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पंचकूला प्लॉट मामले में बड़ी राहत: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भूपिंदर सिंह हुड्डा और एजेएल को दी क्लीन चिट, सभी आरोप रद्द

हरियाणा की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे पंचकूला प्लॉट पुनः आवंटन मामले में बड़ा कानूनी मोड़ आया है। Punjab and Haryana High Court ने पूर्व हरियाणा मुख्यमंत्री Bhupinder Singh Hooda और Associated Journals Limited (एजेएल) को सभी आपराधिक आरोपों से मुक्त कर दिया है। अदालत ने न केवल ट्रायल कोर्ट द्वारा तय किए गए आरोपों को रद्द किया, बल्कि जांच एजेंसी की कार्रवाई पर भी कड़ी टिप्पणी की।

यह फैसला राजनीतिक और कानूनी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि यह मामला पिछले एक दशक से अधिक समय से विवादों में रहा है।

क्या है पूरा मामला?

पंचकूला के सेक्टर-6 में स्थित संस्थागत प्लॉट नंबर C-17 को मूल रूप से 1982 में एजेएल को आवंटित किया गया था। एजेएल ऐतिहासिक रूप से ‘नेशनल हेराल्ड’ जैसे प्रकाशनों से जुड़ी कंपनी रही है। उस समय प्लॉट का उद्देश्य समाचार पत्र प्रकाशन से संबंधित गतिविधियों के लिए भवन निर्माण था।

निर्धारित समयसीमा में निर्माण कार्य पूरा न होने के कारण 1992 में तत्कालीन हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HUDA) ने प्लॉट का आवंटन रद्द कर दिया। इसके बाद एजेएल ने अपील और पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं, लेकिन लंबे समय तक कोई समाधान नहीं निकला।

2005 में पुनः आवंटन और विवाद की शुरुआत

2005 में जब भूपिंदर सिंह हुड्डा हरियाणा के मुख्यमंत्री बने, तब उन्होंने एजेएल को वही प्लॉट पुनः आवंटित करने का आदेश दिया। यह पुनः आवंटन मूल दर (1982 की कीमत) पर ब्याज सहित किया गया। एजेएल ने आवश्यक शुल्क और विस्तार शुल्क जमा कर निर्माण कार्य पूरा किया और बाद में उसे ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट भी मिल गया।

यहीं से विवाद शुरू हुआ। आरोप लगाए गए कि प्लॉट का पुनः आवंटन मौजूदा बाजार दरों के बजाय पुरानी दरों पर किया गया, जिससे राज्य सरकार को कथित वित्तीय नुकसान हुआ।

सरकार बदलने के बाद जांच

2014 में हरियाणा में सरकार बदलने के बाद इस मामले की विजिलेंस जांच शुरू हुई। बाद में मामला Central Bureau of Investigation (CBI) को सौंप दिया गया। CBI ने 2018 में हुड्डा, एजेएल और अन्य के खिलाफ आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत आरोपपत्र दाखिल किया।

CBI का आरोप था कि मुख्यमंत्री के रूप में हुड्डा ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए एजेएल को अनुचित लाभ पहुंचाया।

ट्रायल कोर्ट में आरोप तय

विशेष CBI अदालत ने 2021 में आरोप तय किए। इसके खिलाफ हुड्डा और एजेएल ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप रद्द करने की मांग की। उनका तर्क था कि यह प्रशासनिक निर्णय था, न कि आपराधिक कृत्य।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

फरवरी 2026 में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा:

  • अभियोजन पक्ष कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया जिससे आपराधिक साजिश साबित हो।
  • सरकारी खजाने को वास्तविक नुकसान हुआ, इसका प्रमाण नहीं दिया गया।
  • पुनः आवंटन का आदेश वैध प्रशासनिक निर्णय था, जिसे कभी रद्द नहीं किया गया।
  • भ्रष्टाचार के आरोपों के लिए आवश्यक तत्वों की कमी है।

अदालत ने कहा कि इस मामले में मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।

अदालत की CBI पर टिप्पणी

हाईकोर्ट ने जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों और परिस्थितियों से प्रथम दृष्टया आपराधिक मामला नहीं बनता। इस प्रकार, आरोप तय करने का आदेश कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।

राजनीतिक असर

यह फैसला भूपिंदर सिंह हुड्डा के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। विपक्ष के नेता के रूप में उनकी राजनीतिक छवि पर इस मामले का प्रभाव रहा था। हाईकोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस पार्टी ने इसे “सत्य की जीत” बताया।

दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल की ओर से अभी विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला हरियाणा की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर सकता है।

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