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कोरोना का टीका लेने से छूटे हुए लोगों के लिए विशेष टीकाकरण 22 अक्टूबर को

छूटे हुए लाभाथिर्यों का विशेष टीकाकरण 22 अक्टूबर कोः मंगल पांडेय
आशा एवं आंगनबाड़ी सेविका को इस कार्ययोजना में लगाया गया

पटना। स्वास्थ्य मंत्री श्री मंगल पांडेय ने कहा कि राज्य में छूटे हुए लाभाथिर्यों का विशेष टीकाकरण 22 अक्टूबर को होगा। स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना से बचाव के लिए चल रहे टीकाकरण अभियान को और गति देते हुए निर्णय लिया है कि राज्य में जिन लोगों ने अब तक टीकाकरण नहीं करवाया है, उनका अब आशा व आंगनबाड़ी वर्कर्स घर-घर जाकर सर्वे करेंगी और इससे संबंधित रिपोर्ट सौंपेगी। उस आधार पर विभाग उनके लिए विशेष अभियान के तहत उनका टीकाकरण सुनिश्चित करवाएगी।

श्री पांडेय ने कहा कि जिन लोगों ने अब तक टीका नहीं लिया है, उनका सर्वे वोटर लिस्ट के आधार पर पूरे राज्य के अलग-अलग पंचायत व वार्डों में 18 से 20 अक्टूबर तक करवाया जायेगा। यह कार्य संबंधित क्षेत्र के आशा फैसिलिटेटर एवं बीसीएम की देख-रेख में किया जाएगा।

इसके साथ ही इस कार्य में सभी संबंधित सहयोगी संस्थाओं का अनिवार्य रुप से सहयोग लेना सुनिश्चित किया गया है। सर्वे के उपरांत प्रखंड द्वारा आशा से प्राप्त लाभार्थी सूची के अनुसार टीकाकरण सत्र स्थल, टीकाकरण कर्मी एवं संबंधित सामग्री आदि को सूक्ष्म कार्ययोजना में समाहित कर जिला को उपलब्ध कराया जाएगा।

श्री पांडेय ने ये भी कहा कि टीकाकरण की सफलता के लिए दुर्गापूजा के अवसर पर सभी पूजा पंडालों में कोविड -19 टीकाकरण से संबंधित प्रचार-प्रसार सामग्रियों को प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया है, ताकि टीकाकरण के प्रति जागरुकता में और तेजी आ सके।

पाकिस्तानी आतंकी का तार बिहार से जोड़े जाने को लेकर उठने लगे सवाल है

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के हत्थे चढ़े पाकिस्तानी आतंकी अशरफ की गिरफ्तारी मामले में जिस तरीके से बिहार से तार जोड़ा जा रहा है उसको लेकर बिहार पुलिस के आलधिकारियों ने गहरी नराजगी व्यक्त किया है ।

दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा जो मीडिया को बताया गया है उसको लेकर अभी तक दिल्ली पुलिस ने बिहार पुलिस मुख्यालय के किसी भी अधिकारी से इस संदर्भ में बात नहीं किया है और ना ही किशनगंज एसपी से।

दिल्ली पुलिस के हवाले से जो मीडिया रिपोर्ट आयी है उसके अनुसार आतंकी अशरफ ने पुल‍िस को पूछताछ के दौरान बताया क‍ि पहली बार साल 2004 में पाकिस्तान से बांग्लादेश और कोलकाता होते हुए भारत में दाखिल हुआ था और उसके बाद वह सीधे अजमेर शरीफ गया।

अजमेर शरीफ में उसकी मुलाकात बिहार के कुछ लोगों से हुई, और उन्हीं लोगों के साथ बिहार चला गया । बिहार में जाकर उसने एक गांव में शरण ली और वहां पर कुछ समय रहकर सरपंच का विश्वास जीता और सरपंच से कागज में लिखवाकर गांव का निवासी होने की आइडेंटिटी बनवाई.
कथ‍ित आतंकी अशरफ ने पुल‍िस को पूछताछ के दौरान बताया क‍ि बाद में वह दिल्ली आया और उसी आईडी के सहारे दिल्ली में पहले राशनकार्ड बनवाया और फिर वोटर आईडी कार्ड और उसके बाद 2014 में पासपोर्ट बनवा लिया ।

राशन कार्ड कैसे बनता है —
राशन कार्ड बनाने की एक पूरी प्रक्रिया है जिसमें पंचायत से लेकर प्रखंड स्तर तक पूरा महकमा शामिल होता है बिहार में सरपंच या मुखिया को ये अधिकार नहीं है किसी के नागरिक होने का प्रमाण पत्र दे, इतना ही नहीं सरपंच और मुखिया अगर ऐसा कोई प्रमाण देता भी है तो उसके आधार पर राशन कार्ड बन ही नहीं सकता है क्यों कि इसके साथ वोटर आईडी कार्ड के अलावा कई और दस्तावेज चाहिए तभी आपको राशन कार्ड बन सकता है ।

इसलिए ये जांच का विषय है कि बिहार के किसी सरपंच के पत्र के आधार पर दिल्ली या यूपी में कैसे राशन कार्ड बन गया जाचं तो यहां से शुरु होनी चाहिए कि इस खेल में कौन लोग शामिल है

कैसे बनता है पासपोर्ट–
पासपोर्ट बनाने के लिए आपको मौजूदा एड्रेस प्रूफ के लिए जरूरी डॉक्यूमेंट्स पानी का बिल टेलीफोन/मोबाइल का बिल बिजली का बिल इनकम टैक्स असेसमेंट ऑर्डर आईडी-कार्ड के साथ साथ जहां आपका स्थायी पता है उसकी भी जानकारी देनी पड़ती है ।

दोनों जगह पुलिस सत्यापन करती है उसके बाद ही पासपोर्ट बन सकता है ।इतना ही नहीं जन्मतिथि के लिए जरूरी प्रमाण-पत्र नगर निगम की ओर से मिला जन्म प्रमाण-पत्र स्कूल लिविंग या ट्रांसफर लेटर की कॉपी पॉलिसी बॉन्ड या फिर पैन कार्ड होना अनिवार्य है ।

ऐसे में अशरफ का पासपोर्ट कैसे बन गया। जन्म प्रमाण पत्र से जुड़े कागजात किस संस्थान द्वारा निर्गत किया गया है कई ऐसे सवाल हैं जो दिल्ली पुलिस के कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर रहा है क्यों कि 2004 में वो भारत में आता है मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 2011 में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने हुए ब्लास्ट से पहले रेकी की थी और उस रेकी में वह कई बार वहां पर आया था, लेकिन उसने बम धमाके में शामिल होने से इनकार कर दिया है.

पुलिस ने धमाकों की साजिश में शामिल एक शख्स की फोटो उसे दिखाई है, जिसके बाद उसने उसे पहचाना लेकिन सही कहा कि उसने सिर्फ रेकी की थी धमाका किसी और ने किया था. स्पेशल सेल अब उसके इस दावे को वेरिफाई करेगी.

कथ‍ित आतंकी अशरफ के जम्मू कश्मीर में भी बम धमाके और हथियार सप्लाई करने का खुलासा हुआ है. सूत्रों के मुताबिक वह काफी समय जम्मू कश्मीर में रहा है, जिसके बाद बुधवार को एनआईए, जम्‍मू कश्‍मीर पुलिस और आर्मी इंटेलिजेंस स्पेशल सेल के दफ्तर में आतंकी से पूछताछ करने आएंगी और उसके जम्मू कश्मीर में जाने के साथ ही वहां पर साजिश का पता लगाएगी.

इस तरह के वारदात में वो शामिल रहा है वह भी दिल्ला में रहते हुए ऐसे में ये सवाल तो बनता ही है कि दिल्ली में राशन कार्ड बनवाने में से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक में किसने सहयोग किया इस संदर्भ में बिहार के एक पूर्व सीनियर पुलिस अधिकारी का कहना है कि दिल्ली और मुबंई पुलिस अक्सर इस तरह का दाव खेलते रहती है ताकि उसके सिस्टम के फेलियर पर लोगों का ध्यान ना जाये ।

शेयर बाजार में लगातार 5वें दिन उछाल; सेंसेक्स 60,737 पर, निफ्टी 18,161 पर बंद हुआ, टाटा समूह के स्टॉक में उछला।

बुधवार को साप्ताहिक एफएंडओ एक्सपायरी से एक दिन पहले सेंसेक्स और निफ्टी रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुआ। सेंसेक्स 452 अंक उछलकर 60,737 पर और एनएसई निफ्टी 170 अंक की तेजी के साथ 18,161 पर बंद हुआ। इंट्राडे ट्रेड में सेंसेक्स 60,836.63 का रिकॉर्ड तोड़ दिया और एनएसई निफ्टी रिकॉर्ड 18,197.80 पर पंहुचा ।

सेंसेक्स चार्ट (13.10.21) एक नजर में

बीएसई स्मॉलकैप और बीएसई मिडकैप क्रमश: 0.62 और 1.46 फीसदी तक चढ़े। सेक्टरों में ऑटो इंडेक्स में 3.5 फीसदी, जबकि एनर्जी, इंफ्रा, आईटी, मेटल, पावर और कैपिटल गुड्स इंडेक्स में 1-1 फीसदी की तेजी आई।

महिंद्रा एंड महिंद्रा, टेक महिंद्रा, बजाज-ऑटो, एशियन पेंट्स, एनटीपीसी, एलएंडटी, बजाज फिनसर्व, कोटक महिंद्रा बैंक सेंसेक्स में शीर्ष पर रहे। मारुति, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), नेस्लेइंडिया और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) सेंसेक्स के शीर्ष  ड्रैगर्स शेयरों में शामिल थे।

सेंसेक्स के 30 शेयर्स में से 22 शेयर बढ़त के साथ और 8 शेयर कमजोरी के साथ बंद हुए।

सेंसेक्स के शेयर एक नजर में

सेक्टोरल मोर्चे पर निफ्टी मीडिया को छोड़कर सभी सेक्टोरल इंडेक्स सकारात्मक दायरे में कारोबार कर रहे थे। बैंक निफ्टी 0.3 फीसदी, निफ्टी ऑटो 3.43 फीसदी, निफ्टी आईटी 1.19 फीसदी और निफ्टी मेटल 1.5 फीसदी चढ़ा।

निफ्टी के प्रमुख शेयरों के टॉप गेनर और लूजर का हाल

सीएम नीतीश कुमार ने की माँ दुर्गा की पूजा

सीएम नीतीश कुमार आज माँ दुर्गा का दर्शन किया और मीडिया से बात करते हुए कहां कि आज का दिन मॉ का दिन है माँ से बस एक ही आर्शीवाद चाहिए ।राज्य खुशहाली रहे समृद्धि रहे।

बच्चों के संदर्भ में कोरोना को लेकर देश का स्वास्थ्य व्यवस्था निपटने में सक्षम।

“बच्चों के संदर्भ में प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटने में देश की मौजूदा निगरानी व्यवस्था से काफी मदद मिली”
डॉ. एन के अरोड़ा राष्ट्रीय टीकाकरण तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) के कोविड-19 कार्यकारी समूह के अध्यक्ष

कोविड-19 टास्क फोर्स के प्रमुख सदस्य डॉ. एन के अरोड़ा ने कोविड-19 वैक्सीन की अब तक की यात्रा और भारत के लिए वर्तमान तथा भविष्य में इसके मायने पर बातचीत की।

देश ने 10 महीने से भी कम समय में 100 करोड़ टीकाकरण की उपलब्धि हासिल कर ली है। यह देश में महामारी की स्थिति में क्या बदलाव लाएगा?
यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। वैक्सीन आत्मनिर्भरता ने इस रिकॉर्ड को हासिल करने में सबसे अधिक सहायता की है। हम इतनी बड़ी आबादी का टीकाकरण कर पाए, क्योंकि हम देश में वैक्सीन का विकास और उत्पादन करने में सफल रहे।
यह उपलब्धि रातोंरात हासिल नहीं की गयी है; यह डेढ़ साल की रणनीतिक सोच, इसके कार्यान्वयन और कड़ी मेहनत का परिणाम है।

हमारे देश में, 94 करोड़ से अधिक वयस्क हैं, जो टीकाकरण के पात्र हैं। कई राज्यों में, 100 प्रतिशत वयस्क आबादी को वैक्सीन की पहली खुराक दी जा चुकी है। भारत की वर्तमान वैक्सीन वितरण क्षमता, वैक्सीन उत्पादन और उपलब्धता की स्थिति को देखते हुए हम अगले तीन महीनों में वैक्सीन की 70 से 80 करोड़ खुराकें और दे सकते हैं।

भविष्य में हमारे देश में महामारी की स्थिति पांच बातों पर निर्भर रहेगी। एक, लोग कितने प्रभावी ढंग से कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन करते हैं? दूसरा, वैक्सीन की उपलब्धता। तीसरा, महामारी की दूसरी लहर के दौरान प्राकृतिक रूप से संक्रमित होने वाली आबादी का प्रतिशत। चौथा, आने वाले सप्ताहों और महीनों में वायरस के किसी नए रूप (वैरिएंट) का सामने आना और पांचवां, भविष्य में मामलों में वृद्धि के निदान के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारी।

दूसरी लहर के दौरान, देश भर में 70 से 85 प्रतिशत लोग संक्रमित हुए। इसके अलावा, पिछले चार महीनों में कोई नया रूप (वैरिएंट) सामने नहीं आया है। सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से आईसीयू बेड की संख्या, ऑक्सीजन की आपूर्ति व जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता को बढ़ाने और नैदानिक सुविधाओं को मजबूत करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए गए हैं। अब, यह देशवासियों पर निर्भर है कि वे कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन, विशेष रूप से आने वाले त्योहारों के दौरान भी जारी रखें। मुझे दृढ़ विश्वास है कि कोविड-उपयुक्त व्यवहार का पालन करने और अनुशासन बनाए रखने से मामलों को कम रखने तथा सामान्य स्थिति की ओर लौटने में काफी मदद मिलेगी।

हालांकि भारत बच्चों की वैक्सीन (टीका) का सबसे बड़ा उत्पादक रहा है, लेकिन इसे वैक्‍सीन (टीका) विकसित करने के लिए नहीं जाना जाता था। महामारी के दौरान, हालांकि इसने अनेक वैक्सीन विकसित की। ऐसा कैसे संभव हुआ?
पिछले दो दशकों में, देश ने आधारभूत विज्ञान अनुसंधान के लिए बुनियादी ढांचा विकसित करने के क्षेत्र में बड़ी उन्‍नति की है।

वास्तविक बदलाव तब शुरू हुआ जब पिछले साल नए टीकों के बुनियादी अनुसंधान और विकास को उत्प्रेरित करने एवं प्रोत्साहित करने का निर्णय किया गया। मार्च 2020 में, बड़ी धनराशि का निवेश किया गया, और एक अनुकूल वातावरण तैयार किया गया। इसने वैज्ञानिकों के साथ-साथ उद्यमियों को भी नए टीकों के विकास के लिए सहयोग करने और एक जगह पर आने के लिए प्रोत्साहित किया। अंतरराष्ट्रीय भागीदारों, स्थानीय निर्माताओं, वैज्ञानिकों और विभिन्न विज्ञान प्रयोगशालाओं के बीच सहयोग के परिणामस्वरूप नई प्रौद्योगिकी का विकास और हस्तांतरण हुआ।

इसके परिणामस्‍वरूप, भारत महामारी की शुरुआत के 10 महीने से भी कम समय में अपना राष्ट्रव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम शुरू कर सका। आज, इसके पास कोविड टीकों की एक मजबूत पाइपलाइन-निष्क्रिय वैक्सीन, सब-यूनिट वैक्सीन, वेक्टर्ड वैक्सीन, डीएनए वैक्सीन, आरएनए वैक्सीन है- जो वयस्कों के साथ-साथ देश के और अनेक अन्‍य देशों के बच्चों के लिए उपलब्ध होगी।

इन टीकों को बहुत कम समय में विकसित किया गया और इन्हें आपातकालीन उपयोग का अधिकार दिया गया, जिसका अर्थ है कि उनके दीर्घकालिक प्रभाव का अध्ययन करने से पहले उन्हें लोगों के लिए उपलब्ध कराया गया। उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या अन्‍य उपाय किए गए?

जून-जुलाई, 2020 के महीनों से ही, दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने टीकों के संभावित प्रभावों और दुष्प्रभावों पर चर्चा शुरू कर दी थी। सितम्‍बर-अक्टूबर तक, भारत में, एक विस्तारित विशेषज्ञ पैनल स्थापित किया गया जो वयस्क टीकाकरण के कारण उत्पन्न हो सकने वाली समस्याओं के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर से लेकर जिला स्तर तक टीकाकरण के बाद प्रतिकूल स्थिति (एईएफआई) पर नजर रख सके। इस पैनल में अन्‍य लोगों के अलावा सामान्य चिकित्सक, पल्मोनोलॉजिस्ट, कार्डियोलॉजिस्ट, न्यूरोलॉजिस्ट, हेपेटोलॉजिस्ट शामिल थे। एईएफआई सदस्यों के लिए देश भर में जांच, कारण और प्रभाव प्रशिक्षण अक्टूबर-नवम्‍बर में आयोजित किया गया था और दिसम्‍बर तक उनमें से अधिकांश को प्रशिक्षित किया जा चुका था।

देश ने उन नैदानिक स्थितियों को शामिल करने के लिए एक सूची तैयार की जिनकी परम्‍परागत रूप से प्रतिकूल घटनाओं के रूप में जानकारी दी जा रही थी, लेकिन अतिरिक्त स्थितियों को सूची में जोड़ा गया जो सैद्धांतिक रूप से किसी भी नए टीके के साथ उत्‍पन्‍न हो सकती हैं – इन्हें एईएसआई भी कहा जाता है, यानी विशेष रुचि की प्रतिकूल घटनाएं।

आसपास के अस्पतालों या जिला अस्पतालों में कार्यरत टीके लगाने वालों, नर्सों और डॉक्टरों को इस बारे में जागरूक किया गया कि कैसे किसी भी साधारण प्रतिक्रिया से होने वाली प्रतिकूल घटना, जहां अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता है, उसे प्रबंधित और रिपोर्ट किया जा सकता है।

बच्चों के मामले में प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं से निपटने में देश के मौजूदा निगरानी अनुभव ने काफी मदद की।
डब्‍ल्‍यूएचओ ने इस कार्य को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके राष्ट्रीय कार्यालय में एक वैक्सीन-सुरक्षा प्रभाग है जो तकनीकी सहायता के साथ-साथ लॉजिस्टिक सहयोग प्रदान करता है।

प्रत्येक टीकाकरण केन्‍द्र में टीकाकरण के बाद 30 मिनट निगरानी रखने के लिए बैठने के स्‍थान की व्‍यवस्‍था है। इसका उद्देश्य किसी भी गंभीर प्रतिक्रिया जैसे कि एनाफिलेक्सिस को तुरंत प्रबंधित करना और फिर उन्हें निकटतम स्वास्थ्य सुविधा में भेजना है। इस दृष्टिकोण ने कई सौ लोगों की जान बचाई है। टीके की एक खुराक देने के 28 दिन के भीतर होने वाली किसी भी नैदानिक घटना या बीमारी को आगे जांच और यह निर्धारित करने के लिए कि क्या यह टीके और टीकाकरण से संबंधित है, इसकी जानकारी एईएफआई के रूप में दी जानी चाहिए। नियमित पूरक निगरानी की जानकारी के लिए देश भर में 20 से 25 स्‍थानों पर अस्पतालों और सामुदायिक स्थलों पर सक्रिय निगरानी स्थापित की गई। इससे हमें टीकों के किसी भी संभावित दीर्घकालिक प्रभाव को खारिज करने में भी मदद मिलेगी।

टीके की सुरक्षा के बारे में लोगों को समझाना कितना मुश्किल था?
पोलियो उन्मूलन के लिए चलाए गए एक लंबे अभियान, जिसने टीके को लेकर संदेह को दूर किया, की वजह से देश कोविड-19 टीकों के बारे में गलत सूचनाओं, अफवाहों से निपटने के लिए पहले से ही तैयार था। सरकार ने टीकाकरण अभियान शुरू होने से पहले ही पिछले साल अक्टूबर में सामाजिक जागरुकता कार्यक्रम शुरू कर दिया था। इस प्रणाली ने टेलीविजन चैनलों, प्रिंट मीडिया, वेबिनार, रेडियो कार्यक्रमों, आमने-सामने के संवाद के माध्यम से तथ्य-आधारित, वैज्ञानिक जानकारी के प्रसार के लिए समग्र दृष्टिकोण को अपनाया। इसके अलावा, कई प्रतिष्ठित व्यक्ति, धार्मिक नेता, सामुदायिक नेता जागरूकता कार्यक्रमों में शामिल थे क्योंकि उनका जनता के साथ एक मजबूत जुड़ाव है।

पहली बार, सोशल मीडिया स्कैनिंग एक व्यवस्थित तरीके से की जा रही है ताकि अफवाहों और गलत सूचनाओं पर बहुत बारीकी से नजर रखी जा सके, उनकी निगरानी की जा सके, उनका विश्लेषण किया जा सके और व्यवस्थित तरीके से उनका मुकाबला किया जा सके। मेरा यह मानना है कि टीके (वैक्सीन) को लेकर शंका भी एक संक्रामक बीमारी की तरह है, यह तेजी से एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्रों में फैलती है यदि इसे खत्म करने के लिए त्वरित कार्रवाई नहीं की जाती है।

आपको क्या लगता है कि देश के लिए बाकी आबादी का टीकाकरण करना कितना आसान या मुश्किल होगा?
भारत में 94 करोड़ वयस्क हैं और इस आबादी को पूरी तरह से प्रतिरक्षित करने के लिए लगभग 190 करोड़ खुराक की आवश्यकता है। जहां तक टीके की आपूर्ति और स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का सवाल है, हमें पूरा भरोसा है। वास्तव में, हम अभी लोगों में टीका लगवाने को लेकर उत्साह का माहौल देख रहे हैं, उनमें अब टीके को लेकर कोई शंका नहीं है। आगे मुश्किलें आ सकती हैं, लेकिन मेरा दृढ़ विश्वास है कि प्रासंगिक कारणों को दूर करने के ठोस प्रयासों से देश को पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

ये बिहार पुलिस का मानवीय चेहरा है जिसके सहारे सरकार कानून का राज स्थापित करने की दावा करती है

पुलिस यूपी की हो या दिल्ली की या फिर बिहार की मिजाज एक ही रहता है यह तस्वीर बिहार की राजधानी पटना की है जहां अतिक्रमण हटाने के दौरान पुलिस के लाठीचार्ज में घायल युवक की मौत हो गयी ,इस घटना के विरोध में जब लोग सड़क पर उतरे तो फिर पुलिस पुरुष क्या क्या महिला देखिए किस तरीके से मार रहा है ।

हलाकि इस मामले में पटना एसएसपी से सवाल किया गया गया कहां कि वीडिओ की जांच करवाते हैं जो भी दोषी होगा उस पर कारवाई होगी लेकिन सवाल कारवाई का नहीं है जिस तरीके से पुलिस को ट्रेनिंग दी जाती है उसमें पुलिस को इसी तरह की कारवाई करना सिखाया ही जाता है ।

जेपी सम्मान पेंशन राशि में सम्मानजनक वृद्धि के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धन्यवाद।-सुशील कुमार मोदी

  1. जेपी सेनानी सम्मान पेंशन योजना की दोनों श्रेणियों के कुल 2681 सुपात्रों की पेंशन राशि में वृद्धि करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को धन्यवाद।
    अब पांच हजार रुपये मासिक पाने वालों को 7.5 हजार रुपये और 10 हजार पाने वालों को 15 हजार रुपये मासिक मिलेंगे।
    बिहार पहला राज्य है, जिसने 2009-10 में जेपी सेनानियों के लिए सम्मान पेंशन शुरू की।
  1. बिहार 1974 के ऐतिहासिक जेपी आंदोलन का एपिक सेंटर था और यहीं के युवाओं ने इसमें सबसे ज्यादा बड़ी भूमिका निभायी।
    इनके योगदान को राजकीय प्रतिष्ठा देने के लिए एनडीए सरकार ने पहले साल पेंशन मद में 1.31 करोड़ रुपये खर्च किये थे वहीं 2020-21 में 23.90 करोड़ खर्च किये गए।
    सम्मान पेंशन राशि में सरकार ने छह साल बाद दूसरी बार वृद्धि की है।
    अब तक इस योजना पर कुल 193.77 करोड़ रुपये खर्च हुए।
  2. राज्य सरकार ने सेनानियों की विधवा का भी ख्याल रखा। 182 ऐसी बुजुर्ग महिलाओं को वही पेंशन राशि दी जा रही है, जो उनके सेनानी पति को मिलती थी।
    इस मामले में पति के बाद विधवा की पेंशन आधी नहीं की गई है।
    सरकार सेनानी परिवार के प्रति संवेदनशील रही।

दिल्ली में गिरफ्तार आतंकी का तार बिहार से जुड़ा

2013 के बाद पहली बार बिहार का किसी बड़े आतंकी से तार जुड़ा है जिसका रिश्ता ISI हो, जी है 2013 में बिहार पुलिस की टीम ने इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी यासीन भटकल व अब्दुल असगर उर्फ हड्डी को नेपाल की सीमा से गिरफ्तार किया था । पूछताछ के दौरान बिहार में  उसके नेटवर्क का भी खुलासा हुआ था उस पर काफी कुछ काम बिहार पुलिस और केंद्रीय एजेंसी ने किया था ,हालांकि भटकल की गिरफ्तारी के बाद देश स्तर पर कोई बड़ी आतंकी घटना नहीं घटी है ।

 लेकिन हाल के दिनों में दरभंगा में ट्रेन ब्लास्ट की साजिश रचने के मामले में NIA ने यूपी और हैदराबाद में बड़ी कारवाई किया है फिर भी ऐसा कुछ भी NIA को हाथ नहीं लगा जिसके सहारे कहां जा सके कि दरभंगा  मॉड्यूल एक बार फिर  सक्रिय हो गया है ।

दिल्ली में जिस आतंकी की गिरफ्तारी हुई है उसके बारे में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस प्रमोद कुशवाहा का कहना है कि असरफ को सोमवार रात 9.20 बजे अरेस्ट किया गया। शुरुआती जांच में पता चला है कि असरफ स्लीपर सेल की तरह काम करके कोई बड़ी साजिश रच रहा था।

