवा से तहके सजवनी
सोनरा के सगरो दोकान लेबु का हो
काहें खिसियाईल बाड़ू जान लेबू का हो..”

तो मन करता है कि इसी खरमास में कोई बढ़िया दिन देखकर बियाह कर ले और तब इस गाने की अगली लाइन सुनें…!

इसमें कोई शक नही है कि..आज भी भरत शर्मा के साथ-साथ मदन राय, गोपाल राय,विष्णु ओझा भोजपुरी के सर्वकालिक लोकप्रिय गायक हैं…कोई स्टार बने या बिगड़े..न इनका महत्व कभी कम हुआ,न ही होगा…आज भोजपुरी संगीत में जो कुछ भी सुंदर हैं..इन्हीं जैसे गायकों की देन है।

लेकिन आइये इधर..नब्बे का दशक बीत रहा था। ठीक उसी उसी समय एकदम लीक से हटकर एक और गायक कम नेता जी आ गए।

वो थे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में बीपीएड की पढ़ाई कर रहे मनोज तिवारी ‘मृदुल’..दो शैली यहाँ हो गयी भोजपुरी में…एक भरत शर्मा व्यास वाली शैली थी…दूसरी थी मनोज तिवारी वाली शैली.

शर्मा जी वाली शैली में अभी भी गायत्री ठाकुर और व्यास शैली का प्रभाव था.लेकिन मनोज तिवारी ने लीक बदल दिया…

“लल्लन संगे खीरा खाली सुनें प्रभुनाथ गाली
घायल मनोज से बुझाली बगलवाली जान मारेली..”

गायकी के इस नए अंदाज नें युवाओं के बीच धूम ही मचा दिया। धीरे-धीरे इसमें स्टेज पर लेडिज डांसर के संग नृत्य का तड़का भी दिया जाने लगा। और ये क्रम लम्बा चला।

फिर साहेब आ जातें है सीधे 2002 में… मार्केट में आडियो और वीसीआर को चुनौती देने के लिए आ गया सीडी कैसेट। अब हाल ये हुआ कि टाउन डिग्री कालेज से मेलेट्री साइंस में बीए करके गाँव के मनोजवा,करिमना चट्टी-चौराहे पर सीडी की दुकानें खोलने लगे।

यहां तक कि चट्टी के गुप्त रोग स्पेशलिस्ट सुखारी डाक्टर के मेडिकल स्टोर पर भी फ़िल्म सीडी मिलने लगी। जहाँ सुविधानुसार हर तरह की फिल्में यानी लाल,पिली,नीली किस्म की फिल्में आसानी से मिल जातीं थीं।

मुझे याद नहीं कि नानी का गेंहू बेचकर भाड़े पर मिथुन चक्रवर्तीया और सनी देवला की कितनी फिल्में देखीं होंगी।

तब जिनके यहाँ गाँव में पहली दफा सीडी आई थी, उनके यहाँ बिजली आते ही मेला लग जाता था। इस माहौल को ध्यान रखते हुए उस समय भोजपुरी की म्यूजिक कम्पनियों ने एक नया ट्रेंड निकाला…वो था भोजपुरी म्यूजिक वीडियो सीडी…!

टी सीरीज तब भी इस मामले में नम्बर एक थी।

उसने मनोज तिवारी के सुपरहिट एल्बम बगल वाली,सामने वाली, ऊपर वाली, नीचे वाली, पूरब के बेटा, सबका वीडियो बना डाला..!

फिर हुआ क्या कि लोग जिसे आज तक आडियो में सुनते थे..और कैसेट के रैपर पर छपे गायक को बड़े ध्यान से देर तक देखते थे.. लोग उसे वीडियो में नाँचते-और झूमते देखने लगे।

इसी चक्कर में टी-सीरीज ने भरत शर्मा और मदन राय के तमाम पुराने गीतों का इतना घटिया फिल्मांकन कर दिया,जिसकी कल्पना आप नहीं कर सकते हैं.. वो घटिया इस मामले में कि गाने का भाव कुछ और तो वीडियो में कुछ और दिखाया जाने लगा।

तब तक आँधी की तरह असम से आ गई कल्पना..

“एगो चुम्मा ले लs राजाजी.. बन जाई जतरा..”

