स्टालिन ने कहा कि पट्टीनापक्कम के समुद्री किनारे पर स्थित इस जमीन पर निर्माण से स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर गहरा असर पड़ेगा। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि इस प्रस्तावित परिसर की लागत और पर्यावरणीय प्रभाव अभी तक स्पष्ट नहीं हैं, जिससे जनता में असंतोष बढ़ रहा है।
पिछले कुछ महीनों में सरकार ने इस परियोजना को तेज करने के लिए कई प्रशासनिक आदेश जारी किए थे, जिसमें भूमि अधिग्रहण और निर्माण अनुबंधों को अंतिम रूप दिया गया था। वहीं, पर्यावरण संरक्षण संगठनों ने इस योजना की वैधता पर सवाल उठाते हुए कई रिपोर्टें प्रकाशित की हैं, जिनमें बताया गया है कि समुद्र तट की प्राकृतिक संरचना को नुकसान पहुँच सकता है।
प्रस्तावित सचिवालय का क्षेत्रफल लगभग 150 एकड़ का है, जिसमें प्रमुख सरकारी विभागों के कार्यालय और एक बड़ा सभा कक्ष शामिल होगा। सरकारी स्रोतों के अनुसार, इस परियोजना का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों को एक ही स्थान पर केंद्रीकृत करना और राज्य की विकास गति को तेज करना है।
विपक्षी दलों ने इस योजना को “राजनीतिक दिखावा” कहकर खारिज किया है और इसे जनता के खर्च पर निजी लाभ के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह की बड़ी निर्माण परियोजना के लिए जनता की राय को अनदेखा करना लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के विरुद्ध है।
स्थानीय मछुआरों के संघ ने भी इस निर्णय के खिलाफ प्रदर्शन करने की चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि निर्माण कार्य जारी रहता है तो उनके पारम्परिक मत्स्य पकड़ने के अधिकार खतरे में पड़ेंगे, जिससे उनकी आय में भारी कमी आएगी। संघ के प्रमुख ने बताया कि उन्होंने पहले भी कई बार सरकार से संवाद किया, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं मिला।
राज्य सरकार के प्रवक्ता ने स्टालिन के बयानों को “असमझदारीपूर्ण” कहा और कहा कि परियोजना पहले ही कई नियामक मंजूरियों से गुजर चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने सभी हितधारकों को सुनने के लिए सार्वजनिक सुनवाई का आयोजन किया है, लेकिन अभी तक कोई वैध आपत्ति नहीं उठी है।
विपक्षी नेता ए. के. स्टालिन ने इस सार्वजनिक सुनवाई को “झूठी प्रक्रिया” कहा और कहा कि यह केवल सरकार के फैसले को वैध ठहराने के लिए किया जा रहा है। उन्होंने आगे कहा कि यदि सरकार इस परियोजना को आगे बढ़ाएगी तो व्यापक सामाजिक उथल-पुथल और आर्थिक नुकसान हो सकते हैं।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अभी तक इस परियोजना के लिए कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं दी है, परन्तु कुछ वरिष्ठ अधिकारीयों ने बताया कि इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स में पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन अनिवार्य होता है। उन्होंने कहा कि अगर अध्ययन में कोई गंभीर खतरा सामने आता है तो परियोजना को पुनर्विचार करना पड़ेगा।
राज्य के आर्थिक विश्लेषकों ने कहा कि इस सचिवालय के निर्माण से दीर्घकालिक रूप से सरकारी खर्च में वृद्धि होगी और यह वित्तीय तंगियों को और बढ़ा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि यह परियोजना पर्यावरणीय क्षति के कारण रुक जाती है तो राज्य की प्रतिष्ठा को भी नुकसान पहुंच सकता है।
सामाजिक संगठनों ने इस मुद्दे को नागरिक अधिकारों की लड़ाई के रूप में देखा है और कहा कि जनता को अपनी आवाज़ उठाने का अधिकार है। कई एनजीओ ने इस पर रिपोर्ट जारी करके कहा कि समुद्र तट के पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाने वाले किसी भी प्रोजेक्ट को रोकना आवश्यक है।
राजनीतिक टिप्पणीकारों ने बताया कि इस विवाद से राज्य सरकार की लोकप्रियता पर असर पड़ सकता है, विशेषकर चुनावी माहौल में। उन्होंने कहा कि अगर सरकार इस विरोध को दबा देती है तो आगामी विधानसभा चुनावों में इसे गंभीर राजनीतिक प्रतिकूलता का सामना करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की बड़े पैमाने की निर्माण परियोजनाओं में सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं का संतुलित विचार आवश्यक है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार जनता की चिंता को अनदेखा करती है तो दीर्घकालिक विकास में बाधा उत्पन्न होगी, जबकि सहयोगात्मक समाधान से सभी पक्षों को लाभ
Opposition leader A.K. Stalin warned that the proposed 150‑acre secretariat on Pattinam’s coastline could devastate local fishermen’s livelihoods and spark swift protests, urging the government to scrap the plan. Environmental groups and analysts echo concerns over unclear costs, potential ecological damage and fiscal strain, warning the project could backfire politically and financially.
The project seeks to centralize multiple government departments in a single complex, aiming to streamline administrative functions. Its location on the coastal zone raises concerns about possible effects on local fishing livelihoods and the surrounding environment.