वह दिल्ली में रहकर अपनी पहचान पीर मौलाना के तौर पर बना रहा था।उसने जाली दस्तावेजों के जरिए भारतीय पहचान पत्र हासिल किया था जो बिहार में बनवाया गया था। अशरफ के पास कई फर्जी आईडी मिले हैं। इनमें से एक अहमद नूरी नाम से बनवाया गया था। दस्तावेज के लिए उसने गाजियाबाद की महिला से शादी भी की थी।

पुलिस ने उसके पास से एक AK-47 राइफल, इसकी एक मैगजीन, एक हैंड ग्रेनेड और 50 राउंड गोलियों के साथ दो पिस्टल बरामद किया है । वह करीब 15 साल से भारतीय नागरिक के तौर पर रह रहा था।दिल्ली और उसके आसपास अपनी साजिश को अंजाम देने के लिए वह ‘पीर मौलाना’ का वेश भी बना रहा था।उसने अली अहमद नूरी के नाम से शास्त्री नगर का एक फर्जी आईडी कार्ड बनवा लिया था।

उसके पास से पुलिस ने फर्जी आईडी, बैग और दो मोबाइल फोन बरामद किए हैं।तुर्कमान गेट इलाके से एक भारतीय पासपोर्ट भी उसने बरामद करवाया है। वो पासपोर्ट  2014 में बिहार के किशनगंज से बनवाया था।

सरफ पहली बार बांग्लादेश के रास्ते सिलीगुड़ी बॉर्डर से भारत आया था। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI ने उसे ट्रेनिंग दी है। इसके बाद से वह पाकिस्तान के हैंडलर के संपर्क में था। उसे भर्ती करने वाले हैंडलर का कोड नेम नासिर था। नासिर ही अशरफ को निर्देश दे रहा था।

हालांकि इस सम्बन्ध में पुलिस मुख्यालय में बैठे आलाधिकारी ,एटीएस चीफ और किशनगंज एसपी फिलहाल कुछ भी बोलने से बच रहे हैं लेकिन जो खबर आ रही है उसके अनुसार बिहार पुलिस किशनगंज और उत्तर बिहार से जुड़े नेपाल पर चौकसी बढ़ा दी  है ।

रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद हुआ बाजार; निफ्टी 18000 तो सेंसेक्स 60300 के करीब पहुंचा

मंगलवार को उतार-चढ़ाव के बीच सेंसेक्स, निफ्टी में तेजी देखने को मिलि । सेंसेक्स 148 अंक बढ़कर 60,284 के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर और निफ्टी 50 इंडेक्स 46 अंक बढ़कर 17,992 के सर्वकालिक उच्च स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह, बेंचमार्क के साथ मिड-कैप इंडेक्स भी आज बाजार बंद होने पर 174 अंक बढ़कर 31,805.5 पर पहुंच गया।

सेंसेक्स चार्ट (12.10.21) एक नजर में

सेक्टर के मोर्चे पर ऑटो, एफएमसीजी, मेटल और पीएसयू बैंक इंडेक्स में 1-3 फीसदी की तेजी आई, जबकि आईटी इंडेक्स में करीब 1 फीसदी की गिरावट आई। बीएसई के स्मॉलकैप और मिडकैप इंडेक्स हरे निशान में बंद हुए।

टाइटन कंपनी, बजाज-ऑटो, बजाज फिनसर्व, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई), नेस्ले इंडिया, आईटीसी, एक्सिस बैंक, टाटा स्टील, आरआईएल, एचयूएल सेंसेक्स में शीर्ष पर रहे।

दूसरी तरफ, एचसीएल टेक, टेक महिंद्रा, अल्ट्राटेक सीमेंट, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारती एयरटेल, आईसीआईसीआई बैंक और इंफोसिस शीर्ष इंडेक्स ड्रैगर्स में से थे।

सेंसेक्स के 30 शेयर्स में से 17 शेयर में बड़हत और 13 शेयर में गिरावट देखने को मिली। बीएसई पर कारोबार के दौरान 342 शेयर्स 52 हफ्ते के ऊपरी स्तर पर और 18 शेयर्स 52 हफ्ते के निचले स्तर पर दिखे।

सेंसेक्स के शेयर एक नजर में

सेक्टोरल मोर्चे पर, निफ्टी आईटी को छोड़कर, सभी सेक्टोरल इंडेक्स सकारात्मक क्षेत्र में समाप्त हुए। निफ्टी मीडिया, मेटल, ऑटो, बैंक और रियल्टी सेक्टर के गेज भी 0.6-1.5 फीसदी के बीच बढ़े।

बैंकिंग शेयरों में देर से हुई खरीदारी ने बेंचमार्क को रिकॉर्ड ऊंचाई पर बंद कर दिया। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 0.6 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 0.8 फीसदी चढ़े।

निफ्टी 50 इंडेक्स पर आज करीब 31 शेयर चढ़े और 19 गिरावट के साथ बंद हुए।

निफ्टी के प्रमुख शेयरों के टॉप गेनर और लूजर का हाल

एस एस बी की बड़ी कारवाई हथियार के साथ तस्कर गिरफ्तार

गुप्त सूचना के आधार पर विशेष गस्ती करते हुए एस एस बी जवानों ने 02 हथियारों के साथ 03 कारोबारी और एक मोटर साइकल को किया जब्त

सोमवार की संध्यकालीन बेला मे एस एस बी 45वी बटालियन बीरपुर की सीमा चौकी नरपटपट्टी ने गुप्त सूचना के आधार पर विशेष गस्ती करते हुए एक 09 इंच लंबा सिक्सर, 7.65 एम एम की पाँच जिंदा कारतूस और एक 09 इंच की एयरगन , एक मोटर साइकल (हीरो स्प्लेंदर संख्या BR 11 K 4424) 03 मोबाइल फोन को जब्त करते हुए तीन कारोबारी को गिरफ्तार किया है।

भारत-नेपाल सीमा स्तम्भ संख्या 220 के समीप छोतही अंसारी टोला, वार्ड संख्या 10, जिला अररिया मे कुछ आपराधिक तत्वों द्वारा अवैध हथियारों का मामला संज्ञान मे आया था। कार्यवाही को अंजाम देते हुए सीमा चौकी नरपटपट्टी से सब इंस्पेक्टर सुदर्शन भट्ट के नेतृत्व मे चिन्हित स्थान के लिए विशेष गस्ती दल को भेजा गया। चिन्हित स्थान पर पहुँचकर भारतीय प्रभाग मे छोतही अंसारी टोला, वार्ड संख्या 10 के समीप सूचना के आधार पर जाने पर देखा गया कि तीन व्यक्ति बैठे हुए हैं और गस्ती दल को देखते हुए भागने लगे ।

जिसे दौड़ते हुए गस्ती दल द्वारा घेर लिया गया और पकड़ लिया गया। जब उनसे पूछताछ के दौरान तीनों की तलाशी ली गई तो उन तीनों मे एक व्यक्ति के समीप से 02 कट्टे और कारतूस बरामद बरामद हुए जिसे जब्त कर तीनों कारोबारी को गिरफ्तार कर लिया गया। तीनों के पास से एक एक मोबाइल भी बरामद हुई। दोनों हथियार, बरामद कारतूस, एक बाइक के साथ कारोबारी को भापटियाही थाना के सुपुर्द किया गया। वहीं कारोबारी की पहचान मो अफ़रोज, मो असलम जो थाना नरपतगंज जिला अररिया का निवासी है और अन्य एक अरविंद कुमार मेहता जो थाना भापटियाही जिला सुपौल का निवासी है।

डेढ़ सौ साल पहले पत्रकारिता की स्वायत्तता को गढ़ते हुए एक पत्रकार नगेंद्रनाथ का बाइस्कोप

डेढ़ सौ साल पहले पत्रकारिता की स्वायत्तता को गढ़ते हुए एक पत्रकार नगेंद्रनाथ का बाइस्कोप
“हालांकि तब सिन्ध में किसी तरह का जनमत न था।”

मैं इस पंक्ति पर ठिठक गया। यह पंक्ति आज से कोई 130-35 साल पुरानी होगी। बिहार में पले-बढ़े पत्रकार नगेंद्रनाथ गुप्त कोलकाता के सार्वजनिक जीवन को जीने के बाद जब पत्रकारिता के लिए सिन्ध जाते हैं तब की पंक्ति है। यह पंक्ति 1884 से लेकर 1891 के बीच की है। आज जब जनमत का निर्माण कई तरह के हथकंडों से होने लगा है एक सदी से पहले के दौर में जनमत की उपस्थिति, अनुपस्थिति और निर्माण की प्रक्रिया की झलक इस किताब में मिलती है। किताब का नाम पुरखा पत्रकार का बाइस्कोप है। पत्रकार उस दौर में सार्वजनिकता को किस तरह से देख रहे हैं इसकी एक मिसाल उनकी ही लिखी यह पंक्ति है।

“1878 तक, जब मैंने बिहार छोड़ा, यहां सार्वजनिक जीवन का कोई हिसाब न था। पैसे वाले लगभग सभी को लौण्डेबाज़ी का शौक़ था। राजा, महाराजाओं में,उनमें से कई से मैं भी मिला था, औसत से भी कम दर्जे की बुद्धि रखते थे।”

नगेंद्रनाथ का देखना और लिखना दोनों ही बेहद संक्षिप्त और संयमित है। प्रभाव में प्रवाहित नहीं होते न फिज़ूल की बात दर्ज करते हैं। उस वक्त की पत्रकारिता की शैली जितना ज़रूरी हो, उतना ही लिखा जाए की रही होगी।सूचनाओं को दर्ज करने का कालक्रम में विकास होता है और यहां तक पहुंचते पहुंचते उसका रुप पूरी तरह बदल चुका है। पुरखा पत्रकार के इस संस्मरण में न जाने कितनी ऐसी हस्तियां हैं जो सामान्य से लेकर विशिष्ट के रुप में दर्ज हैं जिन्हें हम महापुरुष और ऐतिहासिक पुरुष कहते हैं। इनमें से कइयों के साथ पत्रकार का पत्र व्यवहार है, मित्रता है और संपर्क है। कइयों को उन्होंने देखा है। बंकिम चंद्र चटर्जी, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण परमहंस, सत्येंद्र नाथ बनर्जी, रवींद्रनाथ टगोर, दादा भाई नौरोजी और कई गवनर्र, कलक्टर। रवींद्रनाथ टगौर बीस साल की उम्र से उनके मित्र रहे थे लेकिन पत्रकार नगेंद्र नाथ गुप्त ने कोई किताब नहीं लिखी, अपनी किताब में बेहद कम लिखा। जितना लिखा है वही शानदार है।

नगेंद्रनाथ गुप्त पत्रकारों की पहली पीढ़ी के पत्रकार रहे होंगे। उनके संस्मण में चल रहे अनेक धारा प्रवाह प्रसंगों में पत्रकारिता के बन रहे मानकों की भी झलक मिलती है। ग़ुलाम भारत में भी पत्रकार अपने पेशे की स्वायत्तता को बचाना जानता है जबकि आज़ाद भारत में ग़ुलाम हो चुका गोदी मीडिया कब का पत्रकार होने का मतलब भूल चुका है। कई प्रसंग मिलते हैं जिससे पता चलता है कि ब्रिटिश भारत की नौकरशाही का पत्रकारिता के साथ क्या रिश्ता था, ख़बरों को लेकर किस तरह की नाराज़गियां थीं।


1878 में जब वर्नाकुलर प्रेस एक्ट पास हुआ तब के बारे में नगेंद्रनाथ गुप्त लिखते हैं कि “बंगाल के गवर्नर सर एश्ले इडेन को हिन्दुस्तानी प्रेस में सरकार की आलोचना पसंद नहीं थी। सबसे ज़्यादा तकलीफ अमृत बाज़ार पत्रकारिता से थी जो तब आधा अंग्रेज़ी और आधा बांग्ला में निकलता था। उन्होंने पत्रकारिता के संपादक शिशिर कुमार घोष को बुलवाया और कहा कि हिन्दुस्तानी अख़बारों में सरकार की आलोचना बंद होनी चाहिए। उन्होंने कहा मुझे कृष्टो दास पाल( हिन्दू पैट्रियट के संपादक) से कोई तकलीफ नहीं है। अगर आपको कोई तकलीफ है तो आप कभी भी मुझसे मुलाकात कर सकते हैं। मैं आपकी सारी मुश्किलें दूर करूंगा। लेकिन सरकार बार-बार अपने अधिकारियों पर हमले बर्दाश्त नहीं कर सकती।”


शिशिर कुमार घोष के नहीं झुकने पर वर्नाकुलर प्रेस एक्ट पास हो गया। अमृतबाज़ार पत्रिका ने इस कानून के ख़िलाफ़ दमदार अभियान चलाया। जिस हफ्ते कानून का प्रस्ताव आया उस हफ्ते अखबार वर्नाकुलर प्रेस एक्ट से बचने के लिए पूरी तरह अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने लगा और कानून के दायरे से बाहर हो गया। एस्ले इडेन का ख़ूब मज़ाक उड़ा। इस कानून के ख़िलाफ सत्येंद्र नाथ बनर्जी ने ख़ूब बहस की थी। पत्रकार नगेंद्रनाथ गुप्त लिखते हैं कि मैंने एक मीटिंग में कृष्टो दास पाल को बोलते सुना और मैं उनके तर्क करने की शक्ति का कायल हुआ। न ज़ोर-ज़ोर से बोलना, न तालियों की गड़गड़ाहट, न परिचित जुमले थे। लेकिन तर्क और तथ्यों के आधार पर की जाने वाली बात सुनते हुए लोग एकदम से जादू के असर में दिखे। एकदम संतुलित भाषण, पूरी गरिमा और शालीनता से भरा था।


कोलकाता से सिन्ध टाइम्स में काम करने सिन्ध आ गए। जब नगेंद्रनाथ जी को पता चला कि स्वामित्व में बदलाव हुआ है लेकिन जब उन्हें बताए प्रकाशन में बदलाव हुआ तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद एक नया अखबार शुरू किया फिनिक्स। इस अखबार के बारे में लिखते हुए नगेंद्रनाथ गुप्त कहते हैं कि कुछ समय के लिए तो इस नये अख़बार ने मेरी काफी जान खायी क्योंकि उसके सारे ही काम मुझे करने होते थे। मैं रोज़ चौदह से सोलह घंटे काम करता था। अपनी याद आ गई।
“जैसे ही मैंने मिलने के लिए अपना कार्ड भिजवाया वे तुरन्त निकल कर आ गये।”


उन्नीसवीं सदी में पत्रकार विज़िटिंग कार्ड का इस्तमाल करने लगे थे।पत्रकारों को ब्रिटिश हुकूमत के कार्यक्रमों और निजी पार्टियों में बुलाया जाने लगा था।उसमें भारतीय पत्रकार भी होते थे। इसके लिए पास जारी होता था। इसी के साथ भारतीय पत्रकारिता में ऑफ रिकार्ड बनने का भी एक लाजवाब प्रसंग है जो उस समय तो नहीं लीक होता है लेकिन बाद में सबको पता चल जाता है। पत्रकार नगेंद्रनाथ गुप्त ने पत्रकारों के हीरो बनने और फिर बाद में ज़ीरो बन जाने के प्रसंग को भी अपनी शैली में क्या ख़ूब दर्ज किया है।1886 के इस किस्से में ऑफ रिकार्ड, पत्रकार के हीरो बनने और ज़ीरो बनने के प्रसंग मिलते हैं।
नगेंद्रनाथ गुप्त लिखते हैं कि कोलकाता में कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन हुआ था। अधिवेशन के बाद प्रतिनिधिमंडल बंगाल के गवर्नर लार्ड डफरिन से मिलने पहुंचा। उनके साथ इण्डियण मिरर के संपादक नरेंद्रनाथ सेन भी थे। डफरिन ने ग़ुस्से में कहा कि “जेण्टलमैन, मैं आपसे पूछता हूं कि क्या वायसराय के निजी पत्राचार तक आपकी पहुंच हो तो उसको अख़बारी लेख का विषय बनाना उचित है?” कुछ पल की खामोशी के बाद नरेंद्रनाथ सेन ने बहुत मज़बूती के साथ कहा, “माई लार्ड, मुझे अगर ज़रा भी अन्दाज़ा होता कि आप अपने घर के अन्दर मुझे इस तरह अपमानित करेंगे तो मैं यहां कभी न आता। “ गवर्नर के सचिव ने समझा दिया कि कुछ गड़बड़ हो गई है. गवर्नर से उनसे माफी मांगी और सभी से कहा कि ये बात यहां से बाहर नहीं जानी चाहिए।


नगेंद्रनाथ ने आगे लिखा है कि “लार्ड डफरिन की कही बातों का काफी समय तक सम्मान रहा और वर्षों तक प्रेस में कुछ नहीं छपा। पर इतनी बड़ी बात को कब तक दबाये रखा जा सकता था। उस दिन पूरे कोलकाता में इसकी चर्चा होने लगी और कांग्रेस अधिवेशन में आए लोग जान गए। नरेंद्र नाथ सेन अचानक से हीरो बन गए। लेकिन उनका यह अक्खड़पन और आज़ाद स्वभाव अन्त तक नहीं बन सका। उन्हें बाद में रायबहादुर की उपाधि मिली और देसी भाषा में ‘निष्ठावान’ पत्रकारिता के लिए सरकारी सब्सिडी भी मिली।”


उम्मीद है आपने ‘निष्ठावान’ पत्रकारिता पर ग़ौर किया होगा। इसी तरह के कई प्रसंग हैं जब नगेंद्रनाथ गुप्त अधिकारी को ख़बर का सोर्स बताने से इंकार करते हैं और एक प्रसंग में कराची के ज़िला पुलिस सुप्रिटेणडेण्ट कर्नल सिम्पसन से कहताे हैं कि “ मैं किसी एक मामले में आपके समन के लिए यहां आया हूं और अगर फ़ौजदार या किसी को भी अख़बार से शिकायत है तो वह अपने पक्ष में जो चाहे करने को आज़ाद है। फ़ौजदार यह सब देखकर स्तब्ध था और मुझे घूरे जा रहा था।”

“बाहर आने के बाद मैंने इस विषय पर ख़ूब तीखा लिखा और इस मसले को सिन्ध के बाहर के प्रेस वालों ने भी उठाया। शायद किसी ने उन्हें सलाह दी कि समन भेजना ग़लत था और उन्होंने फिर मुझे समन की जगह काफ़ी लल्लो-चप्पो वाला पत्र भेजा। इसके बाद मेरी सिम्पसन से मुलाक़ात नहीं हुई।”


यह प्रसंग शानदार है। बताता है कि एक पत्रकार अपने पेशे की स्वायत्ता के लिए आरंभिक दिनों में किस तरह की लक्ष्मण रेखाएं खींच रहा था। वह अधिकारी की धमकी से नहीं डरता है और न ही ख़ुशामद से झुक जाता है। नरेंद्रनाथ सेन के ज़रिए नगेंद्रनाथ गुप्त ने बता ही दिया कि कैसे एक पत्रकार कैसे गवर्नर को जवाब देकर हीरो बनता है और वही पत्रकार रायबहादुर का ख़िताब लेकर निष्ठावान बन जाता है। नगेंद्रनाथ जी नेअंग्रेज़ी हुकूमत की कार्यप्रणाली को शोषक या मास्टर के खाँचे में बाँट कर नहीं देखा है।

बल्कि जैसा है वैसा ही लिखने के आधार पर दर्ज किया है। ऐसा नहीं है कि वे आज़ादी की चेतना से प्रभावित हैं। कांग्रेस के लिए चंदा कर रहे हैं लेकिन लिखते वक्त उनके प्रसंगों में ब्रिटिश हुकूमत आततायी की तरह नही है। बल्कि वे उसकी व्यवस्था को अपने समय की वस्तुनिष्ठता के साथ दर्ज कर रहे हैं।

इस किताब का कई तरह से पाठ किया जा सकता है। नगेंद्रनाथ गुप्त के जीवन के बहाने हम उस समय के शहरों और कस्बों के जीवन में झांक सकते हैं। बंगाल के नैहट्टी रेलवे स्टेशन के बाहर कई साल पहले बंगाली दुकानदारों का जलवा था अब वहां बिहारी दुकानदारों ने कब्जा कर लिया। आप नगेंद्रनाथ गुप्त के ज़रिए उन्नीसवीं सदी के भारत में लोगों को आइसक्रीम खाते देख सकते हैं। घर में गाउन और पजामा पहने देख सकते हैं जो पत्रकार को पसंद नहीं है। जब वे किसी भारतीय जज या अधिकारी को नोट करते हैं तो उनके इलाके के कपड़े,पगड़ी और चप्पल का ज़िक्र करते हैं। इस आधार पर वे उस अधिकारी को बाकी अधिकारियों से फैसला करते हैं। ब्रिटिश अफसरों में घूस और ईमानदारी के द्वंद के भी कई किस्से हैं। जातिगत पूर्वाग्रह भी हैं। चूँकि इसे बारे में बहुत प्रसंग नहीं है लेकिन इसे आधार बना कर अच्छा ख़ासा अध्ययन हो सकता है। वे एक दो जगहों पर ऊंचा ललाट और खास तरह के चेहरे की पहचान को ब्राह्मणों से जोड़ते हैं। कई तरह के शब्द हैं जो अब प्रचलन में नहीं हैं। कई तरह की मस्तियां हैं जो अब भी हैं।


“जब पण्डित जी क्लास में आते थे तो हमारे कुछ शरारती साथी हाथ जोड़ कर सिर तक ले जाते थे और ज़ोर से कहते थे ‘ पण्‍डित जी प्रोनाउन (प्रणाम की जगह) और उधर से तुन्त जवाब आता था, ‘ बेंचोपरी’( बेंच के ऊपर खड़े हो जाओ)”
यह छपरा का प्रसंग है। प्रणाम का मज़ाक उड़ते-उड़ते प्रोनाउन हो गया है। शरारत प्रयोगधर्मिता को जन्म देती है। ऐसी मौलिकता तो आज के बच्चों की शरारत में कहां होगी। तब लेखक की उम्र बहुत कम थी। वे छपरा के सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे और यह कितना शानदार है कि बच्चे उस समय भी मास्टरों को छेड़ा करते थे। पुरखा पत्रकार ने बंकिम को भी करीब से देखा है और रवींद्रनाथ टगोर से तो दोस्ती ही थी। उनके बारे में लिखते हैं कि “कई महीनों तक वे कमीज़ नहीं पहनते थे और हमारे घर भी सिर्फ धोती पहने आ जाते थे।”

मुझे नगेंद्रनाथ गुप्त जी का देखना बहुत पसंद आया। वे कितनी चीज़ें देख रहे होते हैं। लिखा बहुत कम लेकिन जिस तरह से लिखा है अंदाज़ा हो जाता है कि कितना कुछ देखा है। एक आख़िरी प्रसंग।

“मैंने बाद में एक बार वाजिद अली शाह को कलकत्ता में देखा था। वह दुर्गा पूजा का आख़िरी दिन था और नवाब देवी की प्रतिमा का विसर्जन देखने के लिए अपने एकान्तवास से बाहर आए थे। वे अनपी भारी-भरमक चार पहिये वाली बग्गी पर थे और उनके आगे-पीछे उनके बाडीगार्ड चल रहे थे जो न ख़ुद चुस्त-दुरुस्त दिख रहे थे न उनके घोड़े। वाजिद अली शाह ख़ामोशी से हुक्का पी रहे थे और उनका साइस की सीट पर उनका हुक्काबरदार बैठा हुक्के को संभाल रहा था। नवाब काफी बूढ़े हो गये थे लेकिन उनके चेहरे से उनका नूर टपक रहा था और मैं बांग्ला मुहावरा इस्तमाल करूं तो वे भी तुरन्त टपकने वाले आम की तरह लग रहे थे। उनको देखने के साथ ही मुझे काल के क्रूर चक्र की भी याद आयी। “

शानदार विवरण है। ऐसा लग रहा है जैसे सत्यजीत रे वाजिद अली शाह के आख़िरी पलों को शूट कर रहे हों। इतने छोटे से पैराग्राफ़ में कितना कुछ दर्ज कर दिया है।

अरविन्द मोहन जी शुक्रिया। अनुवाद को साकार करने के लिए और मुझ तक पहुंचाने के लिए। अरविन्द मोहन एक संयोग से इस पुरखा पत्रकार को याद करते हैं कि दोनों का ताल्लुक मोतिहारी से है। मेरी भी है उस ज़िले से। शहर से भले न हो। हमने वाकई एक शानदार किताब पढ़ी है। एक पत्रकार के देखने को देखा है जो हमसे कोई करीब डेढ़ सौ साल पहले इस पेशे में आए थे। ग़ुलाम भारत में पत्रकारिता की स्वायत्ता गढ़ रहे थे। ग़ुलाम भारत में उभर रही आज़ादी की चाह की रेखाओं को दर्ज कर रहे थे।

ध्वस्त हो चुकी है बिहार की नौकरशाही

क्या ये मान लिया जाये कि बिहार में नौकरशाही पूरी तरह से ध्वस्त हो गया या फिर नौकरशाही में आने की जो प्रक्रिया है उस प्रक्रिया में बड़े बदलाव की जरूरत है । यह सवाल आज मैं इसलिए कर रहा हूं कि पांच वर्ष बाद एक बार फिर शुरू हुए जनता के दरबार में सीएम कार्यक्रम के दौरान जिस तरीके की शिकायत आ रही हैं उससे तो यही अनुमान लगाया जा सकता है कि बिहार की नौकरशाही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है । 

 जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम 2007 से  2014 के दौरान शायद ही ऐसा कोई दरबार रहा हो जिसमें मैं एक पत्रकार के रूप में शामिल नहीं हुआ हूं।उस कानून का भी मैं साक्षी हूं जिसके आधार पर जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम को स्थगित कर दिया गया था । जी है मैं बात कर रहा हूं राइट टू सर्विस एक्ट की जिसका रोजाना आज भी सूचना भवन में 50 से अधिक कर्मचारी हर शिकायत और उसके फैसले पर नजर रखते हैं ।

लेकिन यहां भी समस्या वहीं है जनता की शिकायत पर अधिकारी जो फैसला सुनाते हैं उन फैसलों को लागू करने वाले अधिकारी लागू नहीं कराते हैं ऐसे लाखों आदेश की कॉपी पंचायत से लेकर प्रखंड और जिला के दफ्तर में धूल फांक रहा है यह एक्ट भी नौकरशाही का भेट चढ़ गया ।

 इस बार जब से जनता के दरबार में मुख्यमंत्री कार्यक्रम का आयोजन किया गया है देखिए किस तरह की शिकायत आ रही है ।   कल अल्पसंख्यक कल्याण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौद्योगिकी, कला संस्कृति एवं युवा, वित्त, श्रम संसाधन व सामान्य प्रशासन पिछड़ा एवं अति पिछड़ा कल्याण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण के साथ मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य व समाज कल्याण विभाग से जुड़े 147 मामलों आया हुआ था जिसमें   समस्तीपुर से आये एक छात्र ने मुख्यमंत्री से गुहार लगाते हुए कहा कि वर्ष 2017 में ही मैट्रिक की परीक्षा पास की लेकिन 10 हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि नहीं दी गई है।