बिहार के भूतपूर्व संस्कृति मंत्री बिनय बिहारी जी के इस गीत ने मार्केट में तहलका मचा दिया और करीब एक साल तक इस गीत का जबरदस्त प्रभाव रहा।

इसी क्रम में…डायमंड स्टार गुडडू रंगीला,सुपर स्टार राधेश्याम रसिया और सुनील छैला “बिहारी” को याद करने के लिये मुझे अलग से लिखना पड़ेगा।

लेकिन आतें हैं..जिला गाजीपुर के दिनेश लाल यादव “निरहुआ..” पर….

“बुढ़वा मलाई खाला बुढ़िया खाले लपसी
केहू से कम ना पतोहिया पिए पेपसी “

दिनेश लाल के इस खांटी नए अंदाज को जनता नें हाथो-हाथ लिया। फिर क्या था ? टी-सीरिज ने झट से इस मौके को लपका और मार्किट में आ गया उनका अगला एल्बम….
“निरहुआ सटल रहे”

इस कैसेट के आते ही समूचे भोजपुरिया जगत में धूम मच गई..और हाल ये हुआ कि कुछ दिन पहले महज कुछ हजार लेकर घूम-घूम बिरहा गाने वाले दिनेश लाल यादव रातों-रात स्टार हो गए।

ठीक उसी समय कुलांचे भरने लगा आरा जिला का एक और सीधा-साधा सा गायक। आज दुनिया उसको पवन सिंह के नाम से भले जानती है,लेकिन पवन अपने शुरुवाती दिनों में सबसे खास किस्म के गायक हुआ करते थे।

शायद ईश्वर की कृपा..कुछ ही सालों में पवन की आवाज में निखार और भाव आना शुरू हुआ और वो मार्किट में टी सीरिज से वीडियो सीडी लेकर आ गए..

“खा गइलs ओठलाली”..

एकदम आर्केस्ट्रा के अंदाज में.. मूंछो वाले दुबले-पतले पवन सिंह एक्टिंग और डांस के नाम पर दाएं और बाएं हाथ को हिलाते हुए..गाते कि..

“रहेलाs ओहि फेरा में बहुते बाड़ा बवाली..”

तो हम जैसे सात में पढ़ने वाले लड़कों को भी इस बेचारे गायक पर तरस आता.. लेकिन “निरहुआ सटल रहे” की ऊब के बाद पवन ने मार्केट में एक नए किस्म का टेस्ट दे दिया..उनका एल्बम तब बजाया जाता,जब लोग “निरहुआ सटल रहे” दो-चार बार सुनकर ऊब जाते..

उधर समय बदला निरहुआ स्टार होकर फिल्मों में चले गए मनोज तिवारी स्टार हो चुके थे.. एक के बाद एक उनकी फिल्में सुपरहिट हो रहीं थीं..तब तक पवन सिंह फिर आ गए..

“कमरिया करे लपालप लॉलीपॉप लागेलू”

ज़ाहिद अख़्तर के लिखे इस एक गीत ने मार्केट में धूम मचा ही दिया…सिर्फ राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये आज भी भोजपुरी का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है, जिस पर हमें समझ नहीं आता कि गर्व करें या शर्म करें…!

लेकिन ठीक इसी गीत से शुरु हुआ भोजपुरी संगीत का “पवन सिंह युग उर्फ़ लॉलीपॉप युग”….जो लगातार पांच साल तक अनवरत चला।

देखते ही देखते पवन ने म्यूजिक का ट्रेंड ही बदल दिया।

एकदम बम्बइया सालिड डीजे टाइप का म्यूजिक…और हर एल्बम में हर वर्ग के लिए हर किस्म के गाने गाए..

ये दौर ऐसा चला कि नवरात्र हो या सावन,होली हो या चैता। जहाँ भी जाइए बस पवन सिंह,नही तो पवन सिंह टाइप के गानें….

हाल ये हुआ कि भोजपुरी मने पवन सिंह हो गया।

पवन ने कुछ साल तक एकक्षत्र राज किया और झट से फिल्मों में मनोज तिवारी, निरहुआ के बाद तीसरे गायक अभिनेता हो गए औऱ उनकी फ़िल्म आई..

“रंगली चुनरिया तोहरे नाम”

इसके बाद पवन की स्टाइल में कुछ बाल गायक भी पैदा हुआ…जैसे कल्लू और सनिया….

