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दलित महिला पंचायत अध्यक्ष की हत्या की कोशिश मामले में छह दोषियों की उम्रकैद बरकरार: हाईकोर्ट

मद्रास हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Madras High Court ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक दलित (अनुसूचित जाति) महिला पंचायत अध्यक्ष की हत्या की कोशिश के मामले में दोषी ठहराए गए छह लोगों की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने दोषियों की अपील खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत का फैसला सही और न्यायसंगत था।

यह मामला तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले के एक गांव से जुड़ा है, जहां पंचायत अध्यक्ष पर वर्ष 2011 में जानलेवा हमला किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला न केवल हिंसा का बल्कि जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय का भी उदाहरण है।


क्या है पूरा मामला

घटना वर्ष 13 जून 2011 की है। उस समय पी. कृष्णवेनी नाम की महिला थलैयुथु गांव की पंचायत अध्यक्ष थीं और वे अनुसूचित जाति समुदाय से आती थीं।

उन्होंने गांव में महिलाओं के लिए सार्वजनिक शौचालय बनवाने का प्रस्ताव रखा था। पंचायत के पास धन की कमी होने के कारण यह प्रस्ताव पहले खारिज हो गया। इसके बाद कृष्णवेनी ने एक निजी सीमेंट कंपनी से मदद लेकर शौचालय बनवाने की पहल की

लेकिन जिस स्थान पर शौचालय बनने वाला था, वह एक आरोपी के घर के पास था। इस कारण वह व्यक्ति इस निर्माण का विरोध करने लगा। बाद में पंचायत ने सरकारी जमीन पर शौचालय बनाने का प्रस्ताव पास किया, जिससे विवाद और बढ़ गया।


ऑटो से घर लौटते समय हुआ हमला

13 जून 2011 को जब कृष्णवेनी पंचायत कार्यालय से ऑटो रिक्शा में घर लौट रही थीं, तभी कुछ लोगों ने उन पर हमला कर दिया।

हमलावरों ने धारदार हथियारों से हमला किया जिससे उन्हें चेहरे, कंधे और गर्दन पर गंभीर चोटें आईं। इस हमले में:

  • उनके दाहिने कान का हिस्सा कट गया
  • दो उंगलियां भी कट गईं
  • शरीर पर कई गहरे घाव आए

काफी समय तक अस्पताल में इलाज के बाद वे बच सकीं।


पुलिस जांच और आरोप

हमले के बाद थलैयुथु पुलिस ने कुल 9 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। आरोपियों पर कई गंभीर धाराओं में मुकदमा चला, जिनमें शामिल थे:

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराएं
  • SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम
  • तमिलनाडु महिलाओं के उत्पीड़न निषेध अधिनियम

जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में चार्जशीट दाखिल की। मुकदमे के दौरान एक आरोपी नटराजन की मौत हो गई।


ट्रायल कोर्ट का फैसला (2024)

मामले की सुनवाई तिरुनेलवेली की II अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत (PCR कोर्ट) में हुई।

2024 में अदालत ने छह आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। दोषी ठहराए गए लोगों के नाम हैं:

  • सुब्बु उर्फ सुब्रमणियन
  • सुल्तान माइडीन
  • कार्तिक
  • जैकब
  • प्रवीण राज
  • विजयाराममूर्ति

वहीं दो अन्य आरोपियों रामकृष्णन और संथानमारी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।


हाईकोर्ट में अपील

सजा के खिलाफ सभी छह दोषियों ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की।

इस अपील की सुनवाई जस्टिस जी.के. इलंथिरैयन और जस्टिस आर. पूर्निमा की डिवीजन बेंच ने की।

अदालत ने मामले के सभी तथ्यों और सबूतों का अध्ययन करने के बाद कहा कि निचली अदालत का फैसला सही था और दोषियों की सजा बरकरार रखी जानी चाहिए।


हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणियां

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह मामला देश में सामाजिक वास्तविकताओं को उजागर करता है।

न्यायाधीशों ने कहा कि:

  • पीड़िता एक महिला होने के साथ-साथ अनुसूचित जाति समुदाय से थीं
  • गांव में उनका पंचायत अध्यक्ष चुना जाना कुछ लोगों को स्वीकार नहीं था
  • इसी कारण उन पर हमला किया गया

अदालत ने कहा कि यह घटना दलित समुदाय के खिलाफ सामाजिक पूर्वाग्रह और हिंसा का उदाहरण है।


SC/ST एक्ट के तहत कड़ी सजा

हाईकोर्ट ने माना कि आरोपियों ने पीड़िता पर हमला उनकी जाति की वजह से किया

इसलिए अदालत ने कहा कि यह अपराध SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(2)(v) के तहत गंभीर अपराध है।

अदालत के अनुसार, इस तरह के मामलों में कड़ी सजा देना जरूरी है ताकि समाज में ऐसा अपराध करने वालों को स्पष्ट संदेश मिल सके।


सामाजिक न्याय के संदर्भ में अहम फैसला

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह:

  • दलितों के खिलाफ हिंसा के मामलों में न्यायपालिका की सख्ती दिखाता है
  • स्थानीय लोकतंत्र में चुनी हुई महिला प्रतिनिधियों की सुरक्षा का मुद्दा उठाता है
  • पंचायत स्तर पर सामाजिक भेदभाव की वास्तविकता को सामने लाता है

भारत में पंचायत व्यवस्था में महिलाओं और अनुसूचित जाति समुदाय के लिए आरक्षण होने के बावजूद कई जगह सामाजिक विरोध और हिंसा की घटनाएं सामने आती रहती हैं


स्थानीय शासन और महिलाओं की सुरक्षा का सवाल

ग्राम पंचायतें भारत की स्थानीय स्वशासन व्यवस्था की सबसे निचली इकाई हैं।

इन संस्थाओं में महिलाओं और दलित समुदाय के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए संविधान में संशोधन किए गए थे। लेकिन कई मामलों में:

  • महिला प्रतिनिधियों को काम करने में बाधाएं आती हैं
  • जातिगत विरोध सामने आता है
  • हिंसा या धमकी की घटनाएं भी होती हैं

इस मामले में भी अदालत ने माना कि हमला सिर्फ व्यक्तिगत विवाद नहीं बल्कि सामाजिक और जातिगत कारणों से प्रेरित था

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