इसी तरह पिछले दरबार में  नवादा से चलकर आई 17 वर्षीय ईशु कुमारी कहती हैं, “हम मुख्यमंत्री बालिका प्रोत्साहन राशि को लेकर यहां आए हैं. हम साल 2019 में मैट्रिक और साल 2021 में इंटर फर्स्ट डिविजन से पास किए लेकिन प्रोत्साहन राशि नहीं मिली।प्रोत्साहन राशि का पैसा हर जिले में उपलब्ध है लेकिन सरकार के इस योजना का लाभ बच्चों को नहीं मिल रहा है।     इसी तरह शिवहर से आए एक युवक ने मुख्यमंत्री से फरियाद करते हुए कहा कि मैंने वर्ष 2016 में मैट्रिक की परीक्षा पास की लेकिन मेरे सर्टिफिकेट पर मेरी तस्वीर की बजाए एक लड़की की तस्वीर लगा दी गई है।

सर्टिफिकेट पर फोटाे सुधार के लिए बिहार बोर्ड में आवेदन भी किया, लेकिन अबतक सुधार नहीं हुआ जिस वजह से इसकी पढ़ाई बाधित हो गयी है।अंक पत्र में सुधार ,नाम में सुधार जैसी समस्या आम है लेकिन इसमें सुधार हो इसके लिए आपको वर्षो बोर्ड के दफ्तर का चक्कर लगाना पड़ेगा ।हर जिला में आंगनबाड़ी केंद्र में काम करने वाली सेविका और सहायिका के मानदेय के लिए राशि उपलब्ध है लेकिन दो वर्ष से मानदेय नहीं मिल रहा है ।

पीडीएस से अनाज नहीं मिल रहा है ,डॉक्टर अस्पताल नहीं आ रहे हैं  इसी तरह सीएम नीतीश कुमार के ड्रीम प्रोजेक्ट ‘सात निश्चय योजना में काम की गुणवत्ता और सात निश्चय योजना का काम पूरा नहीं होने साथ ही ‘स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना का लाभ मिलने वाले छात्रों को बैंक द्वारा परेशान किये जाना और प्रधानमंत्री आवास योजना के निर्माण में गड़बड़ी और आवंटन को लेकर हेराफेरी, उद्योग विभाग से अनुदान समय पर नहीं मिल रहा है, बिजली बिल में सुधार नहीं हो रहा है जैसे मामले आ रहे हैं ,जमीन और पुलिस से जुड़े से जुड़े मामले पर चर्चा करना ही बेमानी है वहां तो और स्थिति खराब है हर दिन नये प्रयोग हो रहे हैं और उस प्रयोग का पलीता लगाने के लिए पूरा सिस्टम मानो इन्तजार करता रहता है।

   ये ऐसी समस्या है जिसका समाधान ऑन स्पॉट हो सकता है  लेकिन इसके लिए लोगों को सीएम से मिलना पड़ रहा। मतलब सिस्टम गैर जवाबदेह है किसकी क्या जिम्मेदारी है या तो तय नहीं है या फिर तय है तो उसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं है । इस विफलता को आप क्या कहेंगे जबकि सबको पता है कि बीमारी क्या है, ऐसे में आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप क्या होगा कहना मुश्किल है क्यों कि पब्लिक अब पहले से ज्यादा सजग हो गया है अधिकार क्या है ये समझ में आने लगा है, अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत बढ़ती जा रही है । बस समस्या यह है कि हम अपना प्रतिनिधि कैसे चुने इसको लेकर समझ अभी भी 20वीं सदी वाला ही है ।

दरभंगा एयरपोर्ट के विस्तारीकरण का रास्ता हुआ साफ।

पटना – बिहार कैबिनेट की बैठक में आज कुल 12 एजेंडे पर मोहर लगी है । महत्वपूर्ण एजेंडे में राज्य सरकार ने दरभंगा एयरपोर्ट के विस्तारीकरण के लिए तीन अरब 36 करोड़ 76 लाख देने की स्वीकृति बिहार की सरकार ने दी है इसके अलावे आपदा प्रबंधन के तहत फसल क्षति को लेकर 550 करोड़ रुपए देने की स्वीकृति कैबिनेट के द्वारा दी है।

अतिवृष्टि के कारण कई जिलों में काफी नुकसान हुआ है इसको लेकर आपदा प्रबंधन विभाग ने 100 करोड़ की आकस्मिक निधि से राशि देने की स्वीकृति दी है ।

कृषि सिंचाई योजना के तहत लगभग 36 करोड़ 12 लाख रुपया देने की स्वीकृति दी गई है वहीं बिहार सरकार ने दलहन और तिलहन की मिनी किट योजना के तहत लगभग 50 करोड़ 61 लाख रुपया देने की।स्वीकृति दी है। कैबिनेट के अपर सचिव संजय कुमार ने की जानकारी देते हुए कहा कि इस बार के कैबिनेट में कुल 12 एजेंटों पर सहमति मिली है जिसमें मुख्य रूप से ऊर्जा कृषि और आपदा प्रबंधन विभाग से जुड़े मामले हैं केंद्र और बिहार की सरकार पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना के तहत सभी किसानों को सिंचाई का लाभ मिले इसको लेकर रु.872600000 की राशि देने की स्वीकृति दी गई है ताकि किसान सिंचाई को लेकर तत्पर हो सके और वर्तमान केंद्र और बिहार सरकार किसानों को 90% अनुदान देने पर सिंचाई की व्यवस्था कराने जा रही है।

जेपी के सम्पूर्ण क्रांति के सपने को मैं हमेशा याद रखता हूं – नीतीश कुमार

श्री नीतीश कुमार लोक नायक जयप्रकाश नारायण जी की जीवनी पर अधारित पुस्तक “द ड्रीम ऑफ़ रेवोल्यूशन ” का विमोचन करते हुए कहा कि जेपी में गांधी और लोहिया दोनों के विचार को साथ लेकर चलते थे उनके सम्पर्ण क्रांति के उदघोष को देखते हुए ही मैंने दिल्ली से पटना आने वाली ट्रेन का नाम सम्पूर्ण क्रांति दिया था ताकि लोग जान सके कि सम्पूर्ण क्रांति नाम के पीछे वजह क्या है।

इसी तरह नीतीश ने कहा कि मैं जो भी काम करता हूं उसके पीछे जेपी का दर्शन होता है जेपी ने गांधी के बाद देश को आन्दोलन करने कि ताकत दी ।

जेपी के याद में जुटे जेपी सेनानी

जेपी के सपनों का देश बना रहे हैं पीएम मोदी, सिताबदियारा में जेपी की मूर्ति पर किया माल्यार्पण – सुशील मोदी

पटना 11.10.2021
पूर्व उपमुख्यमंत्री और राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जेपी के सपनों का बिहार और देश बना रहे हैं। राष्ट्रीय फलक पर भ्रष्टाचार मुक्त देश की दुनिया भर में सराहना हो रही है।

श्री मोदी आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताब दियारा में उनकी मूर्ति पर माल्यार्पण किया। श्री मोदी ने कहा कि जेपी का नारा था भ्रष्टाचार मिटायेंगे, नया बिहार बनायेंगे। लेकिन अपने को जेपी का वारिस कहने वाले राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे रहे और जेल की हवा खाई। यही नहीं चार घोटाला, अलकतरा सहित कई घोटाले के मामलों में इनके कई मंत्रियों को जेल जाना पड़ा।

श्री मोदी ने जेपी के प्रति अपनी श्रद्धा निवेदित करते हुए कहा कि बिहार और देश में एनडीए की सरकार बनने के बाद से अब तक किसी पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगा। पीएम मोदी पर तो उंगली तक नहीं उठी।

आज पूरी दुनिया में पीएम मोदी के विकास का डंका बज रहा है। लेकिन जेपी के साथ विश्वासघात करने वाले राजद के लोगों द्वारा किये गए भ्रष्टाचार को देश की जनता कभी माफ करने वाली नहीं।

जनता दरबार में बच्चे अपना शैक्षणिक प्रमाण पत्र ठीक कराने आ रहा है ।

जनता दरबार में बिहार के मुख्यमंत्री कार्यक्रम के दौरान आज अल्पसंख्यक कल्याण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, सूचना प्रौधोगिकी, कला संस्कृति एवं युवा, वित्त, श्रम संसाधन व सामान्य प्रशासन पिछड़ा एवं अति पिछड़ा कल्याण, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण के साथ मुख्य रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य व समाज कल्याण विभाग से जुड़े 147 मामलों को मुख्यमंत्री ने सुना।

इस दौरान बिहार विधालय परीक्षा समिति के कारनामे से परेशान शिवहर के एक युवक ने कहा कि वह पुरुष है और उसके मैट्रिक के सर्टिफिकेट में लड़की की तस्वीर लगा दी गई।

युवक नीतीश से बोला सर इसकी वजह से मुझे काफी परेशानी हो रही है, कृपया समस्या का समाधान करें तीन वर्ष से बोर्ड का चक्कर लगा रहे हैं लेकिन इसका समाधान नहीं निकल पाया है सीएम तत्तकाल बोर्ड के अध्यक्ष को समाधान निकालने का निर्देश दिया ।

कैमूर से आए एक युवक ने जब अपना नाम नीतीश कुमार बताया तो मुख्यमंत्री मुस्कुरा दिए। सीएम ने कहा कि आप भी मेरा नाम रख लिए। युवक ने भी जवाब दिया, सर मैंने नहीं माता-पिता ने मेरा नाम नीतीश कुमार रखा था। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज कल नीतीश नाम पड़ा लोग रख रहे हैं। बाद में सीएम ने युवक की समस्या सुनी और अधिकारियों से निदान करवाया।

आपातकाल से जुड़ी भूली विसरी यादें (भाग -1)

जेपी के जयंती के मौके पर आज से जेपी आंदोलन से जुड़ी ऐसी दास्तान से आपको रूबरू कराएंगे जिसनें इंदिरा जैसी मजबूत शासक को धूल चटा दिया था ।

लेखक — फूलेन्द्र कुमार सिंह आंसू
(जेपी आंदोलन के अग्रगी छात्र नेता थे)

आपातकाल के जमाने की भूली विसरी यादें (भाग -1)
आपातकाल( २६ जून)
26 जून 1975 ,याद करके रोंगटे खड़े हो रहे हैं,एक दिन पहले शाम में आंदोलन के साथियों के साथ बैठकर दिल्ली में हुए जे पी के सभा के संभावित नतीजों पर चर्चा की थी ।इस बात की संभावना तो बिलकुल नहीं थी की इंदिरा जी जे पी के मांग पर इस्तीफा देंगी लेकिन बदले राजनैतिक हालात में इंदिरा जी ,आंदोलन के हक़ में कुछ राजनैतिक फैसला करेंगी ।

अहले सुबह हमारे आंदोलन के साथी स्वर्गीय कुमार प्रियदर्शी हमारे हॉस्टल( एम आई टी ,मुज़फ्फर पुर ) आये ।प्रिय दर्शी हमारे छोटे भाई सदृश्य थे ,मालीघाट (मुज़फ्फर पुर जेल के पास ) रहते थे ,सायकिल से आये थे ।सुबह- सुबह वे कभी मिलने नहीं आते थे ,मैं कुछ पूछता ,उन्हों ने जे पी की गिरफ्तारी की सुचना देकर धमाका कर दिया ,मैं सकते में था ,थोड़ा नर्भस भी हुआ ,अपने को सम्हाल नहीं पा रहा था ,आपातकाल घोषित होना ,बिपक्ष के सभी बड़े नेताओं की गिरफ़्तारी ,अखबारों के सेंशरशिप की बातें धीरे -धीरे उनहोंने मुझे बताई ।

धीरे -धीरे अपने भावनाओं पर काबू पाने की कोशिश की ।कालेज के कुछेक
विश्वशनीय आंदोलन के साथियों की बैठक बुलाई और तुरंत की प्रतिक्रिया स्वरुप शहर में मौन जुलुश (मूँह पर काला पट्टी बांधकर ) निकालने का निर्णय लिया ।मै खुद इंजिनीरिंग के अंतिम वर्ष का छात्र था ,कालेज के सभी आंदोलन के साथयों को गुप्त सुचना (समय और स्थान के साथ ) भिजवा दी । प्रकाश (मेरा बैचमेट और अभिन्न मित्र ) और प्रियदर्शी ने लगभग दो घंटे के अंदर काली पट्टी और स्टिकर( इमरजेंसी वापस लो ,जे पी को रिहा करो जैसे नारे लिखवाकर ) कालेज केम्पस आ गए ।

हमारे कुछ अन्य अभिन्न मित्र जी आंदोलन का नैतिक समर्थन करते थे लेकिन आंदोलन में सक्रिय नहीं थे ,उन्हें किसी प्रकार मेरी योजना की भनक लग गयी मुझे समझाने आ गए ,मुझे गिरफ्तार होने का भय दिखाया , अपने समेत बांकी छात्रों के कैरियर ख़राब हो जाने का भय दिखाया गया ।

एक पल के लिए मुझे लगा की कालेज छात्र संघ के महासचिव के हैसियत से अपने समर्थक छात्रों के गिरफ्तार होने और कैरियर से खिलवाड़ करने का ख़तरा मुझे उठाना चाहिए था या नहीं । Instant reaction देने के पक्ष में
अपने निर्णय पर अडिग रहा चाहे खतरा जो भी हो ।

प्रकाश और प्रियदर्शी के आने तक हमने प्रशाशन को देने हेतु एक मेमोरंडम भी तैयार कर लिया ।
हमें उम्मीद नहीं थी कि मेरी सुचना पर 150से 200 छात्र बताएं स्थान,लक्ष्मी चौक पर आ जायेंगे ,मूँह पर काली पट्टी बांध कर और हांथों में नारे वाले स्टिकर लेकर ,मेरे पीछे निकल पड़ेंगे ।

संभव है उन्हें मौन जुलुश, सामान्य जुलुश लगा हो ,गिरफ्तारी भी हो सकती है जिसपर उनहोंने सोचा ही ना हो या फिर अपने प्रिय एवम सम्मानित नेता जे पी की गिरफ्तारी की अप्रत्याशित सुचना उनके अंदर भी गुस्सा भर दिया हो ,एक तथ्य यह भी था कि उसके पहले पुलिश ,आंदोलन के क्रम में अन्य कालेज या उसके छात्रावाश से छात्रों को गिरफ्तार किया करती थी लेकिन एम आई टी या इसके किसी छात्रावास से किसी छात्र की गिरफ्ता7री नहीं की थी ,एक तरह से एम आई टी छात्र अपनेआपको privileged समझते थे ।

हमलोग 11 बजे निकल पड़े ,ब्रह्मपुरा चौक -जुरंनछपडा -सरैयागंज टावर -गरीब स्थान -प्रभात टाकीज –दीपक टाकीज -छोटी कल्याणी -कल्याणी चौक -मोतीझील होते हुए हमलोग बी बी कॉलेजिएट के गेट पर जुलुश रोक दिए ।
मैं आश्चर्यचकित था कि कहीं से पुलिश का हस्तक्षेप नहीं हुआ ,जुलुश के रास्ते शहर के लोग हमारे पास आते थे ,हमारे स्टिकर पर लगे नारों को पढ़ते थे ,आँखों में आश्चर्य ,भय लेकिन अपनापन का भाव दिखता था ,कुछ बोलते नहीं थे क्योंकि हमारे मूँह पर पट्टी बंधी थी लेकिन चेहरे के भाव स्पष्ट थे कि हमारी गिरफ्तारी निश्चित थी ।

बी बी कॉलेजिएट गेट पर हमने आपसी विमर्श से यह निर्णय लिया कि, इतने छात्रों के गिरफ्तारी का खतरा अब ना उठाया जाए ,मैं खुद ,प्रकाश और प्रियदर्शी सामने टाउन थाना जाकर डी एस पी से मिलकर अपना मेमोरंडम सौंपें अगर गिरफ्तारी हुई ,सभी छात्र अपने -अपने हॉस्टल लौट जायेंगे ,अन्यथा वहीँ पर इन्तजार करेंगे ।

हमलोग डी एस पी से उनके कार्यालय कक्ष में मिले ,वे हमें देखकर भौचक हो गए , उन्हें सूझ नहीं रहा था कि हमारे साथ क्या व्यवहार किया जाय ,हमने उन्हें बताया था हमलोग करीब 200 छात्र इमरजेंसी का और जे पी के गिरफ्तारी का विरोध स्वरूप मूँह पर पट्टी बांधकर अपना मेमोरंडम सौंपने आये हैं ताकि आपके माध्यम से अपना विरोध सरकार को बता सकें ,उन्होंने हमें हड़काया ,गिरफ्तारी की धमकी दी लेकिन हमलोग अपना मेमोरंडम उन्हें प्राप्त कराकर ही माना ,मुझे लगा कि इतने छात्रों की गिरफ्तारी से उत्पन्न संभावित प्रतिक्रिया से वे घबरा गए थे
या शायद बड़े नेताओं के गिरफ्तारी का ही आदेश उन्हें प्राप्त हो ,हमें टालना ही उन्हें भला लगा हो ।
हमलोग वहां से शहीद खुदीराम बोस स्मारक आ गए ,आपातकाल और जे पी के गिरफ्तारी के विरोध में अपनी बातें रखी, वहां से अपने अपने हॉस्टल वापस हो गए ।

लगभग 3 बजे दिन में मेरे रूम को नोक किया गया ,मैं खाना खाकर सो गया था ,मैंने गेट खोला तो पाया कि हमारे प्राचार्य श्री एस प्रसाद ,हमारे टीचर श्री एम ऍन पि वर्मा और डी एस पी साहेब गेट पर थे ,मुझे लगा कि मेरी गिरफ्तारी तय है ,लेकिन ऐसा नहीं हुआ ,वे हमें समझाने आये थे ,हमसे आश्वासन चाहते थे कि केम्पस में ऐसी गतिविधि फिर से ना हो ,हम अपना और लड़कों के भविष्य से ना खेलें ।काफी बातें हुई ,हम इतना आश्वासन अवश्य दिए कि मेरे निजी तौर पर सक्रीय नहीं होने का आश्वासन मैं नहीं दे पाऊंगा लेकिन अन्य छात्रों की सक्रियता में मेरी कोई भूमिका नहीं होगी ।मैंने यह भी स्पष्ट किया कि जे पी की गिरफ्तारी जैसी बड़ी सुचना मिलने की स्थिति में मेरी क्या प्रतिक्रया होगी ,इस संबंध में आज कोई आश्वासन नहीं दे पाऊंगा ।

लेखक — फूलेन्द्र कुमार सिंह आंसू
(जेपी आंदोलन के अग्रगी छात्र नेता थे)

केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग को लेकर पटना की सड़क पर उतरे लोग

लखीमपुर खीरी जनसंहार के खिलाफ विरोध मार्च

जेपी जंयती के मौके पर आज अखिल भारतीय किसान महासभा और भाकपा माले की ओर केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी को मंत्रिमंडल से बर्खास्त करने की मांग को लेकर कारगिल चौक से जे. पी. गोलम्बर तक विरोध मार्च निकाला इस मौके पर आन्दोलन कर रहे किसानों का समर्थन करते हुए घोषणा किया कि ।

12 अक्टूबर को देशभर में लखीमपुर खीरी में शहीद किसानों के अरदास के दिन मोमबत्ती मार्च व घरों के सामने किसानों के याद में पांच मोमबत्ती जलाने का घोषणा की गई इसमें बिहार के भी किसान शामिल होगे और किसान आन्दोलन से जुड़े संगठन पटना जंक्शन से बुध्दा स्मृति पार्क तक मोमबत्ती मार्च और पटना सिटी में गुरुद्वारा के निकट मोमबत्ती जलायेगा । .

नए रिकॉर्ड स्तर सेंसेक्स, निफ्टी; निफ्टी पहली बार 17900 के ऊपर तो सेंसेक्स 60100 के ऊपर बंद हुआ।

सोमवार को सेंसेक्स 76.72 अंक ऊपर 60,135.78 पर , निफ्टी 50.75 अंक ऊपर 17,945.95 पर बंद हुआ । दिन में सेंसेक्स 417 अंक बढ़कर 60,476.13 के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया था, निफ्टी 50 इंडेक्स भी पहली बार अपने महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर 18,000 से ऊपर 18,041.95 के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया था ।

सेंसेक्स चार्ट (11.10.21) एक नजर में

सेक्टरों में आईटी इंडेक्स में 3 फीसदी की गिरावट आई, जबकि ऑटो, बैंक, मेटल, पावर और रियल्टी इंडेक्स में 1-2.5 फीसदी की तेजी आई। बीएसई के मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में 0.5% की तेजी आई।

सेंसेक्स पर करीब 20 बढ़त और 10 गिरावट के करीब थे। बीएसई पर कारोबार के दौरान 369 शेयर्स 52 हफ्ते के ऊपरी स्तर पर और 21 शेयर्स 52 हफ्ते के निचले स्तर पर कारोबार करते दिखे।

मारुति सुजुकी, पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, आईटीसी, एनटीपीसी, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई), कोटक बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, शीर्ष बढ़त प्राप्त करने वालों में से थे।

दूसरी तरफ, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस), टेक महिंद्रा, इंफोसिस, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल), भारती एयरटेल शीर्ष इंडेक्स लूसर में थे।

सेंसेक्स के शेयर एक नजर में

निफ्टी में 34 एडवांस और 16 गिरावट आई थी। टाटा मोटर्स, कोल इंडिया और मारुति सूचकांक में ऊपर रहे, जबकि टीसीएस, टेक महिंद्रा और इंफोसिस नीचे रहे।

निफ्टी के प्रमुख शेयरों के टॉप गेनर और लूजर का हाल

बाढ़ प्रभालित इलाकों में दिसम्बर तक स्थिति समान्य हो जायेंगी

बिहार के बाढ़ प्रभावित इलकों में जन जीवन जल्द जल्द से बहाल हो सके इसके लिए सीएम खुद मॉनिटरिंग कर रहे हैं,मीडिया से बात करते हुए सीएम ने कहा कि बाढ़ से राज्य में क्या नुकासान हुआ है

उसका मूल्यांकन चल रहा है जिले के सारे अधिकारी इस काम में लगे हुए हैं जल्द ही केंद्र को रिपोर्ट भेजी जाएगी कि कितना नुकसान हुआ है कल तक रिपोर्ट आ जानी चाहिए और हम जिले के अधिकारियों से लगातार सम्पर्क में हैं ।दिसम्बर तक स्थिति समान्य हो जायेंगी ।

बिहार बिजली संकट से निपटने के लिए बाजार से किसी भी किमत पर बिजली खरीदने का लिया निर्णय

देश में जारी बिजली संकट का असर बिहार में भी देखने को मिल रहा है खास करके ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई है हलाकि सरकार ने दुर्गा पूजा को देखते हुए निर्णय लिया है कि जिस भी रेट में बिजली उपलब्ध है खरीदारी करना है ।

मीडिया से बात करते हुए सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार को जो कोटा निर्धारित है उतनी आपूर्ति नहीं हो पा रही है इसलिए समस्या हो रही है हम ज्यादा दाम पर बिजली खरीद करके लोगों को दे रहे हैं ।

5 दिनों में 570 लाख यूनिट बिजली की खरीद की गई है बिजली खरीदने में पैसा ज्यादा लग रहा है फिलहाल हम लोग नजर बनाये हुए हैं वैसे ये समस्या पूरे देश का है फिर भी राज्य सरकार बिजली व्यवस्था बने रहे इसके लिए सजग है ।

जेपी की 119 जयंती आज पूरे राज्य में राजकीय सम्मान के साथ मनायी जा रही है जयंती

जेपी के 119वीं जयंती के मौके पर आज पूरे राज्य में अलग अलग तरीके से बिहारवासी जेपी को याद कर रहे हैं इस मौके पर चरखा समिति पटना में मुख्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया ।

कार्यक्रम शामिल होने के बाद मीडिया से बात करते हुए सीएम नीतीश कुमार ने कहा कि जेपी आंदोलन सारी तैयारियां यहीं पर हुई थी।मेरा सौभाग्य था मैं उनसे जुड़ा था मुझे बहुत मानते थे।जयप्रकाश जी से जो सीखा उसी के आधार पर काम कर रहा हूं।

गांधी जेपी लोहिया के आदर्श को मानते हुए समाज को आगे बढ़ाना है आपस में भाईचारा कायम रखना है।
जेपी आवास पर मैं नहीं आता तो मुझे संतोष नहीं होता है,जेपी के विचार को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।

स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का नौ-दिवसीय आयोजन शारदीय नवरात्रि।

स्त्रीत्व का उत्सव !
स्त्री-शक्ति के प्रति सम्मान का नौ-दिवसीय आयोजन शारदीय नवरात्रि अवसर है नमन करने का उस सृजनात्मक शक्ति को जिसे ईश्वर ने सिर्फ स्त्रियों को सौंपा है। उस अथाह प्यार, ममता और करुणा को जो कभी मां के रूप में व्यक्त होता है, कभी बहन, कभी बेटी, कभी मित्र, कभी प्रिया और कभी पत्नी के रूप में।

दुर्गा पूजा, गौरी पूजा और काली पूजा वस्तुतः उसी स्त्री-शक्ति के तीन विभिन्न आयामों के सम्मान के प्रतीकात्मक आयोजन हैं। काली स्त्री का आदिम, अनगढ़, अनियंत्रित स्वरुप है जिस पर काबू करना पुरुष अहंकार के बस की बात नहीं। गौरी या पार्वती स्त्री का सामाजिक तौर पर नियंत्रित, गृहस्थ, ममतालु रूप है जो सृष्टि का जनन भी करती है और पालन भी। दुर्गा स्त्री के आदिम और गृहस्थ रूपों के बीच की वह स्थिति है जो परिस्थितियों के अनुरुप करूणामयी भी है, कभी संहारक भी।

कालान्तर में इन तीनों प्रतीकों के साथ असंख्य मिथक जुड़ते चले गए और इस आयोजन ने अपना उद्देश्य और अपनी अर्थवत्ता खोकर विशुद्ध कर्मकांड का रूप ले लिया। स्त्री के सांकेतिक रूप आज हमारे आराध्य बन बैठे हैं और जिस स्त्री के सम्मान के लिए ये तमाम प्रतीक गढ़े गए, वह पुरूष अहंकार के पैरों तले आज भी रौंदी जा रही हैं। जिस देश में सूअर, मगरमच्छ, उल्लूओ, बैलों और चूहों तक को देवताओं के अवतार और वाहन का दर्जा प्राप्त है, उस देश में स्त्रियों को सिर्फ इसलिए गर्भ में मार दिया जाता है कि वह कुल का दीपक नहीं, ज़िम्मेदारी है। इसलिए अपमानित किया जाता है कि उसने अपनी पसंद के कपडे पहन रखे हैं। इसलिए रौंद डाला जाता है कि उसने घर की दहलीज़ से बाहर क़दम रखने की कोशिश की।

स्त्रियों के प्रति हमारे विचारों और कर्म में विरोधाभास हमेशा से हमारी संस्कृति का बड़ा संकट रहा है। स्त्री एक साथ स्वर्ग की सीढ़ी भी रही है और नर्क का द्वार भी। घर की लक्ष्मी भी और ‘ताड़न’ की अधिकारी भी। मनुष्यता की जननी भी और मजे के लिए बिकने वाली देह भी। जबतक हम देवियों की काल्पनिक मूर्तियों की जगह जीवित देवियों का सम्मान करना नहीं सीख लेते, नवरात्रि के कर्मकांड का कोई अर्थ नहीं !