“लगाई दिही चोलिया में हुक राजा जी…और ओही रे जगहिया दांते काट लिहले राजा जी”.. ये एक साल तक खूब बजा..!

जिसका असर ये हुआ कि बड़े-बड़े लोग अपने बेटे-बेटी को पढ़ाई छुड़ा के अश्लील गायक बनाने लगे। खेत बेचके एल्बम की शूटिंग होने लगी।

क्योंकि लोगों के दिलो में ये बात समा गयी कि एक बार बेटा चमक गया तो हम जीवन भर बैठकर खाएंगे।

इधर पवन के फिल्मों की तरफ जानें के बाद कुछ ही साल में आ गए सिवान के खेसारी लाल यादव…एकदम देशी अंदाज.. शादी ब्याह में औरतों के गाए जाने वाले गीतों की धुन…उन्हीं के अंदाज में।

बस जरा अश्लीलता की छौंक और गवनई का तड़का..

अब जो पवन सिंह ने भोजपुरी को धूम-धड़ाका और डीजे में बदल दिया था..उसे खेसारी लाल ने एकदम देहाती संगीत यानी झाल, ढोलक, बैंजो,क्लीयोरनेट वाले युग की तरफ़ मोड़ दिया..

इस मुड़ाव के बाद हुआ क्या कि पांच साल से रस-परिवर्तन खोज रही जनता ने इसे भी हाथों-हाथ ले लिया.

कौन ऐसा भोजपुरिया कोना होगा “संइयाँ अरब गइले ना” नहीं बजा होगा..”

कौन ऐसा रिक्शा, ठेला, जीप, बस, ट्रक वाला नही होगा जो खेसारी के गीतों से अपनी मेमोरी को फूल न कर लिया होगा..

इधर कुछ सालों में फिर समय बदला है..मनोज तिवारी, निरहुआ, पवन सिंह के बाद खेसारी लाल यादव,राकेश मिश्रा,रितेश पांडेय,कलुआ सब फिल्मी दुनिया के हीरो हो गए हैं।

और इस ट्रेंड नें स्ट्रगल कर रहे भोजपुरिया गायकों के दिमाग एक बात भर दिया कि “गायकी में हीट तो फिलिम में फीट” अब हर भोजपुरी गायक खुद को गायक नहीं हीरो मानने लगा है।

इधर आडियो गयावीडियो सीडी गया.. हाथों-हाथ आ गया स्मार्ट फोन.. पेनड्राइव, लैपटाप, डाऊनलोड और डिलीट।पन्द्रह सेकेंड के शॉर्ट्स वीडियोज और रील का जमाना..

इसी चक्कर में भोजपुरी की म्यूजिक इंडस्ट्री भी एकदम से बदल गयी है। कई छोटी म्यूजिक कम्पनियां बिक गयीं।

कारण बस ये कि आज हर जिले में एक दर्जन म्यूजिक कम्पनी हैं तो डेढ़ दर्जन रिकॉर्डिंग स्टूडियोम जिनमें हर जिले के हज़ारों भोजपुरी गायक गा रहे हैं, तो क़रीब लाख अभी रियाज कर रहें हैं।

हर गांव में पच्चीस गायक अभिनेता हैं.. जो एक घण्टे में हिट होकर मनोज,निरहुआ, पवन और खेसारी की तरह मोनालिसा के कमर में हाथ डालना चाहतें हैं।

इस हीरो बनने के चक्कर में इनके गाने सुनिए तो वो सीधे सम्भोग से शुरू होते हैं और सम्भोग पर ही आकर खत्म हो जातें हैं.. यानी “तेल लगा के मारम, त पीछे से फॉर देम, त तहरा चूल्हि में लवना लगा देम, त सकेत बा ए राजा अब ना जाइ.त खोलs की ढुकाइ….!

ये छोटी सी बानगी भर है…. यू ट्यूब खोलिये तब आपको पता चले कि जो जितना नीचे गिर सकता है.. उतना ही वो सुपरहिट है..

