जांच के प्रारम्भिक चरण में पुलिस ने प्रमुख संगठनों के वित्तीय खाते, दानदाताओं की सूची और आयोजन से जुड़े ठेकेदारों के अनुबंधों की समीक्षा शुरू कर दी है। साथ ही, सोशल मीडिया पर प्रचारित किए गए फंडरेज़िंग अभियान और ऑनलाइन पेमेण्ट प्लेटफ़ॉर्म के डेटा को भी पुलिस ने निगरानी में रखा है। इन सबकी मदद से वह संभावित छुपे हुए स्रोतों को उजागर करने का प्रयास कर रही है।
पुलिस ने यह भी स्पष्ट किया कि इस जांच में किसी भी वैध दान या नागरिक भागीदारी को दंडित नहीं किया जाएगा। उद्देश्य केवल यह है कि यदि कोई गैर‑कानूनी या विदेशी निधि प्रवाह के माध्यम से सामाजिक अशांति को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा हो, तो उसे समय पर रोका जा सके। इस दिशा में पुलिस ने कई संगठनों से सहयोग माँगा है और उनसे अनुरोध किया है कि वे सभी वित्तीय दस्तावेज़ उपलब्ध कराएँ।
जांच के दौरान पुलिस ने कई प्रमुख संगठनों को नोटिस जारी किया है, जिसमें उन्हें अपने वित्तीय लेन‑देन का विस्तृत विवरण प्रदान करने का निर्देश दिया गया है। इन नोटिसों में यह भी कहा गया है कि यदि किसी संस्था ने इस निर्देश का पालन नहीं किया, तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इस कदम को कई अधिकारिक स्रोतों ने सामाजिक सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया है।
जांच को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ मिश्रित हैं। ruling coalition के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध के रूप में लेकर चिंता जताई, जबकि विपक्षी पार्टियों ने इसे पुलिस के दायित्व के तहत सही कदम कहा। दोनों पक्षों ने यह कहा कि अगर जांच पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से की जाती है, तो इसे समर्थन मिलेगा।
कुर्सी पार्टी के प्रवक्ता ने कहा कि जंतर मंतर पर होने वाले प्रदर्शन हमेशा से लोकतांत्रिक अधिकारों का अभिव्यक्त रूप रहे हैं, परन्तु यदि फंडिंग स्रोतों में कोई अनियमितता पाई जाती है, तो कड़ाई से कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस को अपनी जाँच में स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव से बचना चाहिए। इस बीच, कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस जांच को नागरिक अधिकारों के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर सार्वजनिक प्रदर्शन की फंडिंग में अनियमितताएँ पाई जाती हैं, तो यह सामाजिक अस्थिरता को बढ़ा सकता है। वे यह भी कह रहे हैं कि वित्तीय पारदर्शिता से न केवल सामाजिक विश्वास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि आर्थिक नीति निर्माण में भी स्पष्टता आएगी। इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि सार्वजनिक स्थल पर आयोजित बड़े आयोजन के लिए वैध फंडिंग स्रोतों का होना अत्यावश्यक है।
सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों का तर्क है कि ऐसी जांचें कभी‑कभी विरोधी आवाज़ों को दबाने के उपकरण बन सकती हैं, यदि उन्हें सही ढंग से लागू नहीं किया जाता। उन्होंने यह सुझाव दिया कि जांच प्रक्रिया में नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाए, जिससे प्रक्रिया में विश्वास बनता रहे। इस प्रकार, वे इस बात पर ज़ोर दे रहे हैं कि पारदर्शिता और अधिकारों के संतुलन को बनाए रखना आवश्यक है।
Delhi police’s probe aims to ensure financial transparency of large-scale protests at Jantar Mantar. The inquiry seeks to prevent illicit funding while safeguarding public safety and social order.