यह आयोजन तब सार्थक होगा जब पुरूष स्त्रियों के विरुद्ध हजारों सालों से जारी भ्रूण-हत्या, लैंगिक भेदभाव, बलात्कार, उत्पीडन और उन्हें वस्तु या उपभोग का सामान समझने की मानसिकता बदलें और स्त्रियां खुद भी अपने भीतर मौजूद काली, पार्वती और दुर्गा को पहचानने और आवश्यकता के अनुरूप उनका इस्तेमाल करना सीखे !

लेखक -ध्रुव गुप्ता

केन्द्रीयमंत्री गिरिराज सिंह अपने ही सरकार के कार्यशैली पर खड़े सवाल पंचायत सरकार सही से काम नहीं कर रहा है ।

बिहार के ग्राम पंचायत के विकास मॉडल और प्रशासनिक तंत्र पर आज केंद्रीय पंचायती राज व ग्रामीण विकास मंत्री गिरिराज सिंह ने ना सिर्फ सवाल ही खड़े किये बल्कि तथ्यों के साथ मंत्री और पदाधिकारी को कटघरे में भी खड़े कर दिये ,जबकि बिहार सरकार का यह विभाग बीजेपी के कोटे में ही है।

1– पंचायत सरकार सही से काम नहीं कर रहा है
हुआ ऐसा कि आज केन्द्रीयमंत्री गिरिराज सिंह ने पंचायती राज से जुड़े विभाग की समीक्षा बैठक बुलाई थी जिसमें उन्होंने कहा है कि बिहार में सिर्फ ग्राम पंचायत सरकार भवन है। ग्राम पंचायत सरकार नहीं चल रही है। ग्राम सभा की बैठकें नहीं हो रहीं।
उन्होंने गांवों के विकास के लिए काम करने वाले सरकारी कर्मियों की प्रतिदिन की उपस्थिति ग्राम पंचायत सरकार भवन में सुनिश्चित करने की ओर भी पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी का ध्यान आकृष्ट किया। बैठक में राजस्व एवं भूमि सुधार, पंचायती राज, ग्रामीण विकास, ग्रामीण कार्य, निबंधन, कृषि और निबंधन विभाग के अधिकारी उपस्थित थे। बैठक में पंचायती राज मंत्री सम्राट चौधरी, केंद्रीय सचिव हुकम सिंह मीणा, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के अपर मुख्य सचिव विवेक सिंह, निदेशक जय सिंह, पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव अरविंद चौधरी एवं निदेशक रणजीत कुमार सिंह ने प्रस्तुति के जरिए विभाग के कामकाज संबंधी उपलब्धियों को केंद्रीय मंत्री को अवगत कराया।

2–बिहार में जमीन के दाखिल खारिज

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बिहार में जमीन के दाखिल खारिज में हो रही की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसी व्यवस्था बनाए कि लोगों को सीओ और एसडीओ के अलावा दूसरे कार्यालय में गुलाब और गेंदा का माला लेकर जाने से निजात मिल जाए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सपना है कि घर बैठे लोगों को जमीन संबंधित सभी दस्तावेज डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो जाए। जमीन संबंधी कार्यों के लिए सरकारी दफ्तरों में वसूली पर केंद्रीय मंत्री ने करारा कटाक्ष किया।


गिरिराज ने कृषि विभाग के अधिकारियों का ध्यान भूमि संरक्षण संबंधित कार्यों में तेजी लाने की ओर आकृष्ट किया। भूमि संरक्षण को लेकर बिहार में हुए कार्यों के प्रति संतोष प्रकट किया।

मुख्यमंत्री ने पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की समीक्षा की

मुख्यमंत्री ने पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की समीक्षा की

मुख्य बिन्दु

• सभी जिलों में अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू उच्च विद्यालय खोलें।

• अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण छात्रावासों, जननायक कर्पूरी ठाकुर कल्याण छात्रावासों, प्राक् परीक्षा प्रशिक्षण केंद्रों, अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू उच्च विद्यालयों, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति छात्रावासों के साथ-साथ सभी अल्पसंख्यक छात्रावासों में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु ऑन लाइन क्लास / कोचिंग की सुविधा प्रारंभ की जायेगी।

• जिन जिलों में जननायक कर्पूरी ठाकुर कल्याण छात्रावास निर्माणाधीन हैं, उनका निर्माण कार्य तेजी से पूर्ण करें।
• अन्य पिछड़ा वर्ग प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना, मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग मेधावृत्ति योजना एवं मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग मेघावृत्ति योजनाओं के अंतर्गत छात्र/छात्राओं के बकाये छात्रवृत्ति / प्रोत्साहन राशि का भुगतान शीघ्र करें।

पटना, 09 अक्टूबर 2021 :- मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार ने 1 अणे मार्ग स्थित संकल्प में पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की समीक्षा की। बैठक में पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के सचिव श्री पंकज कुमार ने विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं की अद्यतन जानकारी दी।

उन्होंने मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग मेधा वृत्ति योजना, मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग मेधा वृत्ति योजना, अन्य पिछड़ा वर्ग प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना, अन्य पिछड़ा वर्ग प्री मैट्रिक छात्र योजना, मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग प्रेवेशिकोत्तर योजना, अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू उच्च विद्यालय, जननायक कर्पूरी ठाकुर कल्याण छात्रावास योजना, अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण छात्रावास योजना, प्राक् परीक्षा प्रशिक्षण केंद्र योजना, मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग सिविल

सेवा प्रोत्साहन योजना, मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग एवं अति पिछड़ा वर्ग छात्रावास अनुदान योजना तथा छात्रावासों में खाद्यान आपूर्ति योजना के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। समीक्षा के दौरान मुख्यमंत्री ने निर्देश देते हुए कहा कि सभी जिलों में अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू उच्च विद्यालय खोलें। जिन जिलों में जननायक कर्पूरी ठाकुर कल्याण छात्रावास निर्माणाधीन हैं, उनका निर्माण कार्य तेजी से पूर्ण करें।

उन्होंने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग प्रवेशिकोत्तर छात्रवृत्ति योजना, मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग मेधावृत्ति योजना एवं मुख्यमंत्री पिछड़ा वर्ग मेधावृत्ति योजनाओं के अंतर्गत छात्र / छात्राओं के बकाये

छात्रवृत्ति / प्रोत्साहन राशि का भुगतान शीघ्र करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग कल्याण छात्रावासों, जननायक कर्पूरी ठाकुर कल्याण छात्रावासों, प्राक् परीक्षा प्रशिक्षण केंद्रों, अन्य पिछड़ा वर्ग कन्या आवासीय प्लस टू

उच्च विद्यालयों, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति छात्रावासों के साथ-साथ सभी अल्पसंख्यक छात्रावासों में प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु ऑन लाइन क्लास / कोचिंग की सुविधा प्रारंभ की जायेगी इस हेतू सभी व्यवस्था सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि जानकारी दी गई है कि मुख्यमंत्री अत्यंत पिछड़ा वर्ग सिविल सेवा प्रोत्साहन योजना से छात्र / छात्राएं काफी लाभान्वित हो रहे हैं, यह खुशी की बात है।

राज्य के सभी जिलों में इंजीनियरिंग कॉलेज खोले जा रहे हैं, कई मेडिकल कॉलेज भी खोले जा रहे हैं ताकि यहां के छात्र/छात्राओं को उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सहूलियत हो ।

बैठक में उप मुख्यमंत्री-सह-पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग की मंत्री श्रीमती रेणु देवी, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री दीपक कुमार, मुख्य सचिव श्री त्रिपुरारी शरण, विकास आयुक्त श्री आमिर सुबहानी, अपर मुख्य सचिव शिक्षा श्री संजय कुमार, अपर मुख्य सचिव वित्त श्री एस० सिद्धार्थ, मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव श्री चंचल कुमार, पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के सचिव श्री पंकज कुमार, बिहार राज्य पुल निर्माण निगम लिमिटेड के प्रबंध निदेशक श्री पंकज कुमार पाल, मुख्यमंत्री के सचिव श्री अनुपम कुमार, पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग के विशेष सचिव श्री वीरेन्द्र प्रसाद यादव एवं मुख्यमंत्री के विशेष कार्य पदाधिकारी श्री गोपाल सिंह उपस्थित थे।

कोठे की तवायफ़ और एक बिका हुआ पत्रकार , दोनों एक ही श्रेणी में आते हैं।

जिस दौर में सुनील दत्त अपने बेटे संजय दत्त के लिए लड़ाई लड़ रहे थे उस समय बाल मन बार बार सोचता था सुनील दत्त जैसा व्यक्तित्व के साथ कांग्रेस को खड़े रहना चाहिए था।

गुस्सा आता था कांग्रेस पर, मुंबई पुलिस पर सुनवाई कर रहे जज पर ।आखिर संजय दत्त ने ऐसा क्या अपराध कर दिया जो सारे लोग उससे मुख मोड़ लिया, ना उसके पास से कोई हथियार बरामद हुआ था और ना ही उस हथियार से किसी की हत्या हुई थी फिर भी पूरा सिस्टम सुनील दत्त के साथ ऐसा व्यवहार कर रहा था जैसे वो दाऊद का पिता हो।

बाल मन था उस समय सोचने का नजरिया कुछ ऐसा ही था ।दिल्ली जब पढ़ाई के लिए पहुंचे तो उसी दौरान 1996 में लॉ फैकल्टी में पढ़ाई कर रही छात्रा प्रियदर्शिनी मट्टू की हत्या कर दी गयी थी उस हत्या के आरोप में लाॅ फैकल्टी के ही सीनियर संतोष सिंह पर बलात्कार करके हत्या करने का आरोप लगा संतोष सिंह के पिता उस समय दिल्ली पुलिस में डीसीपी थे संतोष सिंह की गिरफ्तारी ही नहीं हुई बाद में सजा भी हुआ ।

बाद में दिल्ली में ही 1999 में हरियाणा के नेता और बड़े कारोबारी का बेटा मनु शर्मा ने जेसिका लाल का मर्डर कर दिया था इस केस में भी बस उसकी बहन खड़ी हो गयी तो सिस्टम चाह करके भी कुछ नहीं कर पाया। इसी तरह याद करिए नीतीश कटारा हत्याकांड मामला नीलम कटारा खड़ी हो गयी तो बाहुबली डीपी यादव अपने बेटे को बचा नहीं पाया याद करिए प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन का मामला सत्ता का कोई लाभ मिलता हुआ नहीं दिखा।

याद करिए वो दौर जब प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के लिए विज्ञान भवन में अस्थायीजेल बनाया गया था क्यों पीएम पर भ्रष्टाचार से जुड़े एक मामले की सुनवाई चल रही थी और हो सकता है पीएम को सजा हो जाये मतलब ऐसा हो सकता है इसको देखते हुए अस्थायी जेल उसी अधिकारी ने बनवाया जो दिन रात पीएम को सैल्यूट मारता था ।

और आज इसी देश में एक मंत्री के बेटे पर हत्या का आरोप है पुलिस गिरफ्तार करने के बजाय सम्मन जारी कर रहा है लेकिन वो पुलिस के सामने उपस्थित नहीं होता है ।आज दूसरे दिन भी पुलिस मंत्री के आवास पर सम्मन चिपका कर लौट आया है लेकिन अभी तक हाजिर नहीं हुआ है ।

सुप्रीम कोर्ट सवाल कर रही है हत्या के आरोपी के घर सम्मन क्यों अभी तक गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई है लेकिन सरकार और सिस्टम को सुप्रीम कोर्ट के इस टिप्पणी का कोई असर होता नहीं दिख रहा है। याद करिए ये वही देश है ना जहां निर्भया रेप मामले में पूरा देश सड़क पर आ गया था ये वही देश है ना जहां सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा हुंकार भरा की अन्ना रातो रात देश की दूसरा गांधी बन गये ,सब कुछ तो वैसा ही है वही दिल्ली पुलिस है, वही सुप्रीम कोर्ट है, वही पीएम हाउस है, वही राष्ट्रपति भवन है ,वही राजपथ है फिर ऐसा क्या बदला जो पूरी व्यवस्था बाहुबलियों, मंत्री और दुराचारी के सामने घुटने के बल पर रेंगने लगा इतने सारे उदाहरण के बाद यह मत पूछिए सीता किसकी जोड़ी मतलब यह सब इसलिए हो रहा है कि मीडिया अपना काम कर छोड़ दिया है।

मंटो ने सही ही कहां था कि कोठे की तवायफ़ और एक बिका हुआ पत्रकार , दोनों एक ही श्रेणी में आते हैं।लेकिन इनमें तवायफ़ की इज्जत ज्यादा होती है। इसी तरह गांधी ने कहा था “मैं कहूंगा कि ऐसे निकम्मे अख़बारों को आप फेंक दें जो आपकी बात नहीं करता है सरकार से सवाल नहीं कर सकता है ।

चलिए निराशा के बीच एक अच्छी खबर भी है दुनिया ने पहली बार पत्रकारों को नये आयाम से देखना शुरु किया और पहली बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए जूरी ने इस बार दो पत्रकार को चुना है।समस्या ये नहीं है हम भारतीय में क्षमता नहीं है समस्या यह है कि हमने लड़ना छोड़ दिया है सुविधाभोगी हो गये हैं परिवार और बच्चों के भविष्य को लेकर इस तरह उलझ गये हैं कि आज सब कुछ दाव पर लग गया है ।

ऐसा नहीं है मीडिया हाउस चलाने वाले पहले दबाव नहीं बनाते थे फिर भी पत्रकारिता को बचाये रखने की जिम्मेवारी संपादक और पत्रकारों के हाथ में था आज हम ही विचारधारा के नाम पर तो चंद पैसे और सुविधा के नाम पर अपना सब कुछ दाव पर लगा दिये है।

मुझे समझ में नहीं आता है सिस्टम बचेगा तब ना हम आप बचेंगे ये अलग बात है कि अभी तक वो आग हमारे आपके घर तक नहीं पहुंचा है इस खुशफहमी में मत रहिए देर सबेर मेरे आपके घर भी जरूर पहुंचेगा कोरोना काल में महसूस हो ही गया होगा इसलिए देश रहेगा तो हम आप भी रहेंगे आपका विचारधारा भी रहेगा देश ही नहीं रहेगा तो फिर हम आप कहां रहेंगे ।

रामविलास पासवान की पुण्यतिथि के बहाने खुब हुई सियासत

लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के संस्‍थापक रामविलास पासवान की पहली पुण्‍यतिथि के मौके पर चाचा-भतीजे ने अलग-अलग कार्यक्रम का आयोजन किया। चाचा पशुपति पारस पटना स्थित प्रदेश कार्यालय में, तो भतीजे चिराग पासवान ने दिल्ली स्थित 12, जनपथ में श्रद्धांजलि कार्यक्रम का आयोजन किया था ।

पटना में आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ,राज्यपाल ,नेता प्रतिपंक्ष तेजस्वी यादव ,पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी केन्द्रीयमंत्री गिरिराज सिंह सहित कई नेता शामिल हुए।

वही दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बीजेपी पहली बार चिराग से दूरी बनाते हुए दिखे दिल्ली में रहने के बावजूद पीएम मोदी ,गृहमंत्री अमित शाह,बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड़्डा श्रद्धांजलि कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। बीजेपी के वैसे ही नेता शामिल हुए जिनसे रामविलास पासवान का व्यक्तिगत रिश्ता रहा था रक्षामंत्री राजनाथ सिंह पहुंचे थे हलाकि इस मौके पर राहुल गांधी, लालू प्रसाद सहित विपक्ष के कई नेता जरुर पहुंचे थे।

जिस गर्म जोशी से राहुल ,चिराग और लालू प्रसाद के बीच 15 मिनट से अधिक समय तक अकेले में बात हुई आने वाले भविष्य में एक अलग तरह की राजनीति के संकेत साफ दिख रहे थे हलाकि बीजेपी के सीनियर नेताओं के दूरी बनाये रखने के सवाल पर चिराग ने कहां ऐसी कोई बात नहीं है सभी लोगों का फोन आया था ।

हाईकोर्ट ने टीईटी एसटीईटी उतीर्ण नियोजित शिक्षकों को प्रधान शिक्षक की परीक्षा में शामिल होने कि दी अनुमति

टीईटी /एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षको को अंतरिम राहत देते हुए पटना हाईकोर्ट ने उन्हें शर्तो के साथ प्रधान शिक्षक की परीक्षा देने की अनुमति दे दी है | टीईटी /एसटीईटी उत्तीर्ण नियोजित शिक्षक संघ की याचिका पर चीफ जस्टिस संजय कुमार की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया |

याचिकाकर्ता संघ द्वारा प्रधान शिक्षक नियुक्ति नियमावली को भ्रामक बता कर हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। साथ ही इस नियमावली में सुधार की मांग की है |

याचिकाकर्ता संघ ने प्रधान शिक्षक की नियुक्ति के लिए टीईटी को अनिवार्य करने की मांग करते हुए कहा है कि जब शिक्षक बनने के लिए भी टीईटी अनिवार्य है, तो देश के अन्य राज्यों की भांति प्रधान शिक्षक बनने के लिए भी टीईटी लागू करना चाहिए ।

मामले पर सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ ने टीईटी एसटीईटी उतीर्ण नियोजित शिक्षकों संघ को अंतरिम राहत देते हुए याचिकाकर्ताओं को प्रधान शिक्षक की परीक्षा देने की इस शर्त के साथ अनुमति दे दी है कि परीक्षा का परिणाम इस याचिका पर कोर्ट के अंतिम फैसले पर लागू होगा। याचिकाकर्ता कोर्ट के फैसले से पहले किसी भी अधिकार का दावा नहीं कर सकेंगे।

कोर्ट ने राज्य सरकार को।तीन सप्ताह मे हलफनामा दायर कर जवाब देने का निर्देश दिया है। इस मामले।पर 2 नवंबर,2021 को फिर सुनवाई की जाएगी।

छिटपुट घटनाओं को छोड़ कर तीसरे चरण का चुनाव शांतिपूर्ण सम्पन्न लगभग 60 प्रतिशत हुई है वोटिंग

छिटपुट घटनाओं को छोड़ दे तो बिहार पंचायत चुनाव का तीसरा चरण शांतिपूर्ण ढ़ग से सम्पन्न हो गया ।हालांकि कई जिलों में मतगणना केंद्रों पर अभी वोटिंग चल रही है। लाइन में लगे सभी मतदाता वोटिंग कर रहे हैं। दो जगह पुनर्मतदान होगा और 200 सौ से अधिक उपद्रवियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया है

हलाकि तीसरे चरण की वोटिंग के दौरान कई जिलों में हल्की झड़प हुई। भोजपुर के जंगल महाल पंचायत के बूथ नंबर 112 पर दो प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच झड़प हो गई। विवाद के बाद हुई मारपीट में 2 लोगों का सिर फटा गया। इसके बाद बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को तैनात कर दिया गया था। वहीं, नालंदा के नगरनौसा प्रखंड के खजुरा पंचायत के बूथ नंबर 19 पर थानाध्यक्ष नारद मुनी की गाड़ी पर ही लोगों ने पथराव कर दिया। इस मामले में पुलिस ने 4 लोगों को गिरफ्तार किया।दरभंगा जिले के बहेड़ी प्रखंड की हावीडीह उत्तरी पंचायत के बसकट्टी गांव में बूथ संख्या 233 पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

पंचायत चुनाव बिमार काका जी वोट देने पहुंचे हैं आक्सीजन सिलेंडर

इस बीच मीडिया से बात करते हुए राज्य निर्वाचन आयुक्त ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि समस्तीपुर के उजियारपुर के वार्ड नंबर 8 में फिर से वोटिंग होगी आज 200 लोगों को गिरफ्तार किया गया इस बार भी महिलाओं ने पुरुष से ज्यादा वोट डालें कुछ स्थानों पर अभी भी मतदान चल रहा है ।बायोमेट्रिक की व्यवस्था सफल हुई मुजफ्फरपुर के मुरौल में वार्ड नंबर 4 में दोबारा मतदान होगा और राज्य निर्वाचन आयुक्त ने मतदान केंद्रों पर कोविड-प्रोटोकॉल का पालन नहीं होने मामले में कहा कि इस मामले को मैं खुद अपने स्तर से देख लूंगा और आगे इसको लेकर के व्यवस्था की जाएगी इस चरण में बोगस मतदान नहीं हुए हैं।

नाव पर चढ़कर लोग वोट देने पहुंचे

अभी तक जो जानकारी मिल रही उसके अनुसार लगभग 60 प्रतिशत वोटिंग होने की खबर है ।

क्या खास रहा तीसरे चरण के चुनाव में–
1—58.9 प्रतिशत वोटिंग हुई है

2–कुल 200 लोगों को गिरफ्तार किया गया है

3–दरभंगा जिले के बहेड़ी प्रखंड की हावीडीह उत्तरी पंचायत के बसकट्टी गांव में बूथ संख्या 233 पर गड़बड़ी फैलाने के आरोप में पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ्तार कर लिया।

4—समस्तीपुर के उजियारपुर के वार्ड नंबर 8 में फिर से वोटिंग होगी

5– मुजफ्फरपुर के मुरौल में वार्ड नंबर 4 में दोबारा मतदान होगा

6–भोजपुर के जंगल महाल पंचायत के बूथ नंबर 112 पर दो प्रत्याशियों के समर्थकों के बीच झड़प हो गई। विवाद के बाद हुई मारपीट में 2 लोगों का सिर फटा गया।

7—समस्तीपुर –बूथ संख्या 244 पर हंगामा ,मतदाता और पुलिस कर्मी के बीच झड़प ,उजियारपुर प्रखंड के रामचन्द्रर पुर अन्हेल की घटना ।

इस बार भी महिलाए पुरुष से ज्यादा वोट दी है

8–हाजीपुर–जनदाहा प्रखंड के कजरी बुजुर्ग गाँव स्थित मतदान केन्द्र
संख्या 200 पर जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा अपनी पत्नी के साथ अपने मताधिकार का किया प्रयोग ।

9–मुजफ्फरपुर-मुरौल के हरसिंहपुर लौतन बूथ संख्या-82 पर वैलेट पेपर में मिसप्रिंट के कारण तीन घंटे बाद शुरू हुआ मतदान ।

10–गोपालगंज जिले के भोरे के हुस्सेपुर पंचायत में मतदान के दौरान बवाल हुआ। यहां मतदान करने आए वोटरों ने BDO पर गाली-गलौज और धमकी देने का आरोप लगाया है। नाराज लोगों ने बूथ से BDO को खदेड़ दिया।

11—नवादा –वोट का किया बहिष्कार
रजौली में सिरोडाबर पंचायत की बूथ संख्या-162 पर वोट देने के लिए वोटर नहीं पहुंच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दो मुखिया प्रत्याशी के समर्थकों ने वोटिंग से पहले मारपीट की है। इसके विरोध में मतदान बहिष्कार कर दिया है।

12–बेतिया के सेमरी पंचायात के बूथ संख्या 305 पर बवाल। सेक्टर मजिस्ट्रेट की गाड़ी का लोगों ने तोड़ा शीशा।

13–भोजपुर के जगदीशपुर में गश्ती पार्टी की ओर से धनगाई थाने के समीप बसौना पंचायत की बूथ संख्या 49 के पास निवास करने वाले लोगों को घर में घुसकर पीटने के आरोप में लोगों ने तत्काल वोट डालना बंद कर दिया। आरा-बक्सर हाइवे पर धनगाई थाने के समीप सड़क जाम कर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

14–मुंगेर– जिले के संग्रामपुर प्रखंड के बूथ नंबर 35 एवं 43 पर EVM खराब होने की वजह से मतदान बाधित।
बक्सर के लखन डिहरा पंचायत के बूथ नंबर 2, 7, 8, 10 पर EVM पिछले 2 घंटे से खराब है।

15–बक्सर–
डुमरांव के मतदान केद्रों पर इस बार कोरोना की वैक्सीन भी देने की व्यवस्था कराई गई है।
दरभंगा–बहेड़ी के ग्राम पंचायत राज इनाई के बूथ संख्या 280 एवं 283 पर दो घंटे तक ईवीएम खराब रहने के कारण सुबह नौ बजे बजे के बाद शुरू हुई वोटिंग।

16—सुपौल–रानीगंज प्रखंड के छतियोना में पंचायत स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय छतियोना बूथ संख्या 312 में जिला परिषद सदस्य पद का ईवीएम मशीन में गड़बड़ी होने के कारण 7 बजे से ही मतदान बंद है।

सिविल सर्विसेज की परीक्षाओं में इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि और अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने वाले छात्रों का बढ़ा वर्चस्व

#65thBPSCResult: बीपीएससी चला यूपीएससी की राह, इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि और अंग्रेज़ी माध्यम का बढ़ता वर्चस्व : हाल के वर्षों में यूपीएससी से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं तक के रिजल्ट में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड और अंग्रेज़ी माध्यम के छात्रों के वर्चस्व में निरन्तर वृद्धि हुई है, और इसकी पृष्ठभूमि में हिन्दी माध्यम के छात्र निरन्तर हाशिये पर पहुँचते चले गए।