इसका बस एक ही कारण है..वो है “व्यूज”

आज भोजपुरी में सफलता का मानक मिलियन व्यूज बन गया है। किसका कौन सा गाना कितनी देर यू ट्यूब इंडिया की टाइम लाइन पर ट्रेडिंग में हैं.. ये तय कर रहा है।

किस गीत पर कितने मिलियन शॉर्ट्स वीडियोज और रील बन रहे हैं… ये कर रहा है।

और इस मिलियन व्यूज की सत्ता उन लोगों के हाथ मे चली गई है जो सामान्यतः अनपढ़ हैं..

इन्हें न भोजपुरी की लोक संस्कृति का ज्ञान है,न ही संस्कारों का…न ही अपने घर से डर है,न ही समाज से।

इनके लिए हर हाल में व्यूज महत्वपूर्ण है।

इस खेल में पहले सिर्फ टी सीरीज और वीनस थी,अब बड़े बड़े कारपोरेट इसमें कूद पड़े हैं। सबको हर हाल में व्यूज चाहिए।

इनको हर हफ़्ते गाने बनाने हैं…हर हफ्ते चैनल के इंगेजमेंट बढाने हैं..

तो हर हफ़्ते नया मसाला चाहिए…

इसलिए अब सारी बड़ी कंपनीयाँ उसी गीत-संगीत में पैसा लगाना चाहतीं हैं जो इंटरनेट पर जल्दी-जल्दी पापुलर हो जाए। जिसको अपना यू टयूब चैनल बड़ा करना है..उसकी जरूरत ये भोजपुरी स्टार पूरी करते हैं..

आज एक-एक गीत गाने के तीन से पाँच लाख रुपये मिल रहे हैं..

म्यूजिक कम्पनियो की चांदी का समय अब आया है।

इस कम्पटीशन में एक-एक गाने ने दस-दस लाख रुपये खर्च हो रहें हैं…

यू ट्यूब पर ताजा आया खेसारी का गीत “चाची के बाची” और “खेसरिया के बेटी” इसी व्यूज के भेड़ियाधसान से निकली एक घटना है।

भोजपुरी के एक लाख गायक जो स्टार बनने का सपना पाले हुए हैं.. वो यही काम कर रहें हैं..

व्यूज लाने के लिए कुछ भी गाने का काम..

जिसे सुनकर आप कहेंगे कि हाय ! ये महेंद्र मिसिर, भिखारी ठाकुर.. भरत शर्मा और शारदा सिन्हा मदन राय और गोपाल राय की भोजपुरी को क्या हो गया ?

लेकिन समाधान कैसे होगा ?

जी समाधान तो तब होगा,जब इन्हीं के अंदाज में इन्हीं के हथियारों से इन्हीं के खिलाफ इनसे लड़ा जाएगा..लेकिन लड़ाई होगी तो कैसे.. महज दो-चार लोग.. इन लाखों का सामना कैसे करेंगे..?

ये भी हो सकता था।

लेकिन कौन समझाने जाए,हर जनपद में बने उन भोजपुरी अस्मिता के तथाकथित संगठनों को,जिनमें दूर-दूर तक कहीं एकता नहीं है। कोई किसी के प्रयास को बर्दास्त नहीं कर सकता है।

दरअसल इनकी गलती भी नहीं है। भोजपुरी के नाम पर बने ये संगठन छठ घाट पर भोजपुरी की अस्मिता से ज्यादा व्यक्तिगत राजनीति चमकाने वाली दूकान बनकर रह गए हैं।

भोजपुरी बुद्धिजीवियों और भोजपुरीया अनपढ़ गायकों की संयुक्त मार से आहत है।

बुद्धिजीवी ये समझते हैं कि समस्त भोजपुरी बेल्ट की जनता उनकी तरह ही बुद्धिजीवी हैं..ये अनपढ़ ये समझते हैं..की सब लोग मूर्ख हैं… चाची के बाची में क्या बुराई है ?

अब चाची के बाची वालों ने अपनी बर्बादी की तरफ कदम रख दिया है।

लेकिन उनको रिप्लेस कौन करेगा… कैसे होगा ?

