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FSSAI के चेतावनी लेबल नियम पर घमासान, पोषक तत्वों की अस्पष्टता को लेकर उद्योग और उपभोक्ता समूह आमने-सामने

भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के नए चेतावनी लेबल नियमों को लेकर उद्योग विशेषज्ञों में तीखा विमर्श चल रहा है। प्रस्तावित नियमों के अनुसार, उच्च वसा, शर्करा, नमक (HFSS) वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थों पर लाल षट्भुज आकार का चेतावनी लेबल लगाना अनिवार्य किया जाएगा।
इस पहल का उद्देश्य उपभोक्ताओं को अस्वस्थ खाद्य पदार्थों से बचाना और पोषण संबंधी जागरूकता बढ़ाना था, परंतु विशेषज्ञों का मानना है कि लेबलिंग मानदंडों में मौजूद खामियों के कारण कई अस्वस्थ उत्पाद इस जांच से बाहर रह सकते हैं।एफएसएसएआई ने पहले चरण में 1,300 से अधिक पैकेज्ड खाद्य पदार्थों को लक्षित किया था, जिसमें शर्करा, नमक और वसा की सीमाएँ निर्धारित की गईं। अब प्रस्तावित द्वितीय चरण में इन सीमाओं को और सख्त करने और चेतावनी लेबल का आकार 30 mm × 30 mm से बढ़ाकर 45 mm × 45 mm करने की योजना है। साथ ही, “जोड़ा गया” पोषक तत्व जैसे शुगर, नमक और वसा की गणना को मौजूदा मानकों से अलग कर नई सीमा निर्धारित करने की बात की गई है।

पिछले साल के डेटा के अनुसार, भारत में 30 % से अधिक आयु वर्ग के लोग अत्यधिक शर्करा और नमक वाले खाद्य पदार्थों की अधिकतम मात्रा से अधिक सेवन कर रहे हैं। इस संदर्भ में, एफएसएसएआई के विशेषज्ञों ने बताया कि चेतावनी लेबल के बिना उपभोक्ता इन जोखिमों को पहचान नहीं पाते। हालांकि, प्रस्तावित मानदंडों में “जोड़‑जोड़” पोषक तत्वों की परिभाषा अस्पष्ट रहने के कारण, कई निर्माताओं को लेबल से बचने की संभावनाएँ मिल सकती हैं।

न्यायिक विशेषज्ञों का कहना है कि लेबलिंग मानक में “अधिकतम सीमा” और “औसत सीमा” के बीच का अंतर स्पष्ट नहीं किया गया है, जिससे कंपनियों को अपने उत्पादों को पुनः वर्गीकृत करने का अवसर मिल सकता है। इस पर, कई सार्वजनिक स्वास्थ्य संगठनों ने सुझाव दिया कि लेबल के आकार और रंग को और अधिक स्पष्ट किया जाए, ताकि उपभोक्ताओं के लिए इसे पढ़ना आसान हो।

उद्योग प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि मौजूदा लेबलिंग नियमों में पहले ही कई खाद्य पदार्थों को हाई‑फ़ैट, हाई‑शुगर और हाई‑सॉल्ट के रूप में वर्गीकृत किया जा चुका है, और अतिरिक्त लेबल से उत्पादन लागत में वृद्धि होगी। उन्होंने यह भी कहा कि छोटे और मध्यम उद्यमों को विशेषकर पैकेजिंग के खर्च में भारी बोझ उठाना पड़ेगा, जिससे बाजार में कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।

वहीं, उपभोक्ता अधिकार समूह ने कहा कि लेबल का आकार और स्पष्टता ही इस नीति की सफलता की कुंजी होगी। उन्होंने कहा कि यदि लेबल छोटा और रंगीन नहीं रहेगा तो उपभोक्ता इसे नजरअंदाज कर सकते हैं। साथ ही, उन्होंने यह भी उजागर किया कि कई खाद्य कंपनियां “अधिकतम सीमा” के भीतर अपने उत्पादों में शुगर और नमक को घटा कर लेबल से बचने की कोशिश कर सकती हैं।

फूड प्रोसेसिंग असोसिएशन के प्रवक्ता ने कहा कि वर्तमान प्रस्ताव में “जोड़‑जोड़” पोषक तत्वों की गणना में अस्पष्टता है, जिससे कंपनियों को अपने फ़ॉर्मुलेशन को दोबारा जांचना पड़ेगा। उन्होंने यह भी बताया कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पहले से ही अपनी उत्पादन लाइनों को नया लेबल अपनाने के लिए तैयार किया है, परन्तु छोटे उद्यमों को इस बदलाव के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया है।

संबंधित राज्य सरकारों ने इस नीति के कार्यान्वयन में अपनी भूमिका स्पष्ट करते हुए कहा कि वे लेबलिंग मानकों को स्थानीय स्तर पर भी लागू करेंगे। उन्होंने यह भी बताया कि लेबल की निगरानी के लिए विशेष निरीक्षण टीमों का गठन किया जाएगा, जिससे उत्पादन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की ढील नहीं होगी।

वित्त मंत्रालय ने इस प्रस्ताव के आर्थिक प्रभाव को लेकर संकेत दिया कि यदि लेबलिंग के कारण उपभोक्ताओं के खाने की आदतें बदलती हैं, तो स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च में कमी आने की संभावना है। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक रूप से यह नीति राष्ट्रीय स्वास्थ्य बजट को स्थिर करने में मददगार हो सकती है।

विपरीत रूप से, स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि यदि लेबलिंग मानकों में खामियाँ बनी रहती हैं तो अस्वस्थ खाद्य पदार्थों की

Updated: August 29, 2026

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