यह स्थिति बीपीएससी के रिजल्ट में भी देखी जा सकती है। 7 दिसम्बर को जारी बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 65वीं संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा के परिणाम में शीर्ष के 13 स्थानों में दस स्थानों पर इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के छात्रों ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवायी। इनमें से 3 छात्र तो आईआईटी बैकग्राउंड से हैं। यहाँ पर इस बात को ध्यान में रखे जाने की ज़रुरत है कि इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के अधिकांश छात्र माध्यम के रूप में अंग्रेजी और वैकल्पिक विषय के रूप में मानविकी विषय को चुनते हैं। टॉप 20 में मौजूद नौ अभ्यर्थियों ने भूगोल को और दो अभ्यर्थियों ने अर्थशास्त्र को अपने वैकेल्पिक विषय के रूप में चुना है।

हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए चिन्ता का विषय:
संघ लोक सेवा आयोग से लेकर राज्य लोक सेवा आयोग तक सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले हिन्दी माध्यम के छात्रों की कम होती भागीदारी चिन्ता का विषय है, इन छात्रों के लिए भी और समाज एवं प्रशासन के लिए भी। आने वाले समय में यह समाज के सामने नयी मुश्किलें खड़ी करेगा।

इसके कारण हिन्दी माध्यम के छात्र भी दबाव में हैं और कोचिंग संस्थान भी। इसलिए इन दोनों ने इस दबाव से निबटने का सुविधाजनक रास्ता ढूँढ लिया है, और वह है सारी जिम्मेवारी को बीपीएससी या यूपीएससी के मत्थे मढ़ देना। यही कारण है कि लोक सेवा परीक्षाओं के रिजल्ट-प्रकाशन के ठीक बाद हिन्दी माध्यम के छात्र से लेकर कोचिंग संस्थान तक माध्यम और इसको लेकर होने वाले भेदभाव का रोना रोने लगते हैं। हिन्दी माध्यम के प्रति जमकर प्रेम प्रदर्शित किया जाता है और उसके खिलाफ होने वाले भेदभाव जोर-शोर से की जाती है।

ऐसा नहीं है कि ये संस्थाएँ निर्दोष हैं या इनमें कोई कमी नहीं है, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस समस्या के मूल में कहीं-न-कहीं हमारी शिक्षा-व्यवस्था, शिक्षक और छात्र मौजूद हैं। लेकिन, इस से सम्बद्ध मूल प्रश्नों की अनदेखी करते हुए इस पूरे मसले को रोमांटिसाइज़ कर दिया जाता है। इसके कारण मूल प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं, और उस पर सार्थक विचार-विमर्श संभव नहीं हो पाता है। यह स्थिति हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए भी सुविधाजनक है, और उन कोचिंग संस्थानों के लिए भी, जो हिन्दी माध्यम में कोचिंग उपलब्ध करवाते हैं, पर अपनी जवाबदेही स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं।

अंग्रेजी माध्यम की ओर छात्रों एवं अभिभावकों का बढ़ता रुझान:

सबसे पहले, मैं पिछले दो दशकों के दौरान शिक्षा-व्यवस्था में आने वाले बदलावों की चर्चा करना चाहूँगा। इस दौरान:

  1. सार्वजनिक शिक्षा की व्यवस्था ध्वस्त होती चली गयी, और उसकी कीमत पर निजी शिक्षण संस्थानों के विकास को प्रोत्साहित किया गया।
  2. जो भी अभिभावक सक्षम थे या तमाम मुश्किलों के बावजूद जो निजी शिक्षण-संस्थानों का खर्च वहन करने के लिए तैयार थे, उन्होंने अपने बच्चों को सरकारी शिक्षण संस्थानों के बजाय निजी शिक्षण संस्थानों को प्राथमिकता दी।
  3. इनमें जो भी बच्चे पढ़ने में अच्छे थे, उनमें से अधिकांश ने अंग्रेजी माध्यम की ओर रुख किया। स्वाभाविक है कि अच्छे बच्चे अंग्रेजी माध्यम की ओर शिफ्ट करते चले गए, और हिन्दी माध्यम में छँटे हुए बच्चे रह गए। मेरा आग्रह होगा कि मेरी इन बातों को अन्यथा नहीं लिया जाए। मैं सामान्य सन्दर्भों में बात कर रहा हूँ, विशिष्ट सन्दर्भों की नहीं।

तैयारी करने वाले बच्चों की पृष्ठभूमि:

सामान्यतः जो अच्छे बच्चे होते हैं, उनमें से अधिकांशतः बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग या मेडिकल की रुख करते हैं और इन्हीं में से कुछ प्रोफेशनल डिग्री हासिल करने के बाद सिविल सेवा की तैयारी में लग जाते हैं। जो बच्चे उधर नहीं जा पाते हैं, वे ग्रेजुएशन के बाद या तो प्रबंधन, लॉ और एकेडेमिक्स की तरफ बढ़ जाते हैं, या फिर अंग्रेज़ी एवं मैथ्स ठीक-ठाक होने की स्थिति में बैंक पी.ओ. और अन्य वनडे एग्जाम की तैयारी में लग जाते हैं। वही लोग सिविल सेवा की तैयारी में लगते, जो या तो पूरी तरह से इसके प्रति प्रतिबद्ध हैं, या फिर इस दिशा में प्रयास कर एक चांस लेना चाहते हैं।

अधिकांश रिजल्ट इन्हीं के बीच से मिलता है, विशेष रूप से प्रोफेशनल बैकग्राउंड के बच्चों के बीच से, या फिर प्रतिबद्ध बच्चों के बीच से। इस तथ्य से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले दो दशकों के दौरान शिक्षा की गुणवत्ता की दृष्टि से अन्तराल बढ़ता चला गया है और इस बढ़ते हुए अन्तराल ने हिन्दी माध्यम के छात्रों को बैकफुट पर ले जाने का काम किया है। यहाँ तक कि अब तो यह अन्तराल अंग्रेजी माध्यम में भी मुखर होने लगा है।

माध्यम का फर्क और माइंडसेट का फर्क:

सिविल सेवा परीक्षा का कोई भी विश्लेषण तब अटक अधूरा है, अजब तक हिन्दी माध्यम एवं अंग्रेजी माध्यम के बच्चों के माइंडसेट के फर्क को नहीं समझा जाए। सामान्यतः हिन्दी माध्यम के बच्चे भावुक प्रकृति के होते हैं, विषय के प्रति उनका नजरिया भावुक होता है और इसी बह्वुक मनःस्थिति में वे निर्णय भी लेते हैं जो सिविल सेवा में उनकी संभावनाओं को प्रभावित करता है। इसके विपरीत, सामान्यतः अंग्रेजी माध्यम के छात्रों का एप्रोच प्रोफेशनल होता है, विषय के प्रति भी और तैयारी के प्रति भी। इसीलिए उनके निर्णयों में प्रोफेशनलिज्म की झलक दिखाई पड़ती है जो सफलता की सम्भावनाओं को बाधा देती है।

यह प्रोफेशनलिज्म पुस्तकों और कोचिंग संस्थानों के चयन से लेकर विषय-वस्तु के प्रति रवैये तक में परिलक्षित होता है। यही कारण है कि मानविकी विषयों, जो उनके लिए नया होता है, में भी मानविकी पृष्ठभूमि के छात्रों की तुलना में इंजीनियरिंग बैकग्राउंड वाले छात्रों का प्रदर्शन बेहतर होता है, अंकों के संदर्भ में भी और अन्तिम चयन में भी।

माइंडसेट के इसी फर्क के कारण सिविल सेवा परीक्षा के डायनामिज्म और इसके कारण उत्पन्न होने वाली चुनौतियों के प्रति हिन्दी और अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के रेस्पोंस भी अलग-अलग होते हैं। यह फर्क उनके द्वारा प्रश्नों को दिए गए रेस्पोंस के स्तर पर भी देखा जा सकता है।

कोचिंग संस्थानों का नजरिया:

यह पूरी चर्चा अधूरी रह जायेगी, यदि कोचिंग संस्थानों की भूमिका पर चर्चा नहीं की जाए। आज हिंदी माध्यम के अधिकांश कोचिंग संस्थानों पर निदा फ़ाज़ली का यह शेर लागू होता है:

कभी-कभी हमने यूँ ही अपने जी को बहलाया है;

जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है।

मुझे कहना तो नहीं चाहिए क्योंकि मैं खुद भी इसी व्यवसाय से जुड़ा हूँ, पर खुद को यह कहने से रोक पाना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है कि उनके टीचिंग, टीचिंग कम, क्लास-मैनेजमेंट कहीं ज्यादा है। और, इस सन्दर्भ में अगर सही एवं उपयुक्त शब्दों का चयन करें, तो यह मदारी के खेल’ में तब्दील हो चुका है। बच्चे भी कोचिंग में मदारी का खेल ही देखने जाते हैं, और टीचर भी मदारी का खेल दिखाने ही जाते हैं।

न बच्चों को इस बात से मतलब है कि उन्हें जो पढ़ाया जा रहा है, वहाँ से प्रश्न कवर होते हैं या नहीं; और न ही शिक्षक को इस बात से मतलब है। चूँकि बच्चे मज़ा लेने के लिए जाते हैं, इसीलिए शिक्षक का फोकस भी इसी बात पर रहता है कि कैसे बच्चों को मज़ा आये। ऐसा नहीं अहि कि अंग्रेजी माध्यम की स्थिति बहुत बेहतर है, पर चूँकि वहाँ बच्चों की गुणवत्ता अपेक्षाकृत बेहतर है और वे अपने कैरियर को लेकर कहीं अधिक कंसर्न्ड हैं, इसीलिए वहाँ स्थिति थोड़ी-सी बेहतर है।

लेकिन, जैसे-जैसे वहाँ भी भीड़ बढ़ रही है, फर्क कम होता जा रहा है। ऐसा नहीं कि हिन्दी माध्यम में अच्छे कोचिंग संस्थान और अच्छे शिक्षक नहीं हैं, पर उनमें से अधिकांश या तो हाशिये पर खड़े हैं, या फिर बाज़ार के दबाव में उन्हें अपने को बदलना पड़ रहा है।

गुणवत्ता-पूर्ण अध्ययन-सामग्री की उपलब्धता:

अगर अध्ययन-सामग्री की दृष्टि से देखा जाए, तो हिन्दी माध्यम की तुलना में अंग्रेजी माध्यम में गुणवत्ता-पूर्ण अध्ययन-सामग्री कहीं अधिक सहजता एवं सरलता से उपलब्ध है। यह फर्क न्यूज-पेपर और मैगज़ीन से लेकर कोचिंग संस्थानों द्वारा उपलब्ध करवायी जा रही अध्ययन सामग्रियों तक में देखा जा सकता है।

आज हिन्दी में द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस सरीखे कौन-सा समाचार-पत्र उपलब्ध है और हिन्दी समाचार-पत्रों में किसके कवरेज में इतनी गहरायी एवं व्यापकता है, इस सवाल का जवाब कोई दे सकता है? अगर ऐसा कोई भी समाचार-पत्र हिन्दी माध्यम में उपलब्ध नहीं है, तो क्यों और इसके लिए कौन जिम्मेवार है? इसके अतिरिक्त, अंग्रेजी माध्यम के छात्रों के समक्ष आसानी से विकल्प उपलब्ध होते हैं जिनके कारण उपयुक्त विकल्पों का चयन उनके लिए आसान होता है। कहीं-न-कहीं यह भी दोनों माध्यमों में परिणामों के फर्क को जन्म दे रहा है।

सार्वजनिक क्षेत्र का बढ़ता आकर्षण:

पिछले दशक के दौरान, विशेष रूप से सन् 2008-09 की आर्थिक मन्दी के बाद निजी क्षेत्र में रोजगार की दृष्टि से अनिश्चितता भी बढ़ी है और वेतन एवं सुविधाओं की दृष्टि से आकर्षण भी कम हुआ है। उधर, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने के बाद वेतन एवं सुविधाओं की दृष्टि से निजी क्षेत्र एवं सार्वजनिक क्षेत्र का फर्क भी कम हुआ है जिसके कारण सार्वजानिक क्षेत्र ने व्यावसायिक पृष्ठभूमि वाले छात्रों को कहीं अधिक आकर्षित किया है। फलतः सिविल सेवा की ओर उनका रुझान बढ़ा और प्रतिस्पर्धा मुश्किल होती चली गयी।

इस पूरी चर्चा के क्रम में इस बात को ध्यान में रखे जाने की ज़रुरत है कि अहम् माध्यम नहीं है, अहम् है सिविल सेवा परीक्षा की माँग के अनुरूप अपने आपको ढ़ालना और उसकी ज़रूरतों को पूरा करना। इस सन्दर्भ में हिन्दी माध्यम के छात्रों के समक्ष मुश्किलें थोड़ी ज्यादा हैं, पर ऐसा नहीं है कि अगर नज़रिए को सकारात्मक रखा जाए और सकारात्मक नज़रिए से इन चुनौतियों से मुकाबले की कोशिश की जाए, टिन तमाम चुनौतियों से पार पाया जा सकता है। (60-62)वीं बीपीएससी परीक्षा में हिन्दी माध्यम के डॉ. संजीव कुमार सज्जन का शीर्ष स्थान हासिल करना इसका प्रमाण है।

वक़्त की ज़रुरत को समझें हिन्दी माध्यम के छात्र:

आज हिन्दी माध्यम के बच्चे यह समझने के लिए तैयार नहीं हैं कि यूपीएससी या फिर बीपीएससी उनके हिसाब से बदलने नहीं जा रही है, उन्हें इसके हिसाब से खुद को बदलना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि जहाँ वे विकल्पहीन हैं, वहीँ इन संस्थानों के पास पर्याप्त विकल्प है। जहाँ इन्हें बेहतर विकल्प दिखेगा, वे उसको प्राथमिकता के आधार पर चुनेंगे। इतना ही नहीं, उन्हें यह भी समझना होगा कि तैयारी के क्रम में मुश्किलें तो आनी ही हैं, अब चुनना उन्हें है कि वे क्लासरूम की मुश्किलों का सामना करना चाहते हैं या फिर एग्जाम-हॉल की मुश्किलों का।

अगर वे क्लास रूम की मुश्किलों का सामना करने के लिए तैयार हैं, तो एग्जाम हॉल में मुश्किलों से वे बच भी सकेंगे और चयन की सम्भावना भी प्रबल होगी; अन्यथा रिजल्ट के बाद एक-दो दिन जम कर बीपीएससी या यूपीएससी को गाली देकर भड़ास निकाल लें, इससे न तो कुछ फर्क पड़ने वाला है और न ही रिजल्ट बदलने वाला है।

अगर इन्होने खुद को नहीं बदला, तो कोचिंग संस्थान क्लास-रूम में उन बिन्दुओं की चर्चा से परहेज़ करते रहेंगे, जिनको समझने में मुश्किलें आ सकती हैं, पर जो एग्जाम की दृष्टि से उपयोगी हैं और जिनकी आपके चयन में अहम् भूमिका होगी। इसलिए हिन्दी माध्यम के छात्रों को मेरा एक ही सन्देश है: सवालों का सामना करें और अपने शिक्षकों से भी सवाल पूछें।

इन सवालों के बिना न तो अपने प्रति आपकी जवाबदेही निर्धारित हो सकती है और न ही आपको पढ़ने वाले शिक्षकों की जवाबदेही; और जवाबदेही के बिना सफलता मुश्किल है। जहाँ यूपीएससी या बीपीएससी की सीमा है, वहाँ आप या हम कुछ नहीं कर सकते, पर खुद को बदलकर उस सीमा की कैजुअलिटी का शिकार होने से खुद को बचाया तो जा ही सकता है। अगर समय रहते नहीं संभले, तो आने वाले समय में बीपीएससी परीक्षा के परिणामों में हिन्दी माध्यम के छात्र भी उसी तरह से हाशिये पर पहुँचते चले जायेंगे जिस तरह यूपीएससी की परीक्षा में पिछले एक दशक के दौरान हाशिये पर पहुँचते चले गए और आज उनकी भागीदारी तीस के आसपास तक सिमट चुकी है।

लेखक — कुमार सर्वेश
पिछले दो दशकों से सिविल सर्विसेज परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्रों की मेंटरिंग कर रहे हैं।)

आरबीआई की घोषणाओं के बाद सेंसेक्स, निफ्टी में उछाल; आईटी, बैंक और धातु चमके

शुक्रवार को सेंसेक्स 381 अंक ऊपर 60,059 पर, निफ्टी 105 अंक ऊपर 17,895 पर बंद हुआ। आरबीआई ने दिन में अपनी मौद्रिक नीति समिति के फैसलों की घोषणा की। इसने प्रमुख दरों को अपरिवर्तित रखा और समायोजनात्मक रुख पर यथास्थिति बनाए रखी। आरबीआई की नीति के बाद सेंसेक्स 381 अंक चढ़ा, निफ्टीभी रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा ।

सेंसेक्स चार्ट (08.10.21) एक नजर में

बेंचमार्क के साथ मिड-कैप इंडेक्स भी आज बाजार के करीब 133 अंक या 0.43 प्रतिशत से अधिक चढ़ गया। सेक्टरों में आईटी इंडेक्स में करीब 2 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और खरीदारी में भी ऑटो, मेटल, एनर्जी के नाम देखे जा रहे हैं, जबकि रियल्टी इंडेक्स में 3 फीसदी की गिरावट आई है।

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल), इंफोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, एलएंडटी, एचसीएल टेक्नोलॉजीज ने सूचकांकों की बढ़त में सबसे अधिक योगदान दिया। वहीं हिंदुस्तान यूनिलीवर और NTPC के शेयर 1% से ज्यादा गिरकर बंद हुए।

बीएसई का स्मॉल कैप इंडेक्स 241 अंक की तेजी के साथ 29,330 पर बंद हुआ। बीएसई मिडकैप इंडेक्स 38 अंक की तेजी के साथ 25,837 पर बंद हुआ। सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 13 बढ़त के साथ बंद । बीएसई पर 414 शेयर्स में अपर सर्किट लगा तो वहीं 140 शेयर्स में लोअर सर्किट लगा।

सेंसेक्स के शेयर एक नजर में

निफ्टी पीएसयू बैंक, मीडिया, ऑयल एंड गैस, ऑटो और मेटल इंडेक्स भी 0.3-1.8 फीसदी के बीच चढ़े। निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 0.4 फीसदी और निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 1.3 फीसदी चढ़ा।

निफ्टी के प्रमुख शेयरों के टॉप गेनर और लूजर का हाल

पंचायत चुनाव का तीसरा चरण छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शातिपूर्ण ढ़ग से चल रहा है

बिहार पंचायत चुनाव के तीसरे चरण की वोटिंग चल रही है छिटपुट घटना को छोड़कर मतदान शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा है सुबह 6 बजे से ही महिला और पुरूष मतदान केंद्र पर पहुंचने लगे थे हलाकि जैसे जैसे घूप तेज होती गयी मतदान का प्रतिशत कम होता चला गया दोपहर 2 दो बजे तक 30 से 40 प्रतिशत वोटिंग की खबर है हलाकि इस बार पहले के तुलना में ईभीएम के खराब होने खबर कम आयी फिर भी दो दर्जन मतदान केन्दों पर मतदान जरुर प्रभावित हुआ ।

मतदान केंद्र पर सुरक्षा के चाक-चौबंद इंतजाम किए गए हैं। इस चरण में 35 जिलों के 50 प्रखंडो में चुनाव होना है। सुबह 7 बजे से शुरू हुआ मतदान शाम 5 तक चलेगा। तीसरे चरण के कुल 23 हजार 128 पदों के लिए 81 हजार 616 उम्मीदवार मैदान में हैं।

गोपालगंज के भोरे इलाके की हुस्सेपुर पंचायत में मतदान के दौरान बवाल हो गया। यहां मतदान करने आए वोटरों ने BDO पर गाली-गलौज और धमकी देने का आरोप लगाया। इसके बाद नाराज लोगों ने बूथ से BDO को खदेड़ दिया। इधर, दरभंगा में चुनाव के दौरान गश्ती पर निकले SSP के काफिले पर पथराव हो गया है। एक गाड़ी का शीशा फूट गया है। मतदान केंद्र पर से भीड़ हटाए जाने के बाद आक्रोशित हो गए थे ग्रामीण।

जदयू के प्रदेश अध्यक्ष पत्नी संग वोट देने पहुंचे

वही रोहतास-पंचायत चुनाव के मतदान के दौरान ग्रामीणों का हंगामा।पुलिस प्रशासन पर गाली गलौज तथा एक तरफा कार्रवाई का आरोप।पुलिस पर एक मुखिया उम्मीदवार के पक्ष में काम करने का आरोप।कछवा ओपी के दनवार में लोगों ने सड़क किया जाम।एसपी आशीष भारती पहुंचे मौके पर दनवार पंचायत का है मामला।

पंचायत चुनाव अपडेट

1—2 बजे तक 30 से 40 प्रतिशत वोटिंग हुई है

2—कैमूर के चैनपुर प्रखंड के जगरिया पंचायत में बूथ पर बायोमैट्रिक सिस्टम में गड़बड़ी आ गई है। इस कारण मतदान विलम्भ से शुरु हुआ । जगदीशपुर प्रखंड में कौंरा पंचायत में बूथ संख्या 9,10 का EVM खराब होने कि वजह से मतदान विलम्भ से शुरु हुआ ।

3–मोतिहारी–घोड़ासहन के बूथ संख्या 192 पर EVM में आई खराबी के कारण मतदान विलम्भ से शुरु हुआ

4–भोजपुर के जगदीशपुर के तेंदूनी मध्य विद्यालय की मतदान संख्या 77 पर 60 मिनट से ईवीएम मशीन खराब रहने कि वजह से मतदान विलम्भ से शुरु हुआ ।

5—भोजपुर के कौंरा पंचायत के कौंरा गांव में बूथ संख्या 9,10 के ईवीएम भी आयी खराबी के कारण मतदान विलम्भ से शुरु हुआ

6– औरंगाबाद जिले के बारुण प्रखंड की गोठौली पंचायत के बूथ संख्या 42 पर इवीएम मशीन में खराबी के कारण विलम्भ से शुरु हुआ मतदान

7—समस्तीपुर –बूथ संख्या 244 पर हंगामा ,मतदाता और पुलिस कर्मी के बीच झड़प ,उजियारपुर प्रखंड के रामचन्द्रर पुर अन्हेल की घटना ।

8–हाजीपुर–जनदाहा प्रखंड के कजरी बुजुर्ग गाँव स्थित मतदान केन्द्र
संख्या 200 पर जदयू के प्रदेश अध्यक्ष उमेश सिंह कुशवाहा अपनी पत्नी के साथ अपने मताधिकार का किया प्रयोग ।

9–मुजफ्फरपुर-मुरौल के हरसिंहपुर लौतन बूथ संख्या-82 पर वैलेट पेपर में मिसप्रिंट के कारण तीन घंटे बाद शुरू हुआ मतदान ।

10–गोपालगंज जिले के भोरे के हुस्सेपुर पंचायत में मतदान के दौरान बवाल हुआ। यहां मतदान करने आए वोटरों ने BDO पर गाली-गलौज और धमकी देने का आरोप लगाया है। नाराज लोगों ने बूथ से BDO को खदेड़ दिया।

11—नवादा –वोट का किया बहिष्कार
रजौली में सिरोडाबर पंचायत की बूथ संख्या-162 पर वोट देने के लिए वोटर नहीं पहुंच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि दो मुखिया प्रत्याशी के समर्थकों ने वोटिंग से पहले मारपीट की है। इसके विरोध में मतदान बहिष्कार कर दिया है।

12–बेतिया के सेमरी पंचायात के बूथ संख्या 305 पर बवाल। सेक्टर मजिस्ट्रेट की गाड़ी का लोगों ने तोड़ा शीशा।

13–भोजपुर के जगदीशपुर में गश्ती पार्टी की ओर से धनगाई थाने के समीप बसौना पंचायत की बूथ संख्या 49 के पास निवास करने वाले लोगों को घर में घुसकर पीटने के आरोप में लोगों ने तत्काल वोट डालना बंद कर दिया। आरा-बक्सर हाइवे पर धनगाई थाने के समीप सड़क जाम कर कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

14–मुंगेर– जिले के संग्रामपुर प्रखंड के बूथ नंबर 35 एवं 43 पर EVM खराब होने की वजह से मतदान बाधित।
बक्सर के लखन डिहरा पंचायत के बूथ नंबर 2, 7, 8, 10 पर EVM पिछले 2 घंटे से खराब है।

15–बक्सर–
डुमरांव के मतदान केद्रों पर इस बार कोरोना की वैक्सीन भी देने की व्यवस्था कराई गई है।
दरभंगा–बहेड़ी के ग्राम पंचायत राज इनाई के बूथ संख्या 280 एवं 283 पर दो घंटे तक ईवीएम खराब रहने के कारण सुबह नौ बजे बजे के बाद शुरू हुई वोटिंग।

16—सुपौल–रानीगंज प्रखंड के छतियोना में पंचायत स्थित उत्क्रमित मध्य विद्यालय छतियोना बूथ संख्या 312 में जिला परिषद सदस्य पद का ईवीएम मशीन में गड़बड़ी होने के कारण 7 बजे से ही मतदान बंद है।

रामविलास पासवान का पहली बरसी आज

रामविलास पासवान का पहली बरसी आज,पटना में पार्टी कार्यालय में आयोजित है श्रद्धांजलि
मंत्री पशुपति कुमार पारस के निर्देशन में चल रहा है कार्यक्रम,श्रद्धांजलि के बाद मीडिया से बात करते हुए सीएम नीतीश कुमार ने कहा किआज ही के दिन रामविलास पासवान जी का निधन हुआ था उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए हम सब इकट्ठा हुए हैं।

रामविलास पासवान ने जो काम किया है उसको सदैव लोग जानते रहेंगे।हमारा संबंध रामविलास पासवान से बहुत पहले का है जब से जेपी मूवमेंट शुरू हुआ था तब से हमारा संबंध है।उनके जाने की अभी उम्र नहीं थी ,राम विलास पासवान की स्मृति को लोगों तक पहुँचाने के लिए काम किया जाएगा।

बीजेपी जातीय कुबना की राजनीति से बाहर निकल नहीं पायी चेहरा बदला है सोच वहीं पूरानी है

भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति में बिहार को जो भागीदारी मिली है उससे यह संकेत साफ है कि बिहार बीजेपी में सुशील मोदी ,नंद किशोर यादव,प्रेम कुमार,अश्वनी चौबे और सीपी ठाकुर युग का अब अंत हो गया है और अब पार्टी बिहार में संजय जयसवाल,गिरिराज सिंह ,नित्यानंद राय और मंगल पांडेय के सहारे आगे बढ़ेंगी ।

1—30 वर्षों बाद भी बीजेपी जातीय कुनबा वाली राजनीति से बाहर नहीं निकल पाया
बिहार में बीजेपी का दूसरा एरा लालू प्रसाद के सत्ता में आने के साथ ही 1990 से शुरू हुआ और उस दौर में सुशील मोदी पार्टी के युवा चेहरा हुआ करते थे झारखंड अलग होने के बाद उन्होंने कैलाशपति मिश्र के एरा को खत्म कर बीजेपी को सवर्ण और बनिया की पार्टी से बाहर निकालने की कोशिश शुरू किया।

हालांकि सुशील मोदी को भी इसमें खास सफलता हासिल नहीं हुई और यही वजह रहा कि सत्ता में बने रहने के लिए बीजेपी को आज भी नीतीश कुमार जैसे नेताओं की जरूरत है।

इस बार भी राष्ट्रीय कार्यसमिति में बिहार को जो भागीदारी मिली है उसको देखने से यही लगता है कि बीजेपी सिर्फ चेहरा बदला है सोच वही पुरानी है ।सुशील मोदी की जगह संजय जयसवाल ,सीपी ठाकुर की जगह गिरिराज सिंह ,नंद किशोर यादव की जगह नित्यानंद राय,अश्विनी कुमार चौबे की जगह मंगल पांडेय ,कीर्ति झा आजाद की जगह गोपाल जी ठाकुर और अति पिछड़ा प्रेम कुमार की जगह रेणु देवी को जगह दिया गया ,राजपूत नेता में टीम मोदी को राजीव प्रताप रूडी पसंद नहीं है ऐसे में इनके पास राधा मोहन सिंह को छोड़कर कोई दूसरा नेता है नहीं ।

2—- इन नये चेहरों से बिहार बीजेपी क्या साधना चाहती है
इन चेहरे के पीछे पार्टी की सोच को अगर देखे तो बीजेपी बिहार में गिरिराज सिंह के सहारे भूमिहार को साधना चाहती है, इनकी वैसी पहचान है क्या जो कैलाशपति मिश्र और सीपी ठाकुर का जगह ले सके । इसी तरह संजय जयसवाल कभी सुशील मोदी का जगह ले सकते हैं , मंगल पांडेय और गोपाल जी ठाकुर कभी भी बिहार बीजेपी के पुराने ब्राह्मण नेता की जगह ले सकते हैं।हलाकि नित्यानंद राय नंद किशोर यादव से यादव मतदाताओं के बीच ज्यादा प्रभावी हैं लेकिन नित्यानंद राय जब तक लालू प्रसाद का परिवार है यादव में उनका प्रवेश बहुत मुश्किल है।

फिर अति पिछड़े की बात करे तो रेणु देवा पर दाव लगाना उसी तरह है जैसे प्रेम कुमार 20 वर्षो से अधिक समय से विधायक और मंत्री रहे।
मतलब जिन नये चेहरे पर बीजेपी का केन्द्रीय नेतृत्व भरोसा जताया है उसमें फिलहाल वो क्षमता नहीं है जिसके सहारे बिहार में बीजेपी कुछ खास कर पाए ।

3—बीजेपी प्रभारी में बदलाव का क्या प्रभाव पड़ेगा बिहार की राजनीति पर
नरेन्द्र मोदी बिहार को लेकर काफी सावधान रहे हैं क्यों कि बिहार ऐसा पहला राज्य था जहां उनके पीएम रहने के बावजूद कुछ करिश्मा नहीं कर पाये, 2015 के विधानसभा चुनाव में पूरी कमान मोदी और शाह उठा रखे थे लेकिन पार्टी औंधे मुंह गिर गयी थी।

पीएम मोदी अभी भी सुशील मोदी को माफ करने को तैयार नहीं है ऐसे में टीम मोदी शुरु से ही सुशील मोदी के विकल्प में लगा हुआ है इस बार बिहार मंत्रिमंडल में शामिल नहीं करने के पीछे भी वजह यह रही है ।

हालांकि भूपेन्द्र यादव को जिस उद्देश्य बिहार का प्रभारी बनाया गया था उस उद्देश्य में बीजेपी कामयाब नहीं हो पाया पहली बार 2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी यादव को सबसे ज्यादा टिकट दिया लेकिन अधिकांश उम्मीदवार उनके हार गये।

नित्यानंद राय को गृह राज्यमंत्री बनाया गया फिर भी यादव वोटर को खीच नहीं पाये उलटे मध्य बिहार के इलाके में बीजेपी का जो परंपरागत वोट रहा है वो साथ छोड़ दिया हालांकि अंतिम समय में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को बिहार भेज करके नाराज सवर्ण वोटर को बनाने की कोशिश कि गयी थी लेकिन वो सफल नहीं हुआ तो अंत में चिराग को मैदान में उतरना पड़ा ।

ऐसे में हरीश द्विवेदी को बिहार का प्रभारी बनाये जाने से कोई बड़ा बदलाव होता नहीं दिख रहा क्यों कि बिहार में बीजेपी का जो कोर वोटर है सवर्ण और बनिया वही बीजेपी से खफा है और इसका लाभ राजद 2020 के विधानसभा चुनाव में बनिया को टिकट देकर उठा चुका है।

वही हरीश द्विवेदी के आने से यूपी में जदयू का बीजेपी के साथ गठबंधन होने में सहजता होगी ऐसा भी नहीं दिख रहा तो फिर हरीश द्विवेदी को बिहार का प्रभारी बनाये जाने के पीछे बीजेपी की सोच क्या है आगे आगे देखिए होता है क्या लेकिन इतना तो तय दिख रहा है कि इस टीम से बीजेपी की निर्भरता नीतीश पर हमेशा बनी रहेगी ।

भाजपा राष्ट्रीय कार्यसमिति में बिहार को अच्छी खासी जगह मिली लेकिन सुशील मोदी का पर कतरा दिया गया

भाजपा ने आज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की घोषणा की है ।80 सदस्यीय कार्यसमिति में बिहार से रविशंकर प्रसाद,गिरीराज सिंह ,भगीरथी देवी और नित्यानंद राय को जगह दी गयी है ,वही राधामोहन सिंह को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है ।

विशेष आमंत्रित सदस्य के रुप में सांसद गोपाल जी ठाकुर,मंत्री मंगल पांडेय,पूर्व मंत्री प्रेम कुमार और पूर्व मंत्री नंद किशोर यादव को बनाया गया है । उप मुख्यमंत्री के नाते तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी को पार्टी ने राष्ट्रीय कार्यसमिति में शामिल किया है। पूर्व उप मुख्यमंत्री के नाते सुशील मोदी को भी जगह दी गयी है।

प्रवक्ता की सूची बिहार से चार प्रवक्ताओं को जगह दी गई है। इसमें बिहार के उद्योग मंत्री शाहनवाज हुसैन को राष्ट्रीय प्रवक्ता के नाते लिया गया है। वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव प्रताप रूडी, एमएलसी व राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय मयूख के अलावा गुरु प्रकाश को राष्ट्रीय कार्यसमिति में पार्टी ने जगह दी है।

बिहार भाजपा संगठन से अब भूपेन्द्र यादव बाहर हो गए हैं। सह प्रभारी हरीश द्विवेदी को बिहार भाजपा का प्रभारी बना दिया गया है। अनुपम हजारा नई व्यवस्था में भी सह प्रभारी का जिम्मा संभालेंगे।

द्विवेदी यूपी के बस्ती संसदीय क्षेत्र से सांसद हैं। 2019 लोकसभा चुनाव में UP में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 12 रैलियों के प्रबंधन में हरीश द्विवेदी ने अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद से उनका भाजपा में लगातार कद बढ़ता गया और उन्हें बिहार भाजपा का प्रभारी बना दिया गया है। सह प्रभारी अनुपम हजारा ही होंगे। अनुपम हजारा पश्चिम बंगाल के हैं। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खास रहे हजारा बेलापुर से तृणमूल कांग्रेस से सांसद रह चुके हैं। हालांकि, 2019 चुनाव में वो जाधवपुर से भाजपा के टिकट पर हार गए थे।

बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा में भी इंजीनियरों का रहा बोलबाला टांप 10 में सात इंजीनियर है

बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) की 65वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा का फाइनल रिजल्ट आज जारी हो गया। इसमें रोहतास के गौरव सिंह ने टॉप किया है। वहीं, दूसरे नंबर पर बांका की चंदा भारती रहीं है। जबकि, तीसरे नंबर पर नालंदा के वरुण कुमार ने जगह बनाई है।

टॉप 10 में दो लड़कियां हैं। लड़कियों में सेकेंड टॉपर अनामिका को ओवर-ऑल नौवां स्‍थान मिला है। टॉपर गौरव व सेकेंड टाँपर चंदा सहित टॉप 10 में सात इंजीनियर हैं।

BPSC टॉपर गौरव सिंह की मां शशि कुमारी उत्क्रमित मध्य विद्यालय में पंचायत शिक्षिका हैं। पिता स्व. मनोज कुमार सिंह एयरफोर्स में जॉब करते थे। बच्चों की कम उम्र में ही मनोज कुमार सिंह का देहांत हो गया था। टॉपर गौरव का दूसरा भाई अमन कुमार सिंह पंजाब के लुधियाना से इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है। वहीं, BPSC की सेकेंड टॉपर चंदा भारती बांका की रहने वाली हैं। वे गया बुडको में असिस्टेंट इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं। पिता विवेकानंद यादव गढ़वा में असिस्टेंट इंजीनियर हैं। मां का नाम कुंदन कुमारी है। चंदा भारती तीन भाई एक बहन हैं।
इंटरव्यू के लिए 1,142 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था

इंटरव्यू के लिए 1,142 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था, जिसमें से 1,114 अभ्यर्थी शामिल हुए थे। अनारक्षित वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों के लिए कटऑफ 532, अनारक्षित वर्ग की महिला उम्मीदवारों के लिए कटऑफ 515, ईडब्ल्यूएस के लिए 530, ईडब्ल्यूएस (महिला) के लिए 504, एससी (पुरुष) के लिए 507 और एसटी (पुरुष) के लिए 495 मार्क्स रही है। बिहार सरकार के 14 विभागों में कुल 423 रिक्त पदों के लिए परीक्षा हुई थी, जिसमें से 422 उम्मीदवारों को सफल घोषित किया गया है। इस भर्ती का इंटरव्यू अगस्त में हुआ था।

गुप्ता काल से शुरु हुआ है भारत में स्त्री शक्ति की पूजा

शक्ति-पूजा का अर्थ

प्राचीन काल से ही हिन्दू धर्म तीन मुख्य संप्रदायों में बंटा रहा है – विष्णु का उपासक वैष्णव, शिव का उपासक शैव और शक्ति का उपासक शाक्त संप्रदाय। दुनिया के सभी दूसरे धर्मों की तरह वैष्णव और शैव संप्रदाय जहां सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति पुरुष को मानते हैं, शाक्तों की दृष्टि में सृष्टि की सर्वोच्च शक्ति स्त्री शक्ति है। देवी को ईश्वर के रूप में पूजने वाला शाक्त धर्म दुनिया का संभवतः एकमात्र धर्म है।

स्त्री-शक्ति की आराधना की शुरुआत कब और कैसे हुई, इस विषय पर इतिहासकारों में मतभेद है। ज्यादातर लोग शक्ति पूजा की परंपरा की शुरुआत इतिहास के गुप्त काल से मानते हैं जब ‘देवी महात्मय’ नाम के ग्रंथ की रचना हुई थी। दसवीं से बारहवीं सदी के बीच ‘देवी भागवत पुराण’ की रचना के बाद शाक्त परंपरा उत्कर्ष पर पहुंची थी। सच यह है कि स्त्री-शक्ति की पूजा की जड़ें प्रागैतिहासिक काल में ही मौजूद हैं। सिंधु-सरस्वती घाटी की सभ्यता में मातृदेवी की उपासना का प्रचलन था। खुदाई में उस काल की देवी की कई मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। ऋग्वेद के दसवें मंडल में भी वाक्शक्ति की प्रशंसा में एक देवीसूक्त मिलता है, जिसमें वाक्शक्ति कहती है – मैं ही समस्त जगत की अधीश्वरी तथा देवताओं में प्रधान हूं। मैं सभी भूतों में स्थित हूं। देवगण जो भी कार्य करते हैं वह मेरे लिये ही करते हैं। वेदों की कई अन्य ऋचाओं में अदिति का मातृशक्ति के रूप में वर्णन है जो माता, पिता, देवगण, पंचजन, भूत, भविष्य सब कुछ हैं। कालांतर में शक्ति पूजा की इस प्राचीन परंपरा के साथ असंख्य मिथक और कर्मकांड जुड़ते चले गए।

योगियों की शक्ति उपासना की पद्धति थोड़ी अलग है। वे शक्ति का अस्तित्व किसी दूसरी दुनिया या आयाम में नहीं, मानव शरीर के भीतर ही मानते हैं। रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में कुंडलिनी शक्ति के रूप में। विभिन्न यौगिक क्रियाओं और ध्यान के माध्यम से इस शक्ति की ऊर्ध्व यात्रा शुरू कराई जाती है। जब यह शक्ति शरीर के छह चक्रों का भेदन करती हुई मष्तिष्क में स्थित सातवें चक्र में पहुंच जाती है तो योगी को असीम शक्ति और परमानंद की अनुभूति होती है।

मित्रों को स्त्री – शक्ति की उपासना के नौ-दिवसीय आयोजन नवररात्रि की शुभकामनाएं, इस आशा के साथ कि स्त्री-शक्ति की पूजा की यह गौरवशाली परंपरा स्त्रियों के प्रति सम्मान के अपने मूल उद्देश्य से भटककर महज कर्मकांड बनकर न रह जाए !

लेखक –ध्रुव गुप्ता

हाईकोर्ट ने मुखिया हीरावली देवी को चुनाव लड़ने की दी अनुमति

पटना हाई कोर्ट ने कैमूर(भभुआ) जिले के लहदन ग्राम पंचायत राज की मुखिया रही हीरावती देवी को चुनाव लड़ने का आदेश दिया। जस्टिस विकास जैन की खंडपीठ ने हीरावती देवी की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें मुखिया पद का चुनाव लड़ने की अनुमति दी।

साथ ही कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और जिलाधिकारी कैमूर को सिंबल आवंटित करने का आदेश दिया। हीरावती देवी को आगामी 20 अक्टूबर को होने जा रहे चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने का भी आदेश दिया है।

इसके पूर्व कोर्ट ने मुखिया के पद पर निर्वाचन के लिये नामांकन पत्र को स्वीकार करने का आदेश दिया था। हीरावती देवी को पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव के आदेश से मुखिया के पद से 28 अक्टूबर, 2019 को हटा दिया गया था।
इस आदेश के विरुद्ध अपीलार्थी ने पटना हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर किया था, जोकि 8 मार्च, 2021 को खारिज हो गया था। इस रिट याचिका में दिए गए आदेश के विरुद्ध याचिकाकर्ता ने पटना हाई कोर्ट में ही अपील दायर किया था, जिस पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने यह आदेश को पारित किया।

राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग के प्रधान सचिव द्वारा 20 अक्टूबर, 2019 को पारित उस आदेश को रद्द करने हेतु याचिका दायर की थी, जिसके जरिये उन्हें लोहदन पंचायत के मुखिया के पद से हटा दिया गया था।

अपीलार्थी के अधिवक्ता ने बताया कि मुखिया के ऊपर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कथित रूप से लगभग 34 लाख रुपये का गबन किया था। इन्होंने प्रबंधन कमेटी के नाम से चेक जारी नहीं कर पंचायत सचिव के नाम से चेक जारी किया और पैसे का इस्तेमाल अपने लिये किया था। ये राशि मुख्यमंत्री सात निश्चय योजना की थी।
किन्तु याचिकाकर्ता की जानकारी में जब यह बात आई तो इन्होंने ब्याज समेत पूरे पैसे को खाता में जमा करवा दिया। गबन की गई राशि पर कंपाउंड इनटरेस्ट लेने का भी आदेश दिया गया। अपीलार्थी ने इस राशि को भो खाता में जमा किया।

अपीलार्थी जनवरी, 2016 में मुखिया के तौर पर निर्वाचित हुए थी। पब्लिक फण्ड के गबन को लेकर स्पष्टीकरण भी पूछा गया था। बी डी ओ ने जिला पंचायत राज ऑफिसर को अपीलार्थी द्वारा पैसा जमा कर दिए जाने की सूचना भी दे दिया था।
इस मामले में अगली सुनवाई आगामी 21 अक्टूबर को होगी।

सेंसेक्स, निफ्टी में उछाल; सेंसेक्स 488 अंक उछला, निफ्टी 17,800 के करीब; टाइटन में 10% की बढ़त

भारतीय बाजार कल के नुकसान से उबरकर गुरुवार को सकारात्मक पर समाप्त हुआ। सेंसेक्स 488 अंक उछलकर 59,677.83 पर, जबकि निफ्टी 144.35 अंक ऊपर 17,790.35 पर बंद हुआ ।

सेंसेक्स चार्ट (07.10.21) एक नजर में

तेल और गैस को छोड़कर, अन्य सभी सेक्टोरल इंडेक्स निफ्टी रियल्टी और ऑटो इंडेक्स में 4-6 फीसदी की बढ़त के साथ हरे निशान में बंद हुए। बीएसई के मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में 1-1 फीसदी से ज्यादा की तेजी आई।
बैंक निफ्टी 0.62% बढ़कर 37,750 पर पहुंच गया ।

रियल्टी के साथ ऑटो ने बढ़त हासिल की। टाइटन और टाटा मोटर्स शीर्ष लाभार्थियों में से थे। टाइटन आज सेंसेक्स में शीर्ष पर रहा, समापन पर 10.69% उपर था, इसके बाद एमएंडएम, मारुति, इंडसइंड बैंक और सन फार्मा का स्थान रहा। डॉ रेड्डीज ने सबसे खराब प्रदर्शन किया जो 1.3% नीचे था, इसके बाद एचडीएफसी और नेस्ले इंडिया थे। सेंसेक्स हरे रंग में 20 और लाल रंग में 10 शेयरों के साथ बंद हुआ ।

सेंसेक्स के शेयर एक नजर में

स्मॉलकैप क्षेत्र से कम से कम 346 शेयर 52 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गईं। इस बीच, 15 शेयर 52-सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए, जिनमें से ज्यादातर माइक्रोकैप स्पेस से थे। लगभग 460 शेयरों ने अपर सर्किट लिमिट और 145 लोअर सर्किट लिमिट को हिट किया। सेंसेक्स हरे रंग में 20 और लाल रंग में 10 शेयरों के साथ बंद हुआ, जबकि निफ्टी में 33 अग्रिम और 17 गिरावट देखी गई।

निफ्टी के प्रमुख शेयरों के टॉप गेनर और लूजर का हाल

कन्हैया का कांग्रेस के साथ आना कांग्रेस और कन्हैया दोनों की जरुरत है

कन्हैया कुमार: बहुत कठिन है डगर पनघट की

न मैं वामपंथी हूँ और न ही काँग्रेसी हूँ, लेकिन मेरी नज़रों में वामपंथी या काँग्रेसी होना गुनाह नहीं है, उसी प्रकार जिस प्रकार भाजपायी और संघी होना गुनाह नहीं है। गुनाह है इनके कुकर्मों के खिलाफ आवाज़ न उठाना। इसी प्रकार, न व्यक्ति-केन्द्रित राजनीति में मेरा विश्वास है और न ही मैं किसी मुक्तिदाता की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। हाँ, दक्षिणपंथियों की विभाजनकारी राजनीति के ख़िलाफ़ हूँ, इसमें सन्देह की कोई गुँजाइश नहीं है। मेरी सहानुभूति लेफ़्ट के प्रति भी है और काँग्रेस के प्रति भी, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं लेफ्ट या काँग्रेस की हर बात से सहमत हूँ, या फिर इन्हें निर्दोष मानता हूँ: सन्दर्भ चाहे मुस्लिम-तुष्टिकरण का हो, या फिर इनकी नकारात्मक राजनीति का। आलोचनात्मक विवेक के बिना समर्थन या विरोध मुमकिन नहीं है। यही स्थिति कन्हैया के सन्दर्भ में भी है। मेरा यह मानना है कि जब मुद्दों और समस्याओं को रोमांटिसाइज़ किया जाता है या फिर राजनीति में मुद्दों की जगह व्यक्ति एवं व्यक्तित्व को अहमियत दी जाती है, तो समस्याओं के समाधान की संभावना धूमिल पड़ती चली जाती है।

यही भूल भारतीय जनमानस ने सन् 1977 में की थी, और यही भूल 1989 में दोहरायी गयी। यही चूक अन्ना आन्दोलन के दौरान हुई और यही चूक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सन्दर्भ में हुई। यही चूक सन् 2019 में कन्हैया कुमार के संदर्भ में वामपंथियों से हुई, और यही चूक आज कन्हैया कुमार के काँग्रेस में प्रवेश से उत्साहित काँग्रेसजन या कन्हैया-समर्थक कर रहे हैं। सच तो यही है कि वामपंथ और कन्हैया कुमार एक दूसरे को सँभाल नहीं पाए, और परिणाम सामने है, कन्हैया कुमार का काँग्रेस के पक्ष में खड़ा होना। यह स्थिति काँग्रेस के लिए बेहतर है क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, उसे पाना-ही-पाना है, थोडा ज्यादा या फिर थोडा कम। यह स्थिति कन्हैया कुमार के लिए बेहतर हो सकती है और बेहतर प्रतीत हो रही है, पर कितनी बेहतर होगी, यह भविष्य के गर्भ में छुपा है जिसे आने वाला समय बताएगा। पर, वामपंथ और विशेष रूप से सीपीआई के लिए यह स्थिति किसी त्रासदी से कम नहीं है। रही बात मुझ जैसों की, तो उन्हें पता था की देर-सबेर यह तो होना ही था। पिता के श्राद्ध में बाल मुंडवाने से इनकार और चुनाव के वक़्त मंदिर में मत्थे टेकना, नोटबन्दी के समय माँ को लाइन में लगवाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना और खुद चुनावी लाभ के लिए माँ के इस्तेमाल की हरसंभव कोशिश, युवाओं की ऐसी टोली को तैयार करना जो उनके प्रति वफादार हो: ये तमाम बातें ऐसी आशंकाओं को जन्म ही नहीं दे रहे थे, बल्कि उसे पुष्ट भी कर रहे थे।

काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय गलत नहीं:

सबसे पहले मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि ‘अपने भविष्य को लेकर चिन्तित’ कन्हैया का काँग्रेस में शामिल होने का निर्णय गलत नहीं है। हाँ, अब वह आदर्शों, मूल्यों और सिद्धांतों की राजनीति का दावा नहीं कर सकता है। मेरी नज़रों में तो पहले भी नहीं कर सकता था। लेकिन, उसका काँग्रेस में जाना निस्संदेह जनवादी आन्दोलन के लिए एक झटका है, ऐसा झटका जिससे संभल पाना आसान नहीं होगा। यह उसके लिए एक सपने के टूटने की तरह है जिसकी कसक लम्बे समय तक बनी रहेगी। पर, अगर वामपंथ इस घटना को सकारात्मक नज़रिए से ले, तो यह उसके लिए आत्ममूल्यांकन का अवसर भी है कि क्या उसने अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता पर व्यक्ति को तरजीह देकर सही किया था। ऐसे हज़ारों-लाखों कन्हैया फ़ील्ड में सक्रिय रहते हुए जनवादी आन्दोलन को मज़बूती दे रहे हैं। मेरी नज़रों में उनकी अहमियत और उनकी उपलब्धियाँ कन्हैया से कहीं अधिक मायने रखती हैं। हाँ, यह ज़रूर है कि वे कन्हैया की तरह ‘मीडिया-डार्लिंग’ नहीं हैं।

कन्हैया कुमार की ज़रुरत:

हर राजनीतिक दल की अपनी विशिष्ट संरचना और विशिष्ट प्रकृति होती है। जिस प्रकार संघ-परिवार के बिना भाजपा की कल्पना नहीं की जा सकती है और नेहरु-गाँधी परिवार के बिना काँग्रेस की परिकल्पना नहीं की जा सकती है, ठीक उसी प्रकार वामपंथी दलों की भी अपनी विशिष्ट प्रकृति है। एक तो यह उन अपवाद राजनीतिक दलों में है जिसमें आतंरिक लोकतंत्र मौजूद है और जहाँ पार्टी संगठन में सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़कर ऊपर जाना होता है; और दूसरे पार्टी-संगठन बुज़ुर्ग वहाँ पर भी कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं। जहाँ तक बेगूसराय की बात है, तो सीपीआई अब भी बिहार में कहीं पर बची हुई है और थोड़ा-बहुत प्रभाव रखती है, तो बेगूसराय में। वहाँ ट्रेड यूनियन भी मज़बूत है, और यह पार्टी की आय का प्रमुख स्रोत भी है जिस पर वामपंथी नेताओं की नज़र है।

यद्यपि पार्टी ने कन्हैया कुमार को एडजस्ट करने की हर संभव कोशिश की और उसकी महत्वाकांक्षाओं को तुष्ट करने का प्रयास करते हुए पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थान भी दिया, तथापि कन्हैया कुमार की अपेक्षाओं पर खरा उतर पाने में वह असफल रही। इसका महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि बेगूसराय के बुज़ुर्ग वामपंथी कन्हैया कुमार को वाकओवर देने के लिए तैयार नहीं थे, और कन्हैया कुमार फ्रीहैंड से कम पर मानने के लिए तैयार नहीं। अगर कन्हैया ने लोकसभा-चुनाव के समय उन्हें और पार्टी के कैडरों को साइडलाइन करने की हरसंभव कोशिश की, तो उन्होंने भी कन्हैया कुमार की हार को सुनिश्चित करने में कहीं कोर-कसर नहीं उठा रखा। दोनों के बीच यह अदावत विधानसभा-चुनाव के दौरान देखने को मिली। हालात यहाँ तक पहुँच गए कि न तो कन्हैया पार्टी एवं उसके बुजुर्गों के साथ सहज रह गए और न ही पार्टी एवं उसके बुजुर्ग कन्हैया कुमार के साथ।