किसी को पता नहीं… ये अलग विषय है,जिस पर एक अलग से लेख लिखूँगा…

बस आपको और हमको..सबको मिलकर बेहतर और साफ़-सुथरा कंटेंट प्रमोट करना पड़ेगा..क्योंकि आज भी अच्छा सुनने वालों की कमी नहीं है…

वरना भोजपुरी तो अश्लीलता का पर्याय बन ही चुकी है…

आज नही तो कल, संविधान की आठवी अनुसूची में भी शामिल हो हो जाएगी,लेकिन फायदा क्या होगा जब भोजपुरी में भोजपुरी गायब हो जाएगी।शरीर से आत्मा ही निकल जाएगी.और रह जायेगा मृतक शरीर के रूप में अश्लीलता.सिर्फ अश्लीलता…!

( लेखक अनूप नारायण सिंह वरिष्ठ फिल्म पत्रकार व फिल्म सेंसर बोर्ड कोलकाता रीजन एडवाइजरी कमिटी के सदस्य हैं)

बिहार में खुल गया 8 वीं तक का स्कूल

आज बिहार में कक्षा 1 से 8 तक का स्कूल खुल गया है
कोरोना की दूसरी लहर के दौरान राज्य सरकार ने प्राथमिक विधालय से लेकर कॉलेज तक को बंद कर दिया था ।
कोरोना का लहर कमजोर पड़ने पर जुलाई में राज्य सरकार ने कॉलेज और 11 वीं तक की कक्षा को खोल दिया था और आज से कक्षा 1 से 8 वीं तक का स्कूल आज यानी 16 अगस्त से खुल गया । छोटे बच्चों के स्कूलों को लेकर सरकार ने सुरक्षा को लेकर विशेष सावधानी के निर्देश दिए हैं। नए आदेश के तहत बच्चों से शिक्षक की दूरी पर भी विशेष ध्यान देने को कहा गया है। बुक से लेकर बच्चों की अन्य पाठ्य सामग्री को हाथ लगाने से पहले शिक्षक को हैंड सैनिटाइजर का इस्तेमाल करना होगा।
जो भी स्कूल इस आदेश का अनुपालन नहीं करेगा उस पर कठोर कारवाई की जायेगी ।

संसद की कार्यशैली जिम्मेवार

संसद के कार्यशैली पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्यन्यायधीश ने उठाया सवाल कहा मुकदमे को लेकर कोर्ट पर दवाब संसद के कार्यशैली की वजह से बढ़ा है।

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सीजेआई एनवी रमना ने आज कहा है कि ‘ऐसा लगता है कि आज संसद में कानून बनाते समय गुणवत्ता वाली बहस का अभाव होता है। इससे बहुत सारी मुकदमेबाजी होती है और अदालतें गुणवत्तापूर्ण बहस के अभाव में नए कानून के पीछे की मंशा और उद्देश्य को समझ पाने में असमर्थ रहते हैं।’ जस्टिस रमना के मुताबिक ‘कानूनों में बहुत अस्पष्टता’ की वजह से मुकदमेबाजी को बढ़ावा मिला है, जिससे नागरिकों के साथ-साथ अदालतों और दूसरे संबंधित लोगों के लिए भी परेशानियां पैदा हुईं।

चीफ जस्टिस ने साफ शब्दों में कहा कि, ‘कानूनों में कोई स्पष्टता नहीं है। हम नहीं जानते कि कानूनों को किस उद्देश्य से बनाया गया है। इसके चलते ढेर सारी मुकदमेबाजी होती है, सरकार को परेशानी और नुकासन होता है, साथ ही साथ लोगों को भी परेशानी होती है। अगर सदनों में बुद्धिजीवी और वकील जैसे पेशेवर न हों तो यही होता है।’ जस्टिस रमना ने कहा कि आजादी के बाद संसद में बड़ी संख्या में वकील मौजूद होते थे और शायद इसी वजह से गुणवत्तापूर्ण बहस होते थे। उन्होंने कहा है कि ‘वकील समुदाय को फिर से सार्वजनिक जीवन में समर्पित होना चाहिए और संसदीय बहसों में बदलाव लाना चाहिए।’

