भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) ने इस साल मानसून के दौरान सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई है। जून से सितंबर तक चलने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून देश में औसत से थोड़ा कमजोर रह सकता है। आईएमडी के महानिदेशक डॉ. एम. महापात्र के अनुसार, इस साल कुल बारिश लगभग 80 सेंटीमीटर रहने का अनुमान है, जबकि 1971 से 2020 तक का दीर्घकालिक औसत (एलपीए) 87 सेंटीमीटर है।
अल नीनो के कारण कम बारिश की संभावना है, जो एक प्राकृतिक जलवायु परिवर्तन है जो प्रशांत महासागर में होता है। इसके कारण बारिश में गिरावट आ सकती है। आईएमडी के अनुसार, जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि जून के आसपास अल नीनो की स्थिति बनने की संभावना है। फिलहाल भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में कमजोर ला नीना की स्थिति धीरे-धीरे खत्म होकर सामान्य जलवायु स्थिति में बदल रही है।
इसके अलावा, पॉजिटिव इंडियन ओशन डाइपोल (पीआईओडी) की स्थिति भी मानसून पर प्रभाव डाल सकती है। पीआईओडी का अर्थ है हिंद महासागर के पश्चिमी भाग (अफ्रीकी तट) का सामान्य से अधिक गर्म होना और पूर्वी भाग (इंडोनेशिया) का ठंडा होना। इस स्थिति में हवाएं पूर्व से पश्चिम (बंगाल की खाड़ी से अरब सागर) की ओर चलती हैं, जिससे हिंद महासागर में समुद्र के तापमान में बदलाव हो सकता है और मौसम पर असर पड़ सकता है।
डॉ. महापात्र ने कहा कि पॉजिटिव आईओडी से अधिक बारिश होती है, इसलिए हमें उम्मीद है कि यह मानसून के दूसरे चरण में अल नीनो के प्रभाव को कम करने में सहायक होगा। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले साल की तुलना में, उत्तरी गोलार्द्ध में पिछले तीन महीनों (जनवरी से मार्च) के दौरान हिमपात का क्षेत्र सामान्य से थोड़ा कम रहा। जब उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी और वसंत के दौरान बर्फ ज्यादा गिरता है, तो उसके बाद भारत में मानसून की बारिश आमतौर पर कम हो सकती है, और अगर बर्फ कम हो तो बारिश अधिक होने की संभावना रहती है।
आईएमडी मानसून की बारिश का पहला पूर्वानुमान अप्रैल के मध्य में जारी करता है और मई के अंतिम सप्ताह में अपडेट पूर्वानुमान जारी करता है।
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