दूसरी बात यह कि कन्हैया ने आरम्भ से ही ऐसा लाइन लिया जो गैर-वामपंथी विपक्ष के साथ सहज महसूस कर सके और उसका स्टैंड गैर-वामपंथी विपक्ष के लिए असहज करने वाला न हो। इसे इस बात से भी बल मिला कि पिछले चुनाव के दौरान कन्हैया को अक्रॉस द पार्टी लाइन जाकर सहयोग एवं समर्थन मिला। साथ ही, कई लोगों को व्यक्तिगत रूप से कन्हैया को कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन वामपंथी दल से उसकी उम्मीदवारी के कारण उन्होंने कन्हैया को समर्थन देने और उसके लिए वोट करने से परहेज़ किया। इससे कन्हैया कुमार को यह लगा कि अगर वह सीपीआई का उम्मीदवार न होकर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ता, तो जीत सकता था। अब यह बात अलग है कि यह खुशफहमी ऐसी स्थिति पैदा होने पर टिक पाती अथवा नहीं, लेकिन इससे इतना तो स्पष्ट हो ही गया कि कन्हैया कुमार को एक बड़े प्लेटफ़ॉर्म की तलाश है। जैसे ही इसके लिए उपयुक्त समय और उपयुक्त अवसर आया, कन्हैया कुमार सीपीआई का दामन छोड़कर काँग्रेस के नाव पर सवार हो गए। इससे इतना तो हो ही जाएगा कि कन्हैया कुमार को एक बड़ा प्लेटफ़ॉर्म मिल जाएगा जहाँ से निकट भविष्य में शायद राज्यसभा का रास्ता भी खुले और काँग्रेस के प्रवक्ता के रूप में वे मीडिया कवरेज भी हासिल कर पाने में सफल हों। राजनीतिक भविष्य को लेकर जो अनिश्चितता उन्हें परेशान कर रही है और सत्ता का एक डर, जो उनके अन्दर कहीं गहरे स्तर पर विद्यमान है, वह डर दूर होगा अलग से।

वामपंथियों को लुभाता रहा है काँग्रेस:

ऐसा नहीं है कि यह स्थिति बेगूसराय में ही देखने को मिलती है। इस सन्दर्भ में वामपंथियों का लम्बा-चौड़ा इतिहास है। काँग्रेस तो वामपंथियों की सहोदर ही है। वामपंथियों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन उसे हमेशा मिलता रहा है, और जेएनयू के वामपंथियों की तो काँग्रेस आश्रय-स्थली ही रही है। जैसा कि पुष्परंजन जी अपने आलेख ‘हिटलर के मुल्क में मार्क्सवादियों की जीत’ में लिखते हैं। सन् (1975-76) में जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे देवी प्रसाद त्रिपाठी ने एसएफआई से काँग्रेस और फिर काँग्रेस से एनसीपी तक की यात्रा तय की, तो जेएनयू में एसएफआई राजनीति से निकले डॉ. उदितराज (पूर्व नाम रामराज) ने भाजपा होते हुए काँग्रेस तक की यात्रा। इसी प्रकार चाहे शकील अहमद ख़ान (1992-93) की बात करें, या बत्ती लाल बैरवा की, या फिर नासिर अहमद की, इन लोगों ने जेएनयू के भीतर एसएफआई की राजनीति करते हुए अध्यक्ष के रूप में जेएनयू छात्रसंघ को नेतृत्व प्रदान किया, लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में इन्होंने काँग्रेस का दमन थामते हुए अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने का काम किया। वहाँ वैचारिक प्रतिबद्धता इन्हें ऐसा करने से रोक नहीं पायी। अब, सवाल यह उठता है कि जब अल्ट्रा लेफ्ट सोच वाली आइसा से जेएनयू छात्रसंघ-अध्यक्ष रहे संदीप सिंह (2007-08) और मोहित के. पाण्डेय काँग्रेस में जा सकते हैं, तो कन्हैया कुमार तो फिर भी एआईएसएफ, जो वामपंथी संगठनों में सबसे अधिक उदारवादी सोच वाला छात्र संगठन है जो सीपीआई से सम्बद्ध है, से जुड़े रहे हैं।

काँग्रेस की ज़रुरत:

दरअसल, अगर काँग्रेस ने कन्हैया को प्राथमिकता दी है, तो इसका कारण यह है कि वह कन्हैया कुमार की मोदी-विरोधी छवि, उनकी वाकपटुता, पढ़े-लिखे युवाओं के बीच उसके क्रेज़ और उसकी अखिल भारतीय अपील को भुनाना चाहती है। साथ ही, कन्हैया कुमार के आने से काँग्रेस को नयी पीढ़ी का ऐसा नेता मिलेगा जिसकी मास-अपील है और जिसके सहारे काँग्रेस बिहार में अपने मृतप्राय संगठन में जान फूँकना चाहती है। इतना ही नहीं, काँग्रेस कन्हैया कुमार के सहारे एक बार फिर से सवर्ण मतदाताओं पर नज़र गराए हुए है और उसे लगता है कि पिछले तीन दशकों से हाशिये पर खड़े सवर्ण समुदाय के लिए कन्हैया कुमार उनके राजनीतिक वर्चस्व की पुनर्स्थापना में सहायक साबित हो सकते हैं। इससे ऐसा लगता है कि काँग्रेस बिहार में अपने रिवाइवल को लेकर गम्भीर है, लेकिन उसकी दुविधा महागठबंधन की ज़रुरत और काँग्रेस एवं कन्हैया कुमार को लेकर राजद के रवैये को लेकर है।

काँग्रेस देश की ज़रुरत:

मैं कन्हैया की इस बात से सहमत हूँ, यह कहना तो उचित नहीं है क्योंकि मैं ये बातें लम्बे समय से कह रहा हूँ। मेरा मानना है कि “देश को बचाने के लिए काँग्रेस को बचाना होगा।” जब मैं ऐसा कहता हूँ, तो मेरे लिए काँग्रेस एक राजनीतिक दल नहीं होता। अपनी तमाम कमियों के बावजूद, मेरे लिए काँग्रेस भारतीय सांस्कृतिक चिन्तन परम्परा का प्रतिनिधित्व करती है, उस सांस्कृतिक चिन्तन परम्परा का, जिसके केन्द्र में सहिष्णुता और समन्वय का भाव मौजूद है, जो भारत की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता के प्रति संवेदनशील है तथा जो अपनी मूल प्रकृति में समावेशी है। आज सत्ता-प्रायोजित असहिष्णुता और उसकी पृष्ठभूमि में भारतीय समाज एवं राजनीति के साम्प्रदायीकरण ने भारतीय समाज एवं संस्कृति की विविधता के समक्ष ऐसे चुनौतियाँ उपस्थित की हैं जो राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता पर भी भरी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में इस सोच के खिलाफ ज़ंग किसी भी देशभक्त की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

विचारधारा की राजनीति के भ्रम से मुक्त हो वामपंथ:

कन्हैया कुमार के इस निर्णय से वामपंथी सकते में हैं, और आलम यह है कि उन्होंने कन्हैया के विरुद्ध मोर्चा तक खोल दिया है। उसे समझौतावादी से लेकर अवसरवादी तक साबित करने की हरसंभव कोशिश हो रही है। वामपंथियों को अगर इस बात की गलतफहमी हो कि वे और उनकी विचारधारा से जुड़े लोग ‘विचारधारा की राजनीति’ करते हैं, वे इस गलतफहमी को अपने दिमाग से बाहर निकल दें। इस प्रकार की सोच अतिवाद की ओर ले जाती है। इसी सोच का परिणाम है कि जब बेगूसराय के रास्ते कन्हैया कुमार का राजनीति में प्रवेश हुआ, तो उन्होंने कन्हैया के चरित्र एवं व्यक्तित्व को रोमांटिसाइज़ करते हुए उसे ‘मोदी के वामपंथी अवतार’ में तब्दील ही कर दिया और मुद्दों को दरकिनार करते हुए व्यक्ति-केन्द्रित राजनीति की दिशा में ठोस पहल की; और अब जब कन्हैया कुमार वामपंथ का दामन छोड़कर काँग्रेस में शामिल हो चुका है, तो उसे खलनायक साबित करने की हरसंभव कोशिश की जा रही है। आखिर इस बात की अनदेखी क्यों की जा रही है कि आज के दौर की राजनीति विचारधारा से परे जा चुकी है, और जो भी लोग विचारधारा की राजनीति कर रहे हैं, वे या तो हाशिये पर धकेले जा चुके हैं या धकेले जा रहे हैं। यह खुद वामपंथी राजनीति की भी वास्तविकता है, अन्यथा शत्रुघ्न प्रसाद सिंह की अनदेखी कर लोकसभा-चुनाव,2014 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह और लोकसभा-चुनाव,2019 में कन्हैया कुमार को उम्मीदवार नहीं बनाया जाता। क्या यह सच नहीं है कि शत्रुघ्न बाबू की जगह राजो दा को टिकट दिलवाने में सूरजभान, शत्रुघ्न बाबू के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता और उसकी धन-बल की राजनीति की अहम् भूमिका रही? क्या यह सच नहीं है कि पिछले चुनाव में सीपीआई कैडर की उपेक्षा करने की कन्हैया कुमार को खुली छूट दी गयी? खुद बेगूसराय की राजनीति में भोला बाबू और सुरेन्द्र मेहता जैसे लोगों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए सीपीआई का दामन नहीं छोड़ा? क्या यह सच नहीं है कि हालिया सम्पन्न बिहार विधानसभा-चुनाव में मटिहानी से सीपीएम उम्मीदवार राजेन्द्र प्रसाद सिंह की हार में पूर्व सीपीआई विधायक राजेन्द्र राजन जी के चकवार-प्रेम और बछवाड़ा से सीपीआई उम्मीदवार अवधेश राय की हार में सीपीएम के रामोद कुँवर के भाजपा उम्मीदवार सुरेन्द्र मेहता के प्रति प्रेम की अहम् भूमिका रही? उस समय तो वैचारिक प्रतिबद्धता का ख्याल नहीं रहा। अब सवाल यह उठता है कि यह दोगलापन कब तक चलेगा कि जब तक कोई सीपीआई में है, तो उदार, धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील है; और अगर किसी दूसरे दल में, तो प्रतिक्रियावादी, समझौतावादी और कम्युनल?

बदलते परिवेश और बदलती सोच को समझने की ज़रुरत:

दरअसल, वामपंथी विचारधारा से काँग्रेस की निकटता और उसके भीतर पारंपरिक रूप से मज़बूत सेंटर लेफ्ट की मौजूदगी, जो पिछले तीन दशकों के दौरान कमजोर पड़ी है, अपनी भूलों के कारण वामपंथ का निरन्तर कमजोर पड़ते चला जाना, वामपंथी दलों पर बुजुर्गों के वर्चस्व के कारण युवाओं के सीमित स्पेस, छात्र नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और इसकी पृष्ठभूमि में अखिल भारतीय उपस्थिति एवं प्रभावशीलता के कारण काँग्रेस में बेहतर राजनीतिक भविष्य की सम्भावना इस प्रवृत्ति को उत्प्रेरित करती है। वामपंथी दलों को भी इस सच्चाई को स्वीकारना होगा और यह तब तक संभव नहीं है जब तक कि वे बदलते हुए हालात और बदलती हुई सोच को समझने के लिए तैयार नहीं हो जाते। उन्हें समाज में मूल्यों एवं वैचारिकता के क्षरण को भी समझना होगा और इस बात को भी समझना होगा कि प्रबल राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार युवा अपनी बारी की प्रतीक्षा नहीं कर सकते। उनके पास समय नहीं है और उन्हें कम समय में बहुत कुछ हासिल करना है। वे विचारधारा के नाम पर अपनी भविष्य की संभावनाओं से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। इन सबके मूल में मौजूद है वह दबाव, जो पिछली तीन दशकों के दौरान पूँजीवादी उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते हुए वर्चस्व के कारण सृजित हुआ है और जिसने भारतीय समाज के पारंपरिक मूल्यों और नैतिकताओं को तहस-नहस कर दिया है। इतना ही नहीं, वामपंथ को लोचशीलता प्रदर्शित करते हुए सत्ता की राजनीति की बजाय दबावकारी समूह की राजनीति को प्राथमिकता देनी चाहिए, और उन लोगों एवं उन दलों को भी भरोसे में लेना चाहिए जिनकी प्रतिबद्धता भले ही वामपंथी विचारधारा के प्रति नहीं है, पर जो वामपंथी सरोकारों से इत्तफाक रखते हैं। इस मोर्चेबन्दी को मज़बूत करते हुए वामपंथ को सड़क की राजनीति पर और अधिक फोकस करना चाहिए क्योंकि एक तो अन्य गैर-भाजपा दल सुविधाभोगी होने के कारण सड़क की राजनीति भूल चुके हैं और दूसरे, डॉ. लोहिया ने कहा है: “जब सड़कें सूनी हो जाती हैं, तो संसद आवारा हो जाती है।” तमाम सीमाओं के बावजूद वामपंथ की खासियत इस बात में है कि यह कैडर-आधारित पार्टी है और इसके अधिकांश कैडर, कुछ हद तक वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध होने के साथ-साथ सड़क की राजनीति में विश्वास करते हैं। ऐसी स्थिति में नियति ने भारतीय वामपंथियों पर ऐतिहासिक दायित्व के निर्वाह की जिम्मेवारे सौंपी है जिससे वे मुँह नहीं मोड़ सकते हैं।

बहुत कठिन है डगर पनघट की:

जहाँ तक कन्हैया कुमार के राजनीतिक भविष्य का प्रश्न है, तो कन्हैया के लिए आगे का रास्ता आसान नहीं होने जा रहा है। इसका कारण यह है कि उन्होंने वामपंथी दलों की अदावत मोल ली है जिसके लिए शायद वामपंथी उन्हें माफ़ नहीं करें, और इसकी कीमत देर-सबेर उन्हें चुकानी पड़ सकती है। लेकिन, इस पूरी प्रक्रिया में कन्हैया ने अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता गँवाते हुए अपनी राजनीतिक पूँजी को दाँव पर लगाया है। इस क्रम में उनकी छवि अवसरवादी राजनेता वाली बनी है और इसके कारण यह सन्देश गया है कि वे भी अन्य राजनीतिज्ञों की तरह ही हैं। इसके कारण वे लोग उनसे दूर छिटकेंगे जो राजनीतिक प्रतिबद्धताओं से मुक्त रहते हुए वैकल्पिक संभावनाओं की पड़ताल कर रहे थे।

टिपिकल राजनीतिज्ञ हैं कन्हैया कुमार:

यह कहने, कि कन्हैया कुमार टिपिकल राजनीतिज्ञ बनने की ओर अग्रसर हैं, की तुलना में यह कहना कहीं अधिक उचित है कि कन्हैया कुमार में आरम्भ से ही टिपिकल राजनीतिज्ञ के लक्षण मौजूद रहे हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो शायद जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में उनकी जीत ही संभव नहीं हो पाती। सन् 2016 में ही क़रीब जेएनयू वाली घटना के 6-7 माह बाद बाप्सा के नौ सदस्यों को, जो दलित समुदाय से आते थे, को जेएनयू से निलम्बित किया गया था, कन्हैया सहित तमाम तथाकथित प्रगतिशील और उदारवादी ताक़तों ने निलम्बन के मसले पर उनका साथ देने से इनकार करते हुए ‘जय भीम, लाल सलाम’ नारे को ‘सार्थक’ बनाया। कुछ ऐसे ही हालात बेगूसराय में दिखे, जब पूर्व एमएलसी उषा साहनी को कोई पूछने वाला तक नहीं था, जबकि वे उस सभा में सीपीआई की वरिष्ठतम नेत्री थीं और उस सेमीनार में प्रमुख वक्ता के रूप में कन्हैया कुमार मंच पर विराजमान थे। लोकसभा-चुनाव के बाद होने वाली हिंसा में तीन वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, लेकिन कन्हैया कुमार ने मृतकों के घर जाकर उनके प्रति संवेदना प्रकट करने की आवश्यकता नहीं महसूस की। ये सारे प्रकरण एक दौर में रूमानी नायक में तब्दील हो चुके कन्हैया कुमार के टिपिकल राजनीतिज्ञ होने की ओर इशारा करते हैं।

कन्हैया की समस्या:

श्याम विज सही ही लिखते हैं, “लोग कहते हैं कि कन्हैया कुमार महत्वाकांक्षी है, लेकिन मुझे यह लगता है कि कन्हैया कुमार की समस्या यही है कि वह महत्वाकांक्षी नहीं है।” अगर कन्हैया कुमार महत्वाकांक्षी होते, तो इससे देश एवं समाज का भी भला होता, और खुद उनका भी भला होता। दरअसल, कन्हैया की समस्या यह है कि उसकी महत्वाकांक्षा का दायरा अत्यन्त सीमित है। वह येन-केन-प्रकारेण संसद तक पहुँचने की चाह रखता है, उससे अधिक कुछ नहीं; जबकि उसके सामने खुला मैदान है। लेकिन, इसके लिए उसे मीडिया की चकाचौंध से और इसके द्वारा मिलने वाली सस्ती लोकप्रियता की चाह से मुक्त होना होगा। उसे व्हाट्स एप्प, फेसबुक और ट्वीटर की मायावी दुनिया से बाहर निकलकर ज़मीन पर उतरकर राजनीति करनी होगी, अपने कोम्फोर जोन से बाहर निकलना होगा और अनकम्फर्ट जोन में प्रवेश के लिए तैयार होना होगा। लेकिन, अबतक इसके लक्षण दूर-दूर तक दिखाई नहीं पड़ते हैं। अबतक उसने बने-बनाये प्लेटफ़ॉर्म का इस्तेमाल किया है, हर वह काम किया है जो मीडिया में फुटेज दिला सके और इस काम में उसे सवर्णवादी मीडिया का पूरा-पूरा साथ मिला है। यहाँ तक कि उसने उस मूल एजेंडे से समझौते भी किए हैं और उन लोगों की अनदेखी करते हुए उनकी उपेक्षा की है, उनका तिरस्कार तक किया है जो संघर्ष के दिनों में उसके साथी रहे हैं और जिन्होंने उस समय उसका साथ दिया जिस समय कन्हैया कुमार के साथ लोग खड़े होने से परहेज़ कर रहे थे। जेएनयू से लेकर बेगूसराय तक, एआईएसएफ से लेकर सीपीआई तक के उसके साथी एवं कैडर इसके साक्षी हैं।

एर्रोगेंस से मुक्ति पाने की ज़रुरत:

इतना ही नहीं, कन्हैया कुमार की छवि भी उनकी मुश्किलों को बाधा रही है। दिल्ली से बेगूसराय और पटना तक, छात्र-जीवन से राजनीतिक जीवन तक कन्हैया के एर्रोगेंस की किस्से सुने जा सकते हैं। दरअसल, कन्हैया जितना डिजर्व करता था, उसे उससे कहीं बहुत अधिक मिला। वह अपनी इस सफलता को पचा नहीं पा रहा है। इसने उसे एर्रोगेंट बनाया, और उस एर्रोगेंस के कारण उसने बहुत कम समय में अपने दोस्तों और शुभचिंतकों को खोया है। आज कन्हैया के प्रति सहानुभूति एवं समर्थन रखने वालों को सुदर्शन की ‘हार की जीत’ कहानी के बाबा भारती की बात याद आ रही होगी, और एक ही प्रश्न उनके मानस-पटल पर बार-बार कौंध रहा होगा: ‘अब कोई किसी ‘कन्हैया’ पर कैसे विश्वास करेगा? अब इस तरह से विश्वास करना मुश्किल होगा।”

मुस्लिम-परस्त छवि से छुटकारा पाने की चुनौती:

अबतक कन्हैया की छवि प्रो-मुस्लिम की रही है, और उन्होंने बेगूसराय चुनाव के दौरान जो रवैया अपनाया, उससे उनकी यह छवि और भी अधिक मज़बूत हुई है। उनकी इस छवि को मज़बूत करने में उनके विरोधियों की भी अहम् भूमिका रही, और सीएए-एनआरसी-एनपीआर के मसले पर होने वाले आन्दोलन में उनकी सक्रियता ने इसे और अधिक पुष्ट किया है। उन्हें ये बातें समझनी होंगी कि सिर्फ मुसलमानों एवं दलितों के भरोसे बैठे रहने से कुछ नहीं मिलने वाला है। दलित वोटबैंक के तो पहले से ही कई दावेदार हैं, और अब तो यह बिखर चुका है। रही बात मुस्लिम वोटबैंक की, तो दक्षिणपंथी हिंदुत्व के उभार, इसके कारण मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के द्वारा मुस्लिम उम्मीदवारों को उम्मीदवार बनाने से परहेज़, समाज एवं राजनीति में मुस्लिमों के हाशिये पर चले जाने के अहसास और इसकी पृष्ठभूमि में ओवैसी के राजनीतिक उभार के कारण आने वाले समय में उसमें भी बिखराव आने जा रहा है। आने वाले समय में उन्हें ज़मीनी स्तर पर राजनीति करते हुए अपना जनाधार भी विकसित करना होगा और काँग्रेस संगठन को मजबूती प्रदान करते हुए बिहार में मृतप्राय काँग्रेस में जान भी फूँकनी होगी, अन्यथा वे इतिहास के बियाबान में कहाँ खो जायेंगे, पता भी नहीं चलेगा। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि वे राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दें, और इस बात को पुष्ट करें कि उन्होंने अपनी पिछली गलतियों से कुछ सीखा भी है। काँग्रेस में जाने का निर्णय उनकी राजनीतिक परिपक्वता की ओर भी इशारा करता है और इस बात की ओर भी कि वे फूँक-फूँक कर कदम रख रहे हैं, लेकिन इसी दौरान उन्होंने ऐसे काम भी किये हैं जो उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर सवालिया निशान लगते हैं। अब, जब कन्हैया काँग्रेस के साथ जुड़कर अपनी नयी राजनीतिक पारी शुरू करने जा रहे हैं, उन्हें इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए कि वे अब राजनीति के नौसिखुआ नहीं हैं।


इतना ही नहीं, समस्या कन्हैया कुमार की छवि, उसके रवैये और उसकी कार्यशैली के कारण भी है। पहली बात यह कि कन्हैया कुमार की कम्युनिस्ट पृष्ठभूमि, ‘जय भीम, लाल सलाम’ का नारा और उनकी मुस्लिम-परस्त छवि इसमें बाधक बन सकती है। इतना ही नहीं, बड़े सलीके से उनकी सवर्ण-विरोधी छवि और हिन्दू-विरोधी छवि भी निर्मित की गयी। उसके पिता के श्राद्ध में बाल नहीं मुंडवाने को मुद्दा बनाया गया। लोकसभा-चुनाव के समय कोरई गाँव की घटना को अंजाम दिया गया और इसका इस्तेमाल उन्हें सवर्ण-विरोधी साबित करने के लिए किया गया। पिछले लोकसभा-चुनाव में यही छवि बेगूसराय से कन्हैया कुमार की जीत में बाधक बनी थी। दूसरी बात यह कि सीपीआई का सदस्य रहते हुए कन्हैया कुमार ने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे ऐसा लगता हो कि संगठन को मजबूती प्रदान करने में उसकी कोई रूचि है, जबकि उसके पास इसके बेहतर अवसर उपलब्ध थे। तीसरी बात यह कि कन्हैया कुमार अहमन्यता के शिकार हैं, और इसी कारण उन्हें यह लगता है कि उनका मुकाबला सिर्फ और सिर्फ मोदी से है। यह अहसास उन्हें ज़मीनी स्तर की राजनीति से दूर रख रहा है जिसके बिना न तो कन्हैया कुमार की महत्वाकांक्षा पूरी हो सकती है और न ही वे काँग्रेस की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हैं। अब देखना यह है कि कन्हैया कुमार कहाँ तक पूर्व की अपनी गलतियों से सीखते हुए राजनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हैं और अपनी राजनीतिक स्थिति को मज़बूत करने की कोशिश करते हैं? इसकी अपेक्षा तो नहीं के बराबर है, पर तब तक कन्हैया को उनके उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य के लिए शुभकामनाएँ तो दी ही जा सकती हैं।

लेखक –कुमार सर्वेश

तीसरे चरण के चुनाव से पहले ही 3 हजार से अधिक उम्मीदवार हुए निर्वाचित नक्सल प्रभावित मतदान केन्द्रों पर रहेंगी विशेष नजर

बिहार पंचायत चुनाव में तीसरे चरण का कल मतदान है शांतिपूर्ण और निष्पक्ष चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग की माने तो इस बार फुलप्रुफ व्यवस्था है।इभीएम और बेवकास्ट के साथ साथ थम जांच मशीन पर इस बार विशेष नजर रखी जा रही है । कल वोटिंग सुबह 7 बजे से शाम 5 तक होगी। तीसरे चरण में कुल 23 हजार 128 पदों के उम्मीदवार अपने किस्मत आजमायेंगे। इन पदों के लिए 81616 उम्मीदवार मैदान में हैं । इनमें 43061 महिला उम्मीदवार मैदान में है तो 38555 पुरूष मैदान में हैं। तीसरे चरण में कुल 57 लाख 98 हजार, 379 मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इसके लिए 6646 भवनों में 10529 मतदान केन्द्र बनाये गए हैं ।

नक्सल प्रभावित पंचायत की सुरक्षा को लेकर विशेष सुरक्षा का दावा

हलाकि इस बार नक्सल प्रभावित पंचायत में भी चुनाव है जिसको देखते हुए
राज्य निर्वाचन आयोग ने 445 मतदान भवन नक्सल प्रभावित इलाकों के सभी मतदान केंद्रों पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए है। शांतिपूर्ण, भय मुक्त, मतदान केंद्रों की सुरक्षा, EVM की सुरक्षा के लिए बिहार पुलिस के कुल 35616 अफसर और जवानों को लगाया गया है। इनमें जिला पुलिस के साथ-साथ BSMP, SAP और होमगार्ड की टीम शामिल है।

चुनाव से पहले ही हजारों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं

राज्य निर्वाचन आयोग के अनुसार तीसरे चरण में 3144 प्रत्याशी निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं । सबसे अधिक 3020 पंच निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं । इसी तरह से पंचायत समिति सदस्य के 3 पदों पर भी निर्विरोध निर्वाचन हो गया है। ये निर्वाचन तीसरे चरण के 35 जिलों के 50 प्रखंडों में हुआ है। इन सीटों पर 8 अक्टूबर को मतदान होना है ।वोटिंग से पहले प्रथम चरण की सीटों पर रिजल्ट जारी

ग्राम पंचायत सदस्य पद के लिए 118, पंच पद के लिए 3020, मुखिया पद के लिए 2, पंचायत समिति सदस्य पद के लिए 3, ग्राम कचहरी सरपंच पद के लिए 1 पद शामिल है। तीसरे चरण में 186 पद खाली रह गए हैं यहां कोई प्रत्याशी दावेदारी नहीं किया है। इसमें ग्राम पंचायत सदस्य पद के लिए 7, पंच पद के लिए 176 और ग्राम कचहरी सरपंच पद के लिए 3 पद शामिल है। आयोग का कहना है कि इन पदों पर किसी भी प्रत्याशी ने दावेदारी नहीं की है। तीसरे चरण में कुल 186 पद खाली रह गए हैं यानी यहां किसी ने भी नामांकन नहीं किया। इनमें सबसे अधिक पंच पद 176 हैं।