२१वीं सदी में कहाँ खड़ा है बिहार ।

90 का वो दशक था जब मैं बड़ी हो रही थी और सक्रियता से अपने आस-पास के माहौल का अवलोकन कर रही थी। सरकारी उच्च विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में ना के बराबर कक्षाएं चल रही थी। इसलिए ‘अच्छे’ बच्चे उसमें जाना नहीं चाहते थे। आर्थिक वातावरण भी मंदा था। उच्च मध्यमवर्गीय एवं उच्चवर्गीय बच्चे उभरते हुए अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों (जिसमें काम चलाने योग्य शिक्षक कम वेतन पर पढ़ाते थे) में जाते थे। जो परिवार कर सकते थे, वो बच्चों के चलते किसी तरह आर्थिक जुगाड़ करके राज्य से बाहर भेजने की कोशिश में रहते थें। अपहरण के उस दौर में ऐसा करना उनके लिए मजबूरी भी थी जो भी थोड़ा बहुत कमाते थे। और इस तरह घर छूटने की शुरुआत हो जाती थी। हालांकि उस समय इसे स्टेटस सिंबल माना जाता था (लेकिन, बाद में समझ में आया कि अपने ही राज्य में अवसर क्यों नहीं उपलब्ध थे, चाहे अच्छी शिक्षा के लिए हो या काम के लिए)!


और, इस मामले में भी लड़का व लड़की में अंतर किया जाता था। सामान्यतः लड़कियां लड़कों से कमतर समझी जाती थीं। बेटा न हुआ तो उस परिवार को बेचारगी की दृष्टि से देखा जाता था। गुंडे-मवालियों का मन बढ़ जाता था और ऐसे परिवार (अगर तथाकथित पिछड़ी जाति के हों तो और मुश्किल) इजी टारगेट होते थे, चाहे वह आय का मामला हो या संपत्ति का।पुलिस-प्रशासन से भी कोई ज्यादा उम्मीद नहीं थी।
खैर बात हो रही थी अवसर की, बाहर भेजे जाने के मामले में भी लड़कियों को पीछे रखा जाता था क्योंकि लड़की को पराया धन माना जाता था और दहेज के लिए पैसे बचा कर रखने की प्रवृत्ति थी जो काफी हद तक अभी भी है। अगर कोई मध्यमवर्गीय परिवार असाधारण रूप से अपनी बेटी को बाहर पढ़ने के लिए भेजने की सोचता तो समाज के लोग कई तरह से समझाने लगते थे जैसे, बाहर जाएगी तो बिगड़ जाएगी, ज्यादा पढ़ लेगी तो उस योग्य वर मिलना मुश्किल हो जाएगा इत्यादि।

लड़का और लड़की में दूरी रखने को कहा जाता था अर्थात लड़के का दोस्त लड़का तथा लड़की की दोस्त लड़की होनी चाहिए। लड़कों से मेल-जोल पर परिवार की भौंहे चढ़े न चढ़े, पड़ोसियों की चढ़ जाती थी। जैसे जैसे लड़की बड़ी होती थी, घर के काम की ट्रेनिंग बढ़ती जाती थी। और हर बात में कहा जाता था कि ससुराल से ताना न सुनना पड़े। लड़कों के लिए अमूमन ऐसा ना था। कपड़ों के मामले में भी लड़कियों को अधिक से अधिक ढका हुआ अच्छा माना जाता था। मुझे खुद याद है कि इन सब चीजों से चिढ़कर मैंने अचानक एक दिन ब्वॉय-कट बाल कटवा लिए थे। फिर जींस का मुझे पता चला तो पापा से इजाजत लेने के लिए बहुत तरीके से प्रयास करने पड़े थे।

लगभग एक दशक बाद कुछ परिवर्तन तो अवश्य हुए हैं। महिला सशक्तिकरण की दिशा में काम तो हुआ है, भले ही काफी हद तक प्रतीकात्मक ही सही। इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, स्कूली पोशाक में लड़कियों का (झुंड के झुंड में) साइकिल से पढ़ने जाना। पहले के प्रावधानों के अलावा अभी हाल में मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना आदि का प्रावधान किया गया है जिसके पीछे मंशा तो सकारात्मक हो सकती है, लेकिन असल सशक्तिकरण नहीं हो पा रहा है। अगर हम ईमानदारी से यह पूछे कि क्या हमारी आधी आबादी सशक्त होने की राह पर है, उत्तर पता चल जाएगा? और प्रतीकात्मक मैंने इसीलिए कहा क्योंकि असल उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना होना चाहिए, पर ऐसा हो नहीं रहा है। कक्षा में बच्चों का न होना बहुत कुछ कहता है। शिक्षकों की कमी सभी जानते हैं।


बच्चों में किताब पढ़ने का रुझान कम हो रहा है। पुस्तकालय बुरी स्थिति में है या यों कहें कि अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। बच्चें पढ़ाई के लिए काफी हद तक निजी कोचिंग संस्थानों/ट्यूशन पर आश्रित हो गए हैं जो कि अच्छा संकेत नहीं है, जैसे यह असमानता को बढ़ाता है। अभी भी अच्छा टैलेंट राज्य से बाहर चला जाता है, जो कि ब्रेन ड्रेन समस्या का परिचायक है। उद्यमिता के अनुकूल माहौल नहीं होने से सरकारी नौकरी पर दबाव बढ़ जाता है और उसके भी अवसर कम हैं।

कुल मिलाकर कहे तो दुनिया जिस गति से आगे बढ़ रही है, बिहार उस मामले में काफी पीछे है। मानव विकास सूचकांक पर हम कहां हैं, सब जानते हैं। एक-डेढ़ दशक में कुछ तो बदलाव बिहार में हुए हैं, लेकिन वह काफी नहीं है। बिहार वर्तमान में देश का सबसे युवा राज्य है, लेकिन कमियों के चलते जनसांख्यिकीय लाभांश उठाने में काफी हद तक असफल हैं।


लेखिका प्रो० लक्ष्मी कुमारी
राजीतिक विज्ञान ,आरा विश्वविधालय

बिहार में बड़ा हादसा हाईटेंशन तार से टकराई नाव ,करंट लगने के 25 लोग झुलसे कई लोग लापता

घटना पटना जिले के कच्ची घाट से जुड़ा हुआ है जहां देर रात रोजमर्रा का काम करके नाव से लौट रहे लोग उस वक्त सकते में आ गये जब गंगा के मझधार में पास कर रहे हाईटेंशन तार से नाव टकरा गयी ।

देखते देखते पूरे नाव में करंट प्रभाव करने लगा जिस वजह से 25 लोग झुलस गये हैं जिसमें दो की हालत गम्भीर है । प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक रात करीब साढ़े नौ बजे एक नाव कच्ची दरगाह से वैशाली के रुस्तमपुर राघोपुर के लिए खुली। उस नाव पर करीब पचास से अधिक लोग सवार थे। गंगा के ऊपर से हाईटेंशन लाइन गुजरी है। गंगा में ऊफान के चलते हाईटेंशन लाइन की ऊंचाई बेहद कम हो गई है। नाव जैसे ही वैशाली सीमा के मझधार में पहुंची, अंधेरा होने के कारण नाविक को पता नहीं चला और नाव की पतवार ऊपर से गुजर रही हाईटेंशन तार से टकरा गई।


हादसे की सूचना मिलते स्थानीय लोगों ने दूसरी नाव से लोगों को मदद पहुंचानी शुरू की। गंगा में कूदे लोगों और करंट से घायल लोगों को किनारे लाकर घायलों को विभिन्न निजी नर्सिंग होम में इलाज के लिए भर्ती कराया।
बचाव एवं राहत कार्य में बड़ी संख्या में प्रशासनिक अधिकारी जुट गए। डीएसपी फतुहा  के अनुसार, घायलों का इलाज पटना के कच्ची दरगाह स्थित अलग-अलग नर्सिंग होम में चल रहा है। गंभीर रूप से घायलों का एनएमसीएच में भी इलाज चल रहा है। घटनास्थल पर पटना सिटी और वैशाली के एसडीओ और एसडीपीओ 4 अधिकारी दल बल के साथ मौजूद हैं। लापता यात्रियों की खोजबीन SDRF की टीम मदद से की जा रही है।

बिहार इस बार भी वीरता पदक से चूका

हर वर्ष की भाती स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश के जांबाज पुलिस पदाधिकारियों को दी जाने वाली विरता पुरस्कार( गैलेंट्री पुलिस पदक)में इस बार भी बिहार का नाम नहीं है जबकि विराता पुरस्कार के इतिहास की बात करे तो बिहार हमेशा दो तीन पदक लेता रहा है।

 गृह मंत्रालय हर साल स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेश की पुलिस सेवा से जुड़े पदाधिकारियों व कर्मियों के लिए पदक की घोषणा करती है। यह पदक चार श्रेणी में दिए जाते हैं। राष्ट्रपति का गैलेंट्री पुलिस पदक, गैलेंट्री पुलिस पदक, राष्ट्रपति का विशिष्ट सेवा पदक व सराहनीय सेवा पदक।