बिहार पुलिस के कार्यशैली पर उठा सवाल रुपा और उसकी माँ की आत्महत्या के लिए कौन है जिम्मेवार

आत्महत्या जैसी घटना ना तो मीडिया के लिए कोई खबर है और ना ही समाज के पास वक्त है उस पर मंथन करने को,हां सुशांत सिंह राजपूत जैसे लोग आत्महत्या कर लेते हैं तो उस पर महीनों चर्चाए जरुर होती है ।लेकिन आज हम आपको बिहार की एक बेटी की आत्महत्या की वजह को लेकर आप से बात करना चाहते हैं शायद आपको उबाऊ लगे क्यों कि बिहार की वो बेटी ना तो कोई सेलिब्रिटी है ना ही यूपीएसपी की परीक्षा पास कि है।

पता नहीं क्यों जब से बिहार की उस बेटी का सुसाइड नोट पढ़ा हूं मैं ठीक से सो नहीं पा रहा हूं बार बार उसके सुसाइड नोट का हर एक शब्द सिस्टम और समाजिक मर्यादओं के सामने लाचार एक बिहारी और भारतीय का चेहरा मेरे आंखों के सामने नाचने लगता है।

पहले मां बेटी के सुसाइड करने का मजमून क्या है जरा इस पर चर्चा कर लेते हैं फिर बात सुसाइड नोट की होगी ,हुआ ऐसा है कि छपरा के मढ़ौरा में सोमवार को इसरौली पेट्रोल पंप के पास बाइक सवार पांच अपराधियों ने हथियार के बल पर कैशवैन से 40 लाख रुपए लूट लिया था ।

लूट की घटना के बाद सारण पुलिस को एक सीसीटीवी फुटेज मिला जिसके आधार पर घटना के बाद भाग रहे अपराधियों के मोटरसाइकिल का नम्बर पता चला उसी आधार पर पुलिस ने भेल्दी थाना क्षेत्र के खारदरा में अपराधी सोनू पांडेय के घर छापा मारा जहां से पुलिस को लूट की घटना में उपयोग किये गये मोटरसाइकिल के साथ साथ से छह लाख रुपए और एक देशी पिस्टल बरामद किया हलाकि सोनू घर पर मौजूद नहीं था लेकिन अवैध हथियार मिलने की वजह से पुलिस सोनू के पिता चंदेश्वर पांडेय को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने सोनू के पिता के साथ जिस तरीके मारपीट गाली गलौज और पत्नी और बेटी के सामने जलील किया उससे आहत होकर सोनू की मां और बहन ने आत्महत्या कर लिया ।हलाकि पुलिस ने सोनू के पिता के साथ जो व्यवहार किया उसमें अस्वभाविक कुछ भी नहीं है जिसको लेकर सिस्टम पर सवाल खड़े किये जा सके पुलिस तो ऐसा करती ही है इसमें ऐसा क्या है जो मां बेटी सुसाइड कर ली, लेकिन रुपा ने सुसाइड नोट के सहारे जो सवाल खड़े की है वह सवाल संकेत है आज की युवा पीढ़ी की सोच कितनी दूर तलक चली गयी और सिस्टम कहां पीछे छुट गया है इतना ही नहीं सवाल बिहार के युवक से भी जो चंद पैसे के लिए किस तरीके से गलत कदम उठा रहे हैं और उसका असर एक संवेदशील परिवार पर क्या पड़ रहा है ।

सुसाइड नोट में रुपा ने लिखा है भाई के कुकृत्य के कारण जिस तरीके से पुलिस हमलोगों के सामने पापा को जलील किया है ऐसी स्थिति में अब जिंदा रहने का कोई मतलब नहीं रहा गया है।

मेरे मां-बापा हमेशा से चाहते थे कि उनका बेटा और बेटी भविष्य में कुछ अच्छा काम करें लेकिन अफसोस उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। हम लोग गरीब जरूर हैं लेकिन गलत नहीं है और मेरे पापा हमेशा से हम सबको एक ही बात समझाते हैं कि बेटा मर जाना मगर कभी गलती ना करना। मेरे पापा बहुत बदनसीब हैं मेरे पापा का सपना पूरा ना हो सका।

रुपा ने सुसाइड नोट में आगे लिखा है कि मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि मेरे पापा को गलत ना समझें। प्लीज प्लीज प्लीज मेरे पापा खुद हमेशा सोनू से इस सब के कारण नाराज रहते थे। पापा हम आप की यह हालत नहीं देख सकते। हम कभी नहीं सोचे थे कि कोई आप पर ऐसे हाथ उठाए पर ऐसा हुआ। पुलिस किसी का सम्मान और दर्द नहीं समझती ऐसे में पापा मेरे जिंदा रहने का कोई मतलब नहीं है मां को भी साथ ले जा रहे हैं ।

रुपा तो चली गयी इस दुनिया से लेकिन हमारे आपके सामने कई सावल छोड़ गयी है एक मध्यवर्गीय परिवार के लिए आज भी मर्यादा और परिवार का इज्जत कितना मायने रखता है ऐसे में पुलिस को अपने कार्यशैली में बदलाव लाने कि जरुरत है नहीं तो आने वाले समय में इस तरह की कई घटनाए घट सकती है ।

बेटा अपराधी है तो बाप कहां से गुनहगार हो गया ।सोनू के कृत्य की सजा उसका परिवार क्यों भुगते छपरा एसपी को सोनू की मां और बहन की आत्महत्या करने को लेकर जिम्मेवारी तय करनी चाहिए इतना ही नहीं रुपा को इस दुनिया को छोड़ने की जो वजह रही है उस वजह के सहारे पुलिस के कार्यशैली में क्या सुधार लाया जा सकता है उस पर मुख्यमंत्री से लेकर डीजीपी तक को विचार करनी चाहिए।

बिहार में सरकार आपके द्वारा और पंचायती राज व्यवस्था से नक्सली मुख्यधारा में लौटने लगे हैं।

लाल इलाके में टूट रहा नक्सलियों का मिथक,
जिसके भय से कभी इलाके के लोग वोट डालने नहीं जाते थे
आज वही जनता के चौखट पर जाकर पंचायत के विकास वोट मांग रहा है

जी है हम बात कर रहे हैं बिहार में कभी नकस्लियों का गढ़ रहा झारखंड राज्य के सीमा से सटे गया जिले के बाराचट्टी थाना क्षेत्र के दक्षिणी इलाके पतलुका पंचायत का जहां 1990 के बाद कभी किसी ने वोट नहीं डाला ।चुनावों के दौरान नक्सलियों के वोट वहिष्कार के नारे का पूरी तौर पर पालन होता था। डर से लोग वोट डालने नही जाते थे और उम्मीदवार इस इलाके में प्रवेश करने की हिम्मत नहीं जुटाते थे। यही वह इलाका है जहां आपात स्थिति में लैंड हुये बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष वेंकैया नायडू का हेलीकॉप्टर नक्सलियों ने फूंक दिया था।

परंतु अब स्थितियां बदल चुकी है। यहां के मतदाता विकास के लिए बढ़-चढ़ कर मतदान करने की बात कह रहे हैं। उम्मीदवार भी निडर होकर जनसंपर्क अभियान चला रहे हैं। जहां खून खराबा का माहौल था वहां अब विकास की बात हो रही है। मुख्यधारा में लौटे कई नक्सली इस पंचायत चुनाव में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिस्सा ले रहे हैं।

पूर्व नक्सली नंदा सिंह बताते हैं कि जितने वर्षों तक उन्होंने बंदूक उठाये रखा वह उनके जीवन का वो काला अध्याय था। अब वे समझ चुके हैं कि बंदूक से बदलाव सम्भव नही है। क्षेत्र के विकास के लिए वे चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा ले रहे हैं। अब वे लोकतंत्र में विश्वास जता रहे हैं और ग्रामीणों के बीच घूम-घूम कर जनसंपर्क अभियान चलाकर वोट मांग रहे हैं। ताकि मौका मिलने पर क्षेत्र का विकास कर सकें।यह स्थिति नक्सल प्रभावित गया जिले का ही नहीं है बिहार के अधिकांश नक्सल प्रभावित जिलों में पंचायती राज व्यवस्था के लालू होने के बाद चीजे बदल गयी है नक्सली या तो खुद चुनाव लड़ रहे हैं या उनके समर्थक चुनाव लड़ रहे हैं इतना ही नहीं विरोध में अगर उम्मीदवार चुनावी मैदान में है भी तो उसके साथ किसी भी तरह का हिंसक घटना ना घटे इसके लिए नक्सली खुद चुनाव प्रचार के दौरान खास सतर्कता बरतता है ।

आप भी सुनिए क्या कहता है नक्सली

पेट्रोल और डीजल केन्द्र सरकार सात वर्ष में 14 लाख करोड़ का कमाई किया है

पाँच साल में सरकार को क़रीब चौदह लाख करोड़ रुपये पेट्रोल और डीज़ल पर लगने वाले सभी प्रकार के टैक्स से मिले हैं। विवेक कॉल का डेक्कन हेरल्ड में छपा लेख पढ़ सकते हैं। आख़िर केंद्र सरकार पेट्रोल और डीज़ल का दाम क्यों बढ़ाए जा रही है? जब चुनाव होते हैं तब दाम का बढ़ना कैसे रुक जाता है? क्या आप यह नहीं समझ रहे कि हर दिन आपकी जेब से सरकार कितना पैसा निकाल रही है? इससे बेहतर होता कि आयकर ही ले लेती है। पाँच लाख तक की आमदनी को टैक्स से माफ़ी देकर सरकार ने कोई तीर नहीं मारा था। इतने कम कमाने वालों से टैक्स के नाम पर मिलता ही क्या लेकिन कारपोरेट का टैक्स कम कर सरकार ने दूसरे रास्ते से भरपाई का रास्ता निकाल लिया है। पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स लगा कर। आज भी दाम बढ़े हैं। धर्म की राजनीति का यह सबसे सफल प्रदर्शन है। धर्म लोगों का नागरिक विवेक नष्ट कर देता है। अब सरकार लोगों के शरीर से ख़ून भी चूस लें तो लोग कहेंगे कि धार्मिक सुरक्षा और पहचान के लिए ये कुछ भी नहीं ।

आज दिल्ली में पेट्रोल 103.24 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 91.77 रुपये प्रति लीटर हो गया। मुंबई में पेट्रोल 109.25 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 99.55 रुपये प्रति लीटर हो गया।

आर्थिक मोर्चे पर फेल सरकार के पास कोई रास्ता नहीं बचा है। आपके बौद्धिक मोर्चे पर फेल हो जाने का लाभ उठाएँ और जेब से पैसे निकाल ले। धर्म की विजय हो।

लेखक –रवीश कुमार

माँ दुर्गा डोली पर सवार होकर आयी है और हाथी पर सवार होकर लौटेगी।

आज से पूरा बिहार माँ दुर्गा के उपासना में डूब जायेगा आज मां दुर्गा डोली पर सवार होकर आयी है और हाथी पर सवार होकर लौटेगी इस बार शारदीय नवरात्र आठ दिन का ही होगा।

आज 7 अक्टूबर को कलश स्थापन होगा। चतुर्थ व पंचमी पूजा एक साथ होगी यह बदलाव पितृ पक्ष मेला की वजह से हुई है ।
इस बार चतुर्थी व पंचमी तिथि एक साथ होने से कुष्मांडा माता व स्कंदमाता की अराधना एक साथ होगी।

माता रानी डोली में सवार होकर आएगी। इस लिहाज से महिलाओं का वर्चस्व बढ़ेगा और मान सम्मान में वृद्धि होगी। लेकिन महामारी से लोग परेशान रहेंगे। शास्त्रों में ऐसा वर्णन है कि जब मां दुर्गा डोली पर सवार होकर आती है तो राजनीतिक उथल पुथल की स्थिति होती है। यह प्रभाव सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। माता का डोली पर आना ज्यादा शुभ संकेत नहीं माना जाता। लेकिन माता का प्रस्थान हाथी पर होगा जिसे शुभ माना गया है। 15 अक्टूबर को नवरात्रि का पारण किया जाएगा और दशहरा पर्व भी मनाया जाएगा।

हाईकोर्ट ने कृषि सेवा से जुड़े अधिकारी के नियुक्ति प्रक्रिया शीघ्र पूरा करने का दिया निर्देश।

पटना हाई कोर्ट ने बिहार कृषि सेवा में डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर समेत अन्य पदों पर बहाली के मामले पर सुनवाई करते हुए चयन प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने का निर्देश बीपीएससी को दिया है। चीफ जस्टिस संजय करोल संजय करोल की खंडपीठ ने मनोज कुमार सिंह व अन्य की याचिका पर सुनवाई की।

235 पदों पर बहाली के लिए बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा विज्ञापन निकाला गया था। अधिवक्ता कुमार कौशिक ने कोर्ट को बताया कि याचिकाकर्ताओं ने बिहार एग्रीकल्चर सर्विस कैटेगरी – 1 के रूल्स कैडर (अपॉइंटमेंट, प्रमोशन) रूल्स, 2014 को चुनौती दी थी।

इसके तहत संविदा सेवा को वेटेज नहीं देने का प्रावधान है। याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति संविदा पर जिला स्तर पर डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर, प्रोजेक्ट डायरेक्टर के पदों पर की गई थी। 27 मार्च, 2018 को कोर्ट ने रिजल्ट के अंतिम प्रकाशन पर रोक लगा दिया था, लेकिन परीक्षा लेने की अनुमति दे दी थी।

तीन अप्रैल 2018 को मुख्य परीक्षा का संचालन किया गया। 07 नवंबर, 2019 को मुख्य परीक्षा का रिजल्ट घोषित किया गया था।

आजादी के बाद देश में फैले हिंसा के दौरान 84 दिन गाँधी पटना में रहे थे ।

महात्मा गाँधी और मेरे परदादा मंज़ूर सुब्हानी की साथ की तस्वीर। 20 मार्च से 30 मार्च 1947 तक महात्मा गांधी बिहार में ही रहकर दंगे की आग में झुलस रहे लोगो से शांति का प्रयास कर रहे थे।इस दौरान वे मसौढ़ी, पटना, हांसदीह, घोड़ौआ, पिपलवां, राजघाट, जहानाबाद, घोसी, अमठुआ, ओकरी, अल्लागंज, बेला, जुल्फीपुर, अबदल्लापुर, बेलार्इ, शाइस्ताबाद आदि स्थानों पर मुस्लिम लीग के सदस्यों, हिन्दू महासभा के सदस्यों, स्त्री-पुरुष मुसलमान शरणार्थियों से मिले एंव ग्राम प्रतिनिधियों, पुलिसकर्मियों और कांग्रेसी कार्यकर्ताओं से बातचीत की।

गाँधी बिहार में

प्रतिदिन सामूहिक प्रार्थना-प्रवचन किये।
राष्ट्रपिता महात्मा हमारे पूर्वजों के गाँव ज़ुल्फीपुर (मोदनगंज)भी पहुँचे थे ।वहाँ साम्प्रदायिक दंगे में हुई छति का जायज़ा लेने पहुँचे गाँधी जी ने हमारे परदादा मंज़ूर सुब्हानी जो कि स्थानीय जमींदार थे से विस्तृत जानकारी ली ।

दंगे में उस वक़्त हमारे पूर्वजो को भी वह जगह छोड़नी पड़ी थी परिवार के औरतें खुद को उस इंसानियत खो चुकी भीड़ से बचने के लिए घर के पास बने कुआँ में बच्चों संग छलांग लगा दी थी ।

ये तस्वीरे उसी कुँए की है जिसे देखने अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देखने पहुँचे थे। दंगे के बाद तब हमारे परदादा वहाँ गांधी जी के साथ खड़े थे वही कुआँ को दर्शाते हुए पूरी कहानी उन्हें बता रहे थे। गांधी जी इतनी भी हिम्मत नही हो पा रही थी वो कुआँ अंदर झांके बहुत भयावह हाल था।

परिवार के जो लोग वहाँ से भाग निकले थे वह काको आ कर बसे और यहाँ मकान बना ।
तसवीरें हमारे उसी पैतृक घर की है जो घर दंगे के कारण वीरान हो चुका था गांधी जी उसी घर का मुआयना करते नज़र आ रहे हैं। इससे ज़्यादा कहानी न मैं लिख पाऊंगा न आप पढ़ पाएंगे ।

गाँधी चंपारण में

बिहार के इसी कौमी दंगों में अथक दौरा करते गांधीजी ने मार्च 1947 में बिहार के सर्वमान्य नेताओं से सार्वजनिक रूप से पूछाः ” आपसे पूछना चाहता हूं कि आपकी आंखों के सामने 110 साल की उम्र वाली महिला का कत्ल हुआ और आप उसे देख कर भी जिंदा हैं तो कैसे ? …न मैं शांत बैठूंगा, न आपको बैठने दूंगा।… मैं पांव पैदल सारी जगहों पर भटकूंगा और हर कंकाल से पूछूंगा कि उसके साथ क्या हुआ… मेरे भीतर ऐसी आग धधक रही है जो मुझे तब तक शांति से बैठने नहीं देगी जब तक मैं इस पागलपन का कोई इलाज न खोज लूं। और अगर मुझे यह पता चला कि मेरे साथी मुझे धोखा दे रहे हैं तो मैं उबल ही पडूंगा और आंधी-तूफान कुछ भी हो, मैं नंगे पांव चलता ही जाऊंगा…”

बस इससे ज़्यादा अब मैं नहीं लिख पाऊंगा पर वो वक़्त तो गुज़र गया पर आज भी उन घटनाओं को किताबो में पढ़ता हूँ तो आंसू आज भी नही रुकते।

मत्स्य पालकों के बीच डॉल्फिन के बचाव हेतु जागरूकता कार्यक्रम का हुआ आयोजन

पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार के द्वारा दिनांक 6 अक्टूबर को’ एन आई टी घाट, पटना में मत्स्य पालकों के बीच डॉल्फिन के बचाव हेतु जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। जिसका उद्घाटन ‘‘श्री नीरज कुमार सिंह’’, माननीय मंत्री, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार सरकार के कर-कमलों द्वारा किया गया। उक्त अवसर पर श्री दीपक कुमार सिंह, प्रधान सचिव, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग, बिहार सरकार उपस्थित रहे।

जागरूकता कार्यक्रम के साथ , मत्स्य पालकों के बच्चों के बीच खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन भी किया गया। साथ ही उनके प्रोत्साहन हेतु, उनके बीच पुरुस्कार भी वितरित किया गया।

माननीय मंत्री ने अपने संबोधन में लोगों से डॉल्फिन के बचाने को अपील की, उन्होंने कहा कि हमारी और आपकी आपसी समझ और समन्वय से ही इनका बचाव करना सुलभ होगा। आपको बिहार सरकार,इस कार्य के लिए प्रोत्साहित करती रहेगी। साथ ही आपके जीवकोपार्जन में किसी प्रकार की दिक्कत न हो उसका भी उपाय हम करेंगे।

आप सबों से मेरी यह गुजारिश है कि कृपया इसके बचाव में जो बन पड़े कीजिए, साथ ही लोगों को भी अपने से जोड़ जागरूक कीजिए। आज आपके बच्चों ने अपनी बेहतर कला का प्रदर्शन किया और डॉल्फिन को बचाने में अपनी समझ को दर्शाया, यह अत्यंत ही सराहनीय है। मैं आप सभी का आभारी हूं, जो आज आप कर रहे हैं, वह हमारा बेहतर कल में दिखेगा।

प्रधान सचिव ने लोगों से गंगा को स्वच्छ रखने और इसे प्रदूषित न करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह धरती सभी की है जिस पर मानवों के साथ अन्य सभी जीव जंतुओं और जलीय जीवों का अधिकार है। कृपया इसे बचाया जाए, जिससे जैव विवधता और पारिस्थिति तंत्र संतुलित रहे। मुख्य वन्य प्राणी प्रतिपालक और डॉल्फिन मैन प्रोफेसर आर के सिन्हा ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर श्री आशुतोष, प्रधान मुख्य वन संरक्षक (Hoff) बिहार, श्री प्रभात कुमार गुप्ता, श्री गोपाल शर्मा, अंतरिम प्रभारी, राष्ट्रीय डाॅल्फिन शोध केन्द्र, पटना के साथ श्री शशिकांत कुमार DFO, Park पटना, DFO Patna उपस्थित रहे।

बिहार के 40 अस्पतालों में दीदी की रसोई से रोगी तक पहुंच रहा खाना

पटना। स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने बताया कि अस्पतालों में दीदी की रसोई खुलने से मरीजों को बेहतर इलाज के साथ-साथ स्वादिष्ट और पौष्टिक व्यंजन भी मिल रहा है। दीदी की रसोई से मरीजों के अलावे परिजनों को भी काफी सहूलियत हो रही है। रसोई में जीविका दीदियों द्वारा बना शुद्ध भोजन मरीजों को दिया जाता है।

दीदी की रसोई में मरीजों को मुफ्त तथा उनके परिजनों को उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण भोजन दिया जा रहा है। राज्य के 40 अस्पतालों में दीदी की रसोई से मरीजों और उनके परिजनों तक खाना परोसा जा रहा है, जहां स्वच्छता और शुद्धता का पूरा खयाल रखा जाता है।

श्री पांडेय ने कहा कि पहले चरण में पूरे राज्य में 74 दीदी की रसोई खोले जाने हैं। इसमें जिला और अनुमंडलीय अस्पताल मिलाकर अभी तक 40 जगहों पर दीदी की रसोई चालू है। बीते अगस्त को राज्य के 28 अस्पतालों में इसकी शुरुआत की गई है।

राज्य में अभी अरवल, पूर्वी चंपारण, बेगूसराय, कैमूर, खगड़िया, भोजपुर, नालंदा, भागलपुर, जमुई, सुपौल, बांका, कटिहार, नवादा, अररिया, मुजफ्फरपुर, लखीसराय, किसनगंज, मधेपुरा, औरंगाबाद, समस्तीपुर, पटना, मुंगेर, मधुबनी, गोपालगंज, गया, दरभंगा, वैशाली, बक्सर, शेखपुरा, पूर्णिया, शिवहर और सहरसा में दीदी की रसोई संचालित हो रहे हैं। इसमें जिला अस्पताल और अनुमंडलीय अस्पताल दोनों शामिल है।

श्री पांडेय ने बताया कि राज्य के मरीजों को बेहतर और त्वरित स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य विभाग का सतत प्रयास जारी है। अस्पतालों में दीदी की रसोई शुरू हो जाने से मरीजों के परिजनों को भी काफी राहत मिली है। नाश्ता एवं भोजन के लिए अस्पताल में भर्ती मरीजों के परिजनों को नाश्ता एवं भोजन के लिए कहीं दूर नहीं जाना पड़ता है। अब अस्पताल में ही उन्हें विभिन्न वेरायटी का भोजन सस्ते दर पर उपलब्ध हो जाता है, जिससे संतुष्टि भी मिलती है और पैसे की भी बचत होती है।

पुलिस की यातना से आहत मां बेटी ने की आत्महत्या पुलिस मुख्यालय ने दिया जांच का आदेश

छपरा के मढ़ौरा से एक ऐसी खबर आयी है जहां अपराधी भाई के कृत्य और पुलिस की गुंडागर्दी से आहत होकर मां बेटी ने सुसाइड कर लिया है, हुआ ऐसा है कि सोमवार को मढ़ौरा के इसरौली पेट्रोल पंप के पास बाइक सवार पांच अपराधियों ने हथियार के बल पर कैशवैन से 40 लाख रुपए लूट लिया लूट की घटना के बाद सारण पुलिस को एक सीसीटीवी फुटेज मिला था जिसके आधार पर घटना के बाद भाग रहे अपराधियों के मोटरसाइकिल का नम्बर पता चल गया था उसी आधार पर पुलिस ने भेल्दी थाना क्षेत्र के खारदरा में अपराधी सोनू पांडेय के घर छापा मारा जहां से पुलिस को लूट की घटना में उपयोग किये गये मोटरसाइकिल के साथ साथ से छह लाख रुपए और एक देशी पिस्टल मिला हलाकि सोनू घर पर मौजूद नहीं था लेकिन अवैध हथियार मिलने की वजह से पुलिस सोनू के पिता चंदेश्वर पांडेय को गिरफ्तार कर लिया।

गिरफ्तारी के दौरान पुलिस ने सोनू के पिता के साथ अमानवीय व्यवाहर किया उससे आहत होकर सोनू की मां और बहन ने आत्महत्या कर लिया है ।

पुलिस सोनू के बहन का एक सुसाइड नोट बरामद किया है सुसाइड नोट में भाई के कुकृत्य के कारण जिस तरीके से पुलिस हमलोगों के सामने पापा को जलील किया है ऐसी स्थिति में अब जिंदा रहने का कोई मतलब नहीं रहा गया है।

मेरे मां-बापा हमेशा से चाहते थे कि उनका बेटा और बेटी भविष्य में कुछ अच्छा काम करें लेकिन अफसोस उनका यह सपना पूरा नहीं हो सका। हम लोग गरीब जरूर हैं लेकिन गलत नहीं है और मेरे पापा हमेशा से हम सबको एक ही बात समझाते हैं कि बेटा मर जाना मगर कभी गलती ना करना। मेरे पापा बहुत बदनसीब हैं मेरे पापा का सपना पूरा ना हो सका।

रुपा ने सुसाइड नोट में आगे लिखा है कि मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि मेरे पापा को गलत ना समझें। प्लीज प्लीज प्लीज मेरे पापा खुद हमेशा सोनू से इस सब के कारण नाराज रहते थे। इसमें उसका भी कोई कसूर नहीं है जब वह सही था तब उसे विनोद पांडे की बेटी ने अपने प्यार के जाल में फंसा लिया और उसे अपने साथ भागने को मजबूर कर दिया। तब सोनू उस समय तो चला गया लेकिन उसके बाद हम लोगों की इज्जत का कचरा किया। विनोद के पूरे परिवार के कारण वह और बिगड़ गया। पापा हम आप की यह हालत नहीं देख सकते। हम कभी नहीं सोचे थे कि कोई आप पर ऐसे हाथ उठाए पर ऐसा हुआ। पुलिस किसी का दर्द नहीं समझती।

इस बीच बिहार न्यूज पोस्ट द्वारा सवाल खड़े किये जाने पर एडीजी जितेन्द्र गंगवार ने कहा कि इस मामले की अलग से जांच कराई जायेंगी और दोषी पुलिस पदाधिकारियों पर एफआईआर दर्ज किया जायेंगा ।