स्वतंत्रता दिवस पर इस वर्ष बिहार के 23 पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों को गृह मंत्रालय की ओर से सेवा पदक के लिए चुना गया है। दो पुलिस पदाधिकारियों को विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक जबकि डीएसपी सुबोध कुमार समेत 21 को सराहनीय पुलिस सेवा पदक दिया जाएगा। आर्थिक अपराध इकाई, पटना में पुलिस निरीक्षक विपिन कुमार सिंह और पटना जिला बल में पुलिस अवर निरीक्षक राम कुमार सिंह को विशिष्ट सेवा पदक के लिए चुना गया है। बिहार के डीजीपी एसके सिंघल ने विशिष्ट व सराहनीय सेवा पदक पाने वाले पुलिस पदाधिकारियों व कर्मियों को बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य

इन्हें मिला सराहनीय सेवा पदक
– सुबोध कुमार, डीएसपी मद्यनिषेध,
– आनंद कुमार सिंह एसआइ सहरसा,
– राज नारायण यादव एएसआइ पटना,
– सुधाकर सिंह, एसआइ पूर्णिया,
– अर्जुन बेसरा एसआइ, रेल कटिहार,
– शत्रुघ्न पटेल, एसआइ कैमूर,
– अरुण कुमार झा, एसआइ दरभंगा,
– कुमार अजीत सिंह, एएसआइ सीआइडी,
– संजय कुमार यादव, एएसआइ सीआइडी,
– उमेश पासवान, एएसआइ एसटीएफ,
– अजय कुमार द्विवेदी, एएसआइ पुलिस मुख्यालय,
– अमेंद्र कुमार गुप्ता, एएसआइ मद्यनिषेध इकाई,
– अनिल कुमार सिंह, हवलदार एटीएस,
– अरुण कुमार सिंह, चालक हवलदार एटीएस,
– मो. रिजवान अहमद, हवलदार बीएसएपी-10,
– विनय कुमार सिंह, हवलदार सिवान,
– लालबाबू सिंह हवलदार बीएसएपी-14,
– बलराम सिंह, चालक सिपाही बीएसएपी-10,
– हरेंद्र कुमार चौधरी, सिपाही नालंदा,
– रामकुमार शर्मा, सिपाही सीआइडी,
– संजय कुमार सिपाही गोपालगंज।

गैलेंट्री पुलिस पदक नहीं मिलने को लेकर जब राज्य के डीजीपी से सवाल किया गया तो कहां कि हमारे राज्य में जांबाज पुलिस अधिकारियों की कोई कमी है कभी कभी ऐसा होता है वैसे विरता पदक का एक अलग ही महत्व है ।

स्वतंत्रता दिवस पर राजधानी पटना में हाई अलर्ट: सुरक्षा चाक-चौबंद

राजधानी पटना में 15 अगस्त पर अशांति का खतरा है। इंटेलिजेंस से मिले इनपुट के बाद पटना में हाई अलर्ट कर दिया गया है। झंडोत्तोलन कार्याक्रम के दौरान गांधी मैदान के अंदर से लेकर बाहर तक खुफियां निगरानी कराई जाएगी। चप्पे-चप्पे पर मजिस्ट्रेट, पुलिस पदाधिकारी और पुलिस बल को तैनात किया गया है। ताकि स्वतंत्रता दिवस समारोह का आयोजन शांतिपूर्ण हो सके। DM और SSP ने संयुक्त आदेश जारी कर सुरक्षा को लेकर विशेष अलर्ट किया है।

पटना के आयुक्त संजय कुमार अग्रवाल का कहना है- ‘किसी भी दशा में अफवाह फैलाने वालों और अशांति पैदा करने वालों का मंसूबा सफल नहीं होगा’। आयुक्त ने तैनात सभी दंडाधिकारी और पुलिस पदाधिकारी को अपने दायित्व का शत-प्रतिशत पालन करने का निर्देश दिया है। साथ ही विशेष रूप से अफवाह फैलाने वाले, शांति भंग करने वाले व्यक्तियों पर पैनी नजर रखने